एक कवि दो पैरोडी

१. पकोड़े की अभिलाषा

चाह नहीं मैं बेरोज़गारों के
बेरोज़गारी में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं संसद में
छन जनता को ललचाऊँ,
चाह नहीं, मन्नतों के चौखट 
पर, हे हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के शिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ !
मुझे छान लेना हलवाई 
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि में भीख मांगने 
जिस पथ जाएँ बेरोज़गार अनेक !

२.  नागरिक की अभिलाषा 

चाह नहीं मैं बिन गढ्ढों के सड़क पर चल पाऊँ 
चाह नहीं मैं अपनी असहमति कहीं भी दर्ज़ कर पाऊँ 
चाह नहीं मैं देश का अपने गौरव गाथा गाउँ 
चाह नहीं मैं बॉर्डर पर मर जाऊं और झंडे में लिपटा जाऊँ 
मुझे रोक लेना प्रधानमंत्री जी 
उस पथ पर देना तुम फेंक,
हॉकी लेकर दंगा करने 
जिस पर जाएँ काँवरिया अनेक ! 

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