एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खाई

मैं सोचता हूँ अपने ‘स्वाभिमान’ में ‘परिवर्तन’ कैसे लाऊँ ? या ऐसा ‘परिवर्तन’ कैसे लाऊँ कि मेरा ‘स्वाभिमान’ कायम रहे ! बिहारी होने की वजह से रैली, रैला, महारैली, महारैला सबसे ऊब चूका हूँ ! रैली सिर्फ भीड़ की राजनीती है ! गुलामी से निकलने के लिए आजादी की लड़ाई में हमने जिन हथियारों का इस्तेमाल किया था ‘रैली’ उन्ही में से एक है ! आज हम आज़ाद हैं और प्रतिरोध की ये भाषा अब आउट – डेटेड है ! मीडिया और सोशल नेटवर्किंग के महाजाल में आज जागरूकता नए आयाम में है ! शर्म की बात है कि आज भी हमें अपने अधिकारों के लिए भीड़ जमा कर के प्रतिरोध के स्वर में एक होना पड़ता है ! ऐसी रैलियों में जनता की हालत भेड़ – बकरियों से कम नहीं होती जिसे राजनितिक दल देश भर में सामूहिक कल्याण के नाम पर अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते हैं ! हम विकास के नाम पर कब तक अपनी इज्ज़त की रैली निकालते रहेंगे ? चेतना से घर बैठे जो निर्णय ले सकते हैं उसके लिए अपनी सुरक्षा, सम्मान और मानवीय अधिकारों को दाव पर लगा के स्वार्थी नेताओं के महत्वकांक्षा की आग को कब तक बुझाने के काम आयेंगे ? हम कब तक भीड़ बने रहेंगे ? मैदान भरने की राजनीति सिर्फ कुर्सी भरने की राजनीती होती है ! और ऐसी राजनीती से बिहार में विकास और विज़न अब तक नहीं आया !
बिहार के युवा बिहार में क्यों नहीं हैं ? बिहार को ओल्ड ऐज होम किसने बनाया ? बिहार में जो बचे हुए युवा हैं वो सुबह उठ कर शराब से कुल्ला क्यों करने लगे ? किसी गाँव में दवा की दूकान उतने पास नहीं मिलेगी जितने पास अब शराब की दुकान मिल जाएगी ! गाँव के दसो द्वार पर शराब की दुकान को बंद करने की सख़्त जरुरत है ! सरकार की देख रेख में बिहार के अड़तीस जिलों में एक सांस्कृतिक आंदोलन की सख़्त ज़रूरत है ! बिहार में रह रहे और प्रवासी बिहारियों को बिहार का भगदड़ देखने के लिए पटना जाने की जरुरत नहीं है, अपने दिल में झाँकें भगदड़ दिख जाएगा ! और इन समस्याओं के भगदड़ से निकलने के लिए भी हमें अपने दिल में ही झांकना होगा ! कभी कभी खुली आँखों से मैं ये सपना देखता हूँ कि बिहार को भगदड़ का प्रतीक बनाने वाले नेताओं को भीड़ रौंद रही है ! “ बिहार को आप किस रूप में देखना चाहते हैं और इस चुनाव से आपकी क्या उम्मीदें हैं ? “ इस सवाल से अब हर बिहारी थक चुका है ! हम बिहार वासियों का दुर्भाग्य है कि आज हमारे सामने एक तरफ कुआँ है तो दूसरी तरफ खाई …

( प्रभात खबर में प्रकाशित )

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