अभिव्यक्ति : पंच – तंत्र का छठा सेंस

Jai Hind

Jai Hind

सैकड़ों साल से नदी – नाले – तालाब के पानी की गहराई नाप आने वाले कछुआ का प्लास्टिक प्रदूषण से असमय ही निधन हुआ था ! घुट कर मारे गए कछुआ की शोक सभा में अभिव्यक्ति पर काव्य पाठ होना तय हुआ ! जंगल में काव्य पाठ कोई नयी घटना नहीं थी ! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की ऑनलाइन जंगल में आज फिर अग्नि परीक्षा थी !

स्वच्छ जंगल में अभिव्यक्ति पर विमर्श और काव्य-पाठ ? सुनते ही सिंह को डकार आ गया ! जोश में भूख से अधिक खा लिया गया ट्रेंड होता हुआ कल का वाइल्ड गधा अभी पेट में पचा नहीं था और अपच से रात भर नींद भी नहीं आयी थी ! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कविता पाठ और उस पर बहस कैसे पचेगा ये सोच कर सिंह का मुँह पहले कसैला फिर गधेला हो गया ! जंगल के अप्डेट्स के लिए अपने सहायक लकड़बघ्घे को मिस्ड कॉल दे कर सिंह ऊँघने की कोशिश करने लगे !

लकड़बघ्घे को जब किंग का मिस्ड काल मिला तब वो कछुए की याद में अपनी प्रोफाइल पिक बदल रहा था ! अपने बॉस सिंह के कॉल को रिप्लाई करने से पहले उसने सिंह के ट्वीट्स चेक किये ! सियारों के द्वारा साढ़े चार सौ बार री – ट्वीट हुआ ‘ गधे ऑन माइंड ‘ चौबीस घंटे पहले उनका लास्ट ट्वीट था ! व्हॉट्सएप पर भी ‘लास्ट सीन’ चौबीस घण्टे पहले का ही था ! कहते हैं लकड़बघ्घे को मिस्ड कॉल का इशारा ही काफी है !

अगली सुबह ऑनलाइन जंगल में कछुए की वनमानुष कद फोटो के सामने सब मौन थे ! गेंदे की हार में लिपटा कछुआ का फोटो वैसा ही लग रहा था जैसे वो प्लास्टिक के लिपटने से घुट – घुट के मरा था ! मोमबत्ती जल रही थी ! भावना बड़ी चीज़ है ! पशु – पक्षियों ने मिट्टी ला – लाकर शोक सभा का मंच बनाया था !

‘ आम तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ‘ बोलने की आजादी ‘ के रूप में समझा जाता है, लेकिन वह सिर्फ बोलने की आजादी नहीं, उसमें और भी कई चीजें आती हैं ! जंगल को बेहतर बनाने के लिए हर काम इसमें शामिल है ! ‘ सिंह ने अपने अध्यक्षीय भाषण की शुरआत में ये साफ़ करते हुए शोक सभा की शुरआत की !

‘ जिस जंगल में पचास फ़ीसदी जानवर अशिक्षित हैं ! जहाँ के पैंतीस प्रतिशत पशुओं को पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है ! जिस जंगल में विकास की ढोलक तो बजती है लेकिन यह भुला दिया जाता है कि ढोलक के आवरण के साथ ही दोनों छोर जानवर के खाल से बने हैं और खोखले हैं ! जहाँ प्रत्येक तीसरे दिन किसी न किसी के भूख से तड़प कर मर जाने की ख़बर आम है ! ऐसे में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का रोना व्यर्थ ही जान पड़ता है ! घड़ियाल के एक मण्डली के प्रतिनिधि ने शोक सभा का विरोध करते हुए कहा !

विलुप्त गिद्ध ने आगे जोड़ा ‘ पंच – तंत्र के निर्माताओँ ने अभिव्यक्ति को मूल अधिकारों का स्थान देकर हमें मुक्त आकाश में विचरण करने वाला पक्षी तो बना दिया है, लेकिन हमारे भोजन को हमसे छीन कर हमारे पंखों को काट दिया है ! आज हमारे बीच कछुआ होते तो मेरी बात का समर्थन करते !’ ये कहते हुए आखरी निरीह गिद्ध रो पड़ा !

‘ सवाल उठाना हमारा अधिकार है ! एक जानवर की सिर्फ इस अफवाह पर हत्या कर दी गई कि उसने गोमांस खाया था ? सिंह को ऐसा अपराध करने वालों को रोकना होगा ! जानवरों को अधिकार की गारंटी चाहिए ! सूचनाओं के अंबार में किसी किस्म की तानाशाही को छुपाया जाना संभव न होगा ! ‘ मोर बोल पड़ा !

‘ माना कि मूक रहना दासता की निशानी है और मुँह का खुलना आज़ादी का सूचक ! लेकिन मुँह का ज्यादा खुलना भी तो बीमारी का सूचक ही है ! जंगल में कहा जाता है कि ‘ हमारी आज़ादी वहीं पर खत्म होती है जहाँ पर दूसरे जानवर की नाक शुरु होती है ‘ खाने की स्वतंत्रता भी जीने के अधिकार में शामिल होना चाहिए ! कोई जानवर क्या खाता है, क्या पीता है, कैसे रहता है, और क्या पहनता है ? इसमें दूसरे जानवर की दखल – अंदाज़ी सही नहीं कही जा सकती है !’ बुजुर्ग बंदरों की आज़ादी पर गंभीर काम करने वाले शांत घोड़े ने कहा !

अभिव्यक्ति के बहस को हाथ से निकलता देख कर लकड़बघ्घे ने काव्य पाठ की घोषणा कर दी !

शोक सभा में पशुवादी एक्टिविस्ट चिंतक कवि खरगोश से जब जाति का कॉलम भरने को कहा गया था तो उसने रिक्त स्थान में ‘ पशु ‘ भरा था ! नवाचारी खरगोश के सिंग नहीं होते ! पशु कवि खरगोश ने अपनी पतली आवाज़ में पाठ शुरू किया ! खरगोश ने मुंह खोला ‘ मेरी कविता का शीर्षक है, सब ढोंग है ‘ ये सुनते ही जानवरों की पूँछ, सींग, पाँख और कुछ के नथुने फड़फड़ाने लगे ! खरगोश ने सब अनदेखा कर के पूरी ताक़त के साथ अपनी कविता पाठ शुरू की ! ‘ काला कौव्वा सिर्फ काँव काँव करता है … ‘ कविता की पहली ही पंक्ति सुन कर कव्वे क्यों चुप बैठते ! सब मिलकर सचमुच काँव – काँव करने लगे ‘ नौटंकी बंद करो ! सिंह, इस्तीफा दो ! ‘ काँव – काँव की शोर में कविता की अगली पंक्तियाँ किसी ने नहीं सुनी ! होली में अपने ऊपर रंग फेंकने के विरोध में डिजिटल जंगल के कुत्ते अपनी कविता लिख कर लाये थे जिस पर खरगोश की विवादास्पद कविता ने पानी फेर दिया था ! वे भी भोंकने लगे ! नौ सौ चूहे वाली बात के अफ़वाह पर बिल्लियों के पास भी एक कविता थी ! उनका कहना था न वो इतने चूहे खाती हैं न हज़ करने जाती हैं ! वो भी शोर मचाने लगीं ! मौका देख कर बन्दर भी खों – खों करने लगे ! ‘ जंगल के टुकड़े टुकड़े होंगे ! ‘ बंदरों का यह नारा सुन कर जंगल की सीमा पर जंगल की रक्षा करते हुए पशुओं का सर शर्म से झुक गया !

‘ यहाँ जंगल का कानून नहीं मेरा कानून चलेगा ! ये ठोस जंगल है ! यहाँ काठ के उल्लू नहीं रहते ! तुम सब डाल – डाल तो मैं पात पात ! ‘ सिंह ने गरजते हुए साफ़ किया ! ‘ ऐसी किसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है जिससे जंगल की सुरक्षा को ख़तरा हो ! अन्य वनो के दुसरे पशु – पक्षियों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों पर आंच आए, जंगल का क़ानून व्यवस्था खराब हो, किसी जानवर या समूह का मानहानि हो, किसी जानवर को अपराध के लिए प्रोत्साहन मिले, और जंगल की एकता, संप्रभुता और अखंडता को ख़तरा हो ! मेरे इन विचारों के सबसे करीब कौन है ? ‘ सिंह ने फिर दहाड़ लगाई ! सिंह का क्रोध देख कर सभा में सब खड़े हो गए ! कोरस में सबने एक साथ तीन बार कहा ‘ मन की बात / मन की बात / मन की बात !’ शोर के बीच गैप मिलते ही सबको शांत करते हुए सहायक लकड़बग्घे ने कहा ‘ प्रतिभा और पशुता का सम्मान होना चाहिए ! समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, संवाद का है, कविता पाठ का है !’ सिंह ने खरगोश को गुर्राते हुए कहा ‘ मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विश्वास करता हूं लेकिन यह उचित कानूनी ढांचे के भीतर होना चाहिए ! ‘ ऑनलाइन जंगल में रहने वाले जानते हैं कानूनी ढांचे के भीतर खाए हुए जानवरों के खाल भरे थे !

‘आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जरूरत क्या है ?’ वाइल्ड ऍस का सवाल सुन कर सिंह ने मुस्कुराते हुए उसे सिर्फ नशीली आँखों से देखा और बोला ‘ चिढ़ानेवाला, असहज करनेवाला और बेहद अपमानजनक बातें करने वाले जानवर को मैं खा जाऊंगा ! ‘ सिंह की बात सुन कर गधा डर के ऐसा भागा कि फिर अपने विज्ञापनों में भी नहीं दिखा !

आज के काव्य पाठ का खुफिया महत्व था ! आगामी चुनाव के लिए जानवरों के मन को पढ़ा जाना था और हर शाख पर उल्लू बैठ कर जानवरों का दिमाग पढ़ रहे थे !

‘ पूरे जंगल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ढाल बनाकर अप्रिय स्थितियां पैदा की जा रही हैं ! ‘ ये कहता हुआ हाथी व्यथित लग रहा था ! पिनक में हाथी ने यू – टर्न ले लिया ! सब जानते हैं हाथी जितना बड़ा होता है उसका यू – टर्न भी उतना ही बड़ा होता है ! पास के अमरुद का बड़ा पेड़ हाथी के पिनक का शिकार हो गया और जाते जाते उस पर बैठे सभा के तोतों को हाथी उड़ा गया !

उड़ते तोतों को देख कर सुस्त भालू की मंडली जो आज तक कभी सरपंच का चुनाव भी नहीं जीत सकी थी, तोतों के हित में हाथी विरोध के नारे लगाने लगे !

इसी बीच शोक सभा में हो रहे इन घटनाओं को लेकर जानवरों के ट्वीट से जंगल भर गया !

‘ जंगल में सोशल मीडिया पर पशु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग कर रहे हैं ! साइबर सेल को पता है कि कौन क्या लिख रहा है ! ‘ लकड़बघ्घे ने मोबाइल स्क्रीन को देखते हुए कहा ! इस बात से सभी चूहे चोंके ! पीला लंगूर जो ऊंघ रहा था ये सुन कर जाग गया ! ‘ जानवर कृपया अन्धविश्वासी मनुष्यों जैसा वर्ताव न करें ! ‘ लकड़बघ्घे ने फोन को जेब में रखते हुए कहा !

जंगल का सांस्कृतिक परिदृश्य साफ़ था ! धनपशुओं की औलादों के सुझाये गए मार्ग पर सभी पशुवत चल रहे थे ! जंगल की राजनीति इसलिए नहीं सुधर रही थी क्योंकि पशु अपने अपने स्वार्थ में थे और निहित स्वार्थ में जंगल को किसी टहनी पर रखकर सब पशु बेशर्म हो गए थे !

वास्तविक स्वतंत्रता एक मिथक है ! स्वतंत्रता केवल सापेक्षता के माध्यम से परिभाषित किया जा सकता है ! जंगल में स्वतंत्र सिंह का जीवन सच्ची स्वतंत्रता की सबसे आदर्श परिभाषा है ! जंगल को सुचारू रूप से चलाने के लिए बोलने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी बहुत ज़रूरी है और जंगल में इसे आज़ादी की पहली शर्त माना जाता है ! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी अधिकारों की जननी है ! इन्ही हितों के लिए जंगल के राजा सिंह द्वारा जानवरों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई थी , ताकि पशु उन पर अमल कर सकें ! विचारों पर बहस और चर्चा कर सकें जिससे अन्य पशुओं और पक्षियों के साथ वन को समृद्ध बनाया जा सके !

भगदड़ में सभा समाप्त हो गयी ! मंच पर कछुआ का पोट्रेट घुट घुट के मरने के लिए अकेला रह गया था ! कछुआ प्लास्टिक प्रदुषण से यूँ ही घुट कर नहीं मरा था !

अगले दिन जंगल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रहते हुए स्वस्थ सोच को कैसे डेवेलॉप किया जाए, इस विषय पर ऑनलाइन इंटरेक्टिव सामग्री बनाने के लिए पड़ोसी देश भूटान से आये अतिथि याक के साथ सभी जानवर अपनी सेल्फी खिंचवाने में व्यस्त थे !

विकासशील जंगल में अभिव्यक्ति हमेशा की तरह धूर्त, चोट्टे, सेटिंग – बाज, सफेदपोश स्वार्थी जानवरों के कुर्बान चढ़ गया ! जंगल राज के पंच – तंत्र में सबका छठा सेंस कह रहा था कि कुछ तो गड़बड़ है, क्या गड़बड़ है ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रहते हुए भी कोई व्यक्त नहीं कर पा रहा था !

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