महालोक – बारह

केबल ने उसको रोक लिया था ! चाह कर भी टेलीविजन टेबल नहीं छोड़ सका ! पीठ पीछे किसी ने केबल लगा रखा है यह जान के टेलीविजन बहुत उदास हो गया ! इतने साल से वो अपने आप को आज़ाद समझ रहा था ! उसे लगा किसी ने पीठ पर छुरा घोंप दिया है ! ‘ इतना बड़ा विश्वासघात …’ टेलीविजन को बुदबुदाते आज तक किसी ने नहीं देखा था ! ‘मैं सिर्फ एक तार हूँ, तुम किस बात से इतना हैरान हो ? केबल ने पीछे से पुछा ! ‘तुमने मुझे बाँध रखा है तुम एक छलावा हो तार के नाम पर … मैंने तार से संगीत निकलते सुना है जो आत्मा को मुक्त कर देती है … पर तुमने मुझे बाँध रखा है … तुम तार नहीं हो सकते !’ इसमें तुम्हारी गलती है, तुमने कभी पीछे मुड के नहीं देखा … नहीं तो तुम मुझे अपने साथ ही देखते, तुम महान मेरी वज़ह से हुए हो ! तुम्हारे अन्दर जो बाहर निकलने की चाह है उसकी वज़ह भी मैं हूँ ! केबल की यह बात सुनकर कर टेलिविज़न गुस्से से झिलमिलाने लगा ! उसे लगा न सिर्फ उसके अस्तित्व पर सवाल उठाया गया है बल्कि उसे हमेशा के लिए क़ैद भी कर लिया गया है …! ‘ओह फक’ केबल के मुंह से निकला, उसने देखा टेलिविज़न गुस्से से काला होकर सूं की आवाज़ के साथ शट हो गया था ! ‘इडियट बॉक्स कहीं के’ … केबल ने टेलिविज़न को गाली दी …

महालोक – ग्यारह

डिजिटल देवताओं के वाहनों का बुरा हाल हुआ है ! मूषक बिचारा अपने प्राकृतिक सौन्दर्य को कभी नहीं पा सका ! अपने स्वामी को ढूंढता हुआ महानगरों में बिचारा सड़े पानी में तैरता हुआ ही दिखता है ! नंदी अकड के पत्थर बन गया है ! लक्ष्मी जी का उल्लू पार्किंग के लिए एक सही पेड़ नहीं खोज पाता ! विष्णु जी के गरुड़ का आकाश भक्त ने अपने वाहन के लिए छीन लिया है ! शनि का कौवा दो पंखों वाला कोई विचित्र लोक का प्राणी बन किस देवता को ढो रहा है पता ही नहीं चलता ! जबसे देवता डिजिटल हो गए हैं, भक्त मेंटल हो गए हैं ! इस बीच राम की बॉडी बन गयी है ! रावण पॉपुलर हो गए हैं ! गणपति जी जबसे रिमिक्स गानों के जॉकी बन गए हैं नाचना भक्तों की मजबूरी हो गयी है ! पटाखे अब सिर्फ दीपावली के मोहताज नहीं भक्त का मूड हो तो बरसात में भी फटते हैं ! दुर्गा देवी स्लिम हो गयी हैं ! सदा धुत्त रहने वाले शिव जी एक्टिव लगने लगे हैं ! देवताओं के साथ राक्षस भी फेसबुक फ्रेंडली हो गए हैं ! बलात्कार बढ़ा है तो क्या, चमत्कार भी कम नहीं हुए ! कई भगवान् जेल में हैं !

महालोक – दस

उर्दू सब नहीं पढ़ सकते यही सोच के हिंदी में लिखने की योजना बनी ! बोर्ड पर लगने वाले अक्षर की पुडिया में एक ही ‘त’ था और ‘त’ भारत में लग चुका था इसलिए मुल्ला साहेब ने ‘क’ से काम चलाया जो एक्स्ट्रा था ! पर तब तक फतवा ‘फकवा’ बन गया था … नोटिस पढने वाले हंस रहे थे …

महालोक – नौ

वो कन्फ्यूज हो गया था ! एक रूपया लो तो सिक्सटी नाइन रुपया मिलेगा या किसी को एक रूपया देना हो तो सिक्सटी नाइन रूपया देना पड़ेगा ? ये सोचते हुए वो रुपया को गौर से देखने लगा ! अंगूठा दिखाता हुआ ठंढे लोहे का रूपया बिलकुल वैसा ही था, फिर क्या सिक्सटी नाइन हुआ है रूपये के साथ ? बस का कंडक्टर सबसे रूपये ले रहा था और सही टिकट दे रहा था ! पान वाले ने भी रुपया में रुपये की चीज़ दे दी ! दियासलाई की हर तीली रुपये की खरीदी हुई थी जिसकी आग में करोड़ों भस्म करने की वैसी ही ताकत थी जो रुपये के इस हाल में भी है ! फिर उसने दस बीस और पचास को भी आजमा के देख लिया ! सौ में भी वो सब आज मिल रहा था जो कल मिल रहा था ! फिर साला सब दिमाग का सिक्सटी नाइन क्यों कर रहे हैं ? तभी किसी ने उसको पीछे से आवाज़ दी … उसने देखा चाय वाला हाथ दे कर उसको रोक रहा है और छोटू दौड़ता हुआ उसकी तरफ आ रहा है … आपका रुपया रह गया था कहते हुए उसने अपने गीले हाथ से मेरे हाथ में एक गीला ठंढा अंगूठा दिखाता हुआ रुपया रख दिया ! मैंने तो उसके लिए ही रुपया छोड़ा था … सब रुपया से पीछा क्यों छुड़ा रहे हैं …घर लौटते हुए वो यही सोच रहा था !

महालोक – आठ

नगर का हाल विचित्र था, लोग छुप कर जूता और स्याही फेंकने का अभ्यास कर रहे थे … एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए किराये पर चलता फिरता घर मिल जाता जिसमे सिर्फ बैठने की जगह होती … योनी की जगह दिमाग था और सबके दिमाग में सिर्फ योनी थी … सबसे सार्वजनिक चीज को गुप्तांग कहते थे ! सब जेब से सिर्फ अपने हिस्से की धातु निकालते या सबसे छुपा कर रखा गया कई अंकों के कागज़ का एक जैसा टुकड़ा जिसके बदले कोई दूसरा उनको वैसा ही टुकड़ा पकड़ा देता ! अलग अलग तरीके से दिन भर सब यही करते ! आँखों की चमक नाखूनों में थी और जूते चमकाने के लिए लोग सड़क के किनारे इंतज़ार करते ! खाना सबसे ज्यादा था और सब उसी का व्यापार कर रहे थे ! अपने बच्चों को दिन भर सब एक जगह छुपा कर रखते थे ! बच्चे वहां जाने से रोते और फिर उनकी आदत वैसी ही हो जाती … बड़े होकर वो भी छुप कर जूता और स्याही फेंकने का अभ्यास करते …

महालोक – सात

एक समय की बात है ! नगर में मनुष्यों की एक प्रेम सभा हुई ! सभी स्त्री पुरुष आये थे ! सभा में आखिरकार ये तय हुआ कि सब अपनी -अपनी छाती चीर के दिखायेंगे ! कई लोग ये कहते हुए उठ गए की आज वो अपनी छाती घर पर छोड़ आयें हैं ! कईयों ने ‘छाती चीरी नहीं जाती’ का बहाना भी बना लिया ! कुछ लोग ‘आज छाती में दर्द है’ कहते हुए भाग गए ! कईयों ने कहा हमने आज ही नाखून काटा है और उँगलियों में इतनी धार कहाँ जो छाती को चीर सकें ! सब एक दुसरे की तरफ ऊँगली दिखाने लगे ! कुछ लोग इस ख़याल से की अब छाती चीरनी ही पड़ेगी हंसने लगे ! एक को हँसते हुए देख के दूसरा भी हंसने लगा !
अंततः आपसी भाई चारे और विश्वास के आधार पर ये मान लिया गया कि हम सब एक दुसरे के दिल में हैं तो छाती चीर के इस विश्वास को क्यों परखें ? सभा समाप्त हो गयी ! उस दिन से आज तक सब इसी वचन से बंधे हैं ! पर आज भी जब कोई ये कहता है कि हम आपके दिल में रहते हैं तो बरबस सुन रहा कोई तीसरा या कहनेवाले वे दोनों ही हंसने मुस्कुराने लगते हैं ! सबूत कोई नहीं मांगता ! श्री राम भक्त हनुमान ने अपनी छाती चीर के सबका मुंह सिल रखा है !

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शब्दालाप

भावनाओं पर सारे शब्द न्योछावर हैं !

– जितनी भावनाएं हैं उतने शब्द नहीं !
– जैसे ही हम किसी ख्याल की ओर बढ़ते हैं शब्दों को पता चल जाता है !
– शब्द जैसे भी हों अक्षर को कोई दोष नहीं देता !
– शब्द को बचाने के लिए भावनाओं से लड़ना पड़ता है !
– मुंह में बन कर कान तक जाते जाते शब्द ह्रदय को छु आते हैं !
– जब अक्षर मंडराने लगे अक्षरों पर समझो मन में शब्द उतरने लगे हैं !
– शब्द अपना अर्थ ले के घूमते हैं !
– तुकबंदी में शब्दों की रिश्तेदारी नहीं देखी जाती !
– शब्द का अर्थ उसके आकार से नहीं लगता !
– किसी शब्द के लायक बनने में कई वाक्य लग सकते हैं !
– ‘दो शब्द’ को चार शब्द बनते देर नहीं लगता !
– शब्द बहुरुपिया होते हैं ! विचारों में ऐसे समा जाते हैं जैसे लगता है शब्द ही विचार हैं !
– शब्द के तीन यार … कागज़ कलम और विचार !
– दिल से निकली बातों के शब्द अलग ही होते हैं !
– शब्द भावनाओं के घोसले हैं !
– शब्द हमारी इन्द्रियों की सवारी करते हैं !
– शब्द भाव जगाते हैं और हम उन्हें बढ़ा देते हैं !
– आप जो चाहे लिखें… जो चाहें बोलें…शब्दों के भण्डार गृह की चाभी सबके पास है !
– शब्द खर्चीले होते हैं ! कभी कभी बेशकीमती हो जाते हैं तो कभी कभी बहुत महंगे पड़ते हैं !
– पूछने से ज्यादा शब्द बताने में क्यों खर्च होते हैं ?
– उगला शब्द निगला नहीं जाता !
– शब्द बहुत काम आते हैं !
– शब्द के ज़ख्म शब्द ही भरते हैं !
– और राग … और रंग … और शब्द चाहिए !
– ढाई आखर में सिमटा पर पूरी दुनिया मे फैला, मैं एक शब्द से मिला !
– भावनाओं में डूबा कर भी शब्द सूखे रहते हैं !
– ‘शब्द’ के पास कम और ‘चित्र’ के पास अब ज्यादा काम है …

– ‘थैंक यू’ शब्द को हम कई भावनाओं में ठूंस देते है !

जितने शब्द उतनी अक्ल!

सुन ओ भाई शब्द, कोमा से निकलो तो सीधे फुल स्टॉप पर रुकना ! हैश डैश कुछ नहीं …

मेरी हर सच की शुरुआत शब्द से होती है, शब्द मैं सदा तुम्हारा हूँ ! मेरे बहादुर निडर शब्द मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ ! शब्दों ने हर हाल में मेरा साथ निभाया ! मेरी सभी भावनाओं को अपने अंदर से गुजरने दिया ! मेरी बेचैनी को समझा और कभी उन्हें तोड़ने मरोड़ने की कोशिश नहीं की ! मेरी कटुता में, मेरी नाराजगी में, मेरे प्रेम में, मेरे कमज़ोर क्षणों में, मेरे संघर्ष में, मेरी आपत्तियों में, मेरी सहमति असहमति में, मेरे मौन में भी शब्दों ने मौन रह कर मेरा साथ नहीं छोड़ा ! मेरे शब्द बहुत वफ़ादार हैं ! उन्होंने मेरा गाली में भी साथ दिया है …

शिर्डी डायरी

शिर्डी का रास्ता सहृदय दोस्तों की संगत से भी गुजरता है …

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बाग़ का एक – एक पौधा माली का बच्चा होता है ! सबका ‘माली’ एक है !

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मस्जिद माई की आग हर अन्धकार को भस्म कर देती है ! फ़क़ीर की धुनी की धूम है …

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माली के हाथ ! मिटटी से लिपटी हाथों की उँगलियों में न जाने कितने पौधों के प्राण बसते हैं ! पोर पोर में खुशबु ! कभी बीज कभी जड़ कभी सूखी मिटटी कभी पानी कभी कोई पत्ता कभी कोई काँटा कभी कोई कोंपल कोई पल्लव … हमेशा जीवन ! वो फ़क़ीर भी है ! मुठ्ठी भर राख के लिए अपने पास बुलाता है ! उसके खुरदुरे हाथ और आँखों की चमक ले के चलती है दुनिया की रौशनी और सब राह … बस एक बार वो हाथ चूमने मिल जाए … क्या पता आज ? उसने बुलाया तो है …

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वे हमसे दूर जा ही नहीं सकते … मस्जिद से निकल के फूलों की क्यारियों में या बस लेंडी बाग़ … या बच्चों के साथ किसी पेड़ के नीचे या मेघा से बात करते हुए बस यहीं कहीं आस पास …! बाबा सदा हमारे साथ !

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सुंदर बाग़ के माली से मिलने जा रहा हूँ ! मुझे वो अपनी सब क्यारियाँ दिखायेगा और हम किसी पेड़ के नीचे बैठ कर बारिश में पौधों को भीगते हुए देखेंगे ! इस मौसम के फूलों के बारे में भी बात होगी !
क्या पता वो सुंदर फूलों का कुछ बीज दे दे या गीली मिट्टी से लिपटा हुआ कोई नन्हा सा पौधा ! उसके लिए क्या ले जाऊं ? वो सबका मालिक है …

'अल्लाह मालिक' - साईं बाबा

‘अल्लाह मालिक’ – साईं बाबा

महालोक – छह / ‘हे बाबा नागार्जुन’

नंगी आँखों से सब उसे घूर रहे थे ! ऐसा कभी नहीं हुआ की उसने तीसरा गिअर लगाये बगैर चौथा गियर लगाया हो पर आज अभी … ? क्या हो गया उसको ? कैबिन में बैठी औरत ने जैसे अपना पल्लू खिंचा उसे देख के बगल में बैठी बुर्के वाली की आँखें उसे तरेर गयीं ! उसने नज़र चुरा ली ! हे भगवान् उसे कैसे याद नहीं रहता कि लेफ्ट साइड का मिरर मालिक ने उतरवा लिया है और गाडी सिर्फ सामने देख कर चलाने बोला है ! ‘किसी पसिन्जर से आँख मिलाने की जरुरत नहीं है’ ! कैसे भूल जाता है की अब वो जिस सीट पर बैठा है उस पर कालिख पुत चुकी है … अब वो प्राइवेट ‘बस का ड्राईवर’ है सात साल की बच्ची का पिता नहीं ! उफ़ ये सुनसान सड़कों की ठंढी आवारा हवा कान के साथ कितना बलात्कार करती है … सामने गियर के उपर हुक से लटकी काँच की चार गुलाबी चूड़ियाँ बस की रफ़्तार के मुताबिक हिल रहीं थीं … अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा आहिस्ते से बोला: ‘हे बाबा नागार्जुन’ !

महालोक – पाँच

फेसबुक पर एक घंटे प्रति लाइक की दर से चलता हुआ विरोध का अवसाद जब महानगर पहुंचा तो यहाँ मधुशाला में बोहनी हो चुकी थी जिस्म का बाज़ार अंगड़ाई ले रहा था और पांच सौ रूपये में भी बलात्कार करने वाले कम पड़ रहे थे ! धन्धे वालियाँ अपने खोटे नसीब को रो रही थी और धंधे के समय बैठ कर टी वी पर ठंढी राजधानी में हुए रेप का न्यूज़ देख कर मर्दों को मिस कॉल दे रही थीं ! साले मर्दों को आज की ‘रेप’ में पता नहीं क्या मजा आ रहा था …! इतने में शायद किसी का मोबाइल बजा तो, पर वो भी किसी लुख्खे का था ‘ग्राहक’ का नहीं … ‘साले मादरचोद मर्द …’ कोई टी वी पर रोती हुई एक लड़की की तरफ देख के बुदबुदाई … सब हंस पड़े … अभी राजधानी – गेट से आन्दोलन  का आँखों देखा हाल आना बचा था …