सिनेमा का दुखवा मैं कासे कहूँ ?

1.

पात्रों की भाषा को ‘सिनेमा की भाषा’ मानने वाले मुर्ख, ‘देखो’ बसंत आया

” … क्षेत्रीय भाषा बोलने वालों को नीचा दिखा कर अपनी श्रेष्ठता बनाने की कोशिश करने वाले, आप चाहें तो मुझे भी ‘दूस’ सकते हैं, पर सिर्फ़ अपनी मूर्खता की प्रबल दावेदारी बनाये रखने लिए कृपया सवाल मत कीजियेगा ! मेरी बात और ये चित्र नहीं समझे तो रहने दीजिये आप से नहीं होगा, ये अलग भाषा है जो सिनेमा बनाने के काम आती है ! सिनेमा समझने के लिए सिनेमा की भाषा सीखनी पड़ेगी ! सिनेमा के पात्रों की क्षेत्रीय भाषा पर स्टेटस पेल कर आप भाषायी लोगों में हीन भावना भर रहे हैं ! भाषाओँ की इस तौहीन के लिए भाषायी पात्र आपको कभी माफ़ करेंगे ! आप की शिकायत में ‘सिनेमा की भाषा’ दोषी है, ‘पात्रों की भाषा’ नहीं ! फेसबुक पर लाउड स्टेटस की राजनीती कर के आप भाषा की भावनाओं को अनजाने में ठेस पहुँचा रहे हैं ! महान फिल्मकार सत्यजीत रे के पात्रों ने भी क्षेत्रीय भाषा बोल कर विश्व के सिनेमाई भाषा में सर्वश्रेष्ठ स्थान पाया, पर रे ने कभी भाषा बोलने वालों को नहीं ‘दूसा’ ! जो पुरस्कार आपको मिला है वो पात्रों की भाषा का पुरस्कार है ! उक्त भाषा को पात्रों की भाषा बनाने का पुरस्कार भी सिनेमा का पुरस्कार नहीं होता …
‘सिनेमा की भाषा’ पर लगातार काम कर के आप अपनी उपस्थिति बना सकते हैं ! पात्रों की भाषा को ‘दूस’ कर आप अपने ही दर्शकों को बौखला रहे हैं ! जागिये कहीं ऐसा न हो कि आप न सिनेमा के रहे न भाषा के …” – मैं भी मूर्ख हूँ, इसलिए मूर्खों के साथ बहस से बचने के लिए अपने आप को मैंने खुली चिठ्ठी लिखी ‘ सिनेमा का दुखवा मैं कासे कहूँ ?’

2.

हिंदी सिनेमा / भारतीय सिनेमा, हिंदी फिल्म / भारतीय फिल्म, इंडियन सिनेमा / इंडियन फिल्म सही नाम है ! रीजिनल फिल्म / सिनेमा के लिए भारत के क्षेत्रीय भाषाओँ के साथ फिल्म / सिनेमा शब्द लगाइये ! बॉलीवुड कोई स्थान / भाषा नहीं है ! ‘बॉलीवुड’ बहुत मूर्खतापूर्ण शब्द है जो किसी दुसरे देश के एक नगर का पैरोडी है ! हम अपने सौ साल की कलात्मक यात्रा को ‘बॉलीवुड’ कह कर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हास्यास्पद क्यों हो जाते हैं ?

क्रमशः

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