साइलेंट मोड में …

चेहरे पर कोई सेवन बना दे या ऐट बना के मेरा मन अनलॉक कर दे या जेड बना दे उँगलियों से और खोल दे मेरे सारे विंडो या एक बार मेरे चेहरे की स्क्रीन पर हाथ फेर के लॉक अनलॉक कर दे मुझे और यूँ ही पड़ा रहने दे साइलेंट मोड में …

‎सोलह बसंत‬

सरसों के खेतों तक आया, इस बार मुझ तक क्यों नहीं पहुंचा मेरा बसंत ? मीनारों पर बैठे गिध्द कैसे खा गए एक गिलहरी का क्यारी भर बसंत ? कौन पेंच दे के काट गया एक बच्चे का पतंग भर बसंत ? फुनगियों पर सहम कर क्यों रह गया इस बार का मौसम भर बसंत ? किस ने मार गिराया विद्यार्थी का हंस भर बसंत ? महानगरों के तकिये पर क्यों सिसकती रही ह्रदय के आकार की हवस भर देह – बसंत ? किसने दी मौसम को गाली, कैसे बचेगा विरोध भर बसंत ? मुक्त कर दो अपने गगन मन से दमन भर बसंत ..

काला हास्य सूँ – सूँ, कूँ – कूँ

रेडिओ दिवस पर
देश में आज
हर फ्रीक्वेंसी में
सूँ – सूँ, कूँ – कूँ क्यों है

जे एन यू टूँ उऊऊँ – टूँ उऊऊँ
कश्मीर किर्र किर्र किर्र किर्र
राजनीति टी – ईईईई टी – ईईईई
नेता टाआआ – टाआआ टीईईईई
टीईईईई – टीईईईई
टूँ उऊऊँ – टूँ उऊऊँ
सूँ – सूँ, कूँ – कूँ

हर फ्रीक्वेंसी में
सूँ – सूँ, कूँ – कूँ क्यों है

आज रेडियो तरंग
में इतने रंग क्यों है
हर फ्रीक्वेंसी में
सूँ – सूँ, कूँ – कूँ क्यों है

शासन सन सन सुउउउउउ
कानून टूँ टूँ टूँ टूँ टूँ टूँ
बहुमत खट्ट खट्ट खट्ट खट्ट
देशभक्ति टी – ईईईई टी – ईईईई
टीईईईई – टीईईईई
टूँ उऊऊँ – टूँ उऊऊँ
सूँ – सूँ, कूँ – कूँ

हर फ्रीक्वेंसी में
सूँ – सूँ, कूँ – कूँ क्यों है

रेडियो के पास
आज की रात
क्यों नहीं है
मेरे मन की बात ?

काला हास्य

विष्णु को मानने वाले वैष्णव थे अब सहिष्णु को मानने वाले सहैष्णव हैं !
गाँधी जी सहिष्णु हो कर मुझ हिन्दू अब हिष्णु को माफ़ कीजियेगा ! प्रस्तुत है दुःखी जनों के लिए मेरी पैरोडी

सहैष्णव जन तो तेने कहिये, जे स्टेटमेंट पराई जाणे रे
पर ट्वीट उपकार करे तोये, मन कमेण्ट न आणे रे ।।
सोशल मीडिया मां सहुने वन्दे, निन्दा न करे केनी रे ।।
असहिष्णु सहिष्णु मन निश्चल राखे, धन-धन जननी तेरी रे ।।

सहैष्णव जन तो तेने कहिये, जे स्टेटमेंट पराई जाणे रे ।।

किरण आमिर ने तृष्णा त्यागी, पर स्त्री जेने मात रे ।।
जिहृवा थकी असत्य न बोले, सत्यमेव जयते हाथ रे ।।
इनटोलेरेंट व्यापे नहि जेने, सेलिब्रेटी जेना तन मा रे ।।
राम नामशुं ताली लागी, सकल तीरथ तेना देश मा रे ।।
वण लोभी ने कपट रहित छे, काम क्रोध निवार्या रे ।।
मस्तान तेनु दरसन करता, मजोरिटी कुळ तार्या रे ।।

सहैष्णव जन तो तेने कहिये, जे स्टेटमेंट पराई जाणे रे ।।

वैष्णव जन तो तेने कहिये गुजरात के संत कवि नरसी मेहता द्वारा रचित भजन है जो महात्मा गाँधी को बहुत प्रिय था

आत्मरहस्य‬

एक यक्ष प्रश्न है-‘किमाश्चर्यं मतः परम’ अर्थात् सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? हम अपने आपको नहीं जानते यही सबसे बड़ा आश्चर्य है ! हजारों वर्षों से आदमी के सामने प्रश्न है – कोऽहम् ‘मैं कौन हूं ?’ ‘मैं कौन हूं’ इस प्रश्न के अन्वेषण में आदमी ने अपने अस्तित्व की कई परतें उघाड़ी ! उसे प्रतीत हुआ मेरा यह शरीर मैं नहीं है, मेरी इन्द्रियां, मेरी बुद्धि मैं नहीं है ! एक बिन्दु आया, एक अन्तिम ठहराव आया, साधक के अनुभव में, वह अनुभव था, ‘सोऽहम’ ‘मैं हूं’ मेरे सिवाय अन्य किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं है ! ऐसी कितनी ही बातें हैं और ज्ञान की तलाश का कोई निश्चित मार्ग नहीं है ! मैं #आत्मरहस्य को स्वयं अपने अनुभवों से और अनुभूतियों में तलाश रहा हूँ ! मैं अपनी आध्यात्मिक यात्रा में अकेला भटक रहा हूँ ! मेरी लेखनी से यह जाना जा सकता है ! मैं रोज लिखता हूँ जो मेरी अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों से निकली हुई अनर्गल भाव से होते हैं ! मैं अभी सूक्ष्म को नहीं जानता ! स्थूल को जानता हूँ ! शरीर को जानता हूँ ! जो मेरी भावनाओं में लिप्त है ! मैं अपनी पीड़ाओं को देखता हुआ जब अपनी आत्मा में झांकता हूँ तो मुझे कुम्हार के पके हुए बर्तन से दाग दीखते हैं ! कुम्हार के पास कई बर्तन बे दाग भी होते हैं ! लोग उनको ही लेना पसंद करते हैं ! पर मुझे वो बर्तन भी भाते हैं जिन पर भट्टी की आग की ताप की कालिख का दाग होता है ! और मैं अक्सर अपने आप को वैसा ही पाता हूँ ! अन्य सत्य भी है और जो मेरी अनुभूति है वो भी …

१.

पवित्र मन भी कहीं – कहीं से काला होता जाता है ! तपता हुआ, कुंदन होता हुआ, भष्म होने के लिए छोड़ दिया गया अहंकार, अज्ञान, काम, क्रोध, ईर्ष्या की ज्वाला की लपटें आत्मसाक्षात्कार की भट्टी पर चढ़ी आत्मा पर कालिख छोड़ ही जाती है …

२.

रात दिन के भरोसे नहीं रहती ! और दिन रात के भरोसे नहीं रहता ! रात, अपने सितारे अपना आकाश और अपना अँधेरा सब अपने साथ लाती है, और उन्हें अपने साथ ही ले जाती है ! दिन भी रात के लिए कुछ नहीं छोड़ता ! अपनी रौशनी, अपना आसमान और अपना तारा अपने साथ ही लाता है और उन्हें अपने साथ ही ले जाता है ! हम भी दोनों को अपने आप का अलग – अलग हिस्सा देते हैं ! दिन में हम अलग होते हैं, और रात में बिलकुल अलग ! हमारे दिन का मन अलग होता है और रात का बिलकुल अलग ! बीच – बीच में हम भी रात और दिन की तरह ही अलग – अलग होते हैं ! जैसे दिन में सुबह अलग होती है और दोपहर अलग ! रात में शाम अलग होती है और आधी रात अलग ! रात और दिन की तरह ही हम हर पल बदलते रहते हैं ! जैसे रात हर पल दिन की तरफ बढ़ती रहती है और दिन हर पल रात की तरफ बढ़ता रहता है ! हम भी कभी कहीं एक जैसे नहीं होते ! हमारी कोई रात किसी और रात सी नहीं होती ! हमारा कोई दिन किसी और दिन सा नहीं होता ! ये कोई जादू है या फिर कोई रहस्य ? कहाँ से आतीं हैं इतने रातें ? और कहाँ से आते हैं इतने दिन ? और इनको अलग – अलग देने के लिए हर पल हमारे पास अलग – अलग नया मन कहाँ से आता रहता है ?

३.

अपने ही मंदार में लिपटा हुआ आज मैं अपना नाग स्वयं था ! अपनी मुंह और अपनी पूँछ में बँटा हुआ अपनी मंथन में अपना वासुकि भी आज मैं स्वयं बना ! मेरे मुँह की तरफ मेरे दैत्य थे और मेरे देवताओं ने मेरी पूँछ पकड़ रखी थी ! भगवान नारायण ने दानव रूप से दानवों में और देवता रूप से देवताओं में शक्ति का संचार किया ! मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला ! विष की ज्वाला से मेरे देवता और मेरे दैत्य जलने लगे ! उनकी चमक फीकी पड़ने लगी ! मेरे देवताओं और मेरे दैत्यों ने मिल कर शिव की आराधना की ! नीलकण्ठ ने मेरी हथेली पर मेरे विष को रख दिया और मुझ से पीने के लिए कहा ! मैंने हलाहल उनकी चरणो में रख कर अपनी आँखें मूँद लीं ! मेरी आँखें जब खुलीं तो मेरी आंसुओं में आज मेरा सारा गरल बह गया ! आज अपने आत्ममंथन में अपना महादेव भी मैं स्वयं था …

४.

अंतरिक्ष के जिस रौशनी में अभी पृथ्वी नहा रही है वहां की रिक्तता कितनी भयावह होती होगी ? जब पृथ्वी घूमती हुई अन्धकार में चली जाती है, अंतरिक्ष के शून्य में व्याप्त रौशनी कितनी रिक्त और निर्जीव हो जाती होगी …

५.

डार से बिछुड़ते ही हम फिर मिलने की उम्मीद से बंध जाते हैं … टूटते ही फिर से जुड़ने की परिकल्पना बन जाती है … जाने के बाद ही आना होता है …सच के भरोसे ही झूठ को हम टटोलते हैं …पता नहीं ख़ुशी को ग़म के बगैर कैसे पहचानते… ? अन्त ही शुरुआत है  …

६.

मैं दो हिस्से में हूँ ! एक फूला हुआ और एक पिचका हुआ ! सांस लेता हूँ तो फूल जाता हूँ और जब सांस छोड़ता हूँ तो पिचक जाता हूँ ! इसके अलावा मैं और कोई नहीं हूँ ! मेरी इन दोनों अवस्था के अलावा अगर आप मुझे किसी और रूप में देखते हैं तो वो मिथ्या है, भ्रम है, दोष है, माया है, तृष्णा है ! और मेरा कोई ‘ब्रांच’ नहीं है जो मेरे फूलने और पिचकने के अलावा कुछ और करता हो ! देखिये अभी जैसे ही मुझे ये ज्ञान प्राप्त हुआ है मैं ख़ुशी से फूलने लगा हूँ ! और जैसे ही आप मेरी इस बात पर हंस देंगे मैं पिचक जाऊंगा ! लेकिन आप को हंसाने के बाद, पूरी तरह से पिचक जाने के बाद मैं फिर फूलने लगूँगा ! मैंने कहा न मेरी सिर्फ यही दो अवस्था है ! आप मुझसे मुंह फुला लीजिये या मेरे साथ हंस के अपना फेफड़ा खाली कीजिये और पिचक जाइए ! आप जैसे भी लेना चाहें मैं आप का साथ सिर्फ अपने दो हिस्सों से ही दे सकता हूँ ! आप चाहेंगे तो मैं आप के साथ फूल जाऊंगा और फिर हम एक साथ पिचक जायेंगे ! सांस लेता हूँ तो फूल जाता हूँ और जब सांस छोड़ता हूँ तो पिचक जाता हूँ ! आप कोई भी हों मैं अपने दोनों अवस्था के अलावा और कोई नहीं हूँ …

७.

दुःख से निकलने का निर्णय ही दुःख से निकलने का रास्ता है …

८ .

जी भर के रो लेने के बाद भी जीवन में वही बदलता है जो हम बदलना चाहते हैं ! रोना सिर्फ मन के दुःख को सहलाने का तरीका है …

क्रमशः

मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ?

मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ? आप मोदी रख लीजिये मैं देश रख लेता हूँ ! क्या ? आपको मोदी नहीं रखना ? ओ के ! फिर देश आप रख लीजिये मैं मोदी रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

मैं कार्टून रख लेता हूँ, आप संसद रख लीजिये ! क्या ? आपको संसद नहीं रखना ? ओ के ! फिर कार्टून आप रख लीजिये मैं संसद रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप किसान रख लीजिये मैं पोर्न रख लेता हूँ ! क्या ? आपको किसान नहीं रखना ? ओ के ! फिर पोर्न आप रख लीजिये मैं किसान रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप कांग्रेस रख लीजिये मैं आज़ादी रख लेता हूँ ! क्या ? आपको कांग्रेस नहीं रखना ? ओ के ! फिर आज़ादी आप रख लीजिये मैं कांग्रेस रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप सलामी रख लीजिये मैं तस्वीर रख लेता हूँ ! क्या ? आपको सलामी नहीं रखना ? ओ के ! फिर तस्वीर आप रख लीजिये मैं सलामी रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप विज्ञापन रख लीजिये मैं कार्यक्रम रख लेता हूँ ! क्या ? आपको विज्ञापन नहीं रखना ? ओ के ! फिर कार्यक्रम आप रख लीजिये मैं विज्ञापन रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप सिद्धांत रख लीजिये मैं शुभकामनाएँ रख लेता हूँ ! क्या ? आपको सिद्धांत नहीं रखना ? ओ के ! फिर शुभकामनायें आप रख लीजिये मैं सिद्धांत रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप संबंध रख लीजिये मैं दिशा रख लेता हूँ ! क्या ? आपको संबंध नहीं रखना ? ओ के ! फिर दिशा आप रख लीजिये मैं संबंध रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप विरोधी रख लीजिये मैं संस्कृति रख लेता हूँ ! क्या ? आपको विरोधी नहीं रखना ? ओ के ! फिर संस्कृति आप रख लीजिये मैं विरोधी रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप मामला रख लीजिये मैं माहौल रख लेता हूँ ! क्या ? आपको मामला नहीं रखना ? ओ के ! फिर माहौल आप रख लीजिये मैं मामला रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप रायता रख लीजिये मैं बूंदी रख लेता हूँ ! क्या ? आपको रायता नहीं रखना ? ओ के ! फिर बूंदी आप रख लीजिये मैं रायता रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

काशी शरणम् गच्छामि !

१.

नीचे नीच पड़ा है, ऊँचे ऊँच
कहीं चोंच पड़ा है कहीं पूँछ !

शक्ल पड़ी है शीशे मे, अक्ल पडी है खीसे मे !

कहीं दाम पड़ा है, कहीं आम पड़ा है ,
कटा हुआ दिन सुबह से शाम पड़ा है !

टोपी पड़ी है, सर बड़ा है !

हाथ में बन्दूक है नाल पर घडी ,
छोटा मुँह और बात बड़ी !

समस्या पड़ी है, बन्द घड़ी है !
जात पड़ा है, हाथ पड़ा है, कहीं लात पड़ा है !

हवा बसात है,
मैं खुद पड़ा हूँ !

काशी शरणम् गच्छामि !

*

२.

डेमोक्रेसी का डांसर हूँ , पर फ्रीलांसर हूँ !
वोटिंग में रेगुलर हूँ , पर पार्टी में स्ट्रगलर हूँ !

रोज कर, कर भर कर, ये कर वो कर हूँ !
आप सरकार हैं, मैं आपका नौकर हूँ !

आप चाभी हैं, मैं लॉकर हूँ !
आप मास्टर हैं, मैं जोकर हूँ !

थप्पड़ हूँ, कीचड़ हूँ. कचड़ा हूँ ,
आप हाथ हैं, कमल हैं, झाड़ू हैं !

आप ब्लैकबोर्ड हैं, मैं डस्टर हूँ !
मैं क्वेश्चन हूँ , आप आंसर हैं !
मैं मंच हूँ आप डांसर हैं !

मैं प्यास हूँ आप कोला हैं !
आप नारियल हैं मैं टिकौला हूँ !

मैं जुआ हूँ आप तम्बोला हैं !

मैं दिवार हूँ आप पोस्टर हैं !

काशी शरणम् गच्छामि !

आओ करें डिबेट

इस पेट से उस पेट
आओ करें डिबेट

किसने छोड़ा जंतर मंतर
कौन पहुंचेगा इंडिया गेट

देश का नेता कैसा हो
कैसे वेट हो ड्राई स्टेट

कैसे मिली आजादी, और
किसने कर दिया मटियामेट
आओ करें डिबेट

कौन है हारल, कौन है वायरल
मेरी स्ट्रैटेजी, या तेरी ट्रेजेडी

कौन खायेगा फिश फ्राई
कौन वेजिटेबल कटलेट

फां – फूं, अलाय – बलाय
कुछ नॉइस करें क्रिएट
आओ करें डिबेट

हरा, गेरुआ रंग में किसने
पॉलिटिक्स दिया है फेंट
मेरा पेट तेरा पेट
आओ करें डिबेट

कौन लिखेगा किस्मत
गरीब जनता या अमीर कैंडिडेट
कौन करेगा कट पेस्ट
आओ करें डिबेट

मेरा रिबेट, तेरा रेट
इम्प्लीमेंटेशन का दावा
और लाग लपेट

मिडिया करेगी डांस
जनता करेगी वेट
इस पेट से उस पेट
आओ करें डिबेट

राग विकट

जनहित में ‘राग विकट’ ! ‘राग विकट’ को ‘देश राग’ में गाने की जरुरत नहीं है ! इसे ‘अपनी डफली – अपना राग’ में गाया जा सकता है !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
दफ़ा दफ़ा / क्यों ख़फ़ा, ख़फ़ा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
नफ़ा नफ़ा / सब सटा सटा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
सपा सपा / सब सफा सफा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
हटा हटा / सब बँटा बँटा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
रुका रुका / सब रुका रुका ! बढ़ा, बढ़ा / बस नमो नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
खुला खुला / मुंह खुला खुला ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
खिला खिला / कमल खिला / जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
सीला सीला / सब होंठ सीला ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
इकट विकट / सब महा टिकट ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

लघु प्रेम कथा / लप्रेक

 संक्षेप में मुझे प्रेम पर कुछ कहना था … मेरी आँखें भर आयीं … ! इससे संक्षेप में मैं प्रेम पर कुछ सोच भी नहीं सकता …

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प्रेम कहानी के पात्र अपना प्रेमी ढूंढ ही लेते हैं …

लप्रेक – १.

लड़की जाने लगी तो लड़के ने फटाफट मोबाइल से लिफ्ट में उसकी एक तस्वीर ले ली जिसमे लड़की मुस्कुराती हुई हाथ हिला के विदा ले रही थी, उसने अपने पूरे कपड़े तरतीब से पहन रखा था और खुश दिख रही थी ! लिफ्ट का दरवाज़ा बंद होते ही लड़के ने लम्बी सांस ली और फ़ोटो ऑप्शन में जा कर सेव का बटन दबा दिया ! आज उनकी अकेले में पहली मुलाकात थी ! प्रेम का कोंपल आज ही फूटा था …

*

लप्रेक – २.

नहीं ! हाँ ! फिर नहीं ! फिर हाँ ! फिर फिर नहीं ! फिर फिर हाँ ! नहीं ! हाँ ! नहीं ! हाँ ! नहीं ईईई … !! हाँ आँआ… !! बस ये उनकी आखरी बातचीत थी ! कम्प्यूटर पर दोनों मौन अपने अपने विंडो को घूरते रहते ! एक मन हाँ कहता और एक मन ना !

*

लप्रेक – ३.

वो ‘कैंडी क्रश’ से रूठती है तो मुझसे बात करती है !

*

लप्रेक – ४.

पैर लगते ही छन् से लगता है ह्रदय पर, हाथ झट पट उठा कर अपने ही गले से लगा लेता है अपने आप को … क्यों जरुरत होती है प्रेम में किसी के क़दमों पर फेंक देने की …खुद को ??

*

लप्रेक – ५.

हंसती थी तो फंसती थी अब फंसती है तो रोती है…

*

लप्रेक – ६.

‘ऑरकुट’ में नाराज़ हुए थे, पूरा ‘व्हाट्सप’ चुप रहे अब जा कर ‘ट्विटर’ पर माने हैं बीच में ‘फेसबुक’ पर कितना स्टेट्स आ के चला गया …

*

लप्रेक – ७.

एक मन की मान लूं पर दूसरे मन को क्या जवाब दूं ? एक मन से कह दूं पर दूसरे मन से कैसे छुपाऊँ ? तू भी or not तू भी …

*

लप्रेक – ८.

‘हैशटैग’ के चकोर चौखट से बांध कर जब कोई लड़की किसी लड़के से प्रेम करती है तो प्रेमी फिर किसी बन्धन से बंधें न बंधें …

*

लप्रेक – ९ .

‘ काश वो मेरा ‘इनबॉक्स’ पढ़ पाती … ‘

*

लप्रेक – १०.

‘को – रस’ में ‘लव – रस’ :

सुनो लड़कियों – न लड़के साथ आए थे न लड़के साथ जायेंगे !

सुनो लड़कों – न लड़की साथ आयी थी न लड़की साथ जाएगी !

*

लप्रेक – ११.

दुष्यंत से मिल कर शकुंतला फिर अपने मन के सुनसान इन बॉक्स में लौट आई ! 

*

लप्रेक – १२.

मछली के पेट में अँगूठी बहुत दिनों तक नहीं रह सकी ! लेखक ने मछली को जाल में फंसवा के मछुआरे से उसकी पेट चिरवा दी और अँगूठी को राजा के सामने रखवा दिया ! शकुंतला की आँखों में आँसू भला कौन लेखक देख सकता है ?

*

लप्रेक – १३.

“… देखो इलेक्शन का रिजल्ट आ गया है, हमको अब मिलना जुलना कम कर देना चाहिए …”

*

लप्रेक – १४.

“… तुम टैग टैग, हम हैश हैश … ” 

*

लप्रेक – १५.

लड़का : स्माइली
लड़की : स्माइली
लड़का : स्माइली
लड़की : स्माइली
लड़का : स्माइली
लड़की : स्माइली
लड़का : स्माइली
लड़की : …

*

लप्रेक -१६.

कोई नाम … कोई चेहरा … कोई आँख … कोई आवाज़ … कोई होंठ … कोई पलक … कोई लौ … या कोई तस्वीर … कोई याद … कोई धुन … कोई गीत … कोई गंध … या कोई स्पर्श … और क्या है वैलेंटाइन ?

*

लप्रेक – १७.

जिससे लाभ होता है उसी से लव होता है !

*

लप्रेक – १८ .

कुचले जाने के लिए किसने अपनी अभिलाषाओं को प्रेम पथ पर फेंक दिया है …

*

लप्रेक -१९ .

कभी हम छोड़ देते हैं … कभी छूट जाता है … लघु प्रेम कथाएँ अंत में टीस भर ही देती हैं …

*

लप्रेक – २०.

रह रह कर उसका कलेजा मुंह को आता है ! घंटों बाथरूम में बैठ कर रोती है, उसका चश्मा भीगा ही रहता है ! उसको प्यार में धोखा मिला है ! उसके प्रेमी को कोई और पसंद आ गया है ! इतनी बिचारी उसे किसी ने कभी नहीं बनाया ! बिलख बिलख कर रो रही है और आँखें मूंदे चौदह तारीख का वैलेंटाइन वो आज बारह तारिख को ही फुसफुसा कर विश कर रही है ” हैप्पी वैलेंटाइन डे ”

*

लप्रेक – २१.

यादें फोन की घंटी की तरह बजती रहती है, नहीं उठाइए तो फिर कट जाती है …

*

लप्रेक – २२.

दाँत से काट के हमने आधे – आधे छुहारे नहीं खाये ! उसने मेरे कंधे पकड़ के हिलते डुलते अपनी सैंडल का फीता नहीं कसा ! उसके पास सवाल नहीं थे, मैंने कोई जवाब नहीं माँगा ! हम रूठे नहीं ! आते जाते सेंसर पर सिंपल बात हुई ! देखा, मुस्कुराए और अपने अपने रास्ते चल दिए ! शायद फिर से अजनबी होने का यही पहला कदम है …

लप्रेक – २३.

मैं चाहता तो उसकी पंख जैसी बाहें चुरा लेता पर उन्हें मैंने छोड़ दिया मैं किसी की आज़ादी नहीं चुरा सकता था ! मैं चाहता तो उसके पाँव ले भागता पर सपने में भी मैं उसे जंज़ीरों में नहीं देख सकता था ! मैं चाहता तो उसके बाल चुरा लेता पर उसके आशिक़ों को भी ठेस नहीं लगाना चाहता था ! सेंध मार के उसे चुरा ले भागने की योजना में आज सुबह मैं कामयाब हो गया था ! पर आखरी पल में मैंने अपना निर्णय बदल लिया, मैंने उसकी घडी से अपनी घडी मिलाई और अपने ह्रदय में रखी उसकी तस्वीर से उसका चेहरा मिला के छोड़ दिया ! उसे क्या पता एक हु बहु उस जैसे समय को दुनिया के लिए छोड़ आया हूँ और वो हर पल मेरे साथ है और मैंने उसे हमेशा के लिए चुरा लिया है  …

 

 

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