सलीब पर कोई टँगा है

मैं देख रहा था सलीब पर कोई टँगा है जिसके दुःख की कोई सीमा नहीं है ! उसके दोनों खुले हाथों को और उसके दोनों पाँव को समेट कर सलीब पर लोहे के मोटे – मोटे कील से ठोक दिया गया है ! आसूँ और खून से सलीब सना हुआ है ! दर्द से आँखें पथरा गयी हैं ! छलनी बदन से खून टपकना भी बंद हो चूका है ! पर ह्रदय अपार करुणा और प्यार से भर गया है ! उसने सबको माफ़ कर दिया है …

Tagged , , , , , , , , , , . Bookmark the permalink.

One Response to सलीब पर कोई टँगा है

Leave a Reply