महालोक – चौदह

चतुर्भुज नगर में एक वर्ग था ! उसकी चार बराबर भुजाएं थीं ! वर्ग की रेखाएं सरल थीं पर वो कभी भी और कहीं भी खींच दी जाती थी ! रेखा कोई भी खींच सकता था जिसकी वजह से वर्ग में सब अपने -अपने दायरे में रहते ! या यों कहें हर वर्ग ने एक दुसरे के सामने रेखा खींच रखीं थीं जो किसी घेरे से कम नहीं था और मौका मिलते ही वर्ग एक दुसरे को नब्बे की कोण पर काटते थे ! एक दिन एक वर्ग को एक वक्र मिल गई ! वो भी एक रेखा थी और नगर के किसी वर्ग से नहीं मिलती थी ! वर्ग को वक्र से प्रेम हो गया ! प्रेम में वक्र की प्रशंशा वर्ग ने प्रकृति के हर आयाम से कर दी ! वक्र को पाने की चाह अब हर वर्ग करने लगा ! किसी ने कभी उसे अपने देव के माथे पर लगा दिया तो कभी अपने विजय पताका पर ! वक्र अपने प्रेम में वर्ग को मनचाहे कोण पर काट देती ! नए कोण बनने लगे ! जिस वर्ग से वक्र नहीं मिलती वो नए कोण की चाह में छुप छुप के उसकी कल्पना करने लगे ! वक्र ने वर्ग की सभी स्थापित कोणों को तोड़ दिया था ! नए कोण नए धरातल बनाने लगे और सभी वर्ग की छटपटाहट बढ़ने लगी ! वक्र के कई वर्ग दुश्मन हो गए ! तब तक बहुत देर हो चुकी थी … नए कोणों ने वर्ग की ज्यमिति को बदल दिया था … हर वर्ग में अब लोगों को खुले आम प्रेम करते हुए देखा जाने लगा …

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