इंटरव्यू

अपने बारे में पढ़ना मुझे संकोच से भर देता है ! फिर भी Jey Sushil ने मेरे बारे में जो कुछ भी फेसबुक पर लिखा है अपने दोस्तों से बाँट रहा हूँ ! अपने काम काज के प्रति पारदर्शिता और ईमानदारी में सुशील का जवाब नहीं ! मुझे मुझसे ही मिलवाने और डिस्कवर करने के लिए शुक्रिया सुशील बाबु !

 

Pic Credit : Sushil Jha

किसी को जानना हो तो उसे सुनना चाहिए…….घंटों तक….आदमी कितना झूठ बोलेगा….बोलते बोलते….अंत में सच बोलेगा……अंदर की बात खोलेगा…वो आपको तोलेगा…….आपके सवालों से…आपकी बातों से फिर अपना जिगर खोलेगा….आपको मौका देगा उसे समझने का….ये मौके बार बार नहीं आते.
बंबई में दो फिल्मकारों से मिला..दोनों को जानने की कोशिश में सिर्फ यही करने की कोशिश की ….उनको सुनने की….दोनों ही बिल्कुल अलग अलग स्टाइल के फिल्ममेकर. लंबा संघर्ष..छोटी छोटी कहानियां..चेहरे पर मुस्कुराहटें..किसी के बारे में फैसले वाले अंदाज़ में टिप्पणी न करने की आदत.

अपने काम के बारे में कम बोलना…आलोचना को लेकर सजग लेकिन चिंतित नहीं. दोनों को खुद पर भरोसा…अपने पर अपने क्राफ्ट पर. दोनों के बैकग्राउंड बिल्कुल अलग लेकिन कहीं न कहीं एक ललक दोनों में अच्छा सिनेमा बनाने की.

संजय मस्तान Sanjay Jha Mastan– पटना से रंगकर्म, एनएसडी से पढ़ाई फिर क्लैप देने से लेकर डायरेक्शन तक का सफर. एक अलग तरह का डार्क ह्यूमर और फिल्मों का एक एकैडेमिक लैंग्वेज विकसित करने की जिजीविषा. संभवत संजय ने पहली बार किसी कविता को फिल्मों में पिरोया था. फिल्म थी स्ट्रिंग्स और कविता थी नागार्जुन की मंत्र. विरोध प्रदर्शन हुए कविता के विरोध में जबकि कविता पर कभी कोई प्रतिबंध नहीं था. यूट्यूब पर लाखों लोग वो मंत्र कविता सुन चुके हैं .कम लोग जानते हैं वो आइडिया संजय मस्तान का था.

फिर मुंबई चकाचक जो सुनील शेट्टी के कचरा रायते में फंस गया. किसी फिल्मकार के लिए फिल्म तैयार होने के बाद रिलीज़ नहीं होना कैसा होता है ये पूछना भी नहीं चाहिए. संजय भाई को भी बुरा लगा ही होगा लेकिन अब वो नई ऊर्जा से अपनी नई योजनाओं पर बात करते हैं.

वो अकीरा कुरोसावा के फैन हैं और कहते हैं अकीरा के अनुसार किसी फिल्मकार के पास एक समय में पांच स्क्रिप्ट होनी चाहिए और मेरे पास तीन स्क्रिप्ट्स हैं..दो और स्क्रिप्टों पर काम कर रहा हूं. उनकी रुचियों की सूची लंबी है. उनके जैसा दुनिया भर के स्टांपों का कलेक्शन मैंने जीवन में किसी और के पास नहीं देखा है.
वो डिजिटल दुनिया के नए कामों पर बात करते हैं. और उनसे आगे की सोच रखते हैं. उनकी फिल्मों की ही नहीं उनकी बातचीत की भाषा भी ग्लोबल है. वो थिंकिंग फिल्ममेकर हैं शायद इसलिए बॉलीवुड में कम लोग उनकी भाषा समझते हैं.

फेसबुक पर वो अपनी छोटी छोटी टिप्पणियां लिखते हैं. बहस नहीं करते..वो जानते हैं….ये सतही माध्यम है. फिल्मों को कंपलीट माध्यम मानते हैं और फिल्म बनाना उनके लिए साधना है.

उनसे बात करते करते कई बार लगा और मैंने कहा भी कि वो अपने समय से आगे के फिल्ममेकर हैं. उनके आइडियाज़ सुनने के दौरान मेरे पास बहुत कम ही था उसमें कुछ जोड़ने को…

वो वर्ल्ड सिनेमा के स्तर की बात कर रहे थे. मैं बस सुन रहा था. उनके घर में रखी हज़ारों किताबों, मैगज़ीनों, पर्चों, पोस्टरों को पलट रहा था. छोटे से घर में करीने स से रखे हज़ारों स्टांप्स, भरत मुनि का नाट्यशास्त्र और न जाने किन किन विषयों पर किताबें.

मैं उनकी निर्माणाधीन फिल्म पर कोई बात कह नहीं सकता लेकिन मैं अपनी छोटी सी समझ से कह सकता हूं कि यह एक कल्ट फिल्म होगी. अगले पांच वर्षों में जब कभी भी आए वो अपने समय से बहुत आगे की फिल्म होगी.

संजय बात बात पर क्राफ्ट की बात करते हैं…और क्राफ्ट पर बतियाते बतियाते वो मुंबई, कला, जीवन और न जाने कितनी बातों के छोर से छोर मिलाते हुए सहजता से अपनी बात रखते जाते हैं.

अपनी फिल्मों पर बात करते हुए वो बच्चों की तरह खुश हो जाते हैं. अपनी असफलताओं को छुपाते नहीं. उनके आगे के दो दांतों के बीच का खाली हिस्सा मुस्कुराता रहता है.

उन्हें आलोचनाओं से फर्क नहीं पड़ता. वो अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं. उनको पता है फिल्म कैसे बनती है..उनको पता है उन्हें कैसी फिल्म बनानी ही. उनकी चुनौती बस ये है कि उन्होंने जो सोचा है वो पर्दे पर कैसे उतरे..क्योंकि इसी चुनौती में हर कोई सफल या असफल होता है……

आभार – सुशील झा

Sushil Jha

सुशील झा / Pic Credit : Anurag Vats