महालोक में गणपति विसर्जन / शब्द – चित्र : महालोक – एक

गणपति विसर्जन चल रहा था ! भक्त थे, भीड़ थी ! भीड़ देख के भीड़ बढती है ! भीड़ बनना बहुत बड़ा मानवीय गुण है और भीड़ बन पाना बहुत बड़ा सौभाग्य ! भीड़ को चीरता हुआ मुझे एक आदमी मिला जो मुझ सा ही भटका हुआ था ! हम दोनों भीड़ थे ! वो कहीं से भाग के आ रहा था ! हांफ रहा था और मै सहमा खड़ा था, हम दोनों में बस यही फर्क था ! वो अपने हाथ से गोल गोल के इशारे कर के मुझसे कुछ पूछ रहा था पर मै कुछ सुन नहीं पा रहा था , वहां बहुत शोर था ! लोग दल में बँट कर छोटे बड़े ढोल को पीट रहे थे ! ढोल की आवाज़ इतनी थी की आवाज़ में सिर्फ ढोल पीटने का एक्शन दिख रहा था ! तेरह चौदह साल के लौंडों की वहीँ एक जमात थी जिनके हाथों में डंडे नुमा कई चीजें थीं ! सोटा , बेंत , पाइप के टुकड़े , मोटी छड़ी ! वो सड़क के आवारा देसी शहरी कुत्तों को दूंढ – दूंढ के सूत रहे थे और लंगडाते कींकियाते कुत्ते दुबकने की जगह दूंढ रहे थे ! मोबाइल डबल रोल में था, अपने अपने करतूतों का मोबाइल से सब फोटो भी खींच रहे थे और वो कान ढकने के भी काम आ रहा था !  अफरा तफरी मची थी ! उत्साही कार्यकर्ता प्रसाद के तौर पर ग्लूकोज बिस्कुट के बुरादे पकड़ पकड़ के हाथों में ठूँस रहे थे ! सड़क के किनारे किनारे मंडलियाँ जमी थीं ! जहां कहीं भी चार खड़े थे, मिल के ताड़ रहे थे ! बिसलेरी के बोतल में सबका पानी पतला और भूरा हो गया था ! गर्मी और उमस में पसीने से लथ पथ सजी औरतें भीड़ में बह रही थीं ! आवाज़ की कीचड़ में सब के कान सने थे ! बच्चों का सबसे बुरा हाल था ! वो रो और बिलबिला रहे थे !  वो शोर से थक चुके थे ! एक – एक कर के उनके हाथों से छूट के चाइनीज खिलोने भक्तों के पाँव चढ़ रहे थे ! बच्चों की आँखें उनींदी हो चली थीं और उनके हाथों से गुब्बारे छूट के उड़ रहे थे ! एक सौ इक्कीस दशमलव चार डेसिबल में चौंधियाया आकाश सब शोर निगल रहा था और चाँद मटियामेट शोर के बादल में धंसा हुआ था !

कट टू – चाँद ! चाँद पर श्री गणेश जी बैठे हैं और चाँद ट्रक पर सवार है ! गणेश जी के साथ ट्रक पर बेसुध भक्त भी हैं ! चप्पल पहने पैर लटकाए भक्तों ने ट्रक पर अपनी झालर बना के अपनी ही झांकी निकाल ली है ! आज वे सब स्व – मूर्त हो गए हैं ! तभी चाँद पर से गणेश जी को उतारते हुए ट्रक पर एक भक्त ज्यादा झुक गया और बप्पा के हाथ के थाल से एक लड्डू लुढ़क गया ! बात कानो कान फैल गयी ! हाथों हाथ लोग लड्डू ढूँढने लगे !  सामने तट था ! किनारे पर अफरा तफरी मच गयी ! अचानक  इस बात की होड़ लग गयी कि लड्डू किसको मिलता है ! सब अपने अपने अनुमान की दिशा में लपक लिए ! लोग ऐसे भाग रहे थे जैसे घर भागा जा रहा हो ! वहीँ मेडिकल का कचड़ा खुले में बह रहा था ! कचरे का सिरिंज सबको चुभ रहा था ,लोग बेखबर थे ! समुद्र भी चढ़ने लगा ! छ्प – छ्प का संगीत फच – फच हो गया ! लोग फक – फक करने लगे ! किनारे लगे नावों की रस्सी रेत में धंसी थी जो अब निकल के लोगों के पाँव में फंसने लगी ! लोग गिरने लगे और आँख वाले अंधे भक्त उन पर लुढ़क गए ! लड्डू भी धीरे धीरे ढलान पकड़ चूका था ! वो भी लुढ़क रहा था ! इतनी भीड़ थी, सब दिशा भ्रमित हो गए ! लड्डू अब तक किसी के हाथ नहीं आ सका था मानो अंधे भक्तों के बीच लड्डू बच बच के लुढ़क रहा हो ! लोग बे – सब्र होते जा रहे थे , भाग रहे थे और हाथ से गोल गोल इशारे कर रहे थे !

कट टू – श्री गणेश जी ! भगवान् और भक्त सूंड से सूंड मिला के नाच रहे थे ! गणेश जी फोटो भी खिंचवा रहे थे ! बड़े बड़े काले भुजंग स्पीकर भक्तों के कान को चाट रहे थे ! सबके कान गीले थे ! बियर कान से बह रहा था ! हाथ लहरा – लहरा कर भक्त वो सब बन रहे थे जो उनका मन कर रहा था !  तितली , नाग , अम्पायर ! भीड़ हाथ हिला के छः रनों का इशारा कर रही थी ! लड्डू शायद बाउंड्री के बाहर था !

कट टू – भीड़ ! भीड़ अपने मन से बढ़ने लगी ! लड्डू के बहाने सब निकल पड़े थे ! भक्त भक्त को ढूंढ रहे थे ! लगा लड्डू नहीं उनकी लाज है ! कल कुछ भी नहीं बस सब आज है ! अफवाह जब फैलती है तो सब लड्डू जैसा गोल हो जाता है ! गणपति जी के लड्डू को लुढ़कते गनीमत है मिडिया ने नहीं देखा और न ही दिखाया नहीं तो पता नहीं देश भर में क्या हुआ होता ! आज सड़क पर गाड़ी नहीं थी इसीलिए गढ्ढे भी नहीं थे ! आज सड़क पर सिर्फ भीड़ थी ! लोग एक दुसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे सब लड्डू हों ! आज न कोई आगे था न पीछे , न दायें था न बाएं , बस सब लड्डू जैसा गोल था !

कट टू – लड्डू  ! अंततः लड्डू लुढ़क के पानी में चला गया था और कागज़ की नाव की तरह गल गया ! प्लास्टिक का कचरा क्या जाने लड्डू का स्वाद !

कट टू – स्वंम !  ‘श्री गणेश भवन’ से गुजरते समय मुझे प्रिय लड्डू मिल गए ! उन्होंने ये कहानी सुनायी ! वो हंस हंस के ढेर हो रहे थे ! हँसते हुए ही उन्होंने कहा जो लड्डू लुढका था वो मै ही हूँ… ! मै तो सबके पास हूँ ! भक्तों को लगा मै खो गया हूँ … हा हा हा !

 

कट टू – सूचना ! मेरी इस कहानी को दिल पर मत लीजियेगा और हार्ड डिस्क पर लीजियेगा तो बता दीजियेगा ! इसे नाटकीय दृश्य समझ कर पढ़ें और आनंद लें !

कट टू – दी एंड ! शब्द – चित्र  “गणपति विसर्जन ” !

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@ + + + + + + + = © संजय झा मस्तान ,२०१२ .

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2 Responses to महालोक में गणपति विसर्जन / शब्द – चित्र : महालोक – एक

  1. anand says:

    kahani bahut romachit h

  2. Jaya Sathaye says:

    Very very interesting! It makes me wonder how exactly a fiction writer’s mind works! I mean something like a ganpati visarjan crowd – there is such a stark difference between the way you see it and the way I see it! Also, this piece brought me back to my roots and made me realize that I should start reading in other languages too

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