भीड़ की बरसात

भीड़ और बरसात में मुझे समानता दिखती है ! भीड़ शब्द का उपयोग ऐसे स्थान पर किया जाता है, जहाँ मनुष्य का कोई समूह हो ! जहाँ लोग बिना किसी पंक्ति के यहाँ – वहाँ एकत्रित हो जाते हैं ! बरसात में पानी के बूंदों का भी यही हाल होता है ! बादलों को चीर कर पानी की बूँदें भीड़ की तरह समूह में धरती पर बरस पड़ती हैं और यहाँ – वहाँ एकत्रित हो जाती हैं ! मुख्यतः हम भीड़ को हमेशा कंट्रोल कर मार्ग को सामान्य बनाने की कोशिश करते रहते हैं ! बरसात के पानी के साथ भी यही किया जाता है ! भारत में बरसात कृषि, नदी व्यवस्था, जल भंडार और वनस्पतियों और जीवों के उत्थान के लिए बहुत महत्वपूर्ण है ! देश की राजनीती में सत्ता के उत्थान के लिए भीड़ भी उतनी ही जरुरी है ! बरसात भारत का वित्त मंत्री है ! भीड़ भारत का कानून मंत्री है ! बरसात देश के सकल घरेलू उत्पाद को प्रभावित करता है ! भीड़ भी यही करती है ! मेरा मानना है कि पानी की तरह भीड़ का भी संचय और उपयोग हो सकता है ! राष्ट्रीय राजनीति में जबसे भीड़ की बरसात होने लगी है प्राकृतिक बरसात की पहले जैसी हैसियत नहीं रही ! भीड़ की बरसात के माध्यम से राजनितिक मौसम समाज को उसका असली चेहरा दिखा देता है !

आज भीड़ की बरसात के अनगिनत सब्सक्राइबर्स, फॉलोवर्स और व्यूअर्स हैं ! सभी अखबारों की हेडलाइंस और न्यूज चैनलों की सुर्खियों में शुमार ‘भीड़ की बरसात’ सोशल मीडिया पर भी हर मौसम में ट्रेंड करने लगा है ! अपने मजेदार गंवई अंदाज, दिलचस्प चाल – ढाल और बेलगाम ठसक के कारण भीड़ कई नेताओं और अभिनेत्रियों से भी ज्यादा पहचाना जाता है ! बरसात शब्द सुनने में जितना रोमांटिक है, देखने में भीड़ की बरसात भी मिडिया में उतनी ही बढ़िया और रिफ्रेशिंग होती है !

एक ऐसी ही भीड़ की बरसात के मौसम में चार पैर, एक लंबी पूंछ, दो सींग, दो कान, दो आंख, एक बड़ी नाक, बड़ा मुँह और एक सिर वाले जानवर को पशु – मेले से लेकर मैं अपने घर के लिए निकल पड़ा ! सोशल मिडिया का जमाना है इसलिए जानवर का नाम नहीं बताऊंगा !

जानवर के साथ मुझे देखने बारिश के बूंदों की तरह लोग आने लगे ! भीड़ का स्टॉल लग चूका था ! लोग टप – टप टपकने लगे ! कुछ जींस-टी शर्ट में थे और कुछ पैंट क़मीज़ पहने हुए थे ! धीरे धीरे लोग पानी की तरह जमा हो कर भीड़ का हिस्सा बनने लगे ! भीड़ की बरसात की अनुमानित तिथि नहीं होती ! इसके बादल सोशल मिडिया पर बनते हैं ! सबकुछ ‘इट डिपेंडस’ पर निर्भर करता है ! भीड़ के मैकेनिज्म की खोज इलेक्ट्रॉनों, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की खोज जैसी जटिल है और सामाजिक वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं ! भीड़ की डिजिटल और डेटा हिस्ट्री तैयार हो रही है !

सड़क पर जानवर के साथ अब भीड़ भी मेरे साथ चल रही थी ! मेरे एक तरफ जानवर था और एक तरफ भीड़ ! मैं भीड़ और जानवर के बीच में था ! भीड़ मेरे साथ चल रहे बड़े जानवर को पहचानती थी ! मैंने देखा जानवर के चेहरे पर हारे हुए आदमी सा भाव है जो जीवित है किंतु सामाजिक रूप से मरा हुआ है ! मुझे लगा मैं अपनी पूँजी को नहीं आइना देख रहा हूँ !

यह मवेशी जानवर रूप में मेरी पूंजी थी ! हम दोनों में सामाजिक समझौता था ! अपने जीवन में हम दोनों एक दूसरे के काम आने वाले थे ! मुझे लगा जानवर मुझसे कह रही है कि वो घडी आ गयी है जब हम एक दुसरे के काम आने वाले हैं ! मैंने अपनी पूंजी की रास और जोर से अपनी मुठ्ठी में भींच ली ! ‘जीते जी मेरी मुठ्ठी से कोई माई का लाल मेरी पूंजी नहीं छीन सकता ! मैं भारत का नागरिक हूँ ! ‘ मैं बुदबुदाया ! मुझे लगा मवेशी मुझे तनाव में देख कर मुझ पर हंस रही है !

घबराकर मैं चुप हो गया था पर घबराहट में मेरे साथ का जानवर बोलने लगा ! लोग दंग रह गए !

भीड़ जानवर की बातें सुनने के लिए बढ़ने लगी ! ‘ आप कौन लोग हैं ? और आप के एकत्र होने का उदेश्य क्या है ? ‘ जानवर ने भीड़ से पुछा !
‘ हम बेरोज़गार और बिलकुल निठ्ठले हैं ! मोबाइल रिचार्ज करने के लिए इधर उधर मारे – मारे भटक रहे हैं ! ‘ भीड़ ने कोरस में कहा ! ‘ फिर ठीक है ‘ जानवर ने कहा ! ‘ भीड़ हंसने लगी !

इस तरह किसी जानवर ने अब तक भीड़ से बातें नहीं कीं थीं ! फिर कुछ समय के लिए खामोशी छा गई ! बोलते हुए जानवर का वीडियो सेंट और शेयर होने लगा ! सेंट – शेयर के क्लिक – क्लिक से लाइक – लाइक भीड़ बढ़ने लगी ! सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म्स कड़कने लगे ! लोल से लोल टकराने लगे ! भीड़ को कुछ चटपटा चाहिए था ! जानवर सब समझ गया ! जानवर जानता था कि भीड़ में से कई लोग अनपढ़ और साधारण मनुष्य हैं ! उनके दिलों तक पहुँचने के लिए उसने उसी ‘मोबाइली’ भाषा का इस्तेमाल किया जिसे भीड़ समझ सकती थी !

भीड़ एक ऐसे क्लोज़्ड ग्रुप को कहते है जहाँ इसका पता लगा पाना मुश्किल हो जाता है कि कौन, कौन है और कहाँ से आया हैं ! भीड़ में औरतें कम होती हैं ! औरतों को चूल्हा – चौका करना पड़ता है ताकि बच्चों के जगने के पहले खाने का इंतजाम हो सके और वो भीड़ बन सकें !

भीड़ सीधी – सादी  परिश्रमी और ईमानदार होती है ! जो भीड़ को कॉम्प्लिकेटेड मानते हैं वो अपने आप को कम पहचानते हैं ! पानी की तरह भीड़ बहुत सरल होती है ! भीड़ सब देखना और जानना चाहती है ! सबकुछ अपने मोबाईल में रिकॉर्ड करना चाहती है ! भीड़ ने मेरी मानसिक अवस्था की तस्वीरें मोबाइल से अनगिनत दिशाओं में तरंगित कर दीं ! बोलते हुए जानवर को देखने धीरे – धीरे बरसात का जल और भीड़ की संख्या दोनों बढ़ने लगीं ! आपसी भाईचारा हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है जो अब भीड़ के काम आ रही है ! हिंद देश के निवासी भीड़ में सब जन एक थे ! बढ़ती हुई भीड़ का शोर धीरे – धीरे हमारे क़रीब आता जा रहा था ! आवाज़ें तेज़ होने लगीं ! मैं और जानवर डरे हुए बढ़ रहे थे ! जानवर ने देखा भीड़ ने मुझे डंक मार दिया था !

मैं कोई मवेशी चोर नहीं था और न ही कोई दलाल था ! मेरे पास मेरे और जानवर के सभी जरुरी कागज़ात थे ! फ़ेक न्यूज़ कोई नई चीज़ नहीं है, अर्धसत्य से पूर्ण असत्य तक, सदियों से हर रंग – रूप के झूठ चलते रहते हैं, लेकिन ये सब इतना संगठित हो कर पहले कभी भीड़ नहीं बनी ! मोबाइल इंटरनेट पर लोग अपनी जरुरत की वस्तुओं के साथ खूनी वायरल वीडियो भी आर्डर कर रहे हैं ! जानवर के साथ बने फेक न्यूज़ से मेरे इर्द – गिर्द  खुदरा भीड़ खनकने लगी थी ! दालों, अनाजों और सब्जियों की भीड़ मां – बहन की गंदी – गंदी गालियां दे रही थी ! तेज़ आवाज़ ! खूब हल्ला ! धम – धड़ाक ! दौड़ने – भागने और चिल्लाने की आवाज़ें, मानो कोई हमला हुआ हो ! भीड़ की नाराज़गी बच्चों की तुनकमिजाजी जैसी होती है !

‘ अरे पकड़ो ! ‘ आवाज़ आयी ! भीड़ भागने लगी !
‘ देखो, छिपा है ! ‘ आवाज़ आयी ! भीड़ ढूंढने लगी !
‘ मारो ! ‘ आवाज़ आयी ! भीड़ मारने लगी !
‘ चोर है ! ‘  आवाज़ आयी ! भीड़ कोरस में  ‘ चोर, चोर, चोर … ! ‘
‘ इसको नहीं छोड़ेंगे ! ‘ आवाज़ आयी ! भीड़ किसी को ढूंढने लगती है !
‘ जो बचाने आएगा, उसको भी मारेंगे ! ‘ आवाज़ आयी !  भीड़ कोरस में ‘ मारो, मारो मारो … !’
‘ गिरोह है ! ‘ आवाज़ आयी ! गिरोह का सामना करने के लिए भीड़ गिरोह बन गयी !
‘ आग लगा देंगे ! ‘ आवाज़ आयी ! कोई आग लगा देता है !
‘ मार देंगे ! ‘ आवाज़ आयी ! कोई मार देता है !
‘ फूंक दो ! ‘ आवाज़ आयी ! कोई फूंक देता है  !

तरह तरह के फोटो के साथ नफ़रत, हिंसा, भ्रामक जानकारियाँ, आधा – सच, आधा झूठ ये सब इंडस्ट्रियल स्केल पर लघु उद्योग की तरह पैदा किया जा रहा है, और मोबाईल पर बाँटा जा रहा है ! सोशल साइट्स का नतीजा यह हुआ है कि चारों तरफ लोगों के ऊपर अकेलेपन की भावना हावी होने लगी है और वे दूसरों से कटे – कटे रहने लगे हैं ! कटे – कटे रहने का स्वभाव लोगों में शक की भावना पैदा करता है, खासकर जब पड़ोस में हर वक्‍त हिंसा और अपराध का खतरा मँडराता रहता हो ! शक की भावना बहुत जल्द इंसान के जत्थे को पत्थर – दिल भीड़ बना देती है ! कानून अपने हाथ में ले कर भीड़ ने जनता की भलाई करने के लिए एक अनोखा तरीका निकाला है ! जब लोग मिल – जुलकर एक ही मकसद को हासिल करने के लिए काम करते हैं, तो उन्हें काफी हद तक कामयाबी मिलती है !

मृत्यु को करीब देख कर चार पैर के जानवर ने दो पैरों पर खड़े हो कर अपने दो पैरों से हाथ जोड़ के भीड़ को प्रणाम किया ! सब चकित थे ! सबने मेरी तरफ प्रशंशा से देखा जैसे मैं जानवर का गॉड फादर हूँ ! ‘ कोई जानवर दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, या तो मुझे खा लो या मेरा दूध पी लो ! ‘ जानवर की ये बात सुन कर भीड़ को लगा जानवर ने उन पर पैलेट गन से ब्लास्ट कर दिया है ! ‘ तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते इसलिए दोष मत लगाओ, कि तुम पर भी दोष न लगाया जाए ‘ जानवर आगे बोला !  ‘ लोगों के समूहों को उन्मादी भीड़ में तब्दील कर देने में सोशल मीडिया का सबसे बड़ा योगदान है ! कौन भड़काऊ तस्वीरें और पोस्ट डाल रहा है.? ‘ जानवर ने कड़क आवाज़ में पूछा ! ‘ क्या चलता है उन्मादी भीड़ के दिमाग़ में यह मुझसे बेहतर कौन बता सकता है जिसने ख़ुद ऐसी भीड़ का सामना किया हो ! ‘ जानवर के मनोहर शब्द सुन कर भीड़ अचम्भे में पड़ गयी ! ‘ स्थिति को काबू में करने के लिए क्या बेक़ाबू होना जरुरी है ? ‘ जानवर ने पूछा ! भीड़ बारिश के बुलबुले की तरह फटने लगी ! ‘ कृपया हमेशा तथ्यों की जांच करें ! हम सभी से अपील करते हैं कि दुर्भावनापूर्ण वीडियो को ध्यान न दें, जिससे कि समुदायों में अविश्वास पैदा हो ! ‘ धीरे – धीरे जानवर एक लाजवाब शिक्षक बन गया ! काफी हद तक सभी भारतीय शिक्षक ही हैं ! जानवर के उपदेश ने भीड़ के दिलों पर ऐसी गहरी छाप छोड़ी कि वे ऐसे शांत स्वभाव वाले जानवर को परेशान करने के लिए अपने मन को समझा नहीं पा रहे थे !

भीड़ की सबसे अच्छी बात ये होती है कि इसके पास लक्ष्य नहीं होता है ! उनको जो चैनल दिखा दो वो देखने लगती है ! भीड़ का असली मजा वही लेता है जो इस बात को जानता है और जिसके हाथ में भीड़ का रिमोट होता है ! आज सोशल मिडिया भीड़ का स्वामी है !

भीड़ की बरसात में भींग कर जब मैं लोगों के नीचे दबा पड़ा था वहीँ भीड़ में एक भाई साहेब दबे – दबे ही मेरा फोन नंबर मांग रहे थे ! मैं अपना फोन नम्बर देने ही वाला था कि मेरी नाक पर किसी की लात के प्रहार ने मेरी आँखें सुन्न कर दीँ ! मैं म्यूट मोबाइल की तरह अचेत हो गया ! बरसती भीड़ और लोगों की चीख चिल्लाहट की कीचड़ में मेरे होश का कमल खिल कर मुरझा गया था ! कई पंजे मेरी गाल पर पहले ही पड़ चुके थे ! हालात भीड़ के नियंत्रण में हैं इस भरोसे के साथ लोगों के चेहरों पर लाइक्स के सारे इमोटिकॉन बिखर गए थे ! जिसके मन में जो आ रहा था सोशल मीडिया पर अपनी ऊँगली से दबा रहा था ! क्लिक – क्लिक की अदृश्य आवाज़ आसमान में गूँज रही थी और लोग सुन रहे थे ! भीड़ चेहरा – विहीन होती है पर भीड़ का हर चेहरा वायरल होने को तैयार था ! भीड़ को गिरफ्तार करने के लिए भेजे गए सिपाही खाली हाथ लौट रहे थे ! सिपाहियों का असर भीड़ पर नहीं हुआ ! अलग अलग रास्तों के कुछ धार्मिक चरवाहे भी आये ! ‘ ये ‘भेड़’ वर्ग के लोग हैं इसीलिए ‘भीड़’ हैं ! इनको तुम जैसा गृहस्थ चरवाहा ही मंज़िल तक ले जा सकता है ! ‘ वे मुझसे बोले ! ‘ ये भेड़ नहीं हैं, ये भीड़ है, सब भूखे भेड़िया हैं ! ‘ यहाँ से निकलो, भागो ! जानवर को घेरने वाली भीड़ को गिरफ्तार करने के लिए भेजा गया दरोगा सिपाही के साथ खाली हाथ लौटते हुए मुझसे बोला ! धर्म और पुलिस अपना काम कर रही थी ! भीड़ भोंके हज़ार, मेरा जानवर चले बाज़ार ! भारतीय जानवर भारतीय भीड़ के साथ बढ़ रहा है ! भीड़ को आप चाहे न पहचान पाए हों पर जानवर को आप जरूर पहचान गए होंगे ! मैं जीते जी भीड़ की बरसात में सोशल मिडिया पर मर चूका था !

राष्ट्रपति चुनाव अर्थात …

राष्ट्रपति चुनाव अर्थात राष्ट्रपति भवन से एक बग्घी आएगी और हमारे बीच से राष्ट्रपति को चुन कर राष्ट्रपति भवन ले जाएगी !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात गहन विचार विमर्श !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात भोज, भोज, भोज और भोज !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात राष्ट्रपति के नाम की घोषणा !
राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार का विकल्प काल्पनिक होता है !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात पहले आप, पहले आप और पहले आप !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात समर्थन, समर्थन, और समर्थन !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात विपक्ष की सियासत में दरार !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात घोषणा, घोषणा, और घोषणा !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात किस प्रकार विपक्ष को एकजुट रखा जाए !
राष्ट्रपति की राह में दस्तख़त ही दस्तख़त होते हैं !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात दस्तख़त, दस्तख़त, दस्तख़त और दस्तख़त !

राष्ट्रपति चुनाव अर्थात केमिस्ट्री, केमिस्ट्री, केमिस्ट्री और केमिस्ट्री !

राष्ट्रपति चुनाव अर्थात बैठक, बैठक, बैठक, बैठक, और बैठक !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात गैर – राजनीतिक व्यक्ति को ही राष्ट्रपति बनाया जाए !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात गठबंधन, गठबंधन और गठबंधन !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात हम अपनी पसंद के उम्मीदवार को राष्ट्रपति नहीं बना सकते !

राजनीति में जितने भी व्यक्ति है सभी निष्पक्ष हैं, ईमान की बात कहते हैं, सिर्फ राष्ट्रहित की बात सोचते हैं, और भारत को अपनी पार्टी से बड़ा मानते हैं !
हमारे नेताओं के पास अपना विवेक, अपना अंतःकरण, और अपना ईमान है !
राष्ट्रपति मार्गदर्शन, प्रोत्साहन और चेतावनी देते हैं !

राष्ट्रपति चुनाव अर्थात गैर – राजनीतिक राष्ट्रपति की मांग !

राष्ट्रपति चुनाव अर्थात एक सर्वसम्मत उम्मीदवार !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात सर्वसम्मति किसी राजनीतिक व्यक्ति पर ही हो सकती है !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात ये आए और वो गए !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात विपक्षी दल सीधे तौर पर कुछ भी बोलने से बचती है !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात आंकड़ों का खेल !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात प्रत्याशी की स्थिति मजबूत होती जाती है और विपक्ष कमज़ोर पड़ता जाता है !

 

Part – II

राष्ट्रपति चुनाव अर्थात …

राष्ट्रपति चुनाव अर्थात खानापूर्ति का मुक़ाबला !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात हेडलाइन के अलावा कुछ नहीं !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात शुरुआती ना – नुकर के बाद हामी !
राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार अर्थात सामाजिक प्रतीक !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात राजनीतिक फैसले जो मिनट और सेकेंड में बदलते हैं !
राष्ट्रपति चुनाव अर्थात संवाददाताओं से बातचीत !

हमारे पास राष्ट्रपति के इतने होनहार उम्मीदवार हैं कि दुसरे देश भी इसका लाभ ले सकते हैं !

चुनाव के बाद

चुनाव के बाद वही होता है जो व्यंग्य पढ़ने – सुनने के बाद होता है, लोग हँसते हैं ! अच्छा व्यंग्य पढ़ने के बाद जैसी गुदगुदी होती है वैसे ही गुदगुदी वाली फीलिंग पता नहीं क्यों चुनाव के बाद भी होती है ! चुनाव के बाद सब धृतराष्ट्र बन जाते हैं और ‘चुनाव के बाद क्या हुआ’ सब संजय से जानना चाहते हैं ! चुनाव के बाद मॉडर्न महाभारत का संजय टेलीविज़न बन जाता है ! चुनाव के बाद रिजल्ट आने तक सब टी – वी देखते हैं ! धृतराष्ट्र की तरह वोट देने वाले नागरिकों को चुनाव के बाद क्या – क्या होगा सब पता होता है, पर टेलीविज़न के सामने सब चुप रहते हैं !

चुनाव के बाद खिचड़ी पकती है ! चुनाव के बाद सबकी दाल गलती है ! सुबह का भूला चुनाव के बाद घर लौट आता है ! चुनाव के बाद अनुलोम, विलोम हो जाता है ! चुनाव के बाद सब पात ढाक के हो जाते हैं ! चुनाव के बाद कुछ अंगूर खट्टे हो जाते हैं ! चुनाव ख़त्म होते ही राजनीती शुरू हो जाती है !

चुनाव के बाद पाकिस्तान फिर से दुश्मन हो जाता है ! चुनाव के बाद फौजी कश्मीर लौट जाते हैं ! चुनाव के बाद कवि जुलाहा हो जाता है ! चुनाव के बाद शायर कुम्हार हो जाता है ! चुनाव के बाद सबकी जात छोटी हो जाती है ! चुनाव के बाद गधे बाप बन जाते हैं !

चुनाव के बाद कमल झंडे से निकल कर कीचड़ में लौट जाता है ! चुनाव के बाद झाड़ू टोपी से निकल कर डंडे में लग जाता है ! चुनाव के बाद साइकिल पंचर हो जाती है ! चुनाव के बाद चुनाव चिन्ह अपनी दुनिया में लौट जाते हैं !

चुनाव के बाद डाटा का सॉफ्टवेयर बन जाता है ! चुनाव के बाद हर काम में प्रमाण पत्र की जरुरत पड़ती है ! चुनाव के बाद हम सबसे सहयोग की आशा करते हैं !

चुनाव के बाद फिर से शपथ ग्रहण होता है ! चुनाव के बाद कुर्सी बंटती है ! चुनाव के बाद कुर्सी का तौलिया बदल जाता है ! चुनाव के बाद बेरोज़गार के पाँव भारी हो जाते हैं !

चुनाव के बाद हिन्दू मुसलमान एक हो जाते हैं ! चुनाव के बाद मद्य – निषेध अभियान का अंत हो जाता है ! चुनाव के बाद रामचन्द्र जी फिर से वनवास को चले जाते हैं !

चुनाव के बाद पुरस्कार बँटते है ! चुनाव के बाद गर्मी छुट्टी हो जाती है ! चुनाव के बाद बच्चे बड़े हो जाते हैं ! चुनाव के बाद फिल्मों में नयी हीरोइन आ जाती है !

चुनाव के बाद चुनाव में हारा प्रत्याशी फिर से कुँवारा हो जाता है ! चुनाव के बाद साहित्य का चीरहरण हो जाता है ! चुनाव के बाद व्यंग्य की लाज रख ली जाती है ! चुनाव के बाद अगली चुनाव की तैयारी शुरू हो जाती है !

संजय उवाच – चुनाव से पहले और किस्मत से ज्यादा न किसी को कुछ मिला है न मिलेगा !

अभिव्यक्ति : पंच – तंत्र का छठा सेंस

Jai Hind

Jai Hind

सैकड़ों साल से नदी – नाले – तालाब के पानी की गहराई नाप आने वाले कछुआ का प्लास्टिक प्रदूषण से असमय ही निधन हुआ था ! घुट कर मारे गए कछुआ की शोक सभा में अभिव्यक्ति पर काव्य पाठ होना तय हुआ ! जंगल में काव्य पाठ कोई नयी घटना नहीं थी ! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की ऑनलाइन जंगल में आज फिर अग्नि परीक्षा थी !

स्वच्छ जंगल में अभिव्यक्ति पर विमर्श और काव्य-पाठ ? सुनते ही सिंह को डकार आ गया ! जोश में भूख से अधिक खा लिया गया ट्रेंड होता हुआ कल का वाइल्ड गधा अभी पेट में पचा नहीं था और अपच से रात भर नींद भी नहीं आयी थी ! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कविता पाठ और उस पर बहस कैसे पचेगा ये सोच कर सिंह का मुँह पहले कसैला फिर गधेला हो गया ! जंगल के अप्डेट्स के लिए अपने सहायक लकड़बघ्घे को मिस्ड कॉल दे कर सिंह ऊँघने की कोशिश करने लगे !

लकड़बघ्घे को जब किंग का मिस्ड काल मिला तब वो कछुए की याद में अपनी प्रोफाइल पिक बदल रहा था ! अपने बॉस सिंह के कॉल को रिप्लाई करने से पहले उसने सिंह के ट्वीट्स चेक किये ! सियारों के द्वारा साढ़े चार सौ बार री – ट्वीट हुआ ‘ गधे ऑन माइंड ‘ चौबीस घंटे पहले उनका लास्ट ट्वीट था ! व्हॉट्सएप पर भी ‘लास्ट सीन’ चौबीस घण्टे पहले का ही था ! कहते हैं लकड़बघ्घे को मिस्ड कॉल का इशारा ही काफी है !

अगली सुबह ऑनलाइन जंगल में कछुए की वनमानुष कद फोटो के सामने सब मौन थे ! गेंदे की हार में लिपटा कछुआ का फोटो वैसा ही लग रहा था जैसे वो प्लास्टिक के लिपटने से घुट – घुट के मरा था ! मोमबत्ती जल रही थी ! भावना बड़ी चीज़ है ! पशु – पक्षियों ने मिट्टी ला – लाकर शोक सभा का मंच बनाया था !

‘ आम तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ‘ बोलने की आजादी ‘ के रूप में समझा जाता है, लेकिन वह सिर्फ बोलने की आजादी नहीं, उसमें और भी कई चीजें आती हैं ! जंगल को बेहतर बनाने के लिए हर काम इसमें शामिल है ! ‘ सिंह ने अपने अध्यक्षीय भाषण की शुरआत में ये साफ़ करते हुए शोक सभा की शुरआत की !

‘ जिस जंगल में पचास फ़ीसदी जानवर अशिक्षित हैं ! जहाँ के पैंतीस प्रतिशत पशुओं को पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है ! जिस जंगल में विकास की ढोलक तो बजती है लेकिन यह भुला दिया जाता है कि ढोलक के आवरण के साथ ही दोनों छोर जानवर के खाल से बने हैं और खोखले हैं ! जहाँ प्रत्येक तीसरे दिन किसी न किसी के भूख से तड़प कर मर जाने की ख़बर आम है ! ऐसे में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का रोना व्यर्थ ही जान पड़ता है ! घड़ियाल के एक मण्डली के प्रतिनिधि ने शोक सभा का विरोध करते हुए कहा !

विलुप्त गिद्ध ने आगे जोड़ा ‘ पंच – तंत्र के निर्माताओँ ने अभिव्यक्ति को मूल अधिकारों का स्थान देकर हमें मुक्त आकाश में विचरण करने वाला पक्षी तो बना दिया है, लेकिन हमारे भोजन को हमसे छीन कर हमारे पंखों को काट दिया है ! आज हमारे बीच कछुआ होते तो मेरी बात का समर्थन करते !’ ये कहते हुए आखरी निरीह गिद्ध रो पड़ा !

‘ सवाल उठाना हमारा अधिकार है ! एक जानवर की सिर्फ इस अफवाह पर हत्या कर दी गई कि उसने गोमांस खाया था ? सिंह को ऐसा अपराध करने वालों को रोकना होगा ! जानवरों को अधिकार की गारंटी चाहिए ! सूचनाओं के अंबार में किसी किस्म की तानाशाही को छुपाया जाना संभव न होगा ! ‘ मोर बोल पड़ा !

‘ माना कि मूक रहना दासता की निशानी है और मुँह का खुलना आज़ादी का सूचक ! लेकिन मुँह का ज्यादा खुलना भी तो बीमारी का सूचक ही है ! जंगल में कहा जाता है कि ‘ हमारी आज़ादी वहीं पर खत्म होती है जहाँ पर दूसरे जानवर की नाक शुरु होती है ‘ खाने की स्वतंत्रता भी जीने के अधिकार में शामिल होना चाहिए ! कोई जानवर क्या खाता है, क्या पीता है, कैसे रहता है, और क्या पहनता है ? इसमें दूसरे जानवर की दखल – अंदाज़ी सही नहीं कही जा सकती है !’ बुजुर्ग बंदरों की आज़ादी पर गंभीर काम करने वाले शांत घोड़े ने कहा !

अभिव्यक्ति के बहस को हाथ से निकलता देख कर लकड़बघ्घे ने काव्य पाठ की घोषणा कर दी !

शोक सभा में पशुवादी एक्टिविस्ट चिंतक कवि खरगोश से जब जाति का कॉलम भरने को कहा गया था तो उसने रिक्त स्थान में ‘ पशु ‘ भरा था ! नवाचारी खरगोश के सिंग नहीं होते ! पशु कवि खरगोश ने अपनी पतली आवाज़ में पाठ शुरू किया ! खरगोश ने मुंह खोला ‘ मेरी कविता का शीर्षक है, सब ढोंग है ‘ ये सुनते ही जानवरों की पूँछ, सींग, पाँख और कुछ के नथुने फड़फड़ाने लगे ! खरगोश ने सब अनदेखा कर के पूरी ताक़त के साथ अपनी कविता पाठ शुरू की ! ‘ काला कौव्वा सिर्फ काँव काँव करता है … ‘ कविता की पहली ही पंक्ति सुन कर कव्वे क्यों चुप बैठते ! सब मिलकर सचमुच काँव – काँव करने लगे ‘ नौटंकी बंद करो ! सिंह, इस्तीफा दो ! ‘ काँव – काँव की शोर में कविता की अगली पंक्तियाँ किसी ने नहीं सुनी ! होली में अपने ऊपर रंग फेंकने के विरोध में डिजिटल जंगल के कुत्ते अपनी कविता लिख कर लाये थे जिस पर खरगोश की विवादास्पद कविता ने पानी फेर दिया था ! वे भी भोंकने लगे ! नौ सौ चूहे वाली बात के अफ़वाह पर बिल्लियों के पास भी एक कविता थी ! उनका कहना था न वो इतने चूहे खाती हैं न हज़ करने जाती हैं ! वो भी शोर मचाने लगीं ! मौका देख कर बन्दर भी खों – खों करने लगे ! ‘ जंगल के टुकड़े टुकड़े होंगे ! ‘ बंदरों का यह नारा सुन कर जंगल की सीमा पर जंगल की रक्षा करते हुए पशुओं का सर शर्म से झुक गया !

‘ यहाँ जंगल का कानून नहीं मेरा कानून चलेगा ! ये ठोस जंगल है ! यहाँ काठ के उल्लू नहीं रहते ! तुम सब डाल – डाल तो मैं पात पात ! ‘ सिंह ने गरजते हुए साफ़ किया ! ‘ ऐसी किसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है जिससे जंगल की सुरक्षा को ख़तरा हो ! अन्य वनो के दुसरे पशु – पक्षियों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों पर आंच आए, जंगल का क़ानून व्यवस्था खराब हो, किसी जानवर या समूह का मानहानि हो, किसी जानवर को अपराध के लिए प्रोत्साहन मिले, और जंगल की एकता, संप्रभुता और अखंडता को ख़तरा हो ! मेरे इन विचारों के सबसे करीब कौन है ? ‘ सिंह ने फिर दहाड़ लगाई ! सिंह का क्रोध देख कर सभा में सब खड़े हो गए ! कोरस में सबने एक साथ तीन बार कहा ‘ मन की बात / मन की बात / मन की बात !’ शोर के बीच गैप मिलते ही सबको शांत करते हुए सहायक लकड़बग्घे ने कहा ‘ प्रतिभा और पशुता का सम्मान होना चाहिए ! समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, संवाद का है, कविता पाठ का है !’ सिंह ने खरगोश को गुर्राते हुए कहा ‘ मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विश्वास करता हूं लेकिन यह उचित कानूनी ढांचे के भीतर होना चाहिए ! ‘ ऑनलाइन जंगल में रहने वाले जानते हैं कानूनी ढांचे के भीतर खाए हुए जानवरों के खाल भरे थे !

‘आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जरूरत क्या है ?’ वाइल्ड ऍस का सवाल सुन कर सिंह ने मुस्कुराते हुए उसे सिर्फ नशीली आँखों से देखा और बोला ‘ चिढ़ानेवाला, असहज करनेवाला और बेहद अपमानजनक बातें करने वाले जानवर को मैं खा जाऊंगा ! ‘ सिंह की बात सुन कर गधा डर के ऐसा भागा कि फिर अपने विज्ञापनों में भी नहीं दिखा !

आज के काव्य पाठ का खुफिया महत्व था ! आगामी चुनाव के लिए जानवरों के मन को पढ़ा जाना था और हर शाख पर उल्लू बैठ कर जानवरों का दिमाग पढ़ रहे थे !

‘ पूरे जंगल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ढाल बनाकर अप्रिय स्थितियां पैदा की जा रही हैं ! ‘ ये कहता हुआ हाथी व्यथित लग रहा था ! पिनक में हाथी ने यू – टर्न ले लिया ! सब जानते हैं हाथी जितना बड़ा होता है उसका यू – टर्न भी उतना ही बड़ा होता है ! पास के अमरुद का बड़ा पेड़ हाथी के पिनक का शिकार हो गया और जाते जाते उस पर बैठे सभा के तोतों को हाथी उड़ा गया !

उड़ते तोतों को देख कर सुस्त भालू की मंडली जो आज तक कभी सरपंच का चुनाव भी नहीं जीत सकी थी, तोतों के हित में हाथी विरोध के नारे लगाने लगे !

इसी बीच शोक सभा में हो रहे इन घटनाओं को लेकर जानवरों के ट्वीट से जंगल भर गया !

‘ जंगल में सोशल मीडिया पर पशु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग कर रहे हैं ! साइबर सेल को पता है कि कौन क्या लिख रहा है ! ‘ लकड़बघ्घे ने मोबाइल स्क्रीन को देखते हुए कहा ! इस बात से सभी चूहे चोंके ! पीला लंगूर जो ऊंघ रहा था ये सुन कर जाग गया ! ‘ जानवर कृपया अन्धविश्वासी मनुष्यों जैसा वर्ताव न करें ! ‘ लकड़बघ्घे ने फोन को जेब में रखते हुए कहा !

जंगल का सांस्कृतिक परिदृश्य साफ़ था ! धनपशुओं की औलादों के सुझाये गए मार्ग पर सभी पशुवत चल रहे थे ! जंगल की राजनीति इसलिए नहीं सुधर रही थी क्योंकि पशु अपने अपने स्वार्थ में थे और निहित स्वार्थ में जंगल को किसी टहनी पर रखकर सब पशु बेशर्म हो गए थे !

वास्तविक स्वतंत्रता एक मिथक है ! स्वतंत्रता केवल सापेक्षता के माध्यम से परिभाषित किया जा सकता है ! जंगल में स्वतंत्र सिंह का जीवन सच्ची स्वतंत्रता की सबसे आदर्श परिभाषा है ! जंगल को सुचारू रूप से चलाने के लिए बोलने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी बहुत ज़रूरी है और जंगल में इसे आज़ादी की पहली शर्त माना जाता है ! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी अधिकारों की जननी है ! इन्ही हितों के लिए जंगल के राजा सिंह द्वारा जानवरों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई थी , ताकि पशु उन पर अमल कर सकें ! विचारों पर बहस और चर्चा कर सकें जिससे अन्य पशुओं और पक्षियों के साथ वन को समृद्ध बनाया जा सके !

भगदड़ में सभा समाप्त हो गयी ! मंच पर कछुआ का पोट्रेट घुट घुट के मरने के लिए अकेला रह गया था ! कछुआ प्लास्टिक प्रदुषण से यूँ ही घुट कर नहीं मरा था !

अगले दिन जंगल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रहते हुए स्वस्थ सोच को कैसे डेवेलॉप किया जाए, इस विषय पर ऑनलाइन इंटरेक्टिव सामग्री बनाने के लिए पड़ोसी देश भूटान से आये अतिथि याक के साथ सभी जानवर अपनी सेल्फी खिंचवाने में व्यस्त थे !

विकासशील जंगल में अभिव्यक्ति हमेशा की तरह धूर्त, चोट्टे, सेटिंग – बाज, सफेदपोश स्वार्थी जानवरों के कुर्बान चढ़ गया ! जंगल राज के पंच – तंत्र में सबका छठा सेंस कह रहा था कि कुछ तो गड़बड़ है, क्या गड़बड़ है ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रहते हुए भी कोई व्यक्त नहीं कर पा रहा था !

मैं बैन का समर्थक नहीं

 

मैं बैन का समर्थक नहीं

मैं बैन का समर्थक नहीं

 

एक /

हम अभी लाइव टेलीकास्ट के लिए तैयार नहीं …

हमें क्रिकेट लाइव दिखाना आता है, देश नहीं
उपवास नहीं
उत्सव, त्यौहार नहीं
बलिदान नहीं, अधिकार नहीं

हमें फैशन शो दिखाना आता है
संस्कार नहीं
हमला नहीं , वार नहीं
हम अभी लाइव टेलीकास्ट के लिए तैयार नहीं !

हमें भाषण दिखाना आता है
खेल नहीं. पुरस्कार नहीं
समाचार नहीं
हम अभी लाइव टेलीकास्ट के लिए तैयार नहीं !

हमें मेंडेट दिखाना आता है
कैंडिडेट नहीं
हमें चमत्कार दिखाना आता है
पत्रकार नहीं
हम अभी लाइव टेलीकास्ट के लिए तैयार नहीं !

हम बैनर बनने को तैयार है
हम अभी बैन होने को तैयार नहीं …

 

दो /

बैन का पहाड़ा

बैन एकम बैन
बैन दूनी सर्कस
बैन तिये स्टेटस
बैन चौके बकवास
बैन पंजे काला
बैन छके हास्य
बैन सत्ते नैन
बैन अठ्ठे रुपया
बैन नामे एन डी टी वी
बैन दसे बांस

‪‪#पैरोडी‬ #‎कालाहास्य ‪#‎Kanhaiya #JNU

मैया मोरी मैं नहिं नारो लगायो !

भोर भयो स्टूडेंट के पाछे, जेल मोहिं पठायो ।
चार पहर जे एन यु भटक्यो, साँझ परे हॉस्टल आयो ॥

मैं बालक बहिंयन को छोटो, कुर्सी किहि बिधि पायो ।
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस नारे मुख लपटायो ॥

तू जननी मन की अति भोरी, मिडिया कहे पतिआयो ।
जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो ॥

यह लै अपनी प्रेसिडेंटी , बहुतहिं नाच नचायो ।
‘मस्तान’ तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ॥

काला हास्य

विष्णु को मानने वाले वैष्णव थे अब सहिष्णु को मानने वाले सहैष्णव हैं !
गाँधी जी सहिष्णु हो कर मुझ हिन्दू अब हिष्णु को माफ़ कीजियेगा ! प्रस्तुत है दुःखी जनों के लिए मेरी पैरोडी

सहैष्णव जन तो तेने कहिये, जे स्टेटमेंट पराई जाणे रे
पर ट्वीट उपकार करे तोये, मन कमेण्ट न आणे रे ।।
सोशल मीडिया मां सहुने वन्दे, निन्दा न करे केनी रे ।।
असहिष्णु सहिष्णु मन निश्चल राखे, धन-धन जननी तेरी रे ।।

सहैष्णव जन तो तेने कहिये, जे स्टेटमेंट पराई जाणे रे ।।

किरण आमिर ने तृष्णा त्यागी, पर स्त्री जेने मात रे ।।
जिहृवा थकी असत्य न बोले, सत्यमेव जयते हाथ रे ।।
इनटोलेरेंट व्यापे नहि जेने, सेलिब्रेटी जेना तन मा रे ।।
राम नामशुं ताली लागी, सकल तीरथ तेना देश मा रे ।।
वण लोभी ने कपट रहित छे, काम क्रोध निवार्या रे ।।
मस्तान तेनु दरसन करता, मजोरिटी कुळ तार्या रे ।।

सहैष्णव जन तो तेने कहिये, जे स्टेटमेंट पराई जाणे रे ।।

वैष्णव जन तो तेने कहिये गुजरात के संत कवि नरसी मेहता द्वारा रचित भजन है जो महात्मा गाँधी को बहुत प्रिय था

आत्मरहस्य‬

एक यक्ष प्रश्न है-‘किमाश्चर्यं मतः परम’ अर्थात् सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? हम अपने आपको नहीं जानते यही सबसे बड़ा आश्चर्य है ! हजारों वर्षों से आदमी के सामने प्रश्न है – कोऽहम् ‘मैं कौन हूं ?’ ‘मैं कौन हूं’ इस प्रश्न के अन्वेषण में आदमी ने अपने अस्तित्व की कई परतें उघाड़ी ! उसे प्रतीत हुआ मेरा यह शरीर मैं नहीं है, मेरी इन्द्रियां, मेरी बुद्धि मैं नहीं है ! एक बिन्दु आया, एक अन्तिम ठहराव आया, साधक के अनुभव में, वह अनुभव था, ‘सोऽहम’ ‘मैं हूं’ मेरे सिवाय अन्य किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं है ! ऐसी कितनी ही बातें हैं और ज्ञान की तलाश का कोई निश्चित मार्ग नहीं है ! मैं #आत्मरहस्य को स्वयं अपने अनुभवों से और अनुभूतियों में तलाश रहा हूँ ! मैं अपनी आध्यात्मिक यात्रा में अकेला भटक रहा हूँ ! मेरी लेखनी से यह जाना जा सकता है ! मैं रोज लिखता हूँ जो मेरी अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों से निकली हुई अनर्गल भाव से होते हैं ! मैं अभी सूक्ष्म को नहीं जानता ! स्थूल को जानता हूँ ! शरीर को जानता हूँ ! जो मेरी भावनाओं में लिप्त है ! मैं अपनी पीड़ाओं को देखता हुआ जब अपनी आत्मा में झांकता हूँ तो मुझे कुम्हार के पके हुए बर्तन से दाग दीखते हैं ! कुम्हार के पास कई बर्तन बे दाग भी होते हैं ! लोग उनको ही लेना पसंद करते हैं ! पर मुझे वो बर्तन भी भाते हैं जिन पर भट्टी की आग की ताप की कालिख का दाग होता है ! और मैं अक्सर अपने आप को वैसा ही पाता हूँ ! अन्य सत्य भी है और जो मेरी अनुभूति है वो भी …

१.

पवित्र मन भी कहीं – कहीं से काला होता जाता है ! तपता हुआ, कुंदन होता हुआ, भष्म होने के लिए छोड़ दिया गया अहंकार, अज्ञान, काम, क्रोध, ईर्ष्या की ज्वाला की लपटें आत्मसाक्षात्कार की भट्टी पर चढ़ी आत्मा पर कालिख छोड़ ही जाती है …

२.

रात दिन के भरोसे नहीं रहती ! और दिन रात के भरोसे नहीं रहता ! रात, अपने सितारे अपना आकाश और अपना अँधेरा सब अपने साथ लाती है, और उन्हें अपने साथ ही ले जाती है ! दिन भी रात के लिए कुछ नहीं छोड़ता ! अपनी रौशनी, अपना आसमान और अपना तारा अपने साथ ही लाता है और उन्हें अपने साथ ही ले जाता है ! हम भी दोनों को अपने आप का अलग – अलग हिस्सा देते हैं ! दिन में हम अलग होते हैं, और रात में बिलकुल अलग ! हमारे दिन का मन अलग होता है और रात का बिलकुल अलग ! बीच – बीच में हम भी रात और दिन की तरह ही अलग – अलग होते हैं ! जैसे दिन में सुबह अलग होती है और दोपहर अलग ! रात में शाम अलग होती है और आधी रात अलग ! रात और दिन की तरह ही हम हर पल बदलते रहते हैं ! जैसे रात हर पल दिन की तरफ बढ़ती रहती है और दिन हर पल रात की तरफ बढ़ता रहता है ! हम भी कभी कहीं एक जैसे नहीं होते ! हमारी कोई रात किसी और रात सी नहीं होती ! हमारा कोई दिन किसी और दिन सा नहीं होता ! ये कोई जादू है या फिर कोई रहस्य ? कहाँ से आतीं हैं इतने रातें ? और कहाँ से आते हैं इतने दिन ? और इनको अलग – अलग देने के लिए हर पल हमारे पास अलग – अलग नया मन कहाँ से आता रहता है ?

३.

अपने ही मंदार में लिपटा हुआ आज मैं अपना नाग स्वयं था ! अपनी मुंह और अपनी पूँछ में बँटा हुआ अपनी मंथन में अपना वासुकि भी आज मैं स्वयं बना ! मेरे मुँह की तरफ मेरे दैत्य थे और मेरे देवताओं ने मेरी पूँछ पकड़ रखी थी ! भगवान नारायण ने दानव रूप से दानवों में और देवता रूप से देवताओं में शक्ति का संचार किया ! मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला ! विष की ज्वाला से मेरे देवता और मेरे दैत्य जलने लगे ! उनकी चमक फीकी पड़ने लगी ! मेरे देवताओं और मेरे दैत्यों ने मिल कर शिव की आराधना की ! नीलकण्ठ ने मेरी हथेली पर मेरे विष को रख दिया और मुझ से पीने के लिए कहा ! मैंने हलाहल उनकी चरणो में रख कर अपनी आँखें मूँद लीं ! मेरी आँखें जब खुलीं तो मेरी आंसुओं में आज मेरा सारा गरल बह गया ! आज अपने आत्ममंथन में अपना महादेव भी मैं स्वयं था …

४.

अंतरिक्ष के जिस रौशनी में अभी पृथ्वी नहा रही है वहां की रिक्तता कितनी भयावह होती होगी ? जब पृथ्वी घूमती हुई अन्धकार में चली जाती है, अंतरिक्ष के शून्य में व्याप्त रौशनी कितनी रिक्त और निर्जीव हो जाती होगी …

५.

डार से बिछुड़ते ही हम फिर मिलने की उम्मीद से बंध जाते हैं … टूटते ही फिर से जुड़ने की परिकल्पना बन जाती है … जाने के बाद ही आना होता है …सच के भरोसे ही झूठ को हम टटोलते हैं …पता नहीं ख़ुशी को ग़म के बगैर कैसे पहचानते… ? अन्त ही शुरुआत है  …

६.

मैं दो हिस्से में हूँ ! एक फूला हुआ और एक पिचका हुआ ! सांस लेता हूँ तो फूल जाता हूँ और जब सांस छोड़ता हूँ तो पिचक जाता हूँ ! इसके अलावा मैं और कोई नहीं हूँ ! मेरी इन दोनों अवस्था के अलावा अगर आप मुझे किसी और रूप में देखते हैं तो वो मिथ्या है, भ्रम है, दोष है, माया है, तृष्णा है ! और मेरा कोई ‘ब्रांच’ नहीं है जो मेरे फूलने और पिचकने के अलावा कुछ और करता हो ! देखिये अभी जैसे ही मुझे ये ज्ञान प्राप्त हुआ है मैं ख़ुशी से फूलने लगा हूँ ! और जैसे ही आप मेरी इस बात पर हंस देंगे मैं पिचक जाऊंगा ! लेकिन आप को हंसाने के बाद, पूरी तरह से पिचक जाने के बाद मैं फिर फूलने लगूँगा ! मैंने कहा न मेरी सिर्फ यही दो अवस्था है ! आप मुझसे मुंह फुला लीजिये या मेरे साथ हंस के अपना फेफड़ा खाली कीजिये और पिचक जाइए ! आप जैसे भी लेना चाहें मैं आप का साथ सिर्फ अपने दो हिस्सों से ही दे सकता हूँ ! आप चाहेंगे तो मैं आप के साथ फूल जाऊंगा और फिर हम एक साथ पिचक जायेंगे ! सांस लेता हूँ तो फूल जाता हूँ और जब सांस छोड़ता हूँ तो पिचक जाता हूँ ! आप कोई भी हों मैं अपने दोनों अवस्था के अलावा और कोई नहीं हूँ …

७.

दुःख से निकलने का निर्णय ही दुःख से निकलने का रास्ता है …

८ .

जी भर के रो लेने के बाद भी जीवन में वही बदलता है जो हम बदलना चाहते हैं ! रोना सिर्फ मन के दुःख को सहलाने का तरीका है …

क्रमशः

मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ?

मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ? आप मोदी रख लीजिये मैं देश रख लेता हूँ ! क्या ? आपको मोदी नहीं रखना ? ओ के ! फिर देश आप रख लीजिये मैं मोदी रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

मैं कार्टून रख लेता हूँ, आप संसद रख लीजिये ! क्या ? आपको संसद नहीं रखना ? ओ के ! फिर कार्टून आप रख लीजिये मैं संसद रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप किसान रख लीजिये मैं पोर्न रख लेता हूँ ! क्या ? आपको किसान नहीं रखना ? ओ के ! फिर पोर्न आप रख लीजिये मैं किसान रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप कांग्रेस रख लीजिये मैं आज़ादी रख लेता हूँ ! क्या ? आपको कांग्रेस नहीं रखना ? ओ के ! फिर आज़ादी आप रख लीजिये मैं कांग्रेस रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप सलामी रख लीजिये मैं तस्वीर रख लेता हूँ ! क्या ? आपको सलामी नहीं रखना ? ओ के ! फिर तस्वीर आप रख लीजिये मैं सलामी रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप विज्ञापन रख लीजिये मैं कार्यक्रम रख लेता हूँ ! क्या ? आपको विज्ञापन नहीं रखना ? ओ के ! फिर कार्यक्रम आप रख लीजिये मैं विज्ञापन रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप सिद्धांत रख लीजिये मैं शुभकामनाएँ रख लेता हूँ ! क्या ? आपको सिद्धांत नहीं रखना ? ओ के ! फिर शुभकामनायें आप रख लीजिये मैं सिद्धांत रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप संबंध रख लीजिये मैं दिशा रख लेता हूँ ! क्या ? आपको संबंध नहीं रखना ? ओ के ! फिर दिशा आप रख लीजिये मैं संबंध रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप विरोधी रख लीजिये मैं संस्कृति रख लेता हूँ ! क्या ? आपको विरोधी नहीं रखना ? ओ के ! फिर संस्कृति आप रख लीजिये मैं विरोधी रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप मामला रख लीजिये मैं माहौल रख लेता हूँ ! क्या ? आपको मामला नहीं रखना ? ओ के ! फिर माहौल आप रख लीजिये मैं मामला रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

आप रायता रख लीजिये मैं बूंदी रख लेता हूँ ! क्या ? आपको रायता नहीं रखना ? ओ के ! फिर बूंदी आप रख लीजिये मैं रायता रख लेता हूँ ! मैं अपने स्टेटस में क्या रखता हूँ ? आप अपने स्टेटस में क्या रखते हैं ?

काशी शरणम् गच्छामि !

१.

नीचे नीच पड़ा है, ऊँचे ऊँच
कहीं चोंच पड़ा है कहीं पूँछ !

शक्ल पड़ी है शीशे मे, अक्ल पडी है खीसे मे !

कहीं दाम पड़ा है, कहीं आम पड़ा है ,
कटा हुआ दिन सुबह से शाम पड़ा है !

टोपी पड़ी है, सर बड़ा है !

हाथ में बन्दूक है नाल पर घडी ,
छोटा मुँह और बात बड़ी !

समस्या पड़ी है, बन्द घड़ी है !
जात पड़ा है, हाथ पड़ा है, कहीं लात पड़ा है !

हवा बसात है,
मैं खुद पड़ा हूँ !

काशी शरणम् गच्छामि !

*

२.

डेमोक्रेसी का डांसर हूँ , पर फ्रीलांसर हूँ !
वोटिंग में रेगुलर हूँ , पर पार्टी में स्ट्रगलर हूँ !

रोज कर, कर भर कर, ये कर वो कर हूँ !
आप सरकार हैं, मैं आपका नौकर हूँ !

आप चाभी हैं, मैं लॉकर हूँ !
आप मास्टर हैं, मैं जोकर हूँ !

थप्पड़ हूँ, कीचड़ हूँ. कचड़ा हूँ ,
आप हाथ हैं, कमल हैं, झाड़ू हैं !

आप ब्लैकबोर्ड हैं, मैं डस्टर हूँ !
मैं क्वेश्चन हूँ , आप आंसर हैं !
मैं मंच हूँ आप डांसर हैं !

मैं प्यास हूँ आप कोला हैं !
आप नारियल हैं मैं टिकौला हूँ !

मैं जुआ हूँ आप तम्बोला हैं !

मैं दिवार हूँ आप पोस्टर हैं !

काशी शरणम् गच्छामि !