एहसास का स्वगत 

मंच पर अँधेरा था ! मैंने टटोल कर अपने पाँव रखे ! मंच पर रौशनी आने से पहले मेरा पैर उसकी छाती पर होना जरुरी है ! दर्शकों के लिए ये वो क्षण है जब मंच पर काली को अपने रौद्र रूप में देखेंगे !

मेरी ये कोशिश रहती है कि मेरे पाँव का दवाब संतुलन में रहे ! किसी पुरुष की छाती पर अपना पैर रखने का ये मेरा पहला अनुभव है ! मैं जैसे ही उसकी छाती पर पाँव रखती हूँ मेरे ह्रदय से तनाव और भय का नाश हो जाता है !

मेरी छाती तेज़ धड़कने लगी है ! अगले क्षण मेरी छाती पर स्त्री का पैर आने वाला है ये सोच कर मेरा रोम रोम काँप जाता है ! पता नहीं शिव की छाती पर अपने पाँव रख कर काली को क्या एहसास हुआ पर मेरी छाती पर एक स्त्री का पैर मुझे उन्मुक्त पुरुष बना जाता है !

मंच पर रौशनी आते ही दर्शकों को लगता है कोई जादू हो गया हो ! स्त्री पुरुष का ऐसा साक्षात दर्शन देख कर दर्शक मुग्ध हैं ! दर्शकों की तालियाँ सुन कर लगता है जैसे उन्होंने अभिनेताओं के दिल की मौन धड़कन सुन ली हो !

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