राम क्षण

मादक ध्वनि संकेत सबको आकर्षित कर रहा था ! कवि ने देखा मादा नर के कलगी को बार – बार चूम रही थी ! प्रेम में दोनों के पूंछ पेट गर्दन सब एक हो गए ! साँस साँस में एक हो कर दोनों पल भर में दो बदन एक प्राण हो गए ! ये प्रेम की पराकाष्ठा थी ! यही प्रेम का मूक क्षण था ! भक्ति प्रेम और समर्पण का जादुई क्षण भी यही था ! क्रौंच के बहाने प्रकृति प्रेम में लीन थी ! सृष्टि में यही राम क्षण था ! धरती पर प्रेम का ये रूप कवि अपनी नंगी आँखों से देख रहा था और अवाक था ! उसने देखा टहनी जिस पर प्रेमी जोड़ा बैठा था, पेड़ जिसकी वो टहनी थी, आकाश जिसके नीचे वो पेड़ था और कवि स्वयं प्रेम प्रकाश में नहा रहे थे और प्रेमी जोड़े के साथ राम में रम के राममय हो गए थे ! इस क्षण सा पवित्र कुछ भी नहीं था !

सहसा एक तीर नर क्रौंच की छाती चीर गया और सूखे पत्ते की तरह वो धरती पर आ गिरा ! नर अपने ही खून की धार में भीग रहा था ! असहाय प्यासी आँखें मादा को देख रही थीं ! रक्तरंजित क्रौंच पीड़ा से छटपटा रहा था ! दर्द और दुःख अश्रु धार में बहने लगे ! तीर नर को आर पार गाँथ चूका था ! रोती हुई मादा क्रौंच भयानक विलाप करने लगी ! नर ने दर्द के नशे में धीरे धीरे ऑंखें मूँद ली ! छटपटाते क्रौंच के आर्तनाद से द्रवित होकर कवि रोने लगा ! अपने प्रेमी नर के बिछोह में मादा ने अपना सिर पटक – पटकर कर प्राण त्याग दिया ! वियोग की दुःख से उसकी छाती फट गयी ! करुणा जाग उठी ! अविरल अश्रु की धार से सब ओझल हो गया था ! कीड़े-मकोड़े, छोटे सांप, घोंघे, सीपी, सारस के सब भोजन क्रौंच वध के साथ ही दुःख में मर गए ! जब भी किसी को किसी से प्रेम हो जाता है तो उसके बिना फिर जीना आज भी मुश्किल हो जाता है ! खेती की कम होती भूमि, सिमटते जंगल, कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग और मानवों की बढ़ती आबादी तो बस सारस के गायब होने का एक कारण होंगे, प्रेम के विलाप में वाल्मीकि के श्राप के शब्द धान के खेत, दलदल, तालाब, झील, और हवा में आज भी तैर रहे हैं !

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