बजट पच्चीसी

Illustration : Anirban Bora

Illustration : Anirban Bora

१.

मैं बजट हूँ !

समझौता के जादू को बजट कहते हैं ! मैं पत्नी के सहयोग से बनता हूँ ! दिन में घर का बजट ही रात में पति बन जाता है ! समय पर बिल भुगतान करना, कर्जों का सही समय पर निपटारा करना और अपने बचत, निवेश लक्ष्यों को हासिल करना भी मेरे ही अंतर्गत आता है ! घर का बजट बनाने का अर्थ है कि आप मुझे बना रहे हैं !

२.

मेरी बजट राशि !
जैसे घूमती हुई पृथ्वी घूमती हुई दिखाई नहीं देती, वैसे ही बजट भी हमारे इर्द गिर्द घूमता है पर मुझे कहीं घूमता हुआ दिखाई नहीं देता ! ऐसा जान पड़ता है कि मैं धन का नहीं, धन मेरा चक्कर लगा रहा है ! मेरे साथ चन्द्रमा और सूर्य भी मेरी धन राशि वृत्त पर चल रहे हैं ! मैं वृत्त में नहीं वित्त में पड़नेवाले विशिष्ट असंख्य तारा समूह में एक हूँ और सबके साथ मेरी राशि भी वित्त है !

३.

बजट का हनीमून !

मुझे अच्छी तरह पता है, बजट बनाने का मतलब है कि आप शादी के फंदे में फंस गए हैं ! मेरी गृहस्थी में बजट की शुरुआत हनीमून से ही हो गयी थी ! हनीमून पैकेज के साथ मेरे अंदर बजट शब्द की गंभीर यात्रा शुरू हो गयी ! शादी के तुरंत बाद मुझे पता चल गया था बजट का हनीमून से नाता है ! जितना बड़ा बजट उतना बड़ा हनीमून पैकेज ! बड़ा पैकेज मतलब बड़ा हनीमून, छोटा बजट मतलब छोटे पैकेज का छोटा हनीमून !

४.

भारतीय बजट !

फ्रांस में धन के आय और उसके व्यय की सूची को बजट कहते हैं ! फ्रांसीसी भाषा के शब्द से जन्मे इस बहुमंजिले शब्द से ही दुनिया लाभ में रहना सीखी है ! फ्रांस में आज बजट के साथ जो भी हो रहा हो, भारतीय बजट में अपनी आय और व्यय की भावना को मुझे बैंक खाते में रखना पड़ता है ! बहुमंजिला बजट को समझने की प्रतिभा मुझसे ज्यादा मेरी पत्नी में है !

५.

चालू खाता !

खाते ! खाते, खाते, खाते और खाते ! खाते – पीते फिर खाते ! खाते – खाते, पीते – पीते ! बैंक और खाते ! खाते – खाते, बैंक – बैंक ! खाते – बैंक, पीते – बैंक ! बैंक – बैंक ! खाते – खाते ! मेरा खाता , मेरा बैंक ! मेरा खाता मेरी खता ! खाता – खता, बैंक बैंक !

६.

बैलेंस बजट !

बजट ब्रह्म है ! वर्ष / केंद्रीय / कोष  / वित्त / मंत्री / आयोग / सरकार / योजना / ग्रामीण / बदलाव / संसद / प्रदर्शन / बिजली / सड़क / गैस / चर्चा / केंद्र / इत्यादि, इत्यादि ! मैं किसी भी शब्द से बजट पर कोई भी वाक्य पूरा कर सकता हूँ ! मेरा बजट मेरा ब्रह्म है ! मेरे बजट का बैलेंस हर शब्द में बना रहता है !

७.

पॉकेट मनी !

मेरे बजट में चार पॉकेट हैं ! दो पैंट के और दो शर्ट के ! मेरे पॉकेट मेरी पत्नी का ही कहा मानते हैं ! मैं सिर्फ उनको धोता और ढोता हूँ ! अपने साल की योजना का इरादा मैं अपने पॉकेट में ही रखता हूँ ! न जाने क्यों जब कभी बजट शब्‍द सुनाई देता है, मेरे हाथ पॉकेट में घुस जाते हैं !

८.

इकोनॉमिक्स !

दिन के, रात के, हफ़्ते के, महीने के, साल के, बजट को पहचानता हूँ ! जैसे घर में मैं अपनी पत्नी को सुनता हूँ वैसे ही टेलीविजन पर सचमुच में वित्त मंत्री को सुनता हूँ ! सिर्फ आलोचना नहीं करता ! मेरे बजट के इकोनॉमिक्स में रुपयों को छोड़ कर फिजिक्स, केमिस्ट्री, हिस्ट्री, जॉग्राफी, बायोलॉजी, स्पोर्ट्स, टेक्नोलॉजी, पर्यावरण, व्यापार, आकाश, पाताल, जंगल, पहाड़, सब है !

९.

मेरी लाइफ !

मेरी लाइफ इस साल भी स्टायलिश लुक के साथ मॉर्डन फीचर्स वाली इंटीरियर की होगी ! मेरे लिए कम बजट में फैमिली कार के बेहतर विकल्प इस साल भी आएंगे ! मार्किट में मल्टी साइज़ के ऑल्टो बजट से मैं इस साल भी बच नहीं पाउँगा ! बेहतर परफॉर्मेंस के साथ-साथ ज्यादा माइलेज के मामले में इस साल भी मेरी लाइफ आगे जाएगी ! किसी भी बजट में मुझे मेरे गंतव्य तक मेरी सरकार पहुँचा ही देगी !

१०.

मेरा हिसाब किताब !

पैसा कैसे काम करता है, इस बात को समझना ही बजट नहीं है ! शादी के कई साल बाद मुझे विश्वास हो गया है कि रोज़ सुबह पूरब में जो उगता है वो बजट है ! दोपहर को दिन भर का बजट आधा हो जाता है ! घरेलू काम की हिस्सेदारी की शेयरिंग ही असली बजट है ! गृहस्थी एक संयुक्त खाता है, बजट का हिसाब किताब दोनों प्राणी को रखना पड़ता है !

११.

बजट का बच्चा !

मेरे बजट के बारह दाढ़ हैं ! इन दांतों के बीच मेरे चार ज्ञान के दाँत हैं जो बजट के नाम पर लोहे का चना चबाते हैं ! दूध के दाँत टूटने तक माता पिता ही बच्चों का बजट हैं ! किशोरावस्था तक जैसे छुप छुप के मैंने इन्टरनेट पर सेक्स समझ लिया था वैसे ही भारतीय बच्चे यू – ट्यूब पर वित्त मंत्रियों को सुन सुन के बजट भी समझ लेंगे !

१२.

बजट पर ज़ुल्म !

बजट के इस पैकेज में हम नए दो हज़ार पांच सौ को विभिन्न स्तर पर भावनात्मक और शारीरिक रूप में ज्यादा जान जायेंगे ! नोटबंदी के नाम पर पिछले ढाई महिने में मुझ पर ना जाने क्या क्या जुल्म हुए, मेरे हज़ार पाँच सौ मेरे नहीं रहे ! लेकिन मैं बजट के साथ रहा किसी के आगे झुका नहीं !

१३.

हास्य बजट !
मुझे अपने बजट को पाने के लिए शेमलेस होना चाहिए था मैं कैश लेस हो गया ! मेरे इस बजट में हास्य बारह परसेंट से पंद्रह परसेंट पर पहुँच गया है ! वर वधु को इस साल भी लिफाफा टिकाया जायेगा ! मैंने सुना है बजट के दिव्यांगों के लिए नए बजट में हेल्पिंग किट्स सस्ते हो गए हैं ! व्यंग – आंगों को मेरा हास्य बजट सुनने पर भाषण के बजट पर लाभांश मिलेगा !

१४.

सबका रुपया एक है !

बजट में पत्नी माँग है और मैं पूर्ती हूँ ! प्रत्येक माह अपने आप को अनुशाशन में रखना होता है तब बजट में लाभ होता है ! मेरी अर्थपूर्ण चाहतों और अनावश्यक इच्छाओं को मुझसे अलग करने को मेरी पत्नी बजट मानती है ! जैसे मेरी आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया एक है, वैसे ही बजट में अपनी अपनी अठ्ठनी होते हुए भी सबका रुपया एक है !

१५.

लाभ – लाइफ !

लव में लाभ को भी बजट कहते हैं, जैसे प्रेम में हानि को लाभ कहते हैं !

१६ .

स्मार्ट बजट !

मेरा स्मार्टफोन इस बजट में और स्मार्ट होगा ! इस बजट में स्मार्ट शहरों की तरह स्मार्टफोन के सोल्ड आउट होने की जानकारी मुझे फिर मिलेगी ! डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहन दिये जाने के साथ – साथ फसलों में प्रचुरता भी इसी साल आएगी ! हेल्थ, एजुकेशन पर इस साल फिर फोकस होगा !

१७.

बजट का श्रृंगार !
बजट का बहिष्कार ही बजट का श्रृंगार है ! जिनके लिए बजट बनता है वही बजट का बहिष्कार करते हैं ! जो आज बनाते हैं वही कल उसकी चुटकी लेते हैं !  बजट एक ऐसा यूनिवर्सल चुटकुला है जो सबको पूरे साल याद रहता है और जिसे सब समझते हैं ! रहमत की बारिश के कीचड़ में इस साल फिर कमल का फूल खिलेगा !

१८.

एक साल की वॉरंटी वाला बजट !
नए बजट में अपने आप को अपग्रेड करने का ऑफर मुझे इस साल भी मिलेगा ! सारे एक्‍सचेंज ऑफर मुझे फिर से पेश किये जायेंगे ! फ्री रजिस्‍ट्रशन और एक साल की वॉरंटी वाला फेस्टिव ऑफर, फेस्टिवल सीजन में कैश डिस्‍काउंट के साथ मुझे इस बजट में फिर मिलेगा ! सोना जीतने का मौका मुझे नया बजट इस साल फिर देगा !

१९.

बजट के बड़े एलान !
‘ बजट इस साल घर का चौका – बर्तन, झाड़ू – पोछा नहीं करेगा ! मशीन से निकाल के कपडे भी नहीं फैलाएगा ! दुकान से राशन भी नहीं लाएगा ! सब्ज़ी खरीदने बाज़ार नहीं जायेगा ! मोबाइल का बिल नहीं भरेगा ! बजट अपना सर – चार्ज करेगा ! ‘ये मैं क्या बड़बड़ा रहा हूँ ! ‘ मुझे किसी बैंक में ले चलो, मुझे डिजिटल साक्षरता की ज़रूरत है !’

२०.

ग्रामीण कम – इन !

ग्रामीण तुम हमें आज ज़मीन दो हम तुम्हे कल घर देंगे ! गाँव में ऋण वसूली बजट के पीठ पीछे होगा ! तीसरा पूर्ण बजट तुम ले लो ! ग्रामीण तुमसे मुझे और कुछ नहीं चाहिए, मुझे कुछ नहीं चाहिए ! कम – इन ग्रामीण !

२१.

बजट का दर्ज़ी !

बजट का दर्ज़ी मेरा साइज़ जानता है ! बजट में मेरे मोबाइल, पर्स, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड के नाप से मेरी इज़्ज़त काटी जाती है ! इस साल युवाओं को अपने साइज़ का पासवर्ड बजट के दर्ज़ी को देना होगा जिससे बचने के लिए युवा अपने कपड़े खुद फाड़ेंगे जिसे सरकार अगले बजट में सिल देगी !

२२.

अच्छा बजट ही एक अच्छा पति है !

कुछ लोग कहते हैं बजट काम नहीं करते ! बजट के साथ यही समस्या है ! बजट का काम किसी को दिखता नहीं है ! अच्छे बजट के पास पैसा होता है, पैसा सबको दिखता है ! ख़राब बजट के पास दिल होता है जिसको अब प्रेमिका भी तोड़ देती है ! कोई ख़ाली जेब को बजट कहता है, एक्सपेंडीचर सेक्रेटरी मेरी पत्नी बचे हुए पैसों को बजट कहती है !

२३.

बजट छुक छुक !

बजट बुद्धिमान ! बजट शक्तिमान ! बजट सुपरमैन ! बजट लक्ष्मी ! बजट शक्ति ! बजट – बुद्धि उत्सुक होता है, बजट अपनी खुशियों की कॉस्मैटिक पटरी पर छुक – छुक होता है !

२४.

बजट पास !

बजट एक बार संसद में पास हो गया तो फिर साल भर तक मेरे पास नहीं आता ! बजट पास होने के बाद बजट को फेल करने की जिम्मेदारी मेरे ही कंधों पर होती है !

२५.

बजट पच्चीसी !

बजट को होना था समृद्धि का बजट सिंहासन बत्तीसी ! ड्रग्स ने बजट को बना दिया बजट बेताल पच्चीसी ! घर का पति मैं, बजट में एक्स व्यक्ति ! इति रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स, इति बजट पच्चीसी !!

किताब और मेला

पुस्तक प्रेमी

जैसे ही किताबों के सपने आने लगते हैं मैं समझ जाता हूँ किताबों का मेला लगने वाला है ! किसी भी पुस्तक मेला के लगने से पहले मुझे किताबों के सपने आने लगते हैं ! अच्छे, बुरे, किताबों से जुड़े तरह तरह के सपने देखने लगता हूँ ! किसी सपने में देखता हूँ कि चारो तरफ किताबों के पेड़ लगे हैं … कभी देखता हूँ सबने मिल कर इतनी किताबें लिख दी हैं कि पढ़ने के लिए उन्हें चारो तरफ बिखरा दिया गया है … लोग किताबों को घर नहीं ले जाना चाहते हैं क्योंकि घर पहुँचते ही एक किताब दूसरे किताब को बुला लेती है और बहुत जल्द घर में किताबों का ढेर लग जाता है … किसी सपने में लोग किताबों से डर कर उन्हें घर से बाहर कर देते हैं … बाहर इतनी किताबें हैं कि देख कर न चलें तो किताबों से ठोकर लग सकती है ! ऐसी ठोकर से बचने के लिए लोग किताब पढ़ना शुरू कर देते हैं ! सब जानते हैं किताबों से बचने का बस यही एक तरीका है, उनको चुप – चाप पढ़ लीजिये ! जब तक आप उसे पढ़ न लें, किताबें तब तक ही आपको डराती है ! सपने में एक दिन मैं सुनता हूँ कि विश्व पुस्तक मेला लगने वाला है ! मेरी आँखें खुल जाती हैं ! अखबार में पुस्तक मेला का समाचार देख कर अपने सपने को सच पाता हूँ ! मेला शब्द सुनते ही मेरी इन्द्रियों के पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं, मेरे मुंह में पानी आने लगता है ! मैं किताब के पन्नों पर प्रिंट की रोशनाई की ताज़ी गंध सूँघने के लिए बैचैन हो जाता हूँ ! मैं एक किताबी कीड़ा हूँ, मेरी रीढ़ की हड्डी किताब चाटे बगैर सीधी नहीं होती !

निर्धारित दिन सुबह ग्यारह बजे मेला पहुँचने वाले पहले जत्थे में मैं भी शामिल था ! ट्वीट्राटी, फेसबुक, यू ट्यूब, इत्यादि से मेला न पहुँच पाने वाले भी मेले का हाल मुझसे ज्यादा जानते हैं क्योंकि मेला जाते ही मैं किताबों में खो जाता हूँ ! पुस्तक मेले में क्या हो रहा है मुझे इस बात की कोई सुधबुध नहीं रहती है ! जैसे ही मुझे कोई दिलचस्प किताब दिखती है, समय गवाएं बिना मैं उसे पढ़ने लगता हूँ ! किताब को पढ़ते समय मैं उस किताब में घुस जाता हूँ और किताब ही मेरी कोठरी बन जाती है ! जब तक मुझे पुस्तक मेले के चौकीदार किताब से खींच के बाहर नहीं कर देते हैं मैं किताब में ही रहता हूँ ! अगले दिन भी मेला पहुँच कर मैं फिर उसी किताब में घुस जाता हूँ ! जब तक किताब खत्म नहीं हो जाती है मैं किताब को नहीं छोड़ता हूँ ! किताबों के मेले की एक बहस में मेरे तर्क और उदहारण सुन कर जबसे लोग मुझे पाठक बुलाने लगे हैं, मैं लोगों और सोशल मीडिया से बचता फिरता हूँ ! सोशल मीडिया में सबने मिल कर मुझे गुमनाम पाठक बना दिया है और मेरी अनुपस्थिति पर फ़िज़ूल का चिटपुटिया बहस करते रहते हैं ! जबकि मैं सोशल मीडिया के पीठ पीछे चुपचाप कई किताबों को पढ़ कर निकल जाता हूँ !

आज मेले में घुसते ही मुझे कालिदास की शकुंतला मिल गयी ! उफ़ ! क्या मानुषी है ! क्लासिकल शकुंतला के बहाने मुझे साहित्य का ऐश्वर्य देखने का फिर से मन करने लगा ! मैंने प्रेम दुःख से भरे इस काव्य नाटक को पढ़ने के लिए पंडाल में किताब की ढेर के पीछे वाला गुप्त हिस्सा चुन लिया और एकांत में शकुंतला को पढ़ने लगा ! रह रह कर मैं शकुंतला के प्रेम प्रसंगों में खो जाता और उसके दुर्भाग्य पर चुपचाप अविरल रोता रहता ! रात हो गयी ! कहानी मेरे मन को छू गयी थी ! मछुआरे की अँगूठी को देख कर जैसे दुष्यंत को शकुंतला की याद आयी वैसे ही शायद मेले के किसी चौकीदार को मुझ पाठक की याद आ गयी थी ! किताब के एक प्रसंग में दुश्यन्त ने शकुन्तला को जैसे ही ढूँढना शुरू किया मैंने महसूस किया मेले का चौकीदार भी किताबों के छुपे पाठक को किताबों में ढूंढ रहा था ! पाठकों को बाहर खदेड़ने में कई प्रकाशक चौकीदार की मदद कर रहे थे ! मुझ जैसे ज़िद्दी पाठकों को बाहर तक ले जाने के लिए चारो तरफ सीटी बज रही थी ! मैंने दुःख की इस कथा को ख़तम किये बिना मेले से न निकलने की ठान ली और एक ऊँची टेबल के नीचे छुप के पढ़ने लगा ! मेनका की बेटी से अब मुझे पुस्तक मेले का कोई चौकीदार और प्रकाशक अलग नहीं कर सकता था ! अंत में दुष्यंत को शकुंतला मिल गयी पर मैं किसी चौकीदार को नहीं मिल सका !

जब किताब ख़तम हुई हॉल से सब जा चुके थे ! मेला कई घंटे पहले अगले दिन तक के लिए बंद हो चूका था ! लाखों किताबों के बीच मेले में, मैं अकेला छूट गया था ! मैं बिना हिले डुले स्थिति का जायजा लेने दूर से आ रही इधर उधर की आवाज़ों को जोड़ के समझने की कोशिश करने लगा ! घडी में रात के डेढ़ बज रहे थे ! पुस्तक मेले के पंडाल के बाहर का मैदान कोहरे में डूब गया था ! इस वक़्त पुस्तक मेले में मैं किसी चौकीदार के हाथ नहीं आना चाहता था ! यह पाठक का निजी क्षण था ! मैं नहीं चाहता था रात के दुसरे पहर पुस्तक मेले से निकलता हुआ पकड़ा जाऊं और सोशल मिडिया में अगली सुबह उछाल दिया जाऊं ! मुझे अपनी स्थिति में पाठक की मिसअंडरस्टूड स्थिति दिखने लगी और सोशल मीडिया में पाठकों की दुर्दशा पर कई दिखाऊ सेमीनार को जन्म देने का बहाना दिखने लगा ! जैसे ही इस घटना पर सहमति असहमति के लाखों चेहरे की सेल्फ़ी का हाहाकार मेरी कान में गूँजा, मैं इस डरावने ख़याल से निकल आया ! अचानक तभी कहीं से मुझे कई फुसफुसाहट की आवाज़ सुनायी देने लगी ! मैं थोड़ा सहम गया ! किताब पढ़ने की धुन में मैं स्टाल संख्या और हॉल संख्या भूल गया था ! फुसफुसाने की सब अज्ञात आवाज़ें आस पास से आ रही थी, लग रहा था कोई मेरा पीछा करता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा है ! बड़ी सावधानी से किताब को कुतरने वाले मेले के वोकेशनल चूहे की तरह मैं पंडाल से बाहर निकलने की जुगत लगाने लगा ! बाहर कहीं अँधेरा था, कहीं रौशनी थी ! बाहर आकर मुझे लगा मैं एक नयी जगह आ गया हूं ! कहाँ गयी वो भीड़ ? कहाँ गए वो असँख्य खरीदार जिसमे मुझ जैसे पाठक दिन में खो जाते हैं !

बाहर आते ही मुझे एक नयी किस्म की भीड़ दिखी ! कुछ ठंढ से और कुछ इस दृश्य को देख कर मैं सिहर गया ! रात के सन्नाटे में बाहर किताबों का मेला लगा था ! पंडालों के भीतर से किताबें बाहर निकल के उत्सव मना रही थी ! ये दृश्य मेरे लिए बिलकुल नया था ! मैं पहली बार पुस्तकों का सच्चा मेला देख रहा था जहाँ किताबें उन्मुक्त थीं ! दूर तक किताब ही किताब … चारों तरफ किताबें बिखरी पड़ी थीं ! पेड़ों पर किताब लटक रहे थे ! मुझे लगा मेरा सपना सच हो गया है ! किताबें किलकारियां मार रही थीं ! उत्तेजना से मुझे और ठंढ लगने लगी ! ठंढ से बचने के लिए मैं कोई जुगाड़ की तलाश में लग गया ! मैंने गर्म कपडे तो पहन रखे थे पर मेरे पास रात की ठंढ की तैयारी नहीं थी ! आग कागज़ का दुश्मन होता है इसलिए अलाव लगाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था ! मैं एक पाठक हूँ और पुस्तक प्रेमी हूँ, मैं सोशल मीडिया के प्रेत की तरह औरों की किताब जला के हाथ नहीं सेंक सकता था ! मैंने देखा नौजवान किताबें बूढी किताबों को ध्यान से सुन रही थी और चुप थीं ! नयी मोटी किताब भी पुराने पतली किताब को सुन रही थी ! बुज़ुर्ग की इज़्ज़त किताबों की दुनिया में ज्यादा थी !

पुस्तक मेले में छात्रों का प्रवेश नि:शुल्क था ! कोई शरारती छात्रा पुस्तक मेले में आयी तो स्कूल ड्रेस में थी पर अंदर अपने कपडे बदल के स्कूल ड्रेस वाला अपना बैग भूल गयी थी ! पुस्तक मेले में पूरा बाल साहित्य इस बाल मानुषी की शरारत को घेर के भावुक हो कर सोया था ! ठंढ से बचने के लिए मैंने बाल साहित्य से छुप कर उस मानुषी के झोले से उसके यूनिफॉर्म का पिंक स्वेटर और पिंक स्कार्फ निकाल कर पहन लिया ! अब मैं आधा बाल मानुषी और आधा वयस्क था ! मुझे लगा आधी रात को अँधेरे में पुस्तकों को चीर कर निकला मुझ पाठक का ये एक नया बाल अर्ध नारीश्वर अवतार है जो अवतरित दृष्टि से एक नया सच देख पा रहा है ! दिन भर अपना सर्वस्व लुटा कर बाहर मेले में किताबें सुस्ता रही थीं ! पुस्तक – प्रेमियों की याद में कुछ किताबों ने रत जगा किया था ! किताब से निकल कर कई पात्र और चरित्र के पुतले किताबों का मेले में साथ दे रहे थे ! मुझे दूर कोहरे में डूबा मेरे प्रिय साबू का पुतला भी दिखा ! रात के इस पहर में ठंढ से बच कर पुस्तक मेले के सभी चौकीदार किताबों की गोद में दुबक के सो रहे थे जैसे उन्हें सपनो के गर्म संसार में ले जा कर छोड़ दिया गया हो ! मेरी नज़रों के सामने पुस्तक मेले की विद्रूपता पराकाष्ठा पर थी !

बाहर निकलते ही कुछ बड़ी और मोटी किताबों ने झुण्ड बना के मुझे घेर लिया ! मुझे देख कर सबके पन्ने फड़कने लगे ! उसकी फड़फड़ाहट की आवाज़ सुन कर कई किताबें मौन हो गयी और उनसे आ मिलीं ! ‘हमारे इस मेले में तुम्हारा क्या काम ?’ रोबदार आवाज़ में एक किताब ने अपने पन्ने खोल कर सवाल किया ! डर विस्मय और मिक्स्ड फीलिंग की वजह से कुछ हॉरर किताबों के अक्षर इधर उधर बिखर के भागने लगे ! कुछ किताबों ने मुझे बाल साहित्य से निकला कोई कठपुतली समझ लिया और पास आ कर मुझे छूने की कोशिश करने लगे ! मुझे लगा मैंने पुस्तक मेले के रंग को भंग कर दिया है ! ‘क्या तुम हमें चुराने आये हो ?’ मोटी किताब ने दूसरा सवाल किया ? मैं कोई जवाब देता इससे पहले एक पतली लंबी गोरी सस्ती फ्रेंच किताब जो अबतक जोर जोर से फुसफुसा रही थीं मुझे देख कर चिल्लाने लगीं ! ‘तुम कोई नयी किताब तो नहीं लिख रहे ?’ अपनी पतली आवाज़ में उसने घबराते हुए पूछा ! उसकी बात सुन कर कहीं से नि:शुल्क बाइबिल दौड़ा हुआ आया और मुझ पर दया बरसाने की प्रार्थना करने लगा ! ज्ञान की इस असली गंगा में मैंने चुप रहना ही ठीक समझा !

थिंक टैंक से निकल कर कुछ गंभीर किताब मार्च करते हुए मुझ तक आये और औपचारिक रूप से मेरा परिचय माँगा ! मैंने कहा मैं शुद्ध पाठक हूँ ! मुझे किताबों से सच्चा प्यार है ! पुस्तक मेला मेरे लिए किसी देवालय से कम नहीं है ! मेरी बात को सुनकर मोटी किताबें जो सबसे ज्यादा गुस्से में थीं उनका सारा पन्ना शांत हो गया ! मेरे पाठक होने के सम्मान में ऑटोग्राफ्ड बुक मेरे पास आकर मुझसे सोशल होने लगे ! मुझे उन पर दया आ रही थी, मुझे उनका सच पता था ! हस्ताक्षर वाले किताब सोल्ड फील कर रहे थे पर वो बिके नहीं थे ! उनकी हालत टोबा टेक सिंह जैसी थी ! वो चाह कर भी मेरा दस्तख़त नहीं ले पा रहे थे ! उन्हें किताब की सीमा कहाँ ख़त्म होती है और पाठक की सीमा कहाँ शुरू होती है इसका भ्रम हो गया था ! वे सब डिप्रेस्सेड थीं और वे पुस्तक मेले में मुक्त हो कर भी अपने आप को अनदेखे खूँटे में बंधा हुआ महसूस कर रही थीं !

मैंने देखा रात में किताबों के लिए पुस्तक मेले का सेल्फी पॉइंट एक भूतहा जगह बन जाती हैं जहाँ कोई भी किताब जाने से डरती हैं ! चुटकुले की किताब क्रिकेट खिलाडियों से किसी बात पर रूठी हुई थीं और बात बात पर हंसने की जगह रो रही थी ! अपने डिजिटल और प्रिंट में होने को लेकर चल रहे गंभीर बहस में हास्य किताबें मौन थीं ! एक शेर के दिल पर लिखी किताब का पेम्पलेट दहाड़ने की कोशिश कर रहा था ! जेएनयू घटना, दिल्ली में वाहन प्रदूषण, वर्तमान सरकार, भारतीय मीडिया, समलैंगिक अधिकारों की किताबों की तस्वीरें लापता हुए लोगों की तरह मेले में चिपकी हुई थीं ! पीछे पुस्तक मेले में कागज़ी घोड़े कलम तोड़ के दौड़ रहे थे ! कुछ घटिया किताबें जो पॉपुलर थी – उनके कैटेलॉगस – रात भर उड़ते रहे ! पेम्प्लेट्स आवारा होती हैं और अपने रीसाइकल्ड नियति की वज़ह से निडर और फ्री होती हैं !

किताबों ने मुझे बताया दुनिया में स्त्रियों द्वारा लिखी स्त्रियों को समझने वाली किताब सबसे ज्यादा बिक रही हैं ! पुरुषों में स्त्री को नए सिरे से समझने की होड़ लगी है ! मेले में पुरुष के सवाल से भरी किताब को किसी ने उठाया भी नहीं ! राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनाव, मौसम और नया साल का बोलबाला था ! फौजी किताबों की दाल गल नहीं रही थी उसमे कुछ काला था !

मैंने देखा राजनीति से संबंधित एक किताब का सेवानिवृत्त क़िताबों से कोई विमर्श चल रहा था ! दूर एक रौशनी के फव्वारे के पास व्यंग्य की जुगलबंदी चल रही थी जो धीरे धीरे कव्वाली का रूप ले रही थी ! राजनीति, अर्थशास्त्र, कला, संगीत, सिनेमा, खेल की कई किताबें प्रमुख घटनाओं की किताब को ध्यान से सुन रही थी ! पास में ही हिन्दी और धर्म एक साथ नाच रहे थे ! नाचते नाचते वो इतने एक हो गए कि हिंदी और धर्म में भ्रम होने लगा ! समझ में ही नहीं आ रहा था कि धर्म क्या है और हिंदी कौन है ? देखते देखते हिंदी धार्मिक हो गयी और धर्म सिर्फ हिंदी का हो कर रह गया !

एक किताब ने मुझे जो बताया वो बात मुझे पता थी ! उसने कहा देखने की किताब अलग होती है, खरीदने की किताब अलग होती है और पढ़ने वाली किताब बिलकुल अलग ! मेले में उपन्यास, संस्मरण, कहानी-संग्रह, कविता संग्रह, नाटक के साथ इतिहास, भूगोल, ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, यात्रा, धर्म, भाषा, जीवन-वृत्त आदि सभी विषयों पर पुस्तकें थीं और ये उनका ही मेला था !

रात भर किताबों के साथ उनकी दुनिया में रह कर मैंने किताबों को थोड़ा और करीब से जाना ! किताबें बहुत कोमल मन की होती है ! पढ़ने का मन न हो फिर भी किसी किताब को कभी ठोकर मत मारिये ! लोगों की ठोकर से किताबें कराहती हैं ! जब आप किसी किताब को बिखरा हुआ देखें उसे समेटने की कोशिश जरूर करें ! किताब से जुड़े हर मामले में कोई न कोई आप का साथ जरूर दे देगा और आप कभी अकेले नहीं रहेंगे ! किताबें ज़िद्दी होती हैं ! दुनिया की हर किताब अपने पढ़े जाने का तब तक इंतज़ार करती हैं जब तक पाठक पढ़ रहे किताब को पढ़ कर ख़त्म न कर दे ! किताबों के पास धरती का धैर्य है ! आप जब भी किताबों से मिलेंगे किताबें कभी आप को निराश नहीं करेंगी ! किताबों में प्रतियोगिता नहीं होती प्रतियोगिता उसे पढ़ने वालों में होती है ! किताबों की आँख नहीं होती वो सबको एक दृष्टि से देखती हैं ! किताबें भोली होती हैं ! पढ़ने वाला अपनी लगाता है वर्ना किताब के पास तर्क शक्ति नहीं होती ! किताबे पढ़ना लिखना नहीं जानती उनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है ! अपने अमेज़न और फ्लिपकार्ट के सपनों के साथ किताबें अब पूरे विश्व में मिलती हैं ! ‘हर किताब, अब विश्वविख्यात’ ये किताबों के लिए नया नारा है !

मेले में सुबह तक मेरी पढ़ी हुई कई किताबें भी मुझसे मिलीं ! पढ़ी हुई किताबों से मिलना बहुत आत्मीय होता है ! पढ़ ली गयी किताब और पाठक के रिश्ते को मैं बाप और बेटी या माँ और बेटी के रिश्ते से कम नहीं मानता हूँ ! किसी किताब को पढ़ कर देखिये, आप को मेरी हर बात सच लगेगी ! किताब और पाठक या पाठिका का अमिट रिश्ता जीवन भर नहीं टूटता है ! पहला पाठक ही हर किताब का पहला प्यार है ! मैं किताबों को एक जीवित भावनाओं का पुलिंदा मानता हूँ ! किताबों में प्राण नहीं होता तो वो हमें हँसाती और रुलाती कैसे ? वो जीवित नहीं होती हैं तो हमारा जीवन कैसे बदलतीँ हैं ? किताबों का मेला नहीं लगता तो हम किताबों से मिलते कैसे ? नयी और पुरानी किताबों से हमारा परिचय कैसे होता ? रात की इस घटना के बाद मुझे एक बात अच्छी तरह समझ में आ गयी है कि हर किताब जाने या अनजाने में आप में एक परिवर्तन जरूर ले आता है ! जैसे पढ़ लिए जाने के बाद किताब एक पाठक पुरानी हो जाती है वैसे ही हम भी किसी किताब को पढ़ने के बाद एक किताब पुराने हो जाते हैं !

सुबह होने लगी थी ! किताबों ने मिल कर मेरे लिए कोरस में ‘हम होंगे कामयाब’ गीत गया और ख़ुशी ख़ुशी मुझे विदा किया ! पुस्तक मेले से लौटते हुए मेरी आँखें पता नहीं क्यों उस बाप की तरह भर गयी थी जो अपनी बेटी को हॉस्टल में छोड़ कर आ जाता है !

मैंने देखा एक पल में सभी किताबें अपनी जगह लौट गयी थीं ! मैं भी अपनी दुनिया में खोने के लिए लौट रहा था ! तभी बाहर से आती हुई एक मानुषी ने मुझसे पूछा ‘बुक फेयर कहाँ है ?’
‘जी ?’ मैं समझा नहीं …! क्या मैं कहीं खो गया हूँ ?’ मेरे मन में ये प्रश्न उठा !
‘बुक फेयर प्लीज ? फेसबुक लाइव करना है, जल्दी कहिये बुक फेयर कहाँ है ?’ उसने मुझे फिर टोका ! वो बहुत जल्दी में थी !
‘यही पुस्तक मेला है !’ मैंने जवाब दिया !
मानुषी ने मुझे ऐसे देखा जैसे साक्षात् प्रेमचंद को देख लिया हो !
क्या पुस्तक मेला और बुक फेयर दो अलग आयोजन हैं ? और अगर ऐसा है तो क्या किताबें ये जानती हैं ? पिंक स्कार्फ़ और स्वेटर उतारते हुए मैं सोचने लगा !
अचानक मानुषी चिल्लाने लगी ‘आए लव बुक्स … आए लव बुक्स !’ और आए लव बुक्स चिल्लाते हुए अंदर की तरफ भाग गयी ! उसे उस किताब का पोस्टर दिख गया था जिसको वो लाइव करने आयी थी ! मैं उसको पुस्तक मेले में जाता हुआ देखता रहा ! क्या पता मानुषी के रूप में अनायास ही मैं भविष्य की किसी लेखिका से सीधा संवाद कर चूका था ! इस कल्पना मात्र से ही मन में गुदगुदी हो रही थी ! मैं किताब के मेले से बच्चों की तरह नाचता हुआ लौट रहा था !

कैशलेस इकॉनमी का पहला कदम

काले धन पर अंकुश लगाने जब मैं कैशलेस की दिशा में चलने लगा तब मैंने महसूस किया मेरा कोई पीछा कर रहा है ! मैंने देखा साइबर अपराधी बैंकों के डेटाबेस लिए छुप के खड़े थे उन्होंने मुझे देख लिया था और मेरा पीछा कर रहे थे ! नज़र बचा कर साइबर अपराधियों से बचने के लिए मैं पांच सौ और हज़ार की खाली जगह में जा कर छुप गया ! हज़ार पाँच सौ के खाली गढ्ढों में बहुत शोर था वहाँ ड्रग्स, तस्करी, दांव, डकैती, कर चोरी, रिश्वतखोरी सब अपना सर पीट के रो रहे थे ! नकदी जो अभी भी छोटे मूल्य के घरेलू भुगतान में काम आ रहा था, मुझे साइबर अपराधियों से छुपते देख लिया और रेंगता हुआ मेरे पास आ गया ! ” जरा सोचो, आपकी कोई लीकेज और भ्रष्ट practices हो तो याद करो ” नकदी मुझसे फुसफुसा के बात करने लगा ! “व्हाट ?? ” मैंने चिढ के कहा ! ” जरा सोचो, आपकी कोई लीकेज और भ्रष्ट practices हो तो याद करो ” नकदी मुझसे फुसफुसा के फिर बोला ! मैंने उसकी तरफ देखा और कोई जवाब नहीं दिया ! हम दोनों की नज़रें मिलीं और एक साइलेंट पल बीत गया ! वो बस मुझे मुस्कुराता हुआ घूर रहा था ! ” डिजिटल प्रणाली का कोई मुकाबला नहीं है फिर भी मुझे डिजिटल लेनदेन से क्यों डर लगता है ? ” मैंने पूछा ! ” यहाँ बहुत सी बातें अवैध हैं ” नकदी ने कहा ! ” डिजिटल लेनदेन से डरते क्यों हो ? कैशलेस इकॉनमी में और कोई रास्ता नहीं है ” मैंने इशारे से साइबर अपराधियों की तरफ़ इंगित किया ! उसने मुझे ऐसे देखा जैसे वहां कोई न हो ! ” जरा सोचो, आपकी कोई लीकेज और भ्रष्ट practices हो तो याद करो ” नकदी मुझसे फुसफुसा के तीसरी बार फिर बोला ! मैं समझ गया नकदी नोटबंदी से डिप्रेस्सेड हो कर अपना मानसिक संतुलन खो रहा है !
नकली मुद्रा के खतरे से बचते हुए सामने से किसी देश की एक कैशलेस अर्थव्यवस्था चली आ रही थी ! उसके साथ क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड और ऑनलाइन बैंकिंग भी चल रहे थे ! सफेद और शुद्ध अर्थव्यवस्था देखने में बहुत सुंदर लग रही थी ! नकदी और मैं हज़ार पाँच सौ के जाने से बने गड्डों में साइबर अपराधियों से बचने के लिए ये विद्रूप तमाशा देख रहे थे !
” उठो, देखो एटीएम में पैसा आ गया है ! सब अपना कार्ड स्वाईप करने जा रहे हैं ! जाओ बैंक से पैसे भर लाओ ” पत्नी ने जगा दिया और कैशलेस इकॉनमी का मेरा डरावना सपना टूट गया ! बैंक जाने के लिए जब मैं घर से निकला तो बाहर लेन – देन का कर्कश रिकॉर्ड बज रहा था ! बैंक की लंबी यात्रा के लिए पाँव नहीं उठ रहे थे …

मिक्स्ड फीलिंग्स / मनः स्टेटस

 

मनः स्टेटस

मनः स्टेटस

1.

किसी को मुझे छोटा दिखाना होता है तो मेरी फिल्मों की असफलता की बात जरूर करते हैं ! फिर चरित्र पर चोट करते हैं ! ये कोई नयी बात नहीं है ! फेसबुक पर मेरी हालत चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ के लड़के जैसी हो जाती है ! इनबॉक्स से निकल कर घर लौटते लौटते लगता है रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया हो ,एक छावड़ीवाले की दिन-भर की कमाई खो दी हो ,एक कुत्ते पर पत्थर मारा हो और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया हो … सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि तो पा ही लेता हूँ … गॉसिप का हिस्सा होता हूँ, ब्लॉक होता हूँ ,अनफ्रेंड होता हूँ तब कहीं घर पहुँचता हूँ …

 

2.

कबीरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर। ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर !

 

फेसबुक पर पूरी तरह उन्मुक्त हो गया हूँ ! ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर ! मेरा कोई चेला नहीं ! मैं किसी का गुरु नहीं ! मेरा कोई गैंग नहीं है और न ही मैं किसी गैंग का हिस्सा हूँ ! मेरा कोई ब्रांच नहीं है और न ही मेरा कोई सिक्का चलता है ! किसी को खुश करने के लिए मैं एक बार भी लाइक बटन पर चटका नहीं लगाता और न ही किसी के द्वारा लाइक नहीं किये जाने पर बुरा मानता हूँ ! चापलूस और चमचे मुझसे दूर भागते हैं ! मैं अपनी मर्ज़ी से जो चाहता हूँ लिखता हूँ और अपने लिखे हुए पर सबकी राय को ठेंगे पर रखता हूँ ! एरोगेंट तो था ही अब ज़हर हो गया हूँ ! ऐसी दोस्ती को चूल्हे में झोंक आया हूँ जो सिर्फ मतलब के लिए की जाती है और निभाई जाती है ! जिसने भी मुझे समझने का दावा किया उनके दिल में मेरे लिए एक कचोट जरूर है क्योंकि वो मुझसे कभी मिले नहीं और मिले भी तो मैं उनके किसी काम न आ सका ! मेरे लिए बनायी गयी हर राय को मैं स्वीकार करता हूँ ! फेसबुक पर मैं एक लूज़र हूँ, अपने मुठ्ठी भर दोस्तों के साथ बहुत खुश हूँ और निडर हूँ !

 

3.

मेरे लिए कुछ भी नया नही है ! मैं हर बात पर, हर काम मे सिर्फ येस का मोहताज़ नहीं ! नो … नहीं …माफ़ करिए .. नही हो सकता … सॉरी … फ़िर कभी … गो अवे … माफ़ी … समय नही है … हो नही सका … विल कॉल यू बैक … बजट नही है … अनफ्रेंड, ब्लॉक, नो रिप्लाई, मेरा जीवन है ! इन सबकी अनुभूति अद्भुत है ! बेशकीमती ! इतना आज़ाद इतना मुक्त इतना अच्छा पहले कभी नही लगा ! कोई कमिटमेंट नहीं / कोई बंधन नही / कोई अनुग्रह, पूर्वाग्रह, कुछ भी नही !! या हू !!! सबका शुक्रिया, सबको सलाम !

 

PS – ये व्यक्तिगत है ! इस पोस्ट पर राजनीतिक / सामाजिक या कोई कट -पेस्ट ज्ञान न पेलें ! अाप से नहीं हो पाएगा, मेरे अनुभव का एक अंश भी अाप का सच नही है …

 

Pic Credit : Google

मैं बैन का समर्थक नहीं

 

मैं बैन का समर्थक नहीं

मैं बैन का समर्थक नहीं

 

एक /

हम अभी लाइव टेलीकास्ट के लिए तैयार नहीं …

हमें क्रिकेट लाइव दिखाना आता है, देश नहीं
उपवास नहीं
उत्सव, त्यौहार नहीं
बलिदान नहीं, अधिकार नहीं

हमें फैशन शो दिखाना आता है
संस्कार नहीं
हमला नहीं , वार नहीं
हम अभी लाइव टेलीकास्ट के लिए तैयार नहीं !

हमें भाषण दिखाना आता है
खेल नहीं. पुरस्कार नहीं
समाचार नहीं
हम अभी लाइव टेलीकास्ट के लिए तैयार नहीं !

हमें मेंडेट दिखाना आता है
कैंडिडेट नहीं
हमें चमत्कार दिखाना आता है
पत्रकार नहीं
हम अभी लाइव टेलीकास्ट के लिए तैयार नहीं !

हम बैनर बनने को तैयार है
हम अभी बैन होने को तैयार नहीं …

 

दो /

बैन का पहाड़ा

बैन एकम बैन
बैन दूनी सर्कस
बैन तिये स्टेटस
बैन चौके बकवास
बैन पंजे काला
बैन छके हास्य
बैन सत्ते नैन
बैन अठ्ठे रुपया
बैन नामे एन डी टी वी
बैन दसे बांस

इंटरव्यू

अपने बारे में पढ़ना मुझे संकोच से भर देता है ! फिर भी Jey Sushil ने मेरे बारे में जो कुछ भी फेसबुक पर लिखा है अपने दोस्तों से बाँट रहा हूँ ! अपने काम काज के प्रति पारदर्शिता और ईमानदारी में सुशील का जवाब नहीं ! मुझे मुझसे ही मिलवाने और डिस्कवर करने के लिए शुक्रिया सुशील बाबु !

 

Pic Credit : Sushil Jha

किसी को जानना हो तो उसे सुनना चाहिए…….घंटों तक….आदमी कितना झूठ बोलेगा….बोलते बोलते….अंत में सच बोलेगा……अंदर की बात खोलेगा…वो आपको तोलेगा…….आपके सवालों से…आपकी बातों से फिर अपना जिगर खोलेगा….आपको मौका देगा उसे समझने का….ये मौके बार बार नहीं आते.
बंबई में दो फिल्मकारों से मिला..दोनों को जानने की कोशिश में सिर्फ यही करने की कोशिश की ….उनको सुनने की….दोनों ही बिल्कुल अलग अलग स्टाइल के फिल्ममेकर. लंबा संघर्ष..छोटी छोटी कहानियां..चेहरे पर मुस्कुराहटें..किसी के बारे में फैसले वाले अंदाज़ में टिप्पणी न करने की आदत.

अपने काम के बारे में कम बोलना…आलोचना को लेकर सजग लेकिन चिंतित नहीं. दोनों को खुद पर भरोसा…अपने पर अपने क्राफ्ट पर. दोनों के बैकग्राउंड बिल्कुल अलग लेकिन कहीं न कहीं एक ललक दोनों में अच्छा सिनेमा बनाने की.

संजय मस्तान Sanjay Jha Mastan– पटना से रंगकर्म, एनएसडी से पढ़ाई फिर क्लैप देने से लेकर डायरेक्शन तक का सफर. एक अलग तरह का डार्क ह्यूमर और फिल्मों का एक एकैडेमिक लैंग्वेज विकसित करने की जिजीविषा. संभवत संजय ने पहली बार किसी कविता को फिल्मों में पिरोया था. फिल्म थी स्ट्रिंग्स और कविता थी नागार्जुन की मंत्र. विरोध प्रदर्शन हुए कविता के विरोध में जबकि कविता पर कभी कोई प्रतिबंध नहीं था. यूट्यूब पर लाखों लोग वो मंत्र कविता सुन चुके हैं .कम लोग जानते हैं वो आइडिया संजय मस्तान का था.

फिर मुंबई चकाचक जो सुनील शेट्टी के कचरा रायते में फंस गया. किसी फिल्मकार के लिए फिल्म तैयार होने के बाद रिलीज़ नहीं होना कैसा होता है ये पूछना भी नहीं चाहिए. संजय भाई को भी बुरा लगा ही होगा लेकिन अब वो नई ऊर्जा से अपनी नई योजनाओं पर बात करते हैं.

वो अकीरा कुरोसावा के फैन हैं और कहते हैं अकीरा के अनुसार किसी फिल्मकार के पास एक समय में पांच स्क्रिप्ट होनी चाहिए और मेरे पास तीन स्क्रिप्ट्स हैं..दो और स्क्रिप्टों पर काम कर रहा हूं. उनकी रुचियों की सूची लंबी है. उनके जैसा दुनिया भर के स्टांपों का कलेक्शन मैंने जीवन में किसी और के पास नहीं देखा है.
वो डिजिटल दुनिया के नए कामों पर बात करते हैं. और उनसे आगे की सोच रखते हैं. उनकी फिल्मों की ही नहीं उनकी बातचीत की भाषा भी ग्लोबल है. वो थिंकिंग फिल्ममेकर हैं शायद इसलिए बॉलीवुड में कम लोग उनकी भाषा समझते हैं.

फेसबुक पर वो अपनी छोटी छोटी टिप्पणियां लिखते हैं. बहस नहीं करते..वो जानते हैं….ये सतही माध्यम है. फिल्मों को कंपलीट माध्यम मानते हैं और फिल्म बनाना उनके लिए साधना है.

उनसे बात करते करते कई बार लगा और मैंने कहा भी कि वो अपने समय से आगे के फिल्ममेकर हैं. उनके आइडियाज़ सुनने के दौरान मेरे पास बहुत कम ही था उसमें कुछ जोड़ने को…

वो वर्ल्ड सिनेमा के स्तर की बात कर रहे थे. मैं बस सुन रहा था. उनके घर में रखी हज़ारों किताबों, मैगज़ीनों, पर्चों, पोस्टरों को पलट रहा था. छोटे से घर में करीने स से रखे हज़ारों स्टांप्स, भरत मुनि का नाट्यशास्त्र और न जाने किन किन विषयों पर किताबें.

मैं उनकी निर्माणाधीन फिल्म पर कोई बात कह नहीं सकता लेकिन मैं अपनी छोटी सी समझ से कह सकता हूं कि यह एक कल्ट फिल्म होगी. अगले पांच वर्षों में जब कभी भी आए वो अपने समय से बहुत आगे की फिल्म होगी.

संजय बात बात पर क्राफ्ट की बात करते हैं…और क्राफ्ट पर बतियाते बतियाते वो मुंबई, कला, जीवन और न जाने कितनी बातों के छोर से छोर मिलाते हुए सहजता से अपनी बात रखते जाते हैं.

अपनी फिल्मों पर बात करते हुए वो बच्चों की तरह खुश हो जाते हैं. अपनी असफलताओं को छुपाते नहीं. उनके आगे के दो दांतों के बीच का खाली हिस्सा मुस्कुराता रहता है.

उन्हें आलोचनाओं से फर्क नहीं पड़ता. वो अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं. उनको पता है फिल्म कैसे बनती है..उनको पता है उन्हें कैसी फिल्म बनानी ही. उनकी चुनौती बस ये है कि उन्होंने जो सोचा है वो पर्दे पर कैसे उतरे..क्योंकि इसी चुनौती में हर कोई सफल या असफल होता है……

आभार – सुशील झा

Sushil Jha

सुशील झा / Pic Credit : Anurag Vats

डिजिटल कचरा

 

digital-data

डिजिटल डाटा

 

डिजिटल कचरे में शब्द कम होते हैं, चित्र ज्यादा

 

एक /

कुत्ता जल रहा है ! लड़की मर रही है ! भाषण चल रहा है ! ब्रीफकेश, अटैची, हैंडबैग सब नोटों से भरा है ! अपनी अपनी तस्वीरों में लोग द्वारका, आगरा, और कशमीर से लेकर कन्या कुमारी तक खड़े हैं ! मसूर और मूँग की दाल, आलू और टमाटर के साथ फोटो खिंचा रहे हैं ! सब एक दुसरे को श्रद्धांजलि और जन्मदिन मुबारक एक ही फोटो पर दे रहे हैं ! फोटो में कोई उज्जैन जा रहा है तो कोई साकीनाका ! बाढ़ के दौरा में मंत्रीजी के हेलीकॉप्टर से पीड़ित कम दिख रहे थे और फोटोशॉप ज़्यादा ! फोटो शॉप की मदद से किसी ने सबकी थाली गायब कर दी है , अस्पतालों में पागलों की तरह लोग फर्श पर खाते दिख रहे हैं ! पेट पर लात और पीठ पर लाश, गाय और गुजरात, हर तरफ है फोटोशॉप का पलटवार ! डिजिटल रायता फ़ैल चूका है !

दो /

कोई फर्श पर खा रहा है तो कोई गाय की पीठ पर, कोई पाकिस्तान के नक़्शे पर खा रहा है तो कोई अपनी ही कार्टून पर ! कोई लाल पानी पर खा रहा है तो कोई आदिवासी के कंधे पर ! बहुत लोग अपने मन की बात पर खा रहे हैं, कविता कहानी जिस पर भी आपका मन हो आप खा सकते हैं ! किसी दिन हम लाल किला पर खा लेते हैं और किसी दिन पथ्थर फेंकते कश्मीर पर ! कोई अपने कहे की फोटो पर ही खा रहा है, कोई सबकी सुन कर खा रहा है ! जो भूखे हैं उनके फोटो पर भी कोई खा रहा है ! जितने देशवासी उतनी थाली और जितनी थाली उतने छेद ! फोटो शॉप से थाली को मिटाया जा रहा है, सबके लिए खाना है पर सबकी थाली गायब …

* कंडीशंस अप्लाई / इस पोस्ट पर आप चाहें तो खा सकते हैं, पर भूख नहीं मिटेगी, पेट नहीं भरेगा

 

Pic Credit : Google

जलते पटाखा का बुझता प्रेमी

पटाखा को लेकर मेरा एक प्यारा सपना था, जिसको मेरी पटाखा ने ही मेरी आंखों में धूल झोंक कर फोड़ दिया है. मेरी पटाखा दरअसल सिर्फ़ मेरी प्रेमिका नहीं बल्कि मेरा एक विचार है. पटाखा की देह गंध मेरे आनन्द का स्रोत रही है. पटाखा के अंदर मेरे बचपन की खुशियां भरी थी और इसकी पवित्र चिंगारी का मैं प्रेमी था. मैं अब तक अपनी पटाखा की प्रेम अग्नि में उत्सव की तरह जलता रहा हूं. इस बार दिवाली के नाम पर अश्लील ढंग से फट कर पटाखा ने मेरा दिल तोड़ा है और मेरे प्रेम के विश्वास में मुझे धोखा दिया है. उसके धोखे से इस बार मेरे अंदर धुआं भर गया, मुझे सांस लेने में तक़लीफ़ होने लगी. पटाखा के धोखे और धुएं से दम घोंटू वातावरण बन गया. उसकी अय्याश रंगरेलियों की आतिशबाजी के धुएं और बेवफ़ाई के विषाक्त धूल से आंखों में जलन और बेचैनी बढ़ने लगी, मुझे उबकाई आने लगी और मैं हिचक के रोने लगा.

मेरी प्रिय पटाखा. मेरे दिल के अनार, चकरी और फुलझड़ियों को धोखा दे कर मेरी रोशनी, दिए, कंदील और मिठाइयों को छोड़ कर तुम अपने सीसा, मैग्नीशियम, कैडमियम, नाइट्रेट, सोडियम फॉस्फोरस की घमंड में जिसके इर्द – गिर्द चकरघिन्नी खा रही हो तुम्हारे वो ग्राहक अपनी कामनाओं की वासना में तुम्हे जला के भष्म कर देंगे. हम दोनों के प्रेम के दिए जलते तो वाकई रौशनी के फूल खिलते, पर तुम इस दिवाली में किसी की कामुकता का पटाखा बन के फटी हो तो दिल जल रहा है. बज कर फुस्स हो जाने का तुम्हारा एक दिन का ज़िद भरा जश्न हर बार मेरे लिए ध्वनि प्रदूषण और हानिकारक गैसों से नुक्सान का कारण बनता रहा है. इस दिवाली किसी और की पटाखा बन के तुमने हम दोनों के प्रेम का पर्यावरण भी जला दिया.

मेरी पटाखा, तुम्हारी बारूदी आंखें मेरी देह के भीतर फटती तो मेरी आत्मा में उत्सव का धमाका होता पर जैसे तुम फट रही हो वह प्यार नहीं है, या कोमलता, या स्नेह, या अपने आप में जीवन, यह सब कुछ भी नहीं है. पटाखा इस दिवाली में तुम्हारे फटने की कामुक कराह का शोर मुझ पर एक भयानक प्रभाव छोड़ गया है. तुम्हारा धमाका खोखले सेक्स की तरह था, जिसमे तुम फटने के बाद हर बार अन्धकार में छूट जाती हो. अपने बारूद के बदले दुसरे के अहम् की देह गंध से बार बार भर जाना क्या तुम्हे घिन से नहीं भरता ? फिर तुम हर बार फटती हुई ऐसे क्यों छटपटाती हो जैसे जलते हुए अनार को किसी ने लात मार दिया हो ? वासना की अराजक सड़कों पर तुम अब चलती कार में हवस का शिकार बन कर बजने लगी हो, मनोरंजन के नाम पर तुम अपने नगर में शोर, धुआं, प्रदूषण का एक विरासत हो और कुछ नहीं. यह भयानक है. मेरी मासूम पटाखा तुम पार्क में हवा साफ करने के लिए सूर्य नमस्कार करते – करते प्रदुषण और अन्धकार की नगर वधु कैसे बन गयी ?

तुम्हारी कामुक आतिशबाजी को बच्चों और बुजुर्गों से भरा तुम्हारा परिवार भी बर्दाश्त नहीं कर सकता है. तुम जब भी बजती हो वो दिन और रात घर में बच्चों और बुजुर्गों के लिए एक भयानक दिन और रात होती है. इसीलिए तुम छुप छुप कर प्लास्टिक पीढ़ी के आवारा मर्दों की जेब खर्च से बजने लगी हो. उम्र भर टाइम बम की टिक टिक की तरह तुम्हे मेरी ह्रदय की धड़कन बन कर रहना था पर तुमने चुना बस एक कामुक ध्वनि, देह का विस्फोट और अब सब स्वाहा. तुम्हारे बजने की बीमार आदत ने मेरी भावनाओं की दुख:मय अंत्येष्टि कर दी है. मुझे पता है तुम अपने विस्फोटों के बीच मेरे शब्दों के माध्यम से मेरी दुःख की सिसकती आवाज सुन रही हो.

सुनो पटाखा तुम जलो और बजो पर अपने प्रेमी के लिए दमघोंटू माहौल बना कर किसी दूसरे की खुशियों के लिए अपने इस पागल प्रेमी की ख़ुशी को तो कम न करो. मेरे प्रेम की सारी आक्सीजन सोंख ली तुम्हारे पटाखे के धुएं ने. अपना उल्लास इतना महत्वपूर्ण है कि दूसरों की शांति में खलल डालते हुए तुम्हे ज़रा भी संकोच नहीं होता है ? मेरी पटाखा आखिर तुम इतनी ज़्यादा सेल्फ सेंटर्ड क्यों हो ?

तुम तो मेरे ह्रदय की मासूम पटाखा थी, दुःख की बात है तुम मुझे धोखा दे कर किसी की छाती पर चढ़ कर बज गयी. तुमने मुझे प्रेम में धोखा दिया है, याद रखना तुम्हे पता भी नहीं चलेगा कि तुम कब आखरी बार बज गयी हो और कब आखरी बार फट के अपने ग्राहकों के दिमाग में बारूदहीन कचरा बन गयी. अब तुम्हारी सल्फर, कोयला और पोटेशियम नाइट्रेट से भरी देह से प्रेम करने में कोई गौरव, सम्मान या आध्यात्मिक इनाम नहीं है. जाओ पटाखा, अपने प्रेमी के रौशनी से पवित्र प्रेम की आतिशबाजी को छल कर जिनके फेफड़े में क्षणिक सुख के लिए तुम सल्फर डाइऑक्साइड भर रही हो तुम्हारे वो ग्राहक तुम्हारे सौंदर्य के फॉस्फोरस के राख होते ही तुम्हे सड़क पर अंधेरे में छोड़ देंगे. प्यार से भरे मेरे दिल से निकल कर अपने कामुक ग्राहकों के पर्स में ज्यादा दिन तक रह पाओ अब तुम जैसी जलती पटाखा के लिए धोखा खाए मुझ जैसा बुझता प्रेमी यही कामना कर सकता है. पंछी और जानवरों के साथ साथ तुमने मुझमे भी भ्रम, चिंता, और भय भर दिया है. मुझे तुमसे अब एलर्जी है. एग्जॉस्ट फैन और वैक्यूम पंप चला कर मैं अपने दिल से ही नहीं तुम्हे फेफड़े से भी हमेशा के लिए निकाल रहा हूं. गुडबाय पटाखा.

लल्लन टॉप में प्रकाशित 

मेरे अंदर एक लाल पान की बेगम है

 

लाल पान की बेगम

लाल पान की बेगम

मेरे अंदर एक लाल पान की बेगम है जिसका मैं गुलाम हूँ ! मेरा मुख्य कर्तव्य दिन रात उस स्त्री की सेवा से जुड़ा हुआ है ! मेरे अंदर उसको बराबरी का दर्जा हासिल है ! अंदर की उकता देनेवाली पुनरावृत्ति और स्नायुओं में भर गयी जड़ता से वो मुझे मुक्त कराती है और वही स्त्री मुझे आत्मनिर्भर बनाती है ! मेरे ह्रदय को एक नहीं अनेक स्त्रियों ने ढाला है ! मैं अपनी स्त्री के बारे में लिख सकता हूँ इसीलिए लिख रहा हूँ ! माँ, बहन, प्रेमिका, दोस्त, पत्नी और अब बेटी, रिश्तों की हर तह में स्त्री को जानने की ललक ही रही होगी जिसकी वजह से मुझे इतना स्त्री धन मिला है ! मौसी, बुआ, मामी, चाची, भाभी, बहु और सबकी बेटियाँ ! बहुत बड़े परिवार के साथ रह कर पला बढ़ा जिसकी वजह से मेरा संसार स्त्रियों से भरा है !

नाट्य, कलाकर्म, साहित्य और अब सिनेमा से जुड़ा जीवन ! गुरु, गाइड, दोस्त, सहकर्मी, अजनबी सब किस्म की स्त्रियों से मिलने और सीखने का सौभाग्य मिला ! स्त्रियों के साथ इतने रिश्तों में जीना, मेरा ही नहीं किसी भी भारतीय या विश्व के स्वस्थ समाज में बिताये अपने बचपन और जी रहे किसी भी उम्र के आदमी का सामान्य जीवन है, जिस पर लाखों करोड़ों लोगों की तरह मुझे भी गर्व है ! मैं आज भी स्त्रियों से आकर्षित और प्रभावित होता रहता हूँ और स्त्री ही मेरे भीतर उत्सव और आनंद का बीज बोती है !

जब भी अपने अंदर झांकता हूँ, मुझे लगता है मेरे अंदर भी एक स्त्री है जो पल रही है और मुझे पाल रही है ! मेरे अंदर की लाल पान की बेगम ही मेरी दुर्गा है, देवी है, काली है, सहचरी है, मेरे जीवन की प्राण शक्ति है ! जो मेरे भीतर के आशावादी, विजयी और सुंदर चेतना की सच्चाई है ! इस स्त्री पर अभी तो कुछ सौ शब्द लिख रहा हूँ पर मैं स्त्री पर अपने हर शब्द न्योछावर कर के उसकी आँचल में बांधेने को तैयार हूँ ! दस दिनों का दशहरा या नौ दिनों की नवरात्रि मेरे लिए स्त्रयों में मेरी आस्था से फिर फिर जुड़ने का संकल्प है !

शब्द

मेरी कई बातों का अर्थ आप नहीं लगा पाएंगे, मेरी दोस्ती शब्दों से है और बहुत सारे शब्द मुझसे मिले हुए हैं ! जैसे ही आप रंग बदलेंगे, वो अर्थ बदल लेंगे