महालोक – पाँच

फेसबुक पर एक घंटे प्रति लाइक की दर से चलता हुआ विरोध का अवसाद जब महानगर पहुंचा तो यहाँ मधुशाला में बोहनी हो चुकी थी जिस्म का बाज़ार अंगड़ाई ले रहा था और पांच सौ रूपये में भी बलात्कार करने वाले कम पड़ रहे थे ! धन्धे वालियाँ अपने खोटे नसीब को रो रही थी और धंधे के समय बैठ कर टी वी पर ठंढी राजधानी में हुए रेप का न्यूज़ देख कर मर्दों को मिस कॉल दे रही थीं ! साले मर्दों को आज की ‘रेप’ में पता नहीं क्या मजा आ रहा था …! इतने में शायद किसी का मोबाइल बजा तो, पर वो भी किसी लुख्खे का था ‘ग्राहक’ का नहीं … ‘साले मादरचोद मर्द …’ कोई टी वी पर रोती हुई एक लड़की की तरफ देख के बुदबुदाई … सब हंस पड़े … अभी राजधानी – गेट से आन्दोलन  का आँखों देखा हाल आना बचा था …

कोट – अनकोट – मिसकोट उर्फ़ मेरा कोट तेरा खोट

एक / मिसकोट उर्फ़ मेरा कोट तेरा खोट

कम शब्दों का इस्तेमाल मेरी अपनी शब्द साधना है ! बचपन से मिली कम बोलने और कम में बोलने की नसीहत पर जब अमल शुरू किया तो शब्दों की महत्ता समझ में आने लगी ! प्रस्तुत उदहारण शायद एक साधारण  दस्तूर हो पर मेरी अपनी समझ के लिए बहुत मत्वपूर्ण है ! बहुत ही मार्मिक घटना पर मेरी प्रतिक्रिया का जब ‘कोट‘ बना तो मामूली शब्दों के हेर फेर से अर्थ के वज़न में फर्क पड़ा और ‘कोट’ का ‘नाप’ बदल गया ! ‘कट – पेस्ट’ में ‘कोट’ कैसे बदल सकता है ? फिर ‘कोट’ कैसे बना ? शब्द बदलने से ‘कोट’ बदल सकता है और अपना ‘कोट’ किसी और के ‘माप’ का हो सकता है …

मैंने लिखा था – ‘पेशाब के रास्ते ‘मर्द’ पहुंचना कहाँ चाहते हैं ?’ और ‘कट पेस्ट’ से हो गया – ” मर्द पेशाब के रास्ते आखिर जाना कहां चाहता है.”
आज नहीं तो कल ऐसे ही मल्टी – मिडिया अर्थ के अनर्थ का कारण बन सकती है ! हमें शब्दों के प्रति सचेत रहना चाहिए और उसके मामूली परिवर्तन के प्रभाव को कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए !

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कोट – अनकोट – मिसकोट उर्फ़ मेरा कोट तेरा खोट 

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दो / वर्ना हम Vernacular

कुछ दिन पहले अपने राज्य के एक अखबार के लोकल पन्ने पर मेरी फेसबुक प्रोफाइल छापी गयी !

ख़ुशी भी है और छोटी छोटी प्रिंटिंग मिस्टेक से दुःख भी ! ख़ुशी इस बात की ज्यादा है  कि सबने मेरा प्रोफाइल पढ़ा !

पर क्या मेरे फेसबुक पत्रकार मित्र महोदय मेरा प्रोफाइल पढ़ नहीं सके या क्या पता मेरा प्रोफाइल वहां पहुँचते पहुँचते थक गया हो और सब झिलमिल – झिलमिल हो गया हो !

खैर आप खुद देख लें वर्ना हम Vernacular कैसे होंगे ?

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मेरा बर्थडे २२ अगस्त है और ये फेसबुक को भी पता है !

२६ अप्रैल को मेरा STATUS था – ‘आप का मुखड़ा किसी जीवन का अंतरा है 🙂 ‘ ( ‘मंत्रा’ देना मुझे कहाँ आता है ? )

मेरी फिल्म का नाम ‘प्राण जाये पर शान न जाये है ‘

कई फिल्मों का निर्देशन मैंने नहीं किया है …तीन फिल्मे बनाई हैं ! एक फिल्म ‘मुंबई चकाचक’ रिलीज़ नहीं हुई है !

directorji@gmail.com मेरा इ मेल आई डी है URL (Uniform resource locator ) नहीं !

 

महानगर की लोक कथा / महालोक – चार

एक लड़की थी जो अपना नाखून डर के चबा लेती थी ! उसको अँधेरे से डर लगता था ! रौशनी की तलाश में वो मुंबई आ गयी ! मुंबई में बिजली नहीं जाने की वजह से उसका डर कम हो गया और उसके नाखून बढ़ने लगे ! उसके अंदर इतना नाखून था ये उसको भी नहीं पता था ! वो उसे रंगने लगी ! नाखूनों को सजाने लगी ! उसे अपनी उँगलियों से प्यार हो गया और वो प्यारी लगने लगी ! लड़की की नाखून से एक लड़के को प्यार हो गया ! लड़का लड़की को जंगली कहता और उसकी फोटो खींचता ! लड़के ने प्रेम गीत के कई शब्द लड़की के कान में भर दिए और आँखों में प्यार का सपना ! लड़की प्रेम में अंधी और बहरी हो गयी थी ! एक दिन लड़की सपने देख रही थी और लड़का सपने में उसके साथ था ! लड़के ने उसके आँखों पर पट्टी बाँध के खेल खेल में ही उसे अपने आप को ढूँढने छोड़ दिया और खुद सपने से बाहर आ गया ! वो अपने साथ एक नेल कटर ले के आया था ! उसने देखा लड़की सपने में खोयी हुई है ! उसने लड़की के नाखून काट दिए ! लड़की सपने के अंदर थी और असकी आँखें बंधी थी ! जब लड़का बहुत देर तक उसको नहीं मिला तो उसने अँधेरे से डर के आँखों पर से पट्टी हटा ली ! डर से लड़की की पुतली बड़ी हो गयी थी, उसकी आँखें चुंधिया गयीं और वो चौंक के सपने से बाहर आ गयी ! उसने देखा उसके सुंदर रंगीन नाखून वहीँ कटे हुए गिरे पड़े हैं और लड़का गायब है ! लड़का अब न सपने में था न कमरे में ! वो दुःख से रोने लगी ! उसके नाखून वहीँ लाश की तरह पड़े थे ! लड़की को प्यार में धोखा हुआ था ! वो बहुत रोई ! पहले तो आंसूं से उसके कपडे भींग गए ! फिर उसके जूते आंसूं से भर गए ! फर्श सीढ़ी की तरफ झुका था और आंसू सीढ़ी से उतरने लगे ! जंगली लड़की के अंदर एक पहाड़ी झरना था ! जो दुःख में फट के लड़की से बाहर आ गया ! लोग आंसूं की धार से बच – बच के चलने लगे ! मुंबई में लोग पाँव से ज्यादा अपने जूते बचा के चलते हैं ! लड़की रोती रही आंसू बहता रहा लोग आते जाते जूते बचाते रहे ! पता नहीं कैसे पर लड़की की आंसू का स्वाद नमकीन नहीं था ये सबको पता चल गया ! बहुत सारे लोग जंगली लड़की के मीठे आंसू बोतल में भर के घर ले गए और कुछ रास्ते में बेचने लगे ! शहर प्यासा था ! पूरा शहर जंगली लड़की के आंसू पी रहा था ! महानगर में इतना आंसू किसी ने नहीं बहाया था ! धीरे धीरे लड़की की आँखें सूख गयीं ! पर बोतल में पानी अब भी बिक रहा है !

( आदिवासी साहित्य – Adivasi Literature में प्रकाशित  )

'आदिवासी साहित्य - Adivasi Literature' पत्रिका के लिए adivasipatrika@gmail.com मेल पर संपर्क कर सकते हैं !

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