वहां आधा भरा और आधा खाली एक ग्लास था !

वहां आधा खाली और आधा भरा एक ग्लास था !
वहां आधा भरा और आधा खाली एक ग्लास था !
उसे आधा खाली ग्लास उठा के लाने कहा गया
और वो आधा भरा ग्लास उठा ले आया !
जिसे आधा खाली ग्लास चाहिए था
अब उसके पास आधा भरा ग्लास था !
वहां आधा खाली और आधा भरा एक ग्लास था !
वहां आधा भरा और आधा खाली एक ग्लास था !
खुश हो कर उसने आधा भरा ग्लास लाने किसी और को भेजा
और वो आधा खाली ग्लास ले आया !

जिसे भरा ग्लास चाहिए था अब उसके पास खाली ग्लास था !
वहां आधा भरा और आधा खाली एक ग्लास था !
वहां आधा खाली और आधा भरा एक ग्लास था !

Is the glass half empty or half full?

मैं शब्द हूँ …

मुझे देखिये मैं शब्द हूँ ! मैने गौर से देखा वो कई अर्थों से लिपटा था ! सबसे बड़ा अर्थ धर्म का था ! मैंने प्रेम देखा ! प्रेत देखा ! नक्षत्र और ब्रह्माण्ड देखा ! स्त्री और पुरुष देखा ! खून, पसीना, सब शब्द से लिपटे थे ! मैंने कहा मुझे एक अर्थ का एक शब्द चाहिए ! उसने गति दिखाई, मैंने शुन्य देख लिया ! मुझे देखिये मैं शब्द हूँ … मुझे सब देख रहे थे और मैं कहीं नहीं था …

शिकायत नामा

शिकायत कान का गहना है पर मूंह का श्रृंगार नहीं ! शिकायत का पुर्ज़ा ढीला ही रहता है ! शिकायत देखते ही देखते बढ़ जाती है ! शिकायत की दाल कभी नहीं गलती ! शिकायत के फल में मिक्स्ड फ्रूट का जूस होता है ! शिकायत रूठने का सिग्नल है ! दूर की शिकायत पास होती है ! शिकायत नहीं होती तो हम दूर क्या करते ? शिकायत की काबिलियत सबमें होती है ! शिकायत नाप के नहीं की जाती ! शिकायत की कल्पना कोई नहीं करता ! शिकायत के पावँ भारी नहीं होते ! शिकायत के ढोल सुहाने होते हैं ! शिकायत में तिल भी ताड़ दिखता है ! जूँ के नहीं रेंगने की शिकायत सबसे पहले की गयी थी ! मेरी शिकायत सुनी नहीं जाती ये आपकी शिकायत कभी नहीं हो सकती ! शिकायत का फल मीठा नहीं होता और इसकी कोई शिकायत भी नहीं करता !
… अपनी शिकायत किस से करें ?

कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

१.

कहानी साफ़ थी पर सभी चरित्र गंदे थे ! प्रेम पवित्र था, सम्बन्ध अवैध थे ! संवाद था पर सब मौन थे ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

२.

सुई की नोक से भी कम जगह लेती है दिल में टीस ! सबसे ज्यादा चुभती है फेरी हुई नज़र ! खाली आसमान भी भर सकता है चुप्पी से ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

३.

कद काठी में हर कहानी आदमकद होती है ! कहानी की हर ज़िद अगर पूरी कर दी जाये तो वो आदमी से ऊपर उठ जाती है ! कहने की ज़िद और नहीं कह पाने की बेबसी हूबहू थी ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

४.

लो पढ़ लो मेरा दिमाग ये कह कर उसने अपने कपडे उतारना शुरू कर दिया … लिखे गए एक – एक शब्द की स्याही जैसे किसी ने चेहरे पर फेंक दी हो … काले मुंह से भरी आँखों में नंगापन झिलमिल झिलमिल कर रहा था … कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

५.

मुझे दूर ही रखना, प्रेम से बहुत दूर, मैं अपने घर और अपने माँ बाप से दूर हूँ ! मुझे हर सुख से दूर रखना , मैं अपनी भाषा अपनी मिट्टी से दूर हूँ … वो गा रहा था और मैं रो रहा था ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

६.

वो जानता था महकती गुलाब की पंखुड़ियों जैसा उसका दिल है … ! अपनी उंगली पर लहू की गर्म बूँद को गीले होंठ से चाटते हुए उसने देखा, नीचे तीखे कांटे थे … !  कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

७.

सामने आइना था ! जैसी कालिख़ मेरी पीठ पर थी वैसी ही कालिख़ आईने की पीठ पर भी थी ! आईने में मैं था या मैं ही आईना था ? मैंने हाथ बढ़ाया, दोनों तरफ सिर्फ काँच ही काँच था ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

८.

एक आहट रह जाती है ! कुछ शब्द रह जाते हैं ! एक तस्वीर रह जाती है ! कुछ निशान रह जाते हैं ! कुछ दाग रह जाते हैं ! एक स्वाद रह जाता है ! कुछ चिपचिपा रह जाता है ! कुछ न कुछ रह जाता है, जहाँ कभी कुछ भी रहा होता है ! और मैं शून्य में एक बुलबुले की तरह फूट जाता हूँ ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

९.

मेरी तरफ से सब वैसा ही है ! क्या तुम्हारी तरफ से सब वैसा है ? एक आँख से टपकी महीनों की जमी चुप्पी ! एकांत की लौ में मेरी धड़कन ने न जाने दर्द का कौन सा राग छेड़ा है ! वो आँखें मूँद कर मुझे सब बता रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

१०.

रेत की तरह मुठ्ठियों की उँगलियों के बीच से फिसल जाने वाली वो औरत और अपनी मुठ्ठियों को अपने भरोसे से भींचे हुए वो आदमी … दुनियाँ के भरोसे के लिए अपने भरोसे की मुठ्ठी वो क्यों खोले ? यही बात वो बार बार दुहरा रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

११.

अतल गहराईयों में उतर के देखा / सब सुख अपने ही सुख चुन रहे थे / आकाश अपना आकाश ही बुन रहा था / बेतरतीब पड़ी थी चुनने को सारी चीज़ें हरश्रृंगार सी / पर हृदय दुःख बीन रहा था .. कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

१२.

सारे शब्द आ गए हैं ! तुम भी लौट आओ ! मेरी वर्तनी, हिज्जै, संधि … मेरे खालीपन को कोई नहीं भर पा रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

 

क्रमशः

शब्दालाप

भावनाओं पर सारे शब्द न्योछावर हैं !

– जितनी भावनाएं हैं उतने शब्द नहीं !
– जैसे ही हम किसी ख्याल की ओर बढ़ते हैं शब्दों को पता चल जाता है !
– शब्द जैसे भी हों अक्षर को कोई दोष नहीं देता !
– शब्द को बचाने के लिए भावनाओं से लड़ना पड़ता है !
– मुंह में बन कर कान तक जाते जाते शब्द ह्रदय को छु आते हैं !
– जब अक्षर मंडराने लगे अक्षरों पर समझो मन में शब्द उतरने लगे हैं !
– शब्द अपना अर्थ ले के घूमते हैं !
– तुकबंदी में शब्दों की रिश्तेदारी नहीं देखी जाती !
– शब्द का अर्थ उसके आकार से नहीं लगता !
– किसी शब्द के लायक बनने में कई वाक्य लग सकते हैं !
– ‘दो शब्द’ को चार शब्द बनते देर नहीं लगता !
– शब्द बहुरुपिया होते हैं ! विचारों में ऐसे समा जाते हैं जैसे लगता है शब्द ही विचार हैं !
– शब्द के तीन यार … कागज़ कलम और विचार !
– दिल से निकली बातों के शब्द अलग ही होते हैं !
– शब्द भावनाओं के घोसले हैं !
– शब्द हमारी इन्द्रियों की सवारी करते हैं !
– शब्द भाव जगाते हैं और हम उन्हें बढ़ा देते हैं !
– आप जो चाहे लिखें… जो चाहें बोलें…शब्दों के भण्डार गृह की चाभी सबके पास है !
– शब्द खर्चीले होते हैं ! कभी कभी बेशकीमती हो जाते हैं तो कभी कभी बहुत महंगे पड़ते हैं !
– पूछने से ज्यादा शब्द बताने में क्यों खर्च होते हैं ?
– उगला शब्द निगला नहीं जाता !
– शब्द बहुत काम आते हैं !
– शब्द के ज़ख्म शब्द ही भरते हैं !
– और राग … और रंग … और शब्द चाहिए !
– ढाई आखर में सिमटा पर पूरी दुनिया मे फैला, मैं एक शब्द से मिला !
– भावनाओं में डूबा कर भी शब्द सूखे रहते हैं !
– ‘शब्द’ के पास कम और ‘चित्र’ के पास अब ज्यादा काम है …

– ‘थैंक यू’ शब्द को हम कई भावनाओं में ठूंस देते है !

जितने शब्द उतनी अक्ल!

सुन ओ भाई शब्द, कोमा से निकलो तो सीधे फुल स्टॉप पर रुकना ! हैश डैश कुछ नहीं …

मेरी हर सच की शुरुआत शब्द से होती है, शब्द मैं सदा तुम्हारा हूँ ! मेरे बहादुर निडर शब्द मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ ! शब्दों ने हर हाल में मेरा साथ निभाया ! मेरी सभी भावनाओं को अपने अंदर से गुजरने दिया ! मेरी बेचैनी को समझा और कभी उन्हें तोड़ने मरोड़ने की कोशिश नहीं की ! मेरी कटुता में, मेरी नाराजगी में, मेरे प्रेम में, मेरे कमज़ोर क्षणों में, मेरे संघर्ष में, मेरी आपत्तियों में, मेरी सहमति असहमति में, मेरे मौन में भी शब्दों ने मौन रह कर मेरा साथ नहीं छोड़ा ! मेरे शब्द बहुत वफ़ादार हैं ! उन्होंने मेरा गाली में भी साथ दिया है …

महालोक – छह / ‘हे बाबा नागार्जुन’

नंगी आँखों से सब उसे घूर रहे थे ! ऐसा कभी नहीं हुआ की उसने तीसरा गिअर लगाये बगैर चौथा गियर लगाया हो पर आज अभी … ? क्या हो गया उसको ? कैबिन में बैठी औरत ने जैसे अपना पल्लू खिंचा उसे देख के बगल में बैठी बुर्के वाली की आँखें उसे तरेर गयीं ! उसने नज़र चुरा ली ! हे भगवान् उसे कैसे याद नहीं रहता कि लेफ्ट साइड का मिरर मालिक ने उतरवा लिया है और गाडी सिर्फ सामने देख कर चलाने बोला है ! ‘किसी पसिन्जर से आँख मिलाने की जरुरत नहीं है’ ! कैसे भूल जाता है की अब वो जिस सीट पर बैठा है उस पर कालिख पुत चुकी है … अब वो प्राइवेट ‘बस का ड्राईवर’ है सात साल की बच्ची का पिता नहीं ! उफ़ ये सुनसान सड़कों की ठंढी आवारा हवा कान के साथ कितना बलात्कार करती है … सामने गियर के उपर हुक से लटकी काँच की चार गुलाबी चूड़ियाँ बस की रफ़्तार के मुताबिक हिल रहीं थीं … अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा आहिस्ते से बोला: ‘हे बाबा नागार्जुन’ !

महानगर की लोक कथा / महालोक – चार

एक लड़की थी जो अपना नाखून डर के चबा लेती थी ! उसको अँधेरे से डर लगता था ! रौशनी की तलाश में वो मुंबई आ गयी ! मुंबई में बिजली नहीं जाने की वजह से उसका डर कम हो गया और उसके नाखून बढ़ने लगे ! उसके अंदर इतना नाखून था ये उसको भी नहीं पता था ! वो उसे रंगने लगी ! नाखूनों को सजाने लगी ! उसे अपनी उँगलियों से प्यार हो गया और वो प्यारी लगने लगी ! लड़की की नाखून से एक लड़के को प्यार हो गया ! लड़का लड़की को जंगली कहता और उसकी फोटो खींचता ! लड़के ने प्रेम गीत के कई शब्द लड़की के कान में भर दिए और आँखों में प्यार का सपना ! लड़की प्रेम में अंधी और बहरी हो गयी थी ! एक दिन लड़की सपने देख रही थी और लड़का सपने में उसके साथ था ! लड़के ने उसके आँखों पर पट्टी बाँध के खेल खेल में ही उसे अपने आप को ढूँढने छोड़ दिया और खुद सपने से बाहर आ गया ! वो अपने साथ एक नेल कटर ले के आया था ! उसने देखा लड़की सपने में खोयी हुई है ! उसने लड़की के नाखून काट दिए ! लड़की सपने के अंदर थी और असकी आँखें बंधी थी ! जब लड़का बहुत देर तक उसको नहीं मिला तो उसने अँधेरे से डर के आँखों पर से पट्टी हटा ली ! डर से लड़की की पुतली बड़ी हो गयी थी, उसकी आँखें चुंधिया गयीं और वो चौंक के सपने से बाहर आ गयी ! उसने देखा उसके सुंदर रंगीन नाखून वहीँ कटे हुए गिरे पड़े हैं और लड़का गायब है ! लड़का अब न सपने में था न कमरे में ! वो दुःख से रोने लगी ! उसके नाखून वहीँ लाश की तरह पड़े थे ! लड़की को प्यार में धोखा हुआ था ! वो बहुत रोई ! पहले तो आंसूं से उसके कपडे भींग गए ! फिर उसके जूते आंसूं से भर गए ! फर्श सीढ़ी की तरफ झुका था और आंसू सीढ़ी से उतरने लगे ! जंगली लड़की के अंदर एक पहाड़ी झरना था ! जो दुःख में फट के लड़की से बाहर आ गया ! लोग आंसूं की धार से बच – बच के चलने लगे ! मुंबई में लोग पाँव से ज्यादा अपने जूते बचा के चलते हैं ! लड़की रोती रही आंसू बहता रहा लोग आते जाते जूते बचाते रहे ! पता नहीं कैसे पर लड़की की आंसू का स्वाद नमकीन नहीं था ये सबको पता चल गया ! बहुत सारे लोग जंगली लड़की के मीठे आंसू बोतल में भर के घर ले गए और कुछ रास्ते में बेचने लगे ! शहर प्यासा था ! पूरा शहर जंगली लड़की के आंसू पी रहा था ! महानगर में इतना आंसू किसी ने नहीं बहाया था ! धीरे धीरे लड़की की आँखें सूख गयीं ! पर बोतल में पानी अब भी बिक रहा है !

( आदिवासी साहित्य – Adivasi Literature में प्रकाशित  )

'आदिवासी साहित्य - Adivasi Literature' पत्रिका के लिए adivasipatrika@gmail.com मेल पर संपर्क कर सकते हैं !

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शब्दशः महालोक का शब्दकार / महालोक – तीन

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शब्दों के भण्डार से कुछ शब्द गायब हो गये ! कहानी यहीं से शुरू होती है ! शब्दों का कोई लेखा जोखा नहीं होने की वजह से इसकी शिकायत कैसे हो इस पर दिमाग काम करने लगा ! किसी से अगर ये बात कहें तो सबसे पहले वो यही पूछेगा कितने शब्द गायब हुए हैं और वे कौन कौन से हैं ? आप इस बात पर हंस सकते हैं पर सब ये जानते हैं की ये एक गंभीर अपराध है !
भला कौन शब्द गिन के रखता है जो सही – सही कह सकेगा ? शब्द के भण्डार में शब्द यूँ ही पड़े रहते हैं ! नए पुराने शब्द सब साथ रहते हैं ! मैंने बोलना शुरू किया तो पता चल सब बातें साफ़ – साफ़ हो रही हैं ! सारे जरूरी शब्द वहीँ थे ! शब्द बड़ी चालाकी से अपने पर्याय से अपने अर्थ निकलवा लेते हैं ! फिर ऐसा क्यों लग रहा था कि कुछ शब्द गायब हैं ? शब्दों की चोरी पकड़ना इतना आसान नहीं है ! सबके शब्द एक जैसे होते हैं !
चोरी का पता चलते ही शब्द के तीनो यार – कागज़ कलम और विचार वहां पहुँच गए ! उनकी कुछ शब्दों से आनाकानी तो चल रही थी पर वो चुरा लिए जायेंगे ये उनको भी विश्वास नहीं हो रहा था !
जितने मुंह उतने शब्द ! कैसे पता चले कौन से शब्द गायब हैं ? चोरी कर लिए गए या भाग गए या मर गए हैं ये कैसे पता चलेगा ?
कुछ सम्मानित शब्द रूठे हुए भी निकले !
अप – शब्दों की तो बुरी हालत थी ! उनके बारे में लोग मुंह पर हाथ रख के बात करते थे !
मैंने फिर भाव के आधार पर उनको ढूँढना शुरू किया ! हंसी ख़ुशी के सारे शब्द फटा – फट पहले जुबां पर आने लगे ! पता चला हिंदी अंग्रेजी साथ मिल के कई शब्दों ने नए शब्दों को जनम दे दिया है !
शब्दों का पीछा करते हुए कई स्वाद एक साथ मुंह में घुलने लगे ! रंग दिखे , आवाज़ सुनायी दिए ! एक ही साथ हंसने और रोने लगा ! इन्द्रियां शब्दों से लत पथ थीं  !
सस्ते और महंगे शब्द की जैसे ही बात हुई अपनी औकात सामने आ गयी !
इंस्पेक्टर ने मुझे अपने से छोटे ओहदे के नए दरोगा को सुपुर्द कर दिया और बोला ये साहित्य वाले हैं इनसे बात कीजिये ! साहित्य वाला नया दरोगा अपने आप को इंस्पेक्टर कहलवाना पसंद करता है और उसे दरोगा शब्द आउट ऑफ़ डेट लगता है ये उसने खुद मुझे बताया !
उसने पुछा आप कौन ? मैंने कहा शब्दकार ! उसका कहना था कोई शब्द – कार कैसे हो सकता है ? कहाँ के शब्दकार ?
शब्द बदलते हैं तो अर्थ बदल जाता है ! आप सही शब्दों का उपयोग कीजिये ! मैंने कहा बस यही उलझन है कई शब्द गायब हैं ! उसने पुछा कौन कौन से शब्द हैं जो आपको नहीं मिल रहे ? मैंने कहा ये भी पता नहीं चल पा रहा है ! उसने कहा ये गंभीर अपराध हुआ है आपके साथ ! पर शब्दों की चोरी के बाबत आज तक कोई ऍफ़ आई आर नहीं हुआ है ! आप इत्यादि जैसे शब्दों के साथ इसे सत्य मानिए …
इस बीच कई शब्द आये और गए पर वो शब्द नहीं मिला जिसके अंत में एक ही अक्षर था जिसके बिना कई वाक्य अधूरे हैं  …
सूखी रोशनाई में शब्दों की आँखों से पानी आ जाता है और वो झिलमिलाते हुए आधे – अधूरे तरह – तरह के आकार में किसी नन्हें हाथों से कागज़ पर उतर – उतर के गीले गीले होठों से तुतली जुबां में छलकते रहते हैं !  अब मेरे पास और कोई चारा नहीं है … नए शब्द वहीँ से लाने होंगे …

बचे खुचे शब्दों के साथ –
आप इस बात पर ध्यान क्यों दे रहे हैं ? मैंने कहा सब शब्दों का खेल है मेरे पास वो शब्द नहीं हैं इसीलिए मैं शोषित हूँ ,कई विरोध शब्द नहीं होने की वजह से व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ …

( Pic : Ora Jha)

अन्ना की अंतड़ी बोल रही है

अन्ना की अंतड़ी बोल रही है
गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र

देश की गठरी खोल रही है
गुड – गुड, गुड – गुड, गुड – गुड, गुड – गुड

अंजर – पंजर, जंतर – मंतर
अंदर – अंदर, अंदर – अंदर
जंतर – मंतर, जंतर – मंतर
बाहर – बाहर, बाहर – बाहर
अंजर – पंजर, जंतर – मंतर

अनशन – फंक्शन , अनशन – फंक्शन
अनशन – फंक्शन , अनशन – फंक्शन

अन्ना की अंतड़ी बोल रही है
गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र
देश की गठरी खोल रही है
गुड – गुड, गुड – गुड, गुड – गुड, गुड – गुड

किल – बिल, किल – बिल,
बिल – बिल, बिल – बिल,
टिम – टीम, टिम – टीम,
टीम – टीम, टीम – टीम,

जा – जा, जा – जा,
बाबा – बाबा, बाबा – बाबा

आ – जा, आ – जा,
वाह – वाह, वाह – वाह,
बा – बा, बा – बा, बा -बा, बा -बा

टोपी – सीधी, टोपी – सीधी,
सिद्धि – सिद्धि, टोपी – सिद्धि,

अन्ना की अंतड़ी बोल रही है
गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र ,
देश की गठरी खोल रही है
गुड – गुड, गुड – गुड,

जन का राजी, जनता राजी – जन का राजी, जनता राजी
अन्न ना – अन्न ना, अन्न ना – अन्न ना

कर अन्न – सन्न, कर अप – सन्न, कर संसोधन – कर संसोधन
ठन – ठन, ठन – ठन, ठन – ठन, ठन – ठन
अन्न – सन्न, अन्न – सन्न, अन्न – सन्न, अन्न – सन्न
कर अप – सन्न, कर अप – सन्न,
अन्न – संसोधन, सन्न – संसोधन,
ठन – ठन, ठन – ठन, ठन – ठन, ठन – ठन

अन्ना की अंतड़ी बोल रही है
गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र ,

देश की गठरी खोल रही है
गुड – गुड, गुड – गुड

Funny-amul-ad-over-lokpal-movement-by-anna-hazare