महालोक – आठ

नगर का हाल विचित्र था, लोग छुप कर जूता और स्याही फेंकने का अभ्यास कर रहे थे … एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए किराये पर चलता फिरता घर मिल जाता जिसमे सिर्फ बैठने की जगह होती … योनी की जगह दिमाग था और सबके दिमाग में सिर्फ योनी थी … सबसे सार्वजनिक चीज को गुप्तांग कहते थे ! सब जेब से सिर्फ अपने हिस्से की धातु निकालते या सबसे छुपा कर रखा गया कई अंकों के कागज़ का एक जैसा टुकड़ा जिसके बदले कोई दूसरा उनको वैसा ही टुकड़ा पकड़ा देता ! अलग अलग तरीके से दिन भर सब यही करते ! आँखों की चमक नाखूनों में थी और जूते चमकाने के लिए लोग सड़क के किनारे इंतज़ार करते ! खाना सबसे ज्यादा था और सब उसी का व्यापार कर रहे थे ! अपने बच्चों को दिन भर सब एक जगह छुपा कर रखते थे ! बच्चे वहां जाने से रोते और फिर उनकी आदत वैसी ही हो जाती … बड़े होकर वो भी छुप कर जूता और स्याही फेंकने का अभ्यास करते …