शब्दयोग‬

मैंने देखा शब्द एक दुसरे को खा रहे हैं ! खाते हुए वे एक दूसरे को देख भी नहीं रहे थे ! ‘विमर्श’ ‘अध्यक्ष’ को खा गया ‘टिप्पणी’ ‘पार्टी’ को खा गयी ! ‘विरोधी’ ‘गतिविधि’ को खा रहे थे ! ‘दिल’ ‘प्रेरणा’ को खा रहा था ! एक या अधिक वर्णों से बनी हुई स्वतंत्र सार्थक ध्वनि भी एक दूसरे को खा रहे थे ! एक वर्ण से निर्मित शब्द अनेक वर्णों से निर्मित शब्द को खा रहे थे ! ‘शेर’ को ‘कुत्ता’ खा रहा था ! बनावट के आधार पर बने शब्द भी अपने सारे भेद को भुला कर एक दुसरे को खा – चबा रहे थे ! ‘रूढ़’ को ‘योगिक’ खा रहा था ‘योगिक’ को ‘योगरूढ़’ ! ‘तत्सम’ ‘तद्भव’ को खा रहा था ! ‘तद्भव’ ‘देशज’ को खा रहा था ! ‘देशज’ को ‘विदेशज’ खा रहा था ! ‘मुद्दा’ ‘मीडिया’ को खा रहा था ! ‘बयान’ को ‘प्रवक्ता’ खा गया ! ‘रंग’ को ‘राजनीती’ खा गयी ! ‘चीन’ को ‘सेक्स’ खा रहा था ! ‘दुनिया’ ‘राजधानी’ को खा रही थी ! ‘स्त्री’ को ‘विज्ञापन’ खा रहा था ! ‘कमज़ोर’ को ‘पत्नी’ खा रही थी ! ‘संज्ञा’ को ‘सर्वनाम’ खा रहा था ! ‘सर्वनाम’ को ‘विशेषण’ खा रहा था ! ‘विशेषण’ को ‘क्रिया’ खा रहा था ! ‘विकारी’ को ‘अविकारी’ खा रहा था ! ‘अर्थ’ को ‘दृष्टि’ खा रही थी ! ‘सार्थक’ को ‘निरर्थक’ खा रहे थे ! ‘कमल’ ‘परमात्मा’ ‘सर्वव्यापी’ सब खाए जा रहे थे ! अलग अलग भाषाओँ के शब्द को अलग अलग भाषाओँ के शब्द खा रहे थे ! उर्दू का ‘शख़्स’ अंग्रज़ी का ‘एजेंडा’ खा गया ! अंग्रेजी का ‘टेलीविजन’ फ़ारसी के ‘आदमी’ को खा गया ! अरबी का ‘रिश्वत’ तुर्की के ‘दरोगा’ को खा गया ! पुर्तगाली का ‘तिज़ोरी’ फ्रांसीसी ‘पुलिस’ को खा रहा था ! यूनानी ‘एटम’ को डच का ‘बम’ खा गया ! ‘व्याकरण’ ‘उपमान’ को खा रहे थे ! शब्द की सारी शक्तियां ‘अभिधा’ ‘लक्षणा’ और ‘व्यंजना’ को खा रहे थे ! मुझ से देखा नहीं गया ! मैं अच्छी तरह जानता हूँ ! सारे शब्द जब खा लिए जायेंगे फिर भी ‘ईश्वर’ ‘प्रेम’ और ‘संसार’ बचा रहेगा ! अंतरिक्ष में नए घर बनेंगे, नया प्रेम होगा और शब्द ही नए शब्द को गढ़ लेंगे !

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