महालोक – दस

उर्दू सब नहीं पढ़ सकते यही सोच के हिंदी में लिखने की योजना बनी ! बोर्ड पर लगने वाले अक्षर की पुडिया में एक ही ‘त’ था और ‘त’ भारत में लग चुका था इसलिए मुल्ला साहेब ने ‘क’ से काम चलाया जो एक्स्ट्रा था ! पर तब तक फतवा ‘फकवा’ बन गया था … नोटिस पढने वाले हंस रहे थे …

महालोक – नौ

वो कन्फ्यूज हो गया था ! एक रूपया लो तो सिक्सटी नाइन रुपया मिलेगा या किसी को एक रूपया देना हो तो सिक्सटी नाइन रूपया देना पड़ेगा ? ये सोचते हुए वो रुपया को गौर से देखने लगा ! अंगूठा दिखाता हुआ ठंढे लोहे का रूपया बिलकुल वैसा ही था, फिर क्या सिक्सटी नाइन हुआ है रूपये के साथ ? बस का कंडक्टर सबसे रूपये ले रहा था और सही टिकट दे रहा था ! पान वाले ने भी रुपया में रुपये की चीज़ दे दी ! दियासलाई की हर तीली रुपये की खरीदी हुई थी जिसकी आग में करोड़ों भस्म करने की वैसी ही ताकत थी जो रुपये के इस हाल में भी है ! फिर उसने दस बीस और पचास को भी आजमा के देख लिया ! सौ में भी वो सब आज मिल रहा था जो कल मिल रहा था ! फिर साला सब दिमाग का सिक्सटी नाइन क्यों कर रहे हैं ? तभी किसी ने उसको पीछे से आवाज़ दी … उसने देखा चाय वाला हाथ दे कर उसको रोक रहा है और छोटू दौड़ता हुआ उसकी तरफ आ रहा है … आपका रुपया रह गया था कहते हुए उसने अपने गीले हाथ से मेरे हाथ में एक गीला ठंढा अंगूठा दिखाता हुआ रुपया रख दिया ! मैंने तो उसके लिए ही रुपया छोड़ा था … सब रुपया से पीछा क्यों छुड़ा रहे हैं …घर लौटते हुए वो यही सोच रहा था !