शब्दालाप

भावनाओं पर सारे शब्द न्योछावर हैं !

– जितनी भावनाएं हैं उतने शब्द नहीं !
– जैसे ही हम किसी ख्याल की ओर बढ़ते हैं शब्दों को पता चल जाता है !
– शब्द जैसे भी हों अक्षर को कोई दोष नहीं देता !
– शब्द को बचाने के लिए भावनाओं से लड़ना पड़ता है !
– मुंह में बन कर कान तक जाते जाते शब्द ह्रदय को छु आते हैं !
– जब अक्षर मंडराने लगे अक्षरों पर समझो मन में शब्द उतरने लगे हैं !
– शब्द अपना अर्थ ले के घूमते हैं !
– तुकबंदी में शब्दों की रिश्तेदारी नहीं देखी जाती !
– शब्द का अर्थ उसके आकार से नहीं लगता !
– किसी शब्द के लायक बनने में कई वाक्य लग सकते हैं !
– ‘दो शब्द’ को चार शब्द बनते देर नहीं लगता !
– शब्द बहुरुपिया होते हैं ! विचारों में ऐसे समा जाते हैं जैसे लगता है शब्द ही विचार हैं !
– शब्द के तीन यार … कागज़ कलम और विचार !
– दिल से निकली बातों के शब्द अलग ही होते हैं !
– शब्द भावनाओं के घोसले हैं !
– शब्द हमारी इन्द्रियों की सवारी करते हैं !
– शब्द भाव जगाते हैं और हम उन्हें बढ़ा देते हैं !
– आप जो चाहे लिखें… जो चाहें बोलें…शब्दों के भण्डार गृह की चाभी सबके पास है !
– शब्द खर्चीले होते हैं ! कभी कभी बेशकीमती हो जाते हैं तो कभी कभी बहुत महंगे पड़ते हैं !
– पूछने से ज्यादा शब्द बताने में क्यों खर्च होते हैं ?
– उगला शब्द निगला नहीं जाता !
– शब्द बहुत काम आते हैं !
– शब्द के ज़ख्म शब्द ही भरते हैं !
– और राग … और रंग … और शब्द चाहिए !
– ढाई आखर में सिमटा पर पूरी दुनिया मे फैला, मैं एक शब्द से मिला !
– भावनाओं में डूबा कर भी शब्द सूखे रहते हैं !
– ‘शब्द’ के पास कम और ‘चित्र’ के पास अब ज्यादा काम है …

– ‘थैंक यू’ शब्द को हम कई भावनाओं में ठूंस देते है !

जितने शब्द उतनी अक्ल!

सुन ओ भाई शब्द, कोमा से निकलो तो सीधे फुल स्टॉप पर रुकना ! हैश डैश कुछ नहीं …

मेरी हर सच की शुरुआत शब्द से होती है, शब्द मैं सदा तुम्हारा हूँ ! मेरे बहादुर निडर शब्द मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ ! शब्दों ने हर हाल में मेरा साथ निभाया ! मेरी सभी भावनाओं को अपने अंदर से गुजरने दिया ! मेरी बेचैनी को समझा और कभी उन्हें तोड़ने मरोड़ने की कोशिश नहीं की ! मेरी कटुता में, मेरी नाराजगी में, मेरे प्रेम में, मेरे कमज़ोर क्षणों में, मेरे संघर्ष में, मेरी आपत्तियों में, मेरी सहमति असहमति में, मेरे मौन में भी शब्दों ने मौन रह कर मेरा साथ नहीं छोड़ा ! मेरे शब्द बहुत वफ़ादार हैं ! उन्होंने मेरा गाली में भी साथ दिया है …

शिर्डी डायरी

शिर्डी का रास्ता सहृदय दोस्तों की संगत से भी गुजरता है …

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बाग़ का एक – एक पौधा माली का बच्चा होता है ! सबका ‘माली’ एक है !

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मस्जिद माई की आग हर अन्धकार को भस्म कर देती है ! फ़क़ीर की धुनी की धूम है …

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माली के हाथ ! मिटटी से लिपटी हाथों की उँगलियों में न जाने कितने पौधों के प्राण बसते हैं ! पोर पोर में खुशबु ! कभी बीज कभी जड़ कभी सूखी मिटटी कभी पानी कभी कोई पत्ता कभी कोई काँटा कभी कोई कोंपल कोई पल्लव … हमेशा जीवन ! वो फ़क़ीर भी है ! मुठ्ठी भर राख के लिए अपने पास बुलाता है ! उसके खुरदुरे हाथ और आँखों की चमक ले के चलती है दुनिया की रौशनी और सब राह … बस एक बार वो हाथ चूमने मिल जाए … क्या पता आज ? उसने बुलाया तो है …

*

वे हमसे दूर जा ही नहीं सकते … मस्जिद से निकल के फूलों की क्यारियों में या बस लेंडी बाग़ … या बच्चों के साथ किसी पेड़ के नीचे या मेघा से बात करते हुए बस यहीं कहीं आस पास …! बाबा सदा हमारे साथ !

*

सुंदर बाग़ के माली से मिलने जा रहा हूँ ! मुझे वो अपनी सब क्यारियाँ दिखायेगा और हम किसी पेड़ के नीचे बैठ कर बारिश में पौधों को भीगते हुए देखेंगे ! इस मौसम के फूलों के बारे में भी बात होगी !
क्या पता वो सुंदर फूलों का कुछ बीज दे दे या गीली मिट्टी से लिपटा हुआ कोई नन्हा सा पौधा ! उसके लिए क्या ले जाऊं ? वो सबका मालिक है …

'अल्लाह मालिक' - साईं बाबा

‘अल्लाह मालिक’ – साईं बाबा

महालोक – छह / ‘हे बाबा नागार्जुन’

नंगी आँखों से सब उसे घूर रहे थे ! ऐसा कभी नहीं हुआ की उसने तीसरा गिअर लगाये बगैर चौथा गियर लगाया हो पर आज अभी … ? क्या हो गया उसको ? कैबिन में बैठी औरत ने जैसे अपना पल्लू खिंचा उसे देख के बगल में बैठी बुर्के वाली की आँखें उसे तरेर गयीं ! उसने नज़र चुरा ली ! हे भगवान् उसे कैसे याद नहीं रहता कि लेफ्ट साइड का मिरर मालिक ने उतरवा लिया है और गाडी सिर्फ सामने देख कर चलाने बोला है ! ‘किसी पसिन्जर से आँख मिलाने की जरुरत नहीं है’ ! कैसे भूल जाता है की अब वो जिस सीट पर बैठा है उस पर कालिख पुत चुकी है … अब वो प्राइवेट ‘बस का ड्राईवर’ है सात साल की बच्ची का पिता नहीं ! उफ़ ये सुनसान सड़कों की ठंढी आवारा हवा कान के साथ कितना बलात्कार करती है … सामने गियर के उपर हुक से लटकी काँच की चार गुलाबी चूड़ियाँ बस की रफ़्तार के मुताबिक हिल रहीं थीं … अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा आहिस्ते से बोला: ‘हे बाबा नागार्जुन’ !

महालोक – पाँच

फेसबुक पर एक घंटे प्रति लाइक की दर से चलता हुआ विरोध का अवसाद जब महानगर पहुंचा तो यहाँ मधुशाला में बोहनी हो चुकी थी जिस्म का बाज़ार अंगड़ाई ले रहा था और पांच सौ रूपये में भी बलात्कार करने वाले कम पड़ रहे थे ! धन्धे वालियाँ अपने खोटे नसीब को रो रही थी और धंधे के समय बैठ कर टी वी पर ठंढी राजधानी में हुए रेप का न्यूज़ देख कर मर्दों को मिस कॉल दे रही थीं ! साले मर्दों को आज की ‘रेप’ में पता नहीं क्या मजा आ रहा था …! इतने में शायद किसी का मोबाइल बजा तो, पर वो भी किसी लुख्खे का था ‘ग्राहक’ का नहीं … ‘साले मादरचोद मर्द …’ कोई टी वी पर रोती हुई एक लड़की की तरफ देख के बुदबुदाई … सब हंस पड़े … अभी राजधानी – गेट से आन्दोलन  का आँखों देखा हाल आना बचा था …

कोट – अनकोट – मिसकोट उर्फ़ मेरा कोट तेरा खोट

एक / मिसकोट उर्फ़ मेरा कोट तेरा खोट

कम शब्दों का इस्तेमाल मेरी अपनी शब्द साधना है ! बचपन से मिली कम बोलने और कम में बोलने की नसीहत पर जब अमल शुरू किया तो शब्दों की महत्ता समझ में आने लगी ! प्रस्तुत उदहारण शायद एक साधारण  दस्तूर हो पर मेरी अपनी समझ के लिए बहुत मत्वपूर्ण है ! बहुत ही मार्मिक घटना पर मेरी प्रतिक्रिया का जब ‘कोट‘ बना तो मामूली शब्दों के हेर फेर से अर्थ के वज़न में फर्क पड़ा और ‘कोट’ का ‘नाप’ बदल गया ! ‘कट – पेस्ट’ में ‘कोट’ कैसे बदल सकता है ? फिर ‘कोट’ कैसे बना ? शब्द बदलने से ‘कोट’ बदल सकता है और अपना ‘कोट’ किसी और के ‘माप’ का हो सकता है …

मैंने लिखा था – ‘पेशाब के रास्ते ‘मर्द’ पहुंचना कहाँ चाहते हैं ?’ और ‘कट पेस्ट’ से हो गया – ” मर्द पेशाब के रास्ते आखिर जाना कहां चाहता है.”
आज नहीं तो कल ऐसे ही मल्टी – मिडिया अर्थ के अनर्थ का कारण बन सकती है ! हमें शब्दों के प्रति सचेत रहना चाहिए और उसके मामूली परिवर्तन के प्रभाव को कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए !

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कोट – अनकोट – मिसकोट उर्फ़ मेरा कोट तेरा खोट 

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दो / वर्ना हम Vernacular

कुछ दिन पहले अपने राज्य के एक अखबार के लोकल पन्ने पर मेरी फेसबुक प्रोफाइल छापी गयी !

ख़ुशी भी है और छोटी छोटी प्रिंटिंग मिस्टेक से दुःख भी ! ख़ुशी इस बात की ज्यादा है  कि सबने मेरा प्रोफाइल पढ़ा !

पर क्या मेरे फेसबुक पत्रकार मित्र महोदय मेरा प्रोफाइल पढ़ नहीं सके या क्या पता मेरा प्रोफाइल वहां पहुँचते पहुँचते थक गया हो और सब झिलमिल – झिलमिल हो गया हो !

खैर आप खुद देख लें वर्ना हम Vernacular कैसे होंगे ?

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मेरा बर्थडे २२ अगस्त है और ये फेसबुक को भी पता है !

२६ अप्रैल को मेरा STATUS था – ‘आप का मुखड़ा किसी जीवन का अंतरा है 🙂 ‘ ( ‘मंत्रा’ देना मुझे कहाँ आता है ? )

मेरी फिल्म का नाम ‘प्राण जाये पर शान न जाये है ‘

कई फिल्मों का निर्देशन मैंने नहीं किया है …तीन फिल्मे बनाई हैं ! एक फिल्म ‘मुंबई चकाचक’ रिलीज़ नहीं हुई है !

directorji@gmail.com मेरा इ मेल आई डी है URL (Uniform resource locator ) नहीं !

 

महानगर की लोक कथा / महालोक – चार

एक लड़की थी जो अपना नाखून डर के चबा लेती थी ! उसको अँधेरे से डर लगता था ! रौशनी की तलाश में वो मुंबई आ गयी ! मुंबई में बिजली नहीं जाने की वजह से उसका डर कम हो गया और उसके नाखून बढ़ने लगे ! उसके अंदर इतना नाखून था ये उसको भी नहीं पता था ! वो उसे रंगने लगी ! नाखूनों को सजाने लगी ! उसे अपनी उँगलियों से प्यार हो गया और वो प्यारी लगने लगी ! लड़की की नाखून से एक लड़के को प्यार हो गया ! लड़का लड़की को जंगली कहता और उसकी फोटो खींचता ! लड़के ने प्रेम गीत के कई शब्द लड़की के कान में भर दिए और आँखों में प्यार का सपना ! लड़की प्रेम में अंधी और बहरी हो गयी थी ! एक दिन लड़की सपने देख रही थी और लड़का सपने में उसके साथ था ! लड़के ने उसके आँखों पर पट्टी बाँध के खेल खेल में ही उसे अपने आप को ढूँढने छोड़ दिया और खुद सपने से बाहर आ गया ! वो अपने साथ एक नेल कटर ले के आया था ! उसने देखा लड़की सपने में खोयी हुई है ! उसने लड़की के नाखून काट दिए ! लड़की सपने के अंदर थी और असकी आँखें बंधी थी ! जब लड़का बहुत देर तक उसको नहीं मिला तो उसने अँधेरे से डर के आँखों पर से पट्टी हटा ली ! डर से लड़की की पुतली बड़ी हो गयी थी, उसकी आँखें चुंधिया गयीं और वो चौंक के सपने से बाहर आ गयी ! उसने देखा उसके सुंदर रंगीन नाखून वहीँ कटे हुए गिरे पड़े हैं और लड़का गायब है ! लड़का अब न सपने में था न कमरे में ! वो दुःख से रोने लगी ! उसके नाखून वहीँ लाश की तरह पड़े थे ! लड़की को प्यार में धोखा हुआ था ! वो बहुत रोई ! पहले तो आंसूं से उसके कपडे भींग गए ! फिर उसके जूते आंसूं से भर गए ! फर्श सीढ़ी की तरफ झुका था और आंसू सीढ़ी से उतरने लगे ! जंगली लड़की के अंदर एक पहाड़ी झरना था ! जो दुःख में फट के लड़की से बाहर आ गया ! लोग आंसूं की धार से बच – बच के चलने लगे ! मुंबई में लोग पाँव से ज्यादा अपने जूते बचा के चलते हैं ! लड़की रोती रही आंसू बहता रहा लोग आते जाते जूते बचाते रहे ! पता नहीं कैसे पर लड़की की आंसू का स्वाद नमकीन नहीं था ये सबको पता चल गया ! बहुत सारे लोग जंगली लड़की के मीठे आंसू बोतल में भर के घर ले गए और कुछ रास्ते में बेचने लगे ! शहर प्यासा था ! पूरा शहर जंगली लड़की के आंसू पी रहा था ! महानगर में इतना आंसू किसी ने नहीं बहाया था ! धीरे धीरे लड़की की आँखें सूख गयीं ! पर बोतल में पानी अब भी बिक रहा है !

( आदिवासी साहित्य – Adivasi Literature में प्रकाशित  )

'आदिवासी साहित्य - Adivasi Literature' पत्रिका के लिए adivasipatrika@gmail.com मेल पर संपर्क कर सकते हैं !

‘आदिवासी साहित्य – Adivasi Literature’ पत्रिका के लिए adivasipatrika@gmail.com मेल पर संपर्क कर सकते हैं !

‘राम Particles’ – कण कण में कोई है

श्री राम की भक्ति में ये पंक्तियाँ उनकी ही कृपा से सहर्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ !
ये अंश समय समय पर अपने फेसबुक वाल पर भी शेयर करता रहा हूँ !
अलग अलग रूप में ये अंश मन में राम – चिंतन के किसी न किसी क्रम से जुड़ कर आए हैं ! और जीवन की आपा – धापी में लगातार ‘राम क्षण’ आ रहे हैं इसीलिए मैं इनको राम – कृपा मानता हूँ ! श्री राम में मन लगा रहे और  मैं लिखता रहूँ , यही सपना है …

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मेरा मन जैसे श्री रामचंद्र जी का वन …

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पानी में अपनी परछाई देख कर श्रवन ठिठक गया ! लगा पानी पर कुछ लिखा है ! शांत नीले पानी में घड़ा डालने से पहले अपनी परछाई के चेहरे को पढने लगा ! तभी एक पत्ता डार से बिछुड़ के पानी पर गिरा और  तरंग बनने लगा गोल…गोल…गोल…! वो ये सब देख रहा था ! सहसा लगा जैसे कोई तेज नुकीली चीज छाती चीर कर कलेजे के आर पार हो गयी… ! श्रवन कुमार का घड़ा पानी में डूबने लगा डूब…गुडूब डूब…गुडूब…

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घुप्प अँधेरे में वो उतरता चला गया …पानी से भरी ये कैसी गुफा है ? उसने सोचा ! उसका शरीर तालाब में औंधे मुँह गिर पड़ा था ! …छपाक !!  ये आवाज़ जब माता पिता ने सुना तो मन में आशंका के ढेर लग गए ! दशरथ को ये तो पता चल गया था की उनका निशाना चूक गया है पर अभी ये पता चलना बाकी था की वो खुद दुर्भाग्य का शिकार हो गए हैं ! वो वहीँ खड़े – खड़े पत्थर के पेड़ बन गए … और अंधे माता पिता तालाब की तरफ बिलखते हुए रेंगने लगे…

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आवाज़ की प्रतिक्रिया चारो और हुई ! मेघ गर्ज़ना सी आवाज़ किसी चीज़ के टूटने की आवाज़ कैसे हो सकती है ? फिर भी सब दौड़ पड़े ! रसोइया अभिषेक के लिए दही ले के भागा … पण्डितजी दूब नोच भाग चले … माली ताज़ा फूल ले के भागा … घोड़े हिनहिनाने लगे … सब वर को देखना चाह रहे थे ! सबका दिल कह रहा था ये धनुष के टूटने की ही आवाज़ थी ! सीता जब स्वयंवर का हार ले के श्री रामचंद्र जी की और बढ़ी तो मिथिलावासी रो रहे थे

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सीता के वियोग में सबसे पहले टूटा धनुष रोया था

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वो विदाई का क्षण था ! सबकी आँखों पर पानी का पर्दा गिर चूका था और सबकुछ झिलमिला रहा था ! उनके महल के चौखट को लांघते ही दशरथ मूर्छित हो कर गिर पड़े… वन के लिए निकला पहला कदम सबको भारी लग रहा था ! उनके नंगे पाँव अभी महल में ही थे पर कल्पनाओं में वन के कांटे सबको चुभने लगे …

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रात भर कोई सो न सका ! सुबह सुबह श्री राम वन के लिए निकल पड़े ! लगा अयोध्या नगर को ही वनवास मिला है ! सब साथ थे ! सब चल रहे थे ! सब रो रहे थे ! भीड़ में वो धोबी भी था…हाँ, वही ! बेसुध रो रहा था…

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वन जाते हुए श्री राम ने कहा  “अब आप लोगों का नाथ भरत है “

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मन और वन एक थे, हर तरफ उलझन और हर तरफ रास्ता …तीनो मौन थे !

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वन में जिस रास्ते पर हंस बैठे मोती चुन रहे थे उसी रास्ते पर कौवे मरे चूहे के लिए लड़ रहे थे …! सबका रास्ता एक था ! वे तीनो भी उसी रास्ते पर चल रहे थे …

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अनदेखे अनजाने रास्तों पर ही शबरी मिलती है, प्रेम विश्वास और भक्ति के जूठे बेर मिलते हैं …

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मीठे फलों के बीच दुसरे स्वाद नहीं होते तो शबरी क्या चखती …

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चारो बत्तख सबसे धीरे चल रहे थे इसीलिए सबके पीछे थे ! उनकी मुसीबत ख़त्म ही नहीं होती थी ! कभी जंगली कुत्ते तो कभी लम्बे घास और कभी तेज़ धार वाली जंगली नदी ! फिर भी चारों बत्तख लगातार चल पा रहे थे ! वो पैदल चलने वालों में सबसे पीछे थे ! कई गाँव के सैकड़ों नागरिक उनके आगे थे ! सबसे आगे वो तीनो थे जिनको वनवास मिला था ! वही सबसे आगे थे जिनके पीछे सब चल रहे थे और वही चारो बत्तख के साथ सबसे पीछे भी ! देखने वालों ने उन्हें सबके साथ चलते हुए एक साथ देखा था !
बूढ़े, बच्चे, जवान, स्त्री – पुरुष, पशु, पक्षी सब भीड़ में और सब अकेले … श्री राम सबके साथ एक साथ थे … !

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सीता – राम का भ्रमण ही जीवन था ! लक्ष्मण चाहते थे दोनों बस कुटिया में ही रहें और जंगल का कष्ट न सहें ! पानी के साथ चरण पर लक्षमण के आंसू जब भी गिरते राम को ठंढे पानी के ढेर में भी उन दो बूंदों की गर्माहट महसूस होती ! … वनवास का असली चेहरा वो चार पाँव ही थे जिन्हें लक्ष्मण रोज़ धोते थे…

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खड़ाऊँ देने के बाद राम ने कभी अपने पाँव की तरफ नहीं देखा ! लक्ष्मण जब उन्हें पखारते तो लगता राम यहाँ वन में है और पाँव ले कर भरत अयोध्या चले गए …

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उर्मिला और भरत एक दूसरे का दुःख कभी आँख मिला के देख नहीं सके …

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लगता कोई चल रहा है ! भरत की नींद टूट जाती ! दौड़ के देखता …सिंघासन पर खडाऊँ जस का तस रखा है ! फिर ये खडाऊँ के पदचाप की आवाज़ कैसी थी…खट… खट… खट…

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वन में मन का तन से ठन जाता है ! क्षण भर मन का तन पर वन में वश नहीं रहता ! पल में जल में पल में नभ में …मन वन में रम नहीं पाता ! जब सब सोते हैं तब तीनो रोते हैं …

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आसमान तारों से भरा था ! इतने तारों को देख के उसे लगा वो अकेली कहाँ ? उर्मिला जाग रही थी ! महल अब छोटा सा वन था …

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तीनो एक दूसरे के बहुत पास आ कर बैठ गए ! रात की स्तब्धता में सिर्फ उनकी सासें चल रही थी ! बाघों की गर्जना से जंगल भरा था ! जंगल का ये खाली मैदान ही तीनो के लिए सबसे सुरक्षित था ! हमला करने वाला कोई भी जानवर चांदनी में साफ़ दिख सकता था ! किसी भी खतरे का सामना करने के लिए दोनों भाइयों ने अपने धनुष पर वाण चढ़ा रखा था ! रात की नीरवता में पता नहीं किसकी उपस्थिति से जंगल में सब जानवर बेकल थे ! वन राममय हो चला था ! चाँद उतर के सीता के भाले की नोक पर चमकने लगा ! भाले पर चाँद की परछाई देख कर सीता मुस्कुरा दी ! राम को वो हर रूप में पहचानती हैं …

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रथ – गाड़ी का पहिया ठीक करा के कोई चढ़ रहा था तो किसी का भाला नदी के कादो में गंथा हुआ था, हरे घास की गठरी की रस्सी में बकरी की टांग फंस गयी थी और बकरी मेमिया रही थी, कोई उसे देख नहीं रहा था ! सब तरफ अफरा तफरी मची थी और नाँव काफी हिल रही थी ! नाँव नहीं खुलने की वज़ह से बच्चे रो रहे थे ! भीड़ बढ़ रही थी ! कीर्तनियों का भी एक दल था जिसके झाल मंजीरे खनखना रहे थे !  मुँह में खेवैया से बचे शुल्क का मुद्रा दबाये और हाथ में कचरी का दौना पकडे वो तेजी से नाँव के सबसे पीछे और मस्तूल के बगल में सबसे ऊँची जगह पर जा बैठा था ! नाव पर सब लोग उचक के खड़े हो गये थे और कुछ देखने लगे थे ! उसने भी खड़े होकर देखा ! केवट श्री राम चन्द्र जी का पाँव पखार रहा है … रो रहा है और कुछ कहे भी जा रहा है ! पीछे से हर्ष ध्वनि में कुछ सुनायी नहीं दिया ! श्री राम को अपने बीच देख के सब अवाक थे ! यातायात की आम सवारी में सब राम राज्य के नागरिक थे ! मस्तूल के ऊपर सूर्यवंशी पताका लहरा रहा था फड…फड… ! फड…फड…!

*

पाँव पखार के सबसे पहले उसने चरणामृत की थाल को उठा के सर से लगाया ! फिर अंजुरी भर चरणामृत अपने ललाट पर मला ! चरणामृत का जल ललाट को भिगोते हुए आँखों को धो गया ! आँखों से बह रही अश्रुधार चरणामृत से मिल कर गाल पर लुढ़कती चली गई ! टप्प् – टप्प् अश्रु बूंदें गर्दन पर चूने लगीं ! बदन सिहर गया ! सहसा जैसे किसी ने गुदगुदा दिया हो ! सुख के चरम पर केवट एक साथ हंस और रो रहा था ! ये सब एक क्षण में हो गया ! नाँव के पास खड़े राम, चरणो पर बैठे केवट को मौन देख रहे थे …

*

गंभीर तर्क दे डाला था केवट ने … सन्नाटा था ! गीले पाँव वाले मन से बहुत दूर तक चप्पू की छप – छप सुनते रहे श्री राम ! मस्तूल की ची.. चों…

*

केवट अँधा हो गया है इस बात से नाँव में हलचल बढ़ गयी ! ‘ अभी तो प्रभु के पाँव पखार रहा था फिर अँधा कब हो गया ?’ सब केवट की तरफ देखने लगे ! केवट की बंद आँखों से अश्रु की धार बह रही थी ! आँखों में प्रभु झीलमिल झीलमिल कर रहे थे ! केवट का रोम – रोम थर – थर काँप रहा था ! श्री राम सबके ह्रदय में हिलोर लेने लगे ! नाँव नदी में झूम रही थी ! लोग गा रहे थे ! केवट प्रेम में अँधा हो गया था ! अश्रु धार में नाँव बह रही थी ! प्रभु सबको पार लिए जा रहे थे …

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‘अरे ये तो श्री राम हैं’ बगल वाली नाव के नाविक ने हुलस के कहा ! यात्रियों में हलचल मच गयी ! क्या बूढ़े क्या बच्चे औरत मर्द सब एक साथ खड़े हो गए ! सबके एक साथ हिलने डुलने से नाव का ताल पानी से टूटने लगा ! नाव डगमगाने लगी ! केवट ने सबको शांत और स्थिर किया ! नाव पर बैठे बैठे ही सभी ने प्रभु को प्रणाम किया ! सीता लजाई हुई थी और हल्की घूंघट में नज़रें नीची कर के बैठी थीं ! उनको नाव तल पर फूल अक्षत पानी के छीटें ही दिख रहे थे ! सीता राम और लक्ष्मण को साथ देख कर पुष्प वर्षा का मौका कौन चूकता ? जिसके हाथ कुछ नहीं था वो नदी का निर्मल जल ही छिड़क रहे थे ! लक्ष्मण मुस्कुरा रहे थे और अविरल मौन ख़ुशी से रो रहे थे ! ‘ …कभी – कभी प्रभु आपके नाव में नहीं होते,वो बगल वाली नाव में होते हैं ‘ …किर्तनिया यही गा रहा था, दोनों केवट का चप्पू ताल से ताल मिला रहे थे ! छोटी – बड़ी सभी नाव साथ – साथ उन्मुक्त लहरों पर मंद मंद हवा के साथ हिलोर लेने लगे ! आँखें मूंदे सब आनंद में डूब रहे थे और किनारा दिखने लगा था…

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नाव मझधार में था ! केवट शांत था ! उसे पता था वो तो बस चप्पू चलाने का अभिनय कर रहा है असली खेवैया तो बैठे मुस्कुरा रहे हैं ! उधर लक्ष्मण ने सुना राम सीता से कह रहे थे केवट इतना कर्मठ हो तो भव सागर भी पार करा सकता है ये तो बस नदी है…

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हम जैसे कईयों की नाव छूटी थी … घाट छोड़ते हुए रामचंद्र जी ने खुद देखा था …

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पाँव पखार के पीने के बाद भी केवट की छाती को चीरती रही रामचन्द्र की नाव …

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कभी कभी फल इतने मीठे होते हैं… लगता है किसी ने चख के हमें दिया हो !

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उर्मिला की आँखें भरी हैं जैसे आसमान के सितारे पानी में डूब गए हो ! उर्मिला की रात तो कट जाएगी पर साथ में आज फिर थोड़ा सा ह्रदय भी कट जायेगा …

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रात्रि की स्तब्धता में लक्ष्मण ने देखा पूरे आकाश में उर्मिला झिलमिला रही थी  …

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दिल का दर्द उसकी नाक से लहू बन के बह रहा था …वो रो रही थी …किसी ने नाक नहीं उसका दिल काटा था…! उसकी एक जिद्द थी जो वनवासी समझ नहीं सके थे ! सूखे पत्तों पर गर्म लाल खून नहीं किसी का दर्प चू रहा था …टप्प… टप्प… टप्प …! हा, वो दर्पनखा थी पर अब केवल सूर्पनखा ! उसकी रुदन से जंगल की वेदना और सघन हो गयी थी…

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सूर्पनखा का कटा हुआ नाक खून से लथ – पथ ज़मीन पर पड़ा रहा ! धीरे धीरे जंगल की लाल चींटियों ने उसे मिट्टी में मिला दिया ..

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पंक्षियों का कलरव …जल की शीतलता…मंद मंद हवा…आकाश का प्रकाश… मायावी ने बहुत धीरे धीरे महीन जाल बिछाया था ! पाँचों इन्द्री सब टटोल ही रहीं थी और मन सुनहरे हिरण के पीछे भाग चला…

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आप चाहे जंगल में ही क्यों न हों… सुनहरी चीज़ मन मोहती है ! …वो तो जीता जागता हिरण था !

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ज़मीन को चीरती हुई कोई नुकीली सी चीज जब दल की ओर बढ़ी तो चारो तरफ अफरा तफरी मच गयी ! हल के फ़ाल की तरह वो जमी मिटटी को खोदती हुई आगे बढ़ गयी ! समतल ज़मीन पर अचानक अब एक खाई सी बन गयी थी और दोनों तरफ भुरभुरी मिटटी की एक छोटी सी पहाड़ी श्रृंखला ! दल बिखर गया ! फल के छोटे छोटे कण बिखर गए ! कुछ तो मिटटी में भी मिल गए ! कई चींटियों के हाथ पाँव मिटटी में दब गए थे ! सब इतनी जल्दी जल्दी हुआ की चींटियों को समझ में ही नहीं आया ! मिश्रीकंद के कण के साथ चींटियों का पूरा दल पंक्तिबद्ध चल रहा था ! आज बाम्बी में मीठे मिश्रीकंद का भोज होना था ! अभी तक इस ज़मीन पर वो बेफिक्र घूमते थे, यहाँ ऐसा कभी नहीं हुआ था ! लगा किसी ने ज़मीन को चीर दिया था ! थोड़ी देर बाद दल मिल के किसी तरह खुदे हुए ज़मीन को लांघ रहा था ! चीटियों को क्या पता कि लक्ष्मण ने ये लकीर क्यों खींची थी …

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फल भी, ओस भी, पंखुड़ी भी, पत्ते भी … चाहे जो देना पड़े पर वो किसी साधू को खाली हाथ नहीं लौटने देती …सब ये जानते थे और वो भी.

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आसमान कंटीला क्यों है ? आज हवा में ये धार कैसा ? सूरज घने बादल से निकल क्यों नहीं रहे ? ये कैसे भंवर उठ रहे है ? जटायु यही सब सोच के वेग से निकले… साएँ…साएँ …

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अपने कटे हुए चौड़े पंख से दूर निस्तेज पड़े खून से लथ – पथ जटायु ज़मीन पर कराह रहे थे … सब याद आ रहा था ! बचपन की बात है ! उड़ने की कोशिश में खोह से सीधे ज़मीन पर गिर गए थे जटायु ! पाँखों में चोट आ गयी थी, वो हिल नहीं पा रहे थे ! लाल चीटियों का एक विशाल झुण्ड घेरने लगा था शिशु जटायु को ! आँख बंद कर के जटायु ने अपनी माँ को याद किया ! माता भी जटायु को ढूंढ रही थी ! एक पल में आसमान को चीरते हुए माता आ गयीं और मज़बूत पंजों ने जटायु को फिर से पहाड़ी की चोटी पर खोह में पहुंचा दिया था … आँख बंद हुई जा रही थीं और पांख शिथिल थे ! गर्म लहू गर्दन से होकर चेहरे पर फ़ैल गया था ! आँख उठा कर जब जटायु ने आकाश की ओर देखा तो लगा माता को कोई लिए जा रहा है … जटायु उन्हें बचा नहीं पाये …खून और बेबसी के आँसू से जटायु का चेहरा लाल हो गया था … काले बादलों ने आसमान को ढक लिया … लाल चीटियों के विशाल फ़ौज की पहली पंक्ति कटे पांख की और बढ़ चले थे …जटायु को मांस भक्षी लाल चीटियों से एक लड़ाई और लड़नी थी, उसे ज़िंदा रहना था

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उन्होंने जब उसे अपने हाथ में उठा कर गोद में रखा तो उस एक पल के लिए उसने अपनी आँखें मूँद ली ! लगा किसी ने पीठ पर से जन्म जन्म का बोझ उतार दिया हो ! उँगलियों का स्पर्श होता ही है ऐसा ! वो सहसा उछली ! उफ़ ये सिहरन है या उँगलियों के निशान की तीन धारी …! गिलहरी की पीठ अब तक सिहर रही है !

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वो सरसराता हुआ तेजी से उनके पैर से लिपट गया और नेवले की ओर फ़न कर के फुफकारने लगा ! उसकी साँसे धौंकनी की तरह चल रही थी … उसे इसकी भनक भी नहीं लगी की वो किसी जीवित मनुष्य के पाँव से लिपटा है ! नेवला के मुंह खून लग चूका था ! वो खीं खीं कर रहा था और अपने दाँत कीटकिटा कर नाग पर आखरी दाव की तैयारी कर रहा था ! नाग डर और क्रोध से धू धू कर के जल रहा था ! उसके फुफकार में ज्वाला थी ! नेवला का मन नाग पढ़ चूका था ! अगर उसने आखरी हमला सटीक नहीं किया तो जान जा सकती थी ! हवा में विष फ़ैल चूका था ! रामचंद्र जी शिला खंड पर बैठे मंद मंद वायु को अपने फेफरों में खींच खींच कर भर रहे थे ! तभी उनको लगा उनके पाँव एक गर्म और ठंढी रस्सी से कोई बाँध रहा है ! उन्होंने बड़ी सतर्क निगाह से सब देखा ! सामने जीवन का विसात बिछा था ! जंगल का ये क्षण लगा उनके किसी मूक सहमती की प्रतीक्षा में मौन होकर ठिठक गया है ! नेवला ने अपने पूरी शक्ति से उछल कर नाग का गर्दन दांत से दबोचना चाहा पर नाग ने भी पूरे वेग से अपने कंठ की शक्ति लगा के विष की पोटली से सबसे ज्यादा ज़हर दांतों में भर लिया ! दोनों तरफ आर या पार का दाव था … नाग का फन और नेवला दोनों हवा में थे … सहसा एक हाथ ने नाग को नेवले की सीध से खींच लिया ! नेवला मुंह के बल धाराशाही हो गया ! नाग के फन से पिचकारी की तरह नीला विष अनायास हवा में लहरा गया ! ‘हे भगवान्’ अपने मुंह पर से विष पोंछते हुए बुदबुदा रहे थे श्री राम !

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रौशनी का प्रकाश बिम्ब जो पर्न कुटिया में ज़मीन पर आसमान से धँसा जा रहा था सीता का ध्यान अपनी और खींच रहा था ! पिघले सोने की मोटी सी एक पीली सुनहरी गोल धार छत से धरती पर धंसी जा रही थी ! रौशनी की धार में कण चमक रहे थे … अनगिनत अदृश्य कण ! कण कण में मानो ये उनका ही संदेश बिम्ब था जो रावण के वाटिका के एक अँधेरे बंद कुटिया में सेंध मार चूका था ! लंका की किसी वाटिका में कैद अकेली सीता रौशनी के वृत्त को देख रही थी ! मन जहाँ पिघलता है वहीँ फ़ैल जाता है …

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आज किस घाट लगी है देह की नॉव ? सुनहरी किरणों पर बिठा कर कौन रौशनी की नदी पार करा रहा है ? इतने सालों बाद केवट नही भूल पाता है वो क्षण जब उसने उनके दोनों पाँव पखारे थे और अपने नॉव से नदी पार कराया था … आह ! आज फिर से उसने उन चरणो पर अपनी आखरी सांस रख दी है …

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‘लंका’ त्यागने के लिए हर घड़ी शुभ घड़ी है…

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वो उड़ चले ! उनकी चौड़ी भुजा पर दोनों भाई लहरा रहे थे ! ये सबसे जरुरी काम था जो वो कर रहे थे ! नीचे असंख्य वानर सेना के हर्ष के चीत्कार से वातावरण गूँज रहा था ! उनके बलशाली कन्धों पर बैठे राम शोर में सिर्फ अपने पाँव से उनकी छाती की उल्लास भरी धड़कन महसूस कर रहे थे …धक्… धक्… धक्… नीचे धरती छोटी हो रही थी … नमन की गूँज अन्तरिक्ष में तैर रहा था ! भक्त और भगवान् को नमन ! नमन !! नमन !!!

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वो कुटिया वहीँ थी ! वन के बनस्पतियों ने उस पर अपना डेरा डाल लिया था ! आते जाते मौसम ने वो रेखा भी मिटा दिया था जो वहां खींची गयी थी ! अयोध्या लौटते हुए पुष्पक विमान से सीता देख रही थी और सोच रही थीं क्या मायावी था वो …

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चौदह दिन में चाँद चढ़ जाता और चौदह दिन में ही फिर घट जाता … चौदह साल तक ये चलता रहा … फिर वो घर लौट आए ! उर्मिला ने उम्र भर फिर कभी अपनी नज़र उन पर से हटाई नहीं…

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पग पग पर दीप जल रहा था ! नगर रौशनी में डूबा था ! पुष्पक विमान पर से अयोध्या नगर हीरे का ढेर लग रहा था ! पुष्पक के उतरते ही लोगों ने उन्हें घेर लिया ! गोद के शिशु अब तरुण हो चुके थे ! एक युग से ज्यादा का अंतराल हो चूका था ! अयोध्या की भूमि पर बहुत कुछ बीत चूका था ! राम को पिता की याद आ गयी और वो मौन हो गए … एक अंजुली अन्धकार राम को अपने ही अन्दर लग रहा था … किसी ने देखा हो या नहीं पर राम ने देखा हर दिए तले अँधेरा था … राम के अंदर एक बिजली कौंध गयी और वो ये सोचने लगे ये शाश्वत अन्धकार मनुष्य के अंदर से कैसे मिटेगा ? वो इतने अन्धकार से कैसे लड़ेंगे ? वो मौन हो कर खिड़की से देखने लगे ! नगर में असंख्य दीप जले थे …

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