अलविदा‬

भीतर अब कोई नहीं था ! खालीपन की वजह से अपनी आवाज़ ही अपने कानों में गूंज रही थी ! अपने कदमों की आहट सुनते हुए उसने कमरे का एक चक्कर लगाया ! भरी हुई जगह ख़ाली होते ही कितनी अलग लगने लगती है ! यहाँ वहां हर तरफ दीवारों पर बिताए हुए हर पल के निशान अब धब्बे की तरह कुरूप लग रहे थे ! उसने दीवार पर बादल से काले एक दाग़ को सहला कर देखा ! उसकी आँखें भर आईं और बरस गईं ! यहाँ वो माथा टेकता था और यहीं वो सर टिका के बाहर खिड़की की तरफ देख कर मुस्कुराती थी और सहसा मुड़ के पीठ को और आराम दे कर जाने का कोई नकली बहाना बनाती थी ! न जाने कितनी बहस, खुद को छुपाने और बताने का धूप छाँव सा खेल ! पा लेने पर पीठ पर धप्पा ! झूठी सच्ची बातों का ह्रदय पर कितने धौल …
कमरे में आखरी स्माइली छोड़ कर वो कमरे को हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुकी थी ! लम्बी सांस लेता हुआ वो बाहर आया और उसने पीछे मुड़ कर फिर कभी नहीं देखा ! धूप के टुकड़े, सूखे फूल की पंखुड़ियाँ, खनकती हंसी और ठहाके हवा के साथ सूने कमरे में गोल गोल घूम रहे थे ! पीछे छूट गयी पढ़ी हुई किसी किताब के पन्नों की फड़फड़ाहट गिलहरी को बुला रही थी पर दोनों के जाने के बाद खुला और खाली इनबॉक्स का दरवाज़ा हवा में खुलता और बंद होता हुआ यादों की गिलहरी को अंदर आने से ठिठका रहा था …