आत्मरहस्य‬

एक यक्ष प्रश्न है-‘किमाश्चर्यं मतः परम’ अर्थात् सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? हम अपने आपको नहीं जानते यही सबसे बड़ा आश्चर्य है ! हजारों वर्षों से आदमी के सामने प्रश्न है – कोऽहम् ‘मैं कौन हूं ?’ ‘मैं कौन हूं’ इस प्रश्न के अन्वेषण में आदमी ने अपने अस्तित्व की कई परतें उघाड़ी ! उसे प्रतीत हुआ मेरा यह शरीर मैं नहीं है, मेरी इन्द्रियां, मेरी बुद्धि मैं नहीं है ! एक बिन्दु आया, एक अन्तिम ठहराव आया, साधक के अनुभव में, वह अनुभव था, ‘सोऽहम’ ‘मैं हूं’ मेरे सिवाय अन्य किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं है ! ऐसी कितनी ही बातें हैं और ज्ञान की तलाश का कोई निश्चित मार्ग नहीं है ! मैं #आत्मरहस्य को स्वयं अपने अनुभवों से और अनुभूतियों में तलाश रहा हूँ ! मैं अपनी आध्यात्मिक यात्रा में अकेला भटक रहा हूँ ! मेरी लेखनी से यह जाना जा सकता है ! मैं रोज लिखता हूँ जो मेरी अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों से निकली हुई अनर्गल भाव से होते हैं ! मैं अभी सूक्ष्म को नहीं जानता ! स्थूल को जानता हूँ ! शरीर को जानता हूँ ! जो मेरी भावनाओं में लिप्त है ! मैं अपनी पीड़ाओं को देखता हुआ जब अपनी आत्मा में झांकता हूँ तो मुझे कुम्हार के पके हुए बर्तन से दाग दीखते हैं ! कुम्हार के पास कई बर्तन बे दाग भी होते हैं ! लोग उनको ही लेना पसंद करते हैं ! पर मुझे वो बर्तन भी भाते हैं जिन पर भट्टी की आग की ताप की कालिख का दाग होता है ! और मैं अक्सर अपने आप को वैसा ही पाता हूँ ! अन्य सत्य भी है और जो मेरी अनुभूति है वो भी …

१.

पवित्र मन भी कहीं – कहीं से काला होता जाता है ! तपता हुआ, कुंदन होता हुआ, भष्म होने के लिए छोड़ दिया गया अहंकार, अज्ञान, काम, क्रोध, ईर्ष्या की ज्वाला की लपटें आत्मसाक्षात्कार की भट्टी पर चढ़ी आत्मा पर कालिख छोड़ ही जाती है …

२.

रात दिन के भरोसे नहीं रहती ! और दिन रात के भरोसे नहीं रहता ! रात, अपने सितारे अपना आकाश और अपना अँधेरा सब अपने साथ लाती है, और उन्हें अपने साथ ही ले जाती है ! दिन भी रात के लिए कुछ नहीं छोड़ता ! अपनी रौशनी, अपना आसमान और अपना तारा अपने साथ ही लाता है और उन्हें अपने साथ ही ले जाता है ! हम भी दोनों को अपने आप का अलग – अलग हिस्सा देते हैं ! दिन में हम अलग होते हैं, और रात में बिलकुल अलग ! हमारे दिन का मन अलग होता है और रात का बिलकुल अलग ! बीच – बीच में हम भी रात और दिन की तरह ही अलग – अलग होते हैं ! जैसे दिन में सुबह अलग होती है और दोपहर अलग ! रात में शाम अलग होती है और आधी रात अलग ! रात और दिन की तरह ही हम हर पल बदलते रहते हैं ! जैसे रात हर पल दिन की तरफ बढ़ती रहती है और दिन हर पल रात की तरफ बढ़ता रहता है ! हम भी कभी कहीं एक जैसे नहीं होते ! हमारी कोई रात किसी और रात सी नहीं होती ! हमारा कोई दिन किसी और दिन सा नहीं होता ! ये कोई जादू है या फिर कोई रहस्य ? कहाँ से आतीं हैं इतने रातें ? और कहाँ से आते हैं इतने दिन ? और इनको अलग – अलग देने के लिए हर पल हमारे पास अलग – अलग नया मन कहाँ से आता रहता है ?

३.

अपने ही मंदार में लिपटा हुआ आज मैं अपना नाग स्वयं था ! अपनी मुंह और अपनी पूँछ में बँटा हुआ अपनी मंथन में अपना वासुकि भी आज मैं स्वयं बना ! मेरे मुँह की तरफ मेरे दैत्य थे और मेरे देवताओं ने मेरी पूँछ पकड़ रखी थी ! भगवान नारायण ने दानव रूप से दानवों में और देवता रूप से देवताओं में शक्ति का संचार किया ! मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला ! विष की ज्वाला से मेरे देवता और मेरे दैत्य जलने लगे ! उनकी चमक फीकी पड़ने लगी ! मेरे देवताओं और मेरे दैत्यों ने मिल कर शिव की आराधना की ! नीलकण्ठ ने मेरी हथेली पर मेरे विष को रख दिया और मुझ से पीने के लिए कहा ! मैंने हलाहल उनकी चरणो में रख कर अपनी आँखें मूँद लीं ! मेरी आँखें जब खुलीं तो मेरी आंसुओं में आज मेरा सारा गरल बह गया ! आज अपने आत्ममंथन में अपना महादेव भी मैं स्वयं था …

४.

अंतरिक्ष के जिस रौशनी में अभी पृथ्वी नहा रही है वहां की रिक्तता कितनी भयावह होती होगी ? जब पृथ्वी घूमती हुई अन्धकार में चली जाती है, अंतरिक्ष के शून्य में व्याप्त रौशनी कितनी रिक्त और निर्जीव हो जाती होगी …

५.

डार से बिछुड़ते ही हम फिर मिलने की उम्मीद से बंध जाते हैं … टूटते ही फिर से जुड़ने की परिकल्पना बन जाती है … जाने के बाद ही आना होता है …सच के भरोसे ही झूठ को हम टटोलते हैं …पता नहीं ख़ुशी को ग़म के बगैर कैसे पहचानते… ? अन्त ही शुरुआत है  …

६.

मैं दो हिस्से में हूँ ! एक फूला हुआ और एक पिचका हुआ ! सांस लेता हूँ तो फूल जाता हूँ और जब सांस छोड़ता हूँ तो पिचक जाता हूँ ! इसके अलावा मैं और कोई नहीं हूँ ! मेरी इन दोनों अवस्था के अलावा अगर आप मुझे किसी और रूप में देखते हैं तो वो मिथ्या है, भ्रम है, दोष है, माया है, तृष्णा है ! और मेरा कोई ‘ब्रांच’ नहीं है जो मेरे फूलने और पिचकने के अलावा कुछ और करता हो ! देखिये अभी जैसे ही मुझे ये ज्ञान प्राप्त हुआ है मैं ख़ुशी से फूलने लगा हूँ ! और जैसे ही आप मेरी इस बात पर हंस देंगे मैं पिचक जाऊंगा ! लेकिन आप को हंसाने के बाद, पूरी तरह से पिचक जाने के बाद मैं फिर फूलने लगूँगा ! मैंने कहा न मेरी सिर्फ यही दो अवस्था है ! आप मुझसे मुंह फुला लीजिये या मेरे साथ हंस के अपना फेफड़ा खाली कीजिये और पिचक जाइए ! आप जैसे भी लेना चाहें मैं आप का साथ सिर्फ अपने दो हिस्सों से ही दे सकता हूँ ! आप चाहेंगे तो मैं आप के साथ फूल जाऊंगा और फिर हम एक साथ पिचक जायेंगे ! सांस लेता हूँ तो फूल जाता हूँ और जब सांस छोड़ता हूँ तो पिचक जाता हूँ ! आप कोई भी हों मैं अपने दोनों अवस्था के अलावा और कोई नहीं हूँ …

७.

दुःख से निकलने का निर्णय ही दुःख से निकलने का रास्ता है …

८ .

जी भर के रो लेने के बाद भी जीवन में वही बदलता है जो हम बदलना चाहते हैं ! रोना सिर्फ मन के दुःख को सहलाने का तरीका है …

क्रमशः

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