महानगर में अभिनेत्री की तलाश / महालोक – २१

पात्र परिचय – अभिनेत्री

चवन्नी सी बदकिस्मत अठन्नी सी बेकार और रुपये सी मुफ्त वो अठारह साल में ही पच्चीस साल सी दिखने वाली लड़की जो महानगर की बदनाम गलियों में ला के छोड़ दी गयी है , जो रंडी बुलाने पर किसी भी मर्द की आँखों में देख के मादरचोद कह सकती है…उसे Bold and beautiful कहना ही काफी नहीं होगा ! मर्द को छठी का दूध याद दिलाने वाली हेठी, अपने आप को साबित करने वाली ज़िद, और मांसल बदन ही उसका परिचय नहीं है ! नमक इतना की किसी को भी आँखों से ही पिघला दे ! निर्वस्त्र किये जाने पर कृष्ण को नहीं बुलाती पर निर्वस्त्र करने वाले के दंभ को खुद ठंडा कर के वापस भेज देती है !

एक महानगरीय लोककथा में ऐसी चरित्र को खेलने के लिए एक अभिनेत्री चाहिए ! बोलने के लिए ताक़तवर शब्द मिलेंगे और करने के लिए मर्मस्पर्शी दृश्य ! महानगरीय भाषा पर पकड़ होना अनिवार्य ! लोककथा की शूटिंग अगले महीने से महानगर में ही होगी ! आपकी काबिलियत और दिलचस्पी पर Audition होगा ! अपनी तस्वीर और इस चरित्र को करने की ख्वाहिश के साथ एक पत्र मेल करें ! ऐसी किसी talented actor के जानकार, model – coordinators , और मददगार मित्र से सहयोग अपेक्षित है !

 

कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

१.

कहानी साफ़ थी पर सभी चरित्र गंदे थे ! प्रेम पवित्र था, सम्बन्ध अवैध थे ! संवाद था पर सब मौन थे ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

२.

सुई की नोक से भी कम जगह लेती है दिल में टीस ! सबसे ज्यादा चुभती है फेरी हुई नज़र ! खाली आसमान भी भर सकता है चुप्पी से ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

३.

कद काठी में हर कहानी आदमकद होती है ! कहानी की हर ज़िद अगर पूरी कर दी जाये तो वो आदमी से ऊपर उठ जाती है ! कहने की ज़िद और नहीं कह पाने की बेबसी हूबहू थी ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

४.

लो पढ़ लो मेरा दिमाग ये कह कर उसने अपने कपडे उतारना शुरू कर दिया … लिखे गए एक – एक शब्द की स्याही जैसे किसी ने चेहरे पर फेंक दी हो … काले मुंह से भरी आँखों में नंगापन झिलमिल झिलमिल कर रहा था … कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

५.

मुझे दूर ही रखना, प्रेम से बहुत दूर, मैं अपने घर और अपने माँ बाप से दूर हूँ ! मुझे हर सुख से दूर रखना , मैं अपनी भाषा अपनी मिट्टी से दूर हूँ … वो गा रहा था और मैं रो रहा था ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

६.

वो जानता था महकती गुलाब की पंखुड़ियों जैसा उसका दिल है … ! अपनी उंगली पर लहू की गर्म बूँद को गीले होंठ से चाटते हुए उसने देखा, नीचे तीखे कांटे थे … !  कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

७.

सामने आइना था ! जैसी कालिख़ मेरी पीठ पर थी वैसी ही कालिख़ आईने की पीठ पर भी थी ! आईने में मैं था या मैं ही आईना था ? मैंने हाथ बढ़ाया, दोनों तरफ सिर्फ काँच ही काँच था ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

८.

एक आहट रह जाती है ! कुछ शब्द रह जाते हैं ! एक तस्वीर रह जाती है ! कुछ निशान रह जाते हैं ! कुछ दाग रह जाते हैं ! एक स्वाद रह जाता है ! कुछ चिपचिपा रह जाता है ! कुछ न कुछ रह जाता है, जहाँ कभी कुछ भी रहा होता है ! और मैं शून्य में एक बुलबुले की तरह फूट जाता हूँ ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

९.

मेरी तरफ से सब वैसा ही है ! क्या तुम्हारी तरफ से सब वैसा है ? एक आँख से टपकी महीनों की जमी चुप्पी ! एकांत की लौ में मेरी धड़कन ने न जाने दर्द का कौन सा राग छेड़ा है ! वो आँखें मूँद कर मुझे सब बता रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

१०.

रेत की तरह मुठ्ठियों की उँगलियों के बीच से फिसल जाने वाली वो औरत और अपनी मुठ्ठियों को अपने भरोसे से भींचे हुए वो आदमी … दुनियाँ के भरोसे के लिए अपने भरोसे की मुठ्ठी वो क्यों खोले ? यही बात वो बार बार दुहरा रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

११.

अतल गहराईयों में उतर के देखा / सब सुख अपने ही सुख चुन रहे थे / आकाश अपना आकाश ही बुन रहा था / बेतरतीब पड़ी थी चुनने को सारी चीज़ें हरश्रृंगार सी / पर हृदय दुःख बीन रहा था .. कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

१२.

सारे शब्द आ गए हैं ! तुम भी लौट आओ ! मेरी वर्तनी, हिज्जै, संधि … मेरे खालीपन को कोई नहीं भर पा रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

 

क्रमशः