आओ करें डिबेट

इस पेट से उस पेट
आओ करें डिबेट

किसने छोड़ा जंतर मंतर
कौन पहुंचेगा इंडिया गेट

देश का नेता कैसा हो
कैसे वेट हो ड्राई स्टेट

कैसे मिली आजादी, और
किसने कर दिया मटियामेट
आओ करें डिबेट

कौन है हारल, कौन है वायरल
मेरी स्ट्रैटेजी, या तेरी ट्रेजेडी

कौन खायेगा फिश फ्राई
कौन वेजिटेबल कटलेट

फां – फूं, अलाय – बलाय
कुछ नॉइस करें क्रिएट
आओ करें डिबेट

हरा, गेरुआ रंग में किसने
पॉलिटिक्स दिया है फेंट
मेरा पेट तेरा पेट
आओ करें डिबेट

कौन लिखेगा किस्मत
गरीब जनता या अमीर कैंडिडेट
कौन करेगा कट पेस्ट
आओ करें डिबेट

मेरा रिबेट, तेरा रेट
इम्प्लीमेंटेशन का दावा
और लाग लपेट

मिडिया करेगी डांस
जनता करेगी वेट
इस पेट से उस पेट
आओ करें डिबेट

राग विकट

जनहित में ‘राग विकट’ ! ‘राग विकट’ को ‘देश राग’ में गाने की जरुरत नहीं है ! इसे ‘अपनी डफली – अपना राग’ में गाया जा सकता है !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
दफ़ा दफ़ा / क्यों ख़फ़ा, ख़फ़ा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
नफ़ा नफ़ा / सब सटा सटा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
सपा सपा / सब सफा सफा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
हटा हटा / सब बँटा बँटा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
रुका रुका / सब रुका रुका ! बढ़ा, बढ़ा / बस नमो नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
खुला खुला / मुंह खुला खुला ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
खिला खिला / कमल खिला / जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
सीला सीला / सब होंठ सीला ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
इकट विकट / सब महा टिकट ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

लघु प्रेम कथा / लप्रेक

 संक्षेप में मुझे प्रेम पर कुछ कहना था … मेरी आँखें भर आयीं … ! इससे संक्षेप में मैं प्रेम पर कुछ सोच भी नहीं सकता …

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प्रेम कहानी के पात्र अपना प्रेमी ढूंढ ही लेते हैं …

लप्रेक – १.

लड़की जाने लगी तो लड़के ने फटाफट मोबाइल से लिफ्ट में उसकी एक तस्वीर ले ली जिसमे लड़की मुस्कुराती हुई हाथ हिला के विदा ले रही थी, उसने अपने पूरे कपड़े तरतीब से पहन रखा था और खुश दिख रही थी ! लिफ्ट का दरवाज़ा बंद होते ही लड़के ने लम्बी सांस ली और फ़ोटो ऑप्शन में जा कर सेव का बटन दबा दिया ! आज उनकी अकेले में पहली मुलाकात थी ! प्रेम का कोंपल आज ही फूटा था …

*

लप्रेक – २.

नहीं ! हाँ ! फिर नहीं ! फिर हाँ ! फिर फिर नहीं ! फिर फिर हाँ ! नहीं ! हाँ ! नहीं ! हाँ ! नहीं ईईई … !! हाँ आँआ… !! बस ये उनकी आखरी बातचीत थी ! कम्प्यूटर पर दोनों मौन अपने अपने विंडो को घूरते रहते ! एक मन हाँ कहता और एक मन ना !

*

लप्रेक – ३.

वो ‘कैंडी क्रश’ से रूठती है तो मुझसे बात करती है !

*

लप्रेक – ४.

पैर लगते ही छन् से लगता है ह्रदय पर, हाथ झट पट उठा कर अपने ही गले से लगा लेता है अपने आप को … क्यों जरुरत होती है प्रेम में किसी के क़दमों पर फेंक देने की …खुद को ??

*

लप्रेक – ५.

हंसती थी तो फंसती थी अब फंसती है तो रोती है…

*

लप्रेक – ६.

‘ऑरकुट’ में नाराज़ हुए थे, पूरा ‘व्हाट्सप’ चुप रहे अब जा कर ‘ट्विटर’ पर माने हैं बीच में ‘फेसबुक’ पर कितना स्टेट्स आ के चला गया …

*

लप्रेक – ७.

एक मन की मान लूं पर दूसरे मन को क्या जवाब दूं ? एक मन से कह दूं पर दूसरे मन से कैसे छुपाऊँ ? तू भी or not तू भी …

*

लप्रेक – ८.

‘हैशटैग’ के चकोर चौखट से बांध कर जब कोई लड़की किसी लड़के से प्रेम करती है तो प्रेमी फिर किसी बन्धन से बंधें न बंधें …

*

लप्रेक – ९ .

‘ काश वो मेरा ‘इनबॉक्स’ पढ़ पाती … ‘

*

लप्रेक – १०.

‘को – रस’ में ‘लव – रस’ :

सुनो लड़कियों – न लड़के साथ आए थे न लड़के साथ जायेंगे !

सुनो लड़कों – न लड़की साथ आयी थी न लड़की साथ जाएगी !

*

लप्रेक – ११.

दुष्यंत से मिल कर शकुंतला फिर अपने मन के सुनसान इन बॉक्स में लौट आई ! 

*

लप्रेक – १२.

मछली के पेट में अँगूठी बहुत दिनों तक नहीं रह सकी ! लेखक ने मछली को जाल में फंसवा के मछुआरे से उसकी पेट चिरवा दी और अँगूठी को राजा के सामने रखवा दिया ! शकुंतला की आँखों में आँसू भला कौन लेखक देख सकता है ?

*

लप्रेक – १३.

“… देखो इलेक्शन का रिजल्ट आ गया है, हमको अब मिलना जुलना कम कर देना चाहिए …”

*

लप्रेक – १४.

“… तुम टैग टैग, हम हैश हैश … ” 

*

लप्रेक – १५.

लड़का : स्माइली
लड़की : स्माइली
लड़का : स्माइली
लड़की : स्माइली
लड़का : स्माइली
लड़की : स्माइली
लड़का : स्माइली
लड़की : …

*

लप्रेक -१६.

कोई नाम … कोई चेहरा … कोई आँख … कोई आवाज़ … कोई होंठ … कोई पलक … कोई लौ … या कोई तस्वीर … कोई याद … कोई धुन … कोई गीत … कोई गंध … या कोई स्पर्श … और क्या है वैलेंटाइन ?

*

लप्रेक – १७.

जिससे लाभ होता है उसी से लव होता है !

*

लप्रेक – १८ .

कुचले जाने के लिए किसने अपनी अभिलाषाओं को प्रेम पथ पर फेंक दिया है …

*

लप्रेक -१९ .

कभी हम छोड़ देते हैं … कभी छूट जाता है … लघु प्रेम कथाएँ अंत में टीस भर ही देती हैं …

*

लप्रेक – २०.

रह रह कर उसका कलेजा मुंह को आता है ! घंटों बाथरूम में बैठ कर रोती है, उसका चश्मा भीगा ही रहता है ! उसको प्यार में धोखा मिला है ! उसके प्रेमी को कोई और पसंद आ गया है ! इतनी बिचारी उसे किसी ने कभी नहीं बनाया ! बिलख बिलख कर रो रही है और आँखें मूंदे चौदह तारीख का वैलेंटाइन वो आज बारह तारिख को ही फुसफुसा कर विश कर रही है ” हैप्पी वैलेंटाइन डे “

*

लप्रेक – २१.

यादें फोन की घंटी की तरह बजती रहती है, नहीं उठाइए तो फिर कट जाती है …

*

लप्रेक – २२.

दाँत से काट के हमने आधे – आधे छुहारे नहीं खाये ! उसने मेरे कंधे पकड़ के हिलते डुलते अपनी सैंडल का फीता नहीं कसा ! उसके पास सवाल नहीं थे, मैंने कोई जवाब नहीं माँगा ! हम रूठे नहीं ! आते जाते सेंसर पर सिंपल बात हुई ! देखा, मुस्कुराए और अपने अपने रास्ते चल दिए ! शायद फिर से अजनबी होने का यही पहला कदम है …

लप्रेक – २३.

मैं चाहता तो उसकी पंख जैसी बाहें चुरा लेता पर उन्हें मैंने छोड़ दिया मैं किसी की आज़ादी नहीं चुरा सकता था ! मैं चाहता तो उसके पाँव ले भागता पर सपने में भी मैं उसे जंज़ीरों में नहीं देख सकता था ! मैं चाहता तो उसके बाल चुरा लेता पर उसके आशिक़ों को भी ठेस नहीं लगाना चाहता था ! सेंध मार के उसे चुरा ले भागने की योजना में आज सुबह मैं कामयाब हो गया था ! पर आखरी पल में मैंने अपना निर्णय बदल लिया, मैंने उसकी घडी से अपनी घडी मिलाई और अपने ह्रदय में रखी उसकी तस्वीर से उसका चेहरा मिला के छोड़ दिया ! उसे क्या पता एक हु बहु उस जैसे समय को दुनिया के लिए छोड़ आया हूँ और वो हर पल मेरे साथ है और मैंने उसे हमेशा के लिए चुरा लिया है  …

 

 

Cont.

वहां आधा भरा और आधा खाली एक ग्लास था !

वहां आधा खाली और आधा भरा एक ग्लास था !
वहां आधा भरा और आधा खाली एक ग्लास था !
उसे आधा खाली ग्लास उठा के लाने कहा गया
और वो आधा भरा ग्लास उठा ले आया !
जिसे आधा खाली ग्लास चाहिए था
अब उसके पास आधा भरा ग्लास था !
वहां आधा खाली और आधा भरा एक ग्लास था !
वहां आधा भरा और आधा खाली एक ग्लास था !
खुश हो कर उसने आधा भरा ग्लास लाने किसी और को भेजा
और वो आधा खाली ग्लास ले आया !

जिसे भरा ग्लास चाहिए था अब उसके पास खाली ग्लास था !
वहां आधा भरा और आधा खाली एक ग्लास था !
वहां आधा खाली और आधा भरा एक ग्लास था !

Is the glass half empty or half full?

मैं शब्द हूँ …

मुझे देखिये मैं शब्द हूँ ! मैने गौर से देखा वो कई अर्थों से लिपटा था ! सबसे बड़ा अर्थ धर्म का था ! मैंने प्रेम देखा ! प्रेत देखा ! नक्षत्र और ब्रह्माण्ड देखा ! स्त्री और पुरुष देखा ! खून, पसीना, सब शब्द से लिपटे थे ! मैंने कहा मुझे एक अर्थ का एक शब्द चाहिए ! उसने गति दिखाई, मैंने शुन्य देख लिया ! मुझे देखिये मैं शब्द हूँ … मुझे सब देख रहे थे और मैं कहीं नहीं था …

शिकायत नामा

शिकायत कान का गहना है पर मूंह का श्रृंगार नहीं ! शिकायत का पुर्ज़ा ढीला ही रहता है ! शिकायत देखते ही देखते बढ़ जाती है ! शिकायत की दाल कभी नहीं गलती ! शिकायत के फल में मिक्स्ड फ्रूट का जूस होता है ! शिकायत रूठने का सिग्नल है ! दूर की शिकायत पास होती है ! शिकायत नहीं होती तो हम दूर क्या करते ? शिकायत की काबिलियत सबमें होती है ! शिकायत नाप के नहीं की जाती ! शिकायत की कल्पना कोई नहीं करता ! शिकायत के पावँ भारी नहीं होते ! शिकायत के ढोल सुहाने होते हैं ! शिकायत में तिल भी ताड़ दिखता है ! जूँ के नहीं रेंगने की शिकायत सबसे पहले की गयी थी ! मेरी शिकायत सुनी नहीं जाती ये आपकी शिकायत कभी नहीं हो सकती ! शिकायत का फल मीठा नहीं होता और इसकी कोई शिकायत भी नहीं करता !
… अपनी शिकायत किस से करें ?

कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

१.

कहानी साफ़ थी पर सभी चरित्र गंदे थे ! प्रेम पवित्र था, सम्बन्ध अवैध थे ! संवाद था पर सब मौन थे ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

२.

सुई की नोक से भी कम जगह लेती है दिल में टीस ! सबसे ज्यादा चुभती है फेरी हुई नज़र ! खाली आसमान भी भर सकता है चुप्पी से ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

३.

कद काठी में हर कहानी आदमकद होती है ! कहानी की हर ज़िद अगर पूरी कर दी जाये तो वो आदमी से ऊपर उठ जाती है ! कहने की ज़िद और नहीं कह पाने की बेबसी हूबहू थी ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

४.

लो पढ़ लो मेरा दिमाग ये कह कर उसने अपने कपडे उतारना शुरू कर दिया … लिखे गए एक – एक शब्द की स्याही जैसे किसी ने चेहरे पर फेंक दी हो … काले मुंह से भरी आँखों में नंगापन झिलमिल झिलमिल कर रहा था … कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

५.

मुझे दूर ही रखना, प्रेम से बहुत दूर, मैं अपने घर और अपने माँ बाप से दूर हूँ ! मुझे हर सुख से दूर रखना , मैं अपनी भाषा अपनी मिट्टी से दूर हूँ … वो गा रहा था और मैं रो रहा था ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

६.

वो जानता था महकती गुलाब की पंखुड़ियों जैसा उसका दिल है … ! अपनी उंगली पर लहू की गर्म बूँद को गीले होंठ से चाटते हुए उसने देखा, नीचे तीखे कांटे थे … !  कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

७.

सामने आइना था ! जैसी कालिख़ मेरी पीठ पर थी वैसी ही कालिख़ आईने की पीठ पर भी थी ! आईने में मैं था या मैं ही आईना था ? मैंने हाथ बढ़ाया, दोनों तरफ सिर्फ काँच ही काँच था ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

८.

एक आहट रह जाती है ! कुछ शब्द रह जाते हैं ! एक तस्वीर रह जाती है ! कुछ निशान रह जाते हैं ! कुछ दाग रह जाते हैं ! एक स्वाद रह जाता है ! कुछ चिपचिपा रह जाता है ! कुछ न कुछ रह जाता है, जहाँ कभी कुछ भी रहा होता है ! और मैं शून्य में एक बुलबुले की तरह फूट जाता हूँ ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

९.

मेरी तरफ से सब वैसा ही है ! क्या तुम्हारी तरफ से सब वैसा है ? एक आँख से टपकी महीनों की जमी चुप्पी ! एकांत की लौ में मेरी धड़कन ने न जाने दर्द का कौन सा राग छेड़ा है ! वो आँखें मूँद कर मुझे सब बता रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

१०.

रेत की तरह मुठ्ठियों की उँगलियों के बीच से फिसल जाने वाली वो औरत और अपनी मुठ्ठियों को अपने भरोसे से भींचे हुए वो आदमी … दुनियाँ के भरोसे के लिए अपने भरोसे की मुठ्ठी वो क्यों खोले ? यही बात वो बार बार दुहरा रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

११.

अतल गहराईयों में उतर के देखा / सब सुख अपने ही सुख चुन रहे थे / आकाश अपना आकाश ही बुन रहा था / बेतरतीब पड़ी थी चुनने को सारी चीज़ें हरश्रृंगार सी / पर हृदय दुःख बीन रहा था .. कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

१२.

सारे शब्द आ गए हैं ! तुम भी लौट आओ ! मेरी वर्तनी, हिज्जै, संधि … मेरे खालीपन को कोई नहीं भर पा रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

 

क्रमशः

शब्दालाप

भावनाओं पर सारे शब्द न्योछावर हैं !

– जितनी भावनाएं हैं उतने शब्द नहीं !
– जैसे ही हम किसी ख्याल की ओर बढ़ते हैं शब्दों को पता चल जाता है !
– शब्द जैसे भी हों अक्षर को कोई दोष नहीं देता !
– शब्द को बचाने के लिए भावनाओं से लड़ना पड़ता है !
– मुंह में बन कर कान तक जाते जाते शब्द ह्रदय को छु आते हैं !
– जब अक्षर मंडराने लगे अक्षरों पर समझो मन में शब्द उतरने लगे हैं !
– शब्द अपना अर्थ ले के घूमते हैं !
– तुकबंदी में शब्दों की रिश्तेदारी नहीं देखी जाती !
– शब्द का अर्थ उसके आकार से नहीं लगता !
– किसी शब्द के लायक बनने में कई वाक्य लग सकते हैं !
– ‘दो शब्द’ को चार शब्द बनते देर नहीं लगता !
– शब्द बहुरुपिया होते हैं ! विचारों में ऐसे समा जाते हैं जैसे लगता है शब्द ही विचार हैं !
– शब्द के तीन यार … कागज़ कलम और विचार !
– दिल से निकली बातों के शब्द अलग ही होते हैं !
– शब्द भावनाओं के घोसले हैं !
– शब्द हमारी इन्द्रियों की सवारी करते हैं !
– शब्द भाव जगाते हैं और हम उन्हें बढ़ा देते हैं !
– आप जो चाहे लिखें… जो चाहें बोलें…शब्दों के भण्डार गृह की चाभी सबके पास है !
– शब्द खर्चीले होते हैं ! कभी कभी बेशकीमती हो जाते हैं तो कभी कभी बहुत महंगे पड़ते हैं !
– पूछने से ज्यादा शब्द बताने में क्यों खर्च होते हैं ?
– उगला शब्द निगला नहीं जाता !
– शब्द बहुत काम आते हैं !
– शब्द के ज़ख्म शब्द ही भरते हैं !
– और राग … और रंग … और शब्द चाहिए !
– ढाई आखर में सिमटा पर पूरी दुनिया मे फैला, मैं एक शब्द से मिला !
– भावनाओं में डूबा कर भी शब्द सूखे रहते हैं !
– ‘शब्द’ के पास कम और ‘चित्र’ के पास अब ज्यादा काम है …

– ‘थैंक यू’ शब्द को हम कई भावनाओं में ठूंस देते है !

जितने शब्द उतनी अक्ल!

सुन ओ भाई शब्द, कोमा से निकलो तो सीधे फुल स्टॉप पर रुकना ! हैश डैश कुछ नहीं …

मेरी हर सच की शुरुआत शब्द से होती है, शब्द मैं सदा तुम्हारा हूँ ! मेरे बहादुर निडर शब्द मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ ! शब्दों ने हर हाल में मेरा साथ निभाया ! मेरी सभी भावनाओं को अपने अंदर से गुजरने दिया ! मेरी बेचैनी को समझा और कभी उन्हें तोड़ने मरोड़ने की कोशिश नहीं की ! मेरी कटुता में, मेरी नाराजगी में, मेरे प्रेम में, मेरे कमज़ोर क्षणों में, मेरे संघर्ष में, मेरी आपत्तियों में, मेरी सहमति असहमति में, मेरे मौन में भी शब्दों ने मौन रह कर मेरा साथ नहीं छोड़ा ! मेरे शब्द बहुत वफ़ादार हैं ! उन्होंने मेरा गाली में भी साथ दिया है …

महालोक – छह / ‘हे बाबा नागार्जुन’

नंगी आँखों से सब उसे घूर रहे थे ! ऐसा कभी नहीं हुआ की उसने तीसरा गिअर लगाये बगैर चौथा गियर लगाया हो पर आज अभी … ? क्या हो गया उसको ? कैबिन में बैठी औरत ने जैसे अपना पल्लू खिंचा उसे देख के बगल में बैठी बुर्के वाली की आँखें उसे तरेर गयीं ! उसने नज़र चुरा ली ! हे भगवान् उसे कैसे याद नहीं रहता कि लेफ्ट साइड का मिरर मालिक ने उतरवा लिया है और गाडी सिर्फ सामने देख कर चलाने बोला है ! ‘किसी पसिन्जर से आँख मिलाने की जरुरत नहीं है’ ! कैसे भूल जाता है की अब वो जिस सीट पर बैठा है उस पर कालिख पुत चुकी है … अब वो प्राइवेट ‘बस का ड्राईवर’ है सात साल की बच्ची का पिता नहीं ! उफ़ ये सुनसान सड़कों की ठंढी आवारा हवा कान के साथ कितना बलात्कार करती है … सामने गियर के उपर हुक से लटकी काँच की चार गुलाबी चूड़ियाँ बस की रफ़्तार के मुताबिक हिल रहीं थीं … अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा आहिस्ते से बोला: ‘हे बाबा नागार्जुन’ !