बसंत के चार यार, लड़का लड़की ग्राहक और बाज़ार / व्यंग्य नाटिका

इस व्यंग्य नाटिका के सभी स्थान और पात्र काल्पनिक हैं !

पात्र –  

लड़का / बसंत ( किसी भी उम्र का एक पुरुष पात्र )

लड़की / मौसम ( किसी भी उम्र की एक स्त्री पात्र )

ग्राहक / सार्वजनिक प्रेमी ( किसी भी लिंग और उम्र का एक पात्र )

बाज़ार / सार्वजनिक प्रेमिका ( मल्टीमिडिया पर्दा / स्क्रीन )

नाटिका में बसंत के एक दिन लड़का, लड़की, ग्राहक और बाज़ार मिल कर ‘एंटी रोमियो स्क्वाड’ बन जाते हैं ! नाटक के अंत में यही सब पात्र मिल कर ‘कामदेव स्क्वाड’ बन जाते है !

 

पात्र  परिचय –

( मंच पर अँधेरा है ! पात्र एक एक कर के प्रकाश वृत में अपना परिचय देते हैं ! पात्र  परिचय में ही पात्रों का आपसी कोनफ्लिक्ट स्थापित हो जाता है )

मंच पर प्रकाश वृत उभरता है !

लड़का : ( रोमांटिक रस ) मैं बसंत हूँ ! मौसम का राजा हूँ ! मैं रोमियो रोमांटिक हूँ !

फिर अँधेरा !

 

मंच पर प्रकाश वृत उभरता है !

लड़की : ( पावरफुल रस ) मैं मौसम हूँ ! बसंत मेरा दास है ! मैं लैला पावरफुल हूँ !

फिर अँधेरा !

 

मंच पर प्रकाश वृत उभरता है !

ग्राहक : ( कन्फ्यूज्ड रस ) मैं प्रेमी हूँ ! वाओ बसंत !!! कितना ब्यूटीफुल मौसम है ! मेरा मोबाइल कहाँ है ? मैं कन्फ्यूज्ड क्यों हूँ ?

फिर अँधेरा !

 

मंच पर प्रकाश वृत उभरता है !

बाजार : ( लॉस्ट रस ) मैं प्रेमिका हूँ ! बसंत के अंधे मजनुओं से कैसे बचूँ ? उफ़ ! ठहरो अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर लूँ ! मैं लॉस्ट क्यों हूँ ? ( स्क्रीन ऑफ हो जाता है )

फिर अँधेरा !

 

मंच पर प्रकाश वृत उभरता है !

सभी पात्र एंटी रोमियो स्क्वाड बनकर कोरस में : ( हाहाकार रस )

आ रही सोशल मिडिया से पुकार

ट्वीटर पूछे बार बार

फेसबुक पर स्टेटस अपार

सब पूछ रहे हैं नेता और संत

रोमियो का कैसा हो बसंत ?

( हाथापाई करते हुए ) बसंत के चार यार / लड़का, लड़की, ग्राहक और बाज़ार

फिर अँधेरा !

दृश्य : एक

स्थान / ह्रदय बाज़ार ! बाज़ार में बहुत सारे ह्रदय लटक और झूल रहे हैं !

लड़का : मुझे बसंत दिखाइए
लड़की : बसंत अभी दूर है ! बसंत के लिए आप का बजट क्या है ?
लड़का : आप ने कितने बसंत देखे हैं ?
लड़की : जितने बसंत आप ने देखे है , उतने बसंत मैंने आज ही बेचे हैं !
लड़का : व्यक्ति को अपना बसंत खुद बनाना पड़ता है !
लड़की : आप जिसकी बात कर रहे हैं वो वो चरित्र है !
लड़का : जी ?
लड़की : चरित्र को बसंत से मत मिलाइये ! चरित्र का अलग स्टोर रूम है !
तुम मुझे अपना बजट दो मैं तुम्हे बसंत दूंगी !
लड़का : ये कैसी राजनीती है ? बसंत में मुझे बजट क्यों सुनाया जा रहा है ?
लड़की : बजट से ही बना मेड इन चाइना बसंत सबकी जेब में है ! नेता हो या संत सबकी जेब में टिंग – टिंग बजता चीन का बसंत !
लड़का : मेड इन इंडिया बसंत कहाँ है ?
लड़की : वो अभी बन रहा है ! बसंत बना सके इसके लिए बसंत देखना जरुरी होता है ! इसीलिए देखिये चीन का बसंत ! ( उँगलियों से रुपये गिनने का इशारा करती है )
( पुलकित होते हुए ) इण्डिया में देखिये अनलिमिटेड चीनी बसंत !
लड़का : मेरे बसंत का ब्रांड क्या होगा ?
लड़की : बसंत एक प्रोडक्ट है जिसका अभी तक कोई ब्रांड नहीं !
लड़का : ( वीर रस में ) ईश्वर का दिया कभी अंत नहीं होता , जो ख़त्म हो जाये वो बसंत नहीं होता !
लड़की : मत भूलो तुम जैसे रोमियो के लिए बाहर लोकल गुंडों का अभ्यास चल रहा है !
लड़का : सभी चीजों की तरह प्यार का ये उत्सव भी ख़त्म हो सकता है ! याद है पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा, बाल विवाह प्रथा, सती प्रथा …
लड़की : सुनो कामदेव ! कैंडी और कन्फेक्शनरी से भरा अपना दिमाग उठाओ और यहाँ से दफा हो जाओ !
लड़का : क्षमा ! क्षमा ! क्षमा !

फिर अँधेरा !

दृश्य : दो
स्थान / प्रेमिकाओं का इनबॉक्स ! बसंत की शुभकामनाओं से इनबॉक्स भरा हुआ है !

इनबॉक्स / एक
एस एम् एस
लड़का – बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है …
लड़की – शटअप

इनबॉक्स / दो
एस एम् एस
लड़का – तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं …
लड़की – शटअप

इनबॉक्स / तीन
एस एम् एस
लड़का – गाता रहे मेरा दिल …
लडकी – शट – अप / शट – अप / शट – अप ! आर्चीज बकवास बंद करो !

फिर अँधेरा !

दृश्य : तीन
स्थान / रंग बिरंगे फूलों के बीच कहीं खिले हुए एक पीले फूल के अंदर !

लड़की : मौसम का क्या हाल है ? पेट कैसा है ?
लड़का : पीले – पीले कर रहा है सुबह से …
लड़की : क्या पिलाया ?
लड़का : पीला ! येलो !
लड़की : कैसा पीला ?
लड़का : सरसों के फूल जैसा पीला और गीला गीला भी !
लड़की : लगता है मौसम को बसंत हो गया है ! लव जिहाद से बचाना !
लड़का : जी ! एंटी रोमियो स्क्वाड देने का प्लान है
लड़की : मार्किट में आ गया है ए आर एस ?
लड़का : जी !
लड़की : बसंत को धमकाता है ?
लड़का : जी !
लड़की : वाह !
लड़का : बस एक बार मौसम बसंत से छूट जाये तो कोहरे तक जान बचेगी !
लड़की : कोहरा कहाँ है ?
लड़का : बाहर है !
लड़की : कोहरे में बसंत ले के आ गए ? मौसम का ग्लोबल वॉर्मिंग चेक करवा लेना, नहीं तो बसंत तक पीला पीला करेगा बाद में सब झड़ जायेगा !
लड़का : जी
लड़की : पतझर तक की दवा दे दी है !
लड़का : जी
लड़की : ( मुस्कुराती हुई ) मौसम पर कोई नियंत्रण नहीं है …
लड़का : ( भरी आँखों से ) तुम क्या जानो मौसम क्या है ?
लड़की : मैं तुम्हारे मौसम का डॉक्टर हूँ !
लड़का : मुझे नहीं पता था कि प्रेम में पागलों के डॉक्टर को मौसम का डॉक्टर कहते हैं !
लड़की : जी ?
लड़का : मेरा मौसम सोशल मिडिया में खुला बदन घूम रहा था !
लड़की : हम्म
लड़का : डॉक्टर साहेब मेरे मौसम को सोशल मिडिया के बसंत से बचा लो !
लड़की : अगर आप के भीतर बसंत की चाह नहीं है तो आप को मौसमी कलैंडर में भी बसंत नहीं मिलेगा !
लड़का : सोशल मिडिया में बसंत इतना भर गया है कि …
लड़की : कि ? क्या …
लड़का : बस एक बार मेरा मौसम सोशल मिडिया के बसंत से छूट जाये तो अगले मौसमी बसंत के अटैक तक जी जायेगा …
लड़की : दूसरों की प्रोफाइल में रहकर हम अपना मौसम खो देते हैं ! अपने मौसम के लिए हमें खुद जीवन के धूप में खड़ा रहना होगा !
लड़का : ये सब राजनीति बसंत की वजह से हुआ ! सॉरी मैंने इस मौसम में दुसरे प्रोफाइल से फ़्लर्ट किया
लड़की : अब किसी को इनबॉक्स में भी हैप्पी बसंत मत बोलना !
लड़का : बस एक बार मुझे सोशल मिडिया के बसंत से बचा लो मैं कभी दुबारा बसंत में झाकूँगा भी नहीं !
लड़की : रोगी बने रहो ! मत भूलो मैं तुम्हारे मौसम की डॉक्टर हूँ !
लड़का : मौन

फिर अँधेरा !

मंच पर प्रकाश वृत उभरता है !
सभी पात्र कामदेव स्क्वाड बनकर कोरस में : बसंत के चार यार / लड़का, लड़की, ग्राहक और बाज़ार / शुरू करो लव सेक्स और प्यार का व्यापार ! हम नहीं कहते जमाना कहता है !

( धनुष से बाण चलाते हुए ) शुरू करो लव सेक्स और प्यार का व्यापार …

रोमांटिक रस के संगीत में पर्दा गिरता है !

इस प्रयोगधर्मी नाटिका में किसी भी प्रकार के मंच सज्जा की कोई आवश्यकता नहीं है ! रचनात्मक प्रकाश और ध्वनि / संगीत से चारों दृश्य को अलग अलग ढंग से दिखाया जा सकता है !

 

दी लास्ट शो

हज़ार

हज़ार

पांच सौ

शो बीच में ही रुक गया ! सर्कस की दुनिया में भारत सर्कस का कैश शो देखने दुनिया आती ! कैश का सर्कस, सर्कस का सबसे खतरनाक खेल था ! यह खेल हृदय रोगियों और बच्चों के लिए नहीं था फिर भी वे सब शो में हिस्सा लेने आते थे ! कैश शो में पांच सौ हज़ार को ड्रम्स में भर – भर के डायनामाइट से उड़ाया जाता और खिलाडी बने दर्शक जान पर खेल कर रुपयों को घर ले जाने के लिए लूटते ! यह एक हॉरर खेल था और रात में अकेले खेलने के लिए उचित नहीं था ! फिर भी सरकस के लास्ट शो में इसे लोग खेलते थे ! अमीर जीवन जीने के लिए लोग सर्कस का ये शो खेलने और देखने आते ! शो का ऐसा असर होता कि दरिद्र दर्शक धनी हो जाते !  सबकी जेब में एक – एक हज़ार का और एक – एक पांच सौ के नोट आने की सर्कस के जोकर्स की चेतावनी सच हो जाती ! खेल का यही चमत्कार था ! इसीलिए भारत सर्कस दुनिया का सबसे अनोखा सर्कस था !

सर्कस में यही एक शो था जिसे जोकर्स भी बैठ के देखते थे ! खेल शुरू हो चूका था ! हवा में लटकते हुए गुल्लकों में जोकर्स बैठे थे ! उनके बैठने की यही जगह थी ! वे गिरती चवन्नी की झन की आवाज़ के साथ मंच पर गिरते हुए एंट्री लेते ! वो ऐसे थूकते कि चवन्नी का भ्रम होता ! लोग जब उन्हें उठाने के लिए झुकते तो वे खूब हँसते ! कैश के इस ख़तरनाक खेल में अठ्ठनी और चवन्नी जोकर्स बनते थे ! चवन्नी को लेकर सीरियस होना फज़ूल है इसलिये सर्व-सम्मति से सर्कस में खिलाड़ी दर्शकों ने उन्हें जोकर मान लिया था ! हर रात कैश के खेल का शो कौड़ियों से शुरू हो कर लाखों करोड़ों तक पहुँच जाता ! हज़ार पांच सौ कैश शो के हीरो थे !

इस खेल को देखने से पहले जोकर्स सर्कस के दर्शकों के लिए एक भविष्यवाणी पढ़ते थे ! भविष्यवाणी के शब्द थे  ‘लार्ड कुबेर इलेक्ट्रॉनिक मनी ले कर आएँगे ! मिस्टेक होता जायेगा, कर्रेक्शन्स आते जायेंगे ‘ ! इन खेलों को देखने के लिए जमाखोरी, सूदखोरी, मुनाफाखोरी जैसे दर्शनों से सर्कस के दर्शक को गुप्त परिचय कराया जाता ! जोकर दर्शकों का चेहरा पढ़ते और कान में आ कर उन्हें बताते कि वे कंजूस हैं या कामचोर ! दर्शक अपने बारे में सुनकर डरने का अभिनय करते हुए हँसते ! फिर सब हंसने लगते ! शो आगे बढ़ जाता !

खेल में बनिए और बिचौलिए बनावटी और दिखावटी नाम के चरित्र बनते ! कैश के शो के क्लाइमेक्स में हज़ार पांच सौ मिल कर बनावटी बनिए और  दिखावटी बिचौलिए की मदद से काले धन की निर्ममता से नकली हत्या करते थे ! मंच पर ये थ्री डी के लाइट इफ़ेक्ट में होता जिसकी गंभीरता का काला हास्य भीड़ समझ लेती और सर्कस के लास्ट शो में सब खूब हँसते और शो ख़त्म होने के बाद हँसते हँसते कैश ले कर अपने अपने घर जाते !

आज कैश शो बीच में ही रुक गया था ! हज़ार पांच सौ जैसे सुपरस्टार के मंच पर रहते रहते सब मिलकर हज़ार पांच सौ पर हंसने के लिए इतने चुटकुले बना लेंगे लोगों ने कभी सोचा नहीं था ! कैश शो के रुकते ही दर्शक दीर्घा में बैठे सर्कस के दर्शक की भीड़ कोरस में रोने लगी और रोते रोते हंसने लगी ! भीड़ की सोशल मीडिया पर सारे तर्क शास्त्री अर्थ शास्त्री बन गए ! कैश ट्रैश हो गया ! रातों रात पांच सौ हज़ार हैश टैग बन गए ! करोड़ कौड़ी हो गया ! हज़ार पांच सौ कैश के शो में चलेबल – रनेबल था, मंच पर अचानक अनेबल हो गया ! भीड़ आपस में बैठ कर तरह – तरह की चिंताएं करने लगी ! दर्शक जहाँ थे वहीँ बैठे बैठे अपने शब्दकोश बनाने लगे ! विचार प्रसारित करने लगे ! दर्शकों में बैठे शराबी अपनी जेबों की नोटों के साथ बच्चों की तरह खेलने लगे और हज़ार के नोट में चखना भर के सेल्फी लेने लगे ! हज़ार इससे ज्यादा पहले कभी अपमानित नहीं हुआ था ! अपनी नज़र में वो दलालों के क़दमों से भी नीचे गिर चूका था ! कैश शो के रुकते ही मंच पर हज़ार पांच सौ दोनों खड़े थे ! पाँच सौ का मुंह उतर गया था ! हज़ार अवाक था !

अभी अभी हज़ार पांच सौ को बीच शो में ही नौकरी से निकाल दिया गया था ! अब तक जो शो का वी आई पी था एक पल में बेसाहारा बन गया था ! सर्कस की कुरूप सच्चाई आज हज़ार पांच सौ के सामने थी ! हज़ार पांच सौ को लगा अब तक उनकी की गयी चापलूसी और भीड़ से मिले चरण स्पर्श का ऋण वे भाषण दे कर ही अदा कर सकते हैं ! चाकरी छोड़ कर मंच पर से उतरने से पहले पांच सौ ने सर्कस के आयोजकों से माइक ले लिया और मौन हो गयी ! ‘ एक प्लेटफार्म से दूसरे प्लेटफार्म पर मुझे कूदना सीखाने से ले कर इस खतरनाक खेल तक मुझे किसने पहुँचाया ? ‘  सबने पहली बार रुपये को बोलते हुए सुना ! रुपया उनसे बात करे कईयों के गले से ये बात नहीं उतरी ! भीड़ में बैठे  इंटेलेक्चुअल्स पांच सौ को भाषण देते हुए देख कर हज़ार पांच सौ को उसके मुँह पर ही कोसने लगे ! हज़ार पांच सौ को ये महसूस हो गया कि सब उनसे एक पल में दूर हो गए हैं और नफरत करने लगे हैं ! हाथ का मैल कह कर उनसे हाथ झाड़ने लगे हैं ! हज़ार पांच सौ का दिल टूट गया ! और वो कराहने लगे और बारी बारी से माइक पर अपने दिल की बात करने लगे ! “ इंटेलेक्चुअल्स मुझे क्यों कोस रहे हैं ? बुद्धिजीवी मुझे क्यों गालियाँ दे रहे हैं ? मुझे समझने में आप कहाँ चूक गए ? मुझसे क्या भूल हुई ? “ पांच सौ बोली ! “ इंटेलेक्चुअल्स देश के मूड को पढ़ने में नाकाम क्यों रहे ? “ अब बोलने की बारी हज़ार की थी ! हज़ार का स्वर सपाट था जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो ! “ मेरी कंडीशनिंग किसने की ? जीने के लिए आग पर चलना मुझे किसने सिखाया ? मेरा स्वामी कौन था ? मेरे धारक कहाँ गए ? मेरे धारक … मेरे धारक  “ इतना कह कर दोनों एक साथ रोने लगे ! अब तक पांच सौ और हज़ार भीड़ में फेनोमेना थे पर अब शो के बीच में ही मंच पर अनाथ मेमना हो गए ! दर्शकों की भीड़ ने न जाने क्या सोच कर कुछ पल तक उनको रोने दिया ! भीड़ की अब यही सहानुभूति उनके लिए बची थी, जो उन्हें भीड़ से मिल रही थी !  हज़ार पांच सौ भौचक्के थे ! अचानक उनसे कोई डर नहीं रहा था ! सब तरफ से रिजेक्ट होते देख कर, पाँच सौ ने फिर कहना शुरू किया ! ” सर्कस संघ का शुक्रिया ! सर्कस सोसाइटी वाले, मेरे खेल प्रेमियों, मेरी एक आखरी इच्छा जरुर पूरी करना ! संस्कृति के नुक्कड़ों पर न रख सको तो कम से कम किसी चौक चौराहे पर मेरे नाम से कोई सड़क या चौराहा जरूर बनवा देना “ दोनों एक पल के लिए मौन हो गए ! सब मौन थे ! जसे श्रधांजलि देने में होते हैं ! “ दे दे मेरा पांच रुपैया बारह आना …”  गाते हुए पांच सौ रोने लगी और सबको भावुक कर दिया ! भीड़ ये गीत गुनगुनाने लगी ! तालियाँ बजी ! हर्ष ध्वनि हुआ ! पांच सौ की आँखें डबडबा गयीं ! सब कुछ बहुत नाटकीय हो गया ! भीड़ का समाज एक झटके में नए खेल के लिए तैयार हो गया था ! पांच सौ और हज़ार अब तक जहाँ पूंजीवाद के नाम पर यूज्ड हो रहे थे अब उसी नाम पर वहीँ अब्यूज़्ड होने लगे !  नाटक शुरु होने से पहले जो नाटक होता है वो शुरू हो चूका था ! आम लोगों के साथ खाने, पीने और घूमने का सबसे ज्यादा पोलिटिकल स्टंट किसने किया है ? लोग ये गूगल करने लगे ! उत्तर में पांच सौ हज़ार का नाम सबसे ऊपर था ! प्रशंसा युग के चाटुकार पत्रकारिता काल में रुपया को बचाने कोई नहीं आया गुजरे वक़्त से सारे रिश्ते टूट चुके थे !

खेल में परदे के पीछे बैठा हुआ काला धन ये सब अपनी आँखों से देखने के लिए घबराया हुआ दौड़ा दौड़ा ग्रीन रूम से मंच पर आ गया और अचानक हांफता हुआ स्पॉट लाइट में फंस गया ! वो पहली बार सबको साफ़ दिख रहा था ! काले धन को मेकअप करने का मौका नहीं मिला था ! वो अपनी सादगी में भी भयानक लग रहा था !

आज सर्कस के कैश शो के बीच में ही 8 बजे भारत सर्कस के प्रमुख की एक घोषणा ने खेल बदल दिया ! भारत सर्कस के प्रमुख की बात किसी सरकारी कानून से कम नहीं था ! प्रमुख सर कह रहे है तो सही ही कह रहे होंगे भीड़ ने सोचा और उनकी हर बात कानून हो कर लागू हो गया ! हज़ार पांच सौ आज आधी रात से अब चाकरी में नहीं होंगे ! चलता हुआ कैश शो बीच में ही रुक गया !

आना, सवैया, पहाड़े में ज़िंदगी का हिसाब लगाने वाला समाज पनियाही आँखों से सर्कस का ये लास्ट शो देख रहा था ! कैश शो के रुकते ही भीड़ शो ख़त्म होने के उल्लास में ताली बजा कर हर्ष ध्वनि में चिल्लाने लगी ! अफरा – तफरी में सब उल्टा पुल्टा होने लगा ! लोग टेलीविज़न में छपने लगे और अख़बार में दिखने लगे ! डिजिटल होते हुए देश के डिजिटल शून्य और डिजिटल एक, भीड़ को चीर कर सामने मंच पर आ गए और मंच का संचालन करने लगे ! भीड़ ने अपने विचार प्रक्रिया से पांच सौ हज़ार को तत्काल हटा दिया ! सबकी नज़रों के सामने भीड़ धीरे धीरे डिजिटल अंक में बदलने लगा !

सर्कस का अर्थशास्त्र जोकर ही समझ सकता है, भीड़ भरे किसी शो का कोई बेपरवाह दर्शक नही ! आगे बढ़ कर चवन्नी – छाप जोकर्स ने ही नया डिजिटल शो संभाला ! अपने पुश्तैनी भारत सरकस में इन जोकरों का इतिहास चवन्निया मेम्बरी से ही शुरू हुआ था ! जोकर अपने गुलाबी और बैंगनी कपड़ों में मिल कर दस रूपये की साइज़ का बच्चों के स्टीकर टाइप दो हज़ार का नोट बन गए ! एक दिन के दूधमुँहे नोट का अभिनय सब जोकर मिल कर बहुत खूबी से करने लगे ! जोकर्स ने दर्शकों का ध्यान खींचना शुरू कर दिया ! एक पैसे से दो हज़ार तक की नए डिजिटल कहानी में पांच सौ और हज़ार से एक पल में सबका कनेक्ट ख़तम हो गया !  ‘ चूरन वाला नोट ‘ चिल्लाती हुई शो में बॉयफ्रेंड के साथ आयी लड़कियों ने जोकर्स का साथ देना शुरू कर दिया ! भीड़ में सबकी अपनी अपनी सेल्फी थी ! भीड़ के पास सबकुछ अपना था ! अपने सिद्धांत, अपनी पूंजी ! अपनी किताबें, अपनी फिल्म, अपने ब्लॉग ! नई दुनिया की नयी जेनेरेशन भीड़ पर सबसे ज्यादा यकीन करती है और पैसा भीड़ का सबसे बड़ा सिद्धांत है ! भीड़ सर्कस के इस खेल को देश की व्यख्या कहने लगी ! जोकर्स के डिजिटल खेल से इकॉनमी के माइक्रो मच्छर मंगल यान से मार्स पर जाने का सपना देखने लगे ! शो में इस बार कोई भविष्य वाणी नहीं हुआ सबको सीधा भविष्य दर्शन हो गया ! भीड़ के सामने हज़ार पांच सौ का जाना बचे खुचे का जाना हो कर रह गया ! दो हज़ार का टिकट कूपन सा दिखने वाला नोट जोकर्स ने शो में सबके लिए बाँट दिए ! भीड़ को राहत मिली ! कुछ ही देर में ज़ोकरों ने अच्छे खासे सर्कस को नौटंकी बना दिया ! दर्शकों ने भी बिना बात के नाचने का मन बना लिया ! अब्दुला की शादी के सब बेगाने, दीवाने बन के नाचने लगे ! भीड़ में कौन कहाँ सक्रिय हो गए कहना मुश्किल हो गया ! सब अपने कूपन लहराने लगे और उन्हें छोटे छोटे रुपयों में बदलवाने के लिए बैंक की ओर बढ़ गए ! सर्कस के बाहर भी लोग खुश थे ! न पैसा है न बदलवाने की झंझट कहते और मुस्कुराते !  लोग देख रहे थे और नौटंकी चल रहा था ! लग रहा था लास्ट शो में ख़ुशी की सबको कोई नयी करन्सी मिल गयी थी ! और इस करंसी का आनंद लेने के लिए काम करते हुए लोग कतार में खड़े हो गए ! पांच सौ हज़ार के युग में कोई बर्तन मांजना नहीं चाहता था, पर अब जनता सब करने को तैयार थी !

अपने सपनो का भारत देखने के लिए लोग लाइन में खड़े हो गए ! जिन्हें नहीं आती थी वो भी पैसों के लिए ए टी एम के सामने एक्टिंग करने लगे और भीड़ में एक दुसरे के भाषण की खूबियों से पेट भरने लगे ! लोगों ने उम्रदराज़ लोगों को बैंकों के आगे झुकते देखा ! सबको मनोवैज्ञानिक आज़ादी मिल गयी थी ! एक युवती ने ख़ुशी में अपना टॉप उतार दिया ! वामपंथी और समाजवादी, पुंजीपतियों की मदद के लिये सडकों पर आ गये ! ज़माना सच में बदलने लगा ! जिस तरह की हताश युवाओं ने शिक्षा पायी, आनन फानन में सबको रोज़गार मिल गया !  इसी दिन के लिए पाल पोस के नयी पीढ़ियों को बड़ा किया गया था ताकि ऐसे युद्ध में वो पुरानी पीढ़ी को डिस्पोज़बल कप्स में पानी पिलाये ! जोकर्स ने युवाओं की हताशा को ऊलजुलूल के लिंक से विद्रोह में बदलना चाहा पर खुद हताश हो गए !

नोट बदल गया था लोग बदल गए थे ! पैसा निकालने की सीमा समाप्त हो गयी ! एटीएम से अब एक दिन में कोई कुछ भी निकाल सकता था ! सुबह की चाय से लेकर लेटने की चटाई तक ! दूध , ब्रेड, अंडा और सब्जी तरकारी के साथ गुप्त रूप से ए टी एम की मशीन में जरुरत का सब सामान मिलने लगा ! जिनके पास गुप्त पासवर्ड था वे लोग दूध जमा कर के ए टी एम की मशीन से दही निकालने लगे ! कहीं कहीं किसी मशीन से घी भी निकला और फिर मशीन बंद हो गयी !

टेलीविज़न पर बैठे कबाड़ी बीस रुपये किलो के भाव से हज़ार और पांच सौ को तौलने निकल पड़े ! दवाई की कम्पनियों और डॉक्टरों की फ़ौज ने सबको बिमार, बहुत बिमार बना दिया था ! शहरों में लोगों को सबसे पहले हॉस्पिटल की याद आयी ! गाँव में बैंक के समीप खुले आकाश के नीचे ज़ेरॉक्स मशीन लग गए ! सबका धंधा चल पड़ा ! नोट-एक्सचेन्ज फ़ॉर्म एक नया सर्कस था !

दुनिया जानती है भारत सर्कस के कैश शो में दर्शक की भीड़ पैसे वाली पार्टी है ! इस भीड़ के पास पैसे की अपनी परंपरा है, पैसे की विरासत है, और पैसे का गौरव है ! इसीलिए ये शो चल रहा था ! भीड़ प्राय: बुद्धि विरोधी होते हैं और भीड़ सिर्फ बेहतर जीवन शैली के लिए जीती है ! भीड़ का समाज एक झटके में नए खेल के लिए तैयार हो गया ! व्यापारियों ने अपने दिमाग में जुगाड़ का गणित झटपट लगा लिया ! कर्मचारियों की सैलरी कैश हो गयी ! उनके दिमाग में उनका कर्मचारी नोट बदलवाने के लिए लाइन में खड़ा हो चूका था ! पांच सौ हज़ार को पूरी पिक्चर समझ में आ गयी ! सरकस में उनकी शो की तम्बू का बम्बू उठ चूका था ! बचत का मतलब सिर्फ महिलायें जानती थी ! महिलाओं का जो गुप्त धन नंगा हुआ उस पर जोकर हंसने लगे ! कोई कह रहा था पांच सौ की इस नोट से ये लड़ाई पांच सौ वर्षों से चल रही थी, आज जीत मिली है ! कोई एक हाथ में सौ सौ के नोट का पंखा बना कर दुसरे हाथ से सेल्फी ले रहा था ! सौ का नोट सबसे ज्यादा बिजी हो गया ! अपने से सभी छोटे नोटोँ का वो फिर से लीडर बन बैठा ! सौ के नीलेपन में थोड़ा मोर पँख और घुल गया , सौ आसमान का राजा नील कंठ हो गया !

शो खत्म होते होते ये ऑफिसियल हो गया था कि देश की अस्सी प्रतिशत आबादी को कैश का ये शो अब सर्कस में नहीं चाहिए इसलिए इस खेल को अब खत्म कर देना चाहिए ! असली नकली के अपने हर रूप में अब तक सबके जीवन में काम आने वाला और हर लिंग की मर्दानी ताक़त हज़ार पांच सौ, बड़े बे आबरू हो कर मंच पर से उतरे ! कोई कह रह था ऐसा पहले भी हुआ है ! कोई कह रह था ऐसा ही कुछ उसने कभी सपने में देखा था !

अपने अपने कैमरे के सामने सब सौ – सौ के नोट लेते देते ह्यूमन लगने लगे !  हज़ार पांच सौ स्कूल, अस्पताल, रोड और रेल लाइन से भी विदा हो गए ! सरकार के साथ साथ  पुलिस, पंचायत, बाजार, फ़ौज, सबका कल्याण हुआ ! एक, दो, पांच, दस के सिक्कों की टोपी पहने जोकर सफ़ेद – ग्रे – काला झंडा लिए ‘भूखे हैं, हम भी भूखे हैं’ कह कर छाती पीटने लगे, यह सब देख कर लास्ट शो में दर्शकों का हँसते हँसते बुरा हाल था ! खुल्ले के फेर में इस दूकान से उस दूकान भीड़ चक्कर नहीं लगाना चाहती ! इसीलिए नए सरकस में इन जोकरों की उपस्थिति ज्यादा फनी हो गया था ! जोकर की नौकरी नए सर्कस में पक्की हो गयी !

इस बीच किसी जोकर ने पांच सौ हज़ार की पीठ पर सरकस की शो का अमर वाक्य लिख दिया था ! मंच पर से उतरने के लिए जैसे ही वे दोनों मुड़े सबने उनकी पीठ पर ‘द – एन्ड’ पढ़ लिया ! जाते जाते उनपर कोई जूते फेंकने लगा तो किसी ने स्याही लहरा दी ! किसी जोकर ने उसी वक़्त लाइट्स आउट कर दिया ! पांच सौ हज़ार अँधेरे में हमेशा के लिए डूब गए ! कैश खत्म, शो ख़तम ! ये उनका लास्ट शो था ! हज़ार पाँच सौ जाते जाते मंच के अँधेरे में काले धन से मिल गए और अँधेरे में अफरा तफरी मचाने की कोशिश की ! इसी अफरा तफरी के हिसाब-किताब की मज़बूरी में सर्कस लास्ट शो के बाद दो दिन तक बंद रहा !

 

लल्लन टॉप में प्रकाशित 

महानगर में अभिनेत्री की तलाश / महालोक – २१

पात्र परिचय – अभिनेत्री

चवन्नी सी बदकिस्मत अठन्नी सी बेकार और रुपये सी मुफ्त वो अठारह साल में ही पच्चीस साल सी दिखने वाली लड़की जो महानगर की बदनाम गलियों में ला के छोड़ दी गयी है , जो रंडी बुलाने पर किसी भी मर्द की आँखों में देख के मादरचोद कह सकती है…उसे Bold and beautiful कहना ही काफी नहीं होगा ! मर्द को छठी का दूध याद दिलाने वाली हेठी, अपने आप को साबित करने वाली ज़िद, और मांसल बदन ही उसका परिचय नहीं है ! नमक इतना की किसी को भी आँखों से ही पिघला दे ! निर्वस्त्र किये जाने पर कृष्ण को नहीं बुलाती पर निर्वस्त्र करने वाले के दंभ को खुद ठंडा कर के वापस भेज देती है !

एक महानगरीय लोककथा में ऐसी चरित्र को खेलने के लिए एक अभिनेत्री चाहिए ! बोलने के लिए ताक़तवर शब्द मिलेंगे और करने के लिए मर्मस्पर्शी दृश्य ! महानगरीय भाषा पर पकड़ होना अनिवार्य ! लोककथा की शूटिंग अगले महीने से महानगर में ही होगी ! आपकी काबिलियत और दिलचस्पी पर Audition होगा ! अपनी तस्वीर और इस चरित्र को करने की ख्वाहिश के साथ एक पत्र मेल करें ! ऐसी किसी talented actor के जानकार, model – coordinators , और मददगार मित्र से सहयोग अपेक्षित है !

 

लघु प्रेम कथा / लप्रेक

 संक्षेप में मुझे प्रेम पर कुछ कहना था … मेरी आँखें भर आयीं … ! इससे संक्षेप में मैं प्रेम पर कुछ सोच भी नहीं सकता …

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प्रेम कहानी के पात्र अपना प्रेमी ढूंढ ही लेते हैं …

लप्रेक – १.

लड़की जाने लगी तो लड़के ने फटाफट मोबाइल से लिफ्ट में उसकी एक तस्वीर ले ली जिसमे लड़की मुस्कुराती हुई हाथ हिला के विदा ले रही थी, उसने अपने पूरे कपड़े तरतीब से पहन रखा था और खुश दिख रही थी ! लिफ्ट का दरवाज़ा बंद होते ही लड़के ने लम्बी सांस ली और फ़ोटो ऑप्शन में जा कर सेव का बटन दबा दिया ! आज उनकी अकेले में पहली मुलाकात थी ! प्रेम का कोंपल आज ही फूटा था …

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लप्रेक – २.

नहीं ! हाँ ! फिर नहीं ! फिर हाँ ! फिर फिर नहीं ! फिर फिर हाँ ! नहीं ! हाँ ! नहीं ! हाँ ! नहीं ईईई … !! हाँ आँआ… !! बस ये उनकी आखरी बातचीत थी ! कम्प्यूटर पर दोनों मौन अपने अपने विंडो को घूरते रहते ! एक मन हाँ कहता और एक मन ना !

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लप्रेक – ३.

वो ‘कैंडी क्रश’ से रूठती है तो मुझसे बात करती है !

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लप्रेक – ४.

पैर लगते ही छन् से लगता है ह्रदय पर, हाथ झट पट उठा कर अपने ही गले से लगा लेता है अपने आप को … क्यों जरुरत होती है प्रेम में किसी के क़दमों पर फेंक देने की …खुद को ??

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लप्रेक – ५.

हंसती थी तो फंसती थी अब फंसती है तो रोती है…

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लप्रेक – ६.

‘ऑरकुट’ में नाराज़ हुए थे, पूरा ‘व्हाट्सप’ चुप रहे अब जा कर ‘ट्विटर’ पर माने हैं बीच में ‘फेसबुक’ पर कितना स्टेट्स आ के चला गया …

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लप्रेक – ७.

एक मन की मान लूं पर दूसरे मन को क्या जवाब दूं ? एक मन से कह दूं पर दूसरे मन से कैसे छुपाऊँ ? तू भी or not तू भी …

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लप्रेक – ८.

‘हैशटैग’ के चकोर चौखट से बांध कर जब कोई लड़की किसी लड़के से प्रेम करती है तो प्रेमी फिर किसी बन्धन से बंधें न बंधें …

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लप्रेक – ९ .

‘ काश वो मेरा ‘इनबॉक्स’ पढ़ पाती … ‘

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लप्रेक – १०.

‘को – रस’ में ‘लव – रस’ :

सुनो लड़कियों – न लड़के साथ आए थे न लड़के साथ जायेंगे !

सुनो लड़कों – न लड़की साथ आयी थी न लड़की साथ जाएगी !

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लप्रेक – ११.

दुष्यंत से मिल कर शकुंतला फिर अपने मन के सुनसान इन बॉक्स में लौट आई ! 

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लप्रेक – १२.

मछली के पेट में अँगूठी बहुत दिनों तक नहीं रह सकी ! लेखक ने मछली को जाल में फंसवा के मछुआरे से उसकी पेट चिरवा दी और अँगूठी को राजा के सामने रखवा दिया ! शकुंतला की आँखों में आँसू भला कौन लेखक देख सकता है ?

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लप्रेक – १३.

“… देखो इलेक्शन का रिजल्ट आ गया है, हमको अब मिलना जुलना कम कर देना चाहिए …”

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लप्रेक – १४.

“… तुम टैग टैग, हम हैश हैश … ” 

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लप्रेक – १५.

लड़का : स्माइली
लड़की : स्माइली
लड़का : स्माइली
लड़की : स्माइली
लड़का : स्माइली
लड़की : स्माइली
लड़का : स्माइली
लड़की : …

*

लप्रेक -१६.

कोई नाम … कोई चेहरा … कोई आँख … कोई आवाज़ … कोई होंठ … कोई पलक … कोई लौ … या कोई तस्वीर … कोई याद … कोई धुन … कोई गीत … कोई गंध … या कोई स्पर्श … और क्या है वैलेंटाइन ?

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लप्रेक – १७.

जिससे लाभ होता है उसी से लव होता है !

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लप्रेक – १८ .

कुचले जाने के लिए किसने अपनी अभिलाषाओं को प्रेम पथ पर फेंक दिया है …

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लप्रेक -१९ .

कभी हम छोड़ देते हैं … कभी छूट जाता है … लघु प्रेम कथाएँ अंत में टीस भर ही देती हैं …

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लप्रेक – २०.

रह रह कर उसका कलेजा मुंह को आता है ! घंटों बाथरूम में बैठ कर रोती है, उसका चश्मा भीगा ही रहता है ! उसको प्यार में धोखा मिला है ! उसके प्रेमी को कोई और पसंद आ गया है ! इतनी बिचारी उसे किसी ने कभी नहीं बनाया ! बिलख बिलख कर रो रही है और आँखें मूंदे चौदह तारीख का वैलेंटाइन वो आज बारह तारिख को ही फुसफुसा कर विश कर रही है ” हैप्पी वैलेंटाइन डे ”

*

लप्रेक – २१.

यादें फोन की घंटी की तरह बजती रहती है, नहीं उठाइए तो फिर कट जाती है …

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लप्रेक – २२.

दाँत से काट के हमने आधे – आधे छुहारे नहीं खाये ! उसने मेरे कंधे पकड़ के हिलते डुलते अपनी सैंडल का फीता नहीं कसा ! उसके पास सवाल नहीं थे, मैंने कोई जवाब नहीं माँगा ! हम रूठे नहीं ! आते जाते सेंसर पर सिंपल बात हुई ! देखा, मुस्कुराए और अपने अपने रास्ते चल दिए ! शायद फिर से अजनबी होने का यही पहला कदम है …

लप्रेक – २३.

मैं चाहता तो उसकी पंख जैसी बाहें चुरा लेता पर उन्हें मैंने छोड़ दिया मैं किसी की आज़ादी नहीं चुरा सकता था ! मैं चाहता तो उसके पाँव ले भागता पर सपने में भी मैं उसे जंज़ीरों में नहीं देख सकता था ! मैं चाहता तो उसके बाल चुरा लेता पर उसके आशिक़ों को भी ठेस नहीं लगाना चाहता था ! सेंध मार के उसे चुरा ले भागने की योजना में आज सुबह मैं कामयाब हो गया था ! पर आखरी पल में मैंने अपना निर्णय बदल लिया, मैंने उसकी घडी से अपनी घडी मिलाई और अपने ह्रदय में रखी उसकी तस्वीर से उसका चेहरा मिला के छोड़ दिया ! उसे क्या पता एक हु बहु उस जैसे समय को दुनिया के लिए छोड़ आया हूँ और वो हर पल मेरे साथ है और मैंने उसे हमेशा के लिए चुरा लिया है  …

 

 

Cont.

पोस्टर – वार

चुनाव मैदान से ‘पोस्टर – वार’ का एक दृश्य ! इसमें मंच है ! पर्दा है ! पोस्टर है ! चेहरे हैं ! रंग है और नाटक का मसाला है !

Cut to –

चार पोस्टरों ने मुझे घेर लिया था ! चारों प्रचार पोस्टर थे ! शाब्दिक,ग्राफिक और तथ्यों से भरी उनकी अपनी – अपनी विचारधारा थी ! सब मुझ पर चिपकना चाह रहे थे ! एक सत्ता का पोस्टर था जो लगातार सत्ता में होने की वजह से परिवर्तन के सूत्रधार की भेष में था ! चेंज का एजेंट था ! देखने में हाथ से बना ये पोस्टर डिजिटल था ! दूसरा विपक्षी पोस्टर था ! वो जघन्य था ! रूढ़ियों से चिपका था ! तीसरा जनतांत्रिक पोस्टर था ! ये पोस्टर सबसे ज्यादा आकर्षक था क्योंकि इसमें मिडिल क्लास था ! चौथा पोस्टर एक कोलाज था ! जोड़ तोड़ से बना यह पोस्टर हिलते डुलते फ्रेम में किसी तरह फिट था ! ये चारो पोस्टर मुझे घेर के खड़े थे और मैं अवाक था ! जब बरसों तक सोयी राजनीती एक बड़ी करवट लेती दिखाई दे रही थी तभी ये घटना घट गयी थी ! पौ फटने को था ! सब जाग रहे थे ! मैं सुबह घूमने निकला था और उन्होंने सोचा मैं रात का भुला हूँ !

Cut to –

वार रूम था ! मुख्यालय था ! इनपुट डेटा था ! रणनीति थी ! तकनीक था ! उपकरण थे ! टीम थी ! प्रयोजन था ! कई दल थे ! ‘युद्ध’ का माहौल था ! हर तरफ बैठक चल रही थी ! रिजल्ट का सबको इंतज़ार था !

Cut to –

मैं पोस्टर में फँस कर चल नहीं पा रहा था ! आगे अब क्या करूँ कुछ सूझ नहीं रहा था ! पोस्टर से बच कर निकलने की मेरे पास कोई स्ट्रेटेजी नहीं थी ! सब पोस्टर से बच रहे थे और मैं फंस गया था ! पोस्टर मुझे घेर के अपने ‘आदमी घेरो अभियान’ में सफल हो गए थे और मैं ‘ पोस्टर से बचो ‘ खेल में हार गया था और अब शहर भर के सभी आदमीयों, औरतों, बच्चों और बूढ़ों को घेरने की उनकी उम्मीद बढ़ गयी थी !

Cut to –

कमल, हाथ, झाड़ू, साइकिल, हाथी, हल, तीर, नगाड़ा, लालटेन, हँसिया – हथोड़ा,फूल – पत्ती , शंख, चक्र,गदा, टेलीफ़ोन, सब वस्तु और जीव पोस्टर पर क्रांतिकारी हो गए थे !

Cut to –

पोस्टर, तख्तियों और बैनर के रूप में नौजवान, आधुनिक, उदार, और भ्रष्ट जिन चार पोस्टरों ने मुझे घेरा था उसके पीछे और भी पोस्टर थे ! कोरस में स्वास्थ, सेक्स, विकास, नारी मुक्ति, धर्म, दूकान, सामान, मकान, तम्बाकू, सबके पोस्टर थे ! उनमे बहुत सारे शब्द और चित्र का कोलाज था ! सबके मिलेजुले रंग थे ! पोस्टर में वे कौन – कौन थे, क्या – क्या थे कहना मुश्किल था ! बचपन से ले कर अब तक इनमे से कई पोस्टरों से मैं मिल चूका था ! उस पर लिखी  हर बात पढ़ चूका था ! उनके रंग में बारी बारी से रंगा जा चूका था ! कई पोस्टर का नारा तो मुझे याद भी था ! कुछ पोस्टर हवा में लहरा रहे थे ! इन सब में विज्ञापन के सैकड़ों पोस्टर उनका साथ दे रहे थे ! सब बहुत अब्सर्ड था !

Cut to –

तभी एक धमाका हुआ और बीस हज़ार पोस्टर का गोला मेरे आगे फट गया ! अफरा तफरी मच गयी ! चारो तरफ पोस्टर ही पोस्टर थे ! सब पोस्टर पर थे ! जो पोस्टर पर नहीं थे वो पोस्ट पर थे ! बड़े बड़े पोस्ट पर बड़े बड़े पोस्टर थे ! मुझसे बार बार कहने लगे कि मैं अपनी पीठ उनको दे दूँ ! मुझे लगा थपथपाएंगे पर उन्होंने झट पट पीठ पर एक पोस्टर चिपका दिया ! अब पोस्टर देखते ही लोग पीठ पर चटका लगाने लगे ! पीठ सहलाने वाला कोई नहीं था ! पीठ थपथपाने वाले मौके का फायदा उठा के पोस्टर चिपका गए ! पोस्टर की वज़ह से पीठ में खुजली होने लगी ! मुझे अपनी खुजली मिटाने के लिए किसी और की पीठ खुजानी पड़ी !

Cut to –

पीठ से अच्छी जगह किसी पोस्टर के लिए अब नहीं बची है ! जिनके पास इच्छा है उनके पास अपनी पीठ है ! पोस्टर की दुनिया में अब पीठ ही पूँजी है ! पुलीस का हमला पीठ पर होता है ! सरकार का पेट पर ! पोस्टर ने उनको एक कर दिया है ! पोस्टर की दुनिया में पीठ और पेट एक हो गए हैं ! जैसे ही पीठ और पेट एक होते हैं हाथ लहराने लगता है ! हमारी पीठ अब सबसे महँगी खाली जगह है ! जब तक अपनी रीढ़ की हड्डी न बेचें पीठ के मालिक हम ही होते हैं !

Cut to –

अजब देश की गजब होली खेली जा रही थी ! ‘पोस्टर वार’ में मैंने देखा एक पोस्टर दूसरे पोस्टर पर कीचड उछाल रहा था !  हाथ और पाँव से बने पोस्टर थे ! पर वो शरीर के नहीं शोषण की बैचैनी के पोस्टर थे ! झंडे में लिपटी औरत का पोस्टर न देश का था न महिला उत्पीड़न का ! मुझे बहुत आश्चर्य हुआ वो महंगे जूते का पोस्टर था ! कुछ पोस्टर में जलते हुए शब्द थे ! उनका हर अक्षर आग से लिपटा धू धू कर रहा था ! फेफड़े का पोस्टर पेड़ के जड़ बने थे ! हर पोस्टर मानव बम लग रहा था ! पोस्टर पर बच्चों तक को हर्फ़ बना दिया गया था और खुद उनका बस्ता बन गए ! कई पोस्टर बदनाम थे ! उनका गज़ब इतिहास था ! उन पर कालिख पोती जा चुकी थी ! कीचड़ उछाला जा चूका था ! उन्हें फाड़ा गया था ! उनमे से कई जले हुए पोस्टर थे जिन्हे जलाया गया था ! सबके अंदर एक पोस्टर छुपा था ! सब अपने अंदर के छुपे पोस्टर के साथ अश्लील हरकतों की फैंटसी रखते थे ! इन सबके बीच नौटंकी के पोस्टर भी थे ! चाय के भी पोस्टर थे जिस पर वाह उस्ताद लिखा था !

Cut to –

अब मुझे पता चला की मेरे अंदर भी एक पोस्टर है ! मिक्स्ड फीलिंग वाला पोस्टर ! हम देखते पहले हैं और पढ़ते बाद में हैं ! चित्र पहले और शब्द बाद में ! बच्चा पहले देखना सीखता है और पढ़ना बाद में ! हम आज कल आस पास क्या देख रहे हैं ? पोस्टर के साथ चित्र, प्रदर्शनी, झांकी, सिनेमा, टेलीविजन, कवर पेज, और हेड लाइन्स ! रंग विरंगे शब्दों के झूठे खोखले वादे और एक दुसरे पर फेके गए बदरंग पानी के गुब्बारे ! शानदार, जानदार, ईमानदार, बिकाऊ, विरोधी, बईमान ,विचार, पत्रकार जैसे कई शब्द पोस्टर से निकल कर मुझे चारो तरफ से खींचने लगे ! मेरी घबराहट बढ़ गयी ! सब गड्ड मड्ड हो गया ! पोस्टरों ने खिचड़ी पका के दिमाग की दही जमा दी थी ! समाधान ‘हाथ’ में है, ‘झाड़ू’ घर में है, ‘कमल’ मन में खिला है फिर भी चारो तरफ भ्रष्टाचार है, महँगाई है, घरके बाहर गंदगी है और मन अशांत है ! चारो ओर ये कैसा ‘पोस्टर वार’ है ?   मैं चीखना चाहता था ! मेरी आँखें भर आयीं !

Cut to –

इतने में आकाश से संविधान – वाणी हुई ” मत भूल बेटा, तेरे पास है नोटा , फिर क्यों तू रोता ” … मैं जोर से चिल्लाया ! ” नॉन ऑफ़ द अबोव, नॉन ऑफ़ द अबोव,  नॉन ऑफ़ द अबोव ” फिर अंग्रेजी में चीखा NOTA , NOTA , NOTA  !!!  हनुमान चालीसा पढ़ते ही जैसे भूत भाग जाते हैं वैसे ही पोस्टर ने मुझे मुक्त कर दिया ! उन्हें देख कर लग रहा था जैसे उन्हें सांप सूँघ गया हो ! सर, सर करने लगे ! मेरी भी हिम्मत बढ़ी  ! मैंने चैन की सांस ली ! पोस्टर को पता चल गया था कि मुझे अपने अधिकार और जिम्मेदारियों के साथ अपनी सभी संवैधानिक सुविधाओं का ज्ञान है ! जितना उन्होंने सोचा था उतना मुर्ख नहीं हूँ ! मैं नए भारत का पढ़ा लिखा और अपना विवेक रखने वाला एक मतदाता हूँ जो स्वतंत्र है और निर्भीक है !

Cut to –

तभी नींद भंग हो गयी ! मेरी आँख खुल गयी ! लगा कोई मोहभंग हो गया है ! बहुत देर तक निढाल मैं बिस्तर पर पड़ा रहा ! हवा तेज़ थी देखा तो पंखा चल रहा था ! अब बाहर निकल कर चल रहे  ‘पोस्टर वार’ के हर पोस्टर की सच्चाई का मुझे सामना करना था !

( प्रभात खबर में प्रकाशित )

शब्दशः महालोक का शब्दकार / महालोक – तीन

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शब्दों के भण्डार से कुछ शब्द गायब हो गये ! कहानी यहीं से शुरू होती है ! शब्दों का कोई लेखा जोखा नहीं होने की वजह से इसकी शिकायत कैसे हो इस पर दिमाग काम करने लगा ! किसी से अगर ये बात कहें तो सबसे पहले वो यही पूछेगा कितने शब्द गायब हुए हैं और वे कौन कौन से हैं ? आप इस बात पर हंस सकते हैं पर सब ये जानते हैं की ये एक गंभीर अपराध है !
भला कौन शब्द गिन के रखता है जो सही – सही कह सकेगा ? शब्द के भण्डार में शब्द यूँ ही पड़े रहते हैं ! नए पुराने शब्द सब साथ रहते हैं ! मैंने बोलना शुरू किया तो पता चल सब बातें साफ़ – साफ़ हो रही हैं ! सारे जरूरी शब्द वहीँ थे ! शब्द बड़ी चालाकी से अपने पर्याय से अपने अर्थ निकलवा लेते हैं ! फिर ऐसा क्यों लग रहा था कि कुछ शब्द गायब हैं ? शब्दों की चोरी पकड़ना इतना आसान नहीं है ! सबके शब्द एक जैसे होते हैं !
चोरी का पता चलते ही शब्द के तीनो यार – कागज़ कलम और विचार वहां पहुँच गए ! उनकी कुछ शब्दों से आनाकानी तो चल रही थी पर वो चुरा लिए जायेंगे ये उनको भी विश्वास नहीं हो रहा था !
जितने मुंह उतने शब्द ! कैसे पता चले कौन से शब्द गायब हैं ? चोरी कर लिए गए या भाग गए या मर गए हैं ये कैसे पता चलेगा ?
कुछ सम्मानित शब्द रूठे हुए भी निकले !
अप – शब्दों की तो बुरी हालत थी ! उनके बारे में लोग मुंह पर हाथ रख के बात करते थे !
मैंने फिर भाव के आधार पर उनको ढूँढना शुरू किया ! हंसी ख़ुशी के सारे शब्द फटा – फट पहले जुबां पर आने लगे ! पता चला हिंदी अंग्रेजी साथ मिल के कई शब्दों ने नए शब्दों को जनम दे दिया है !
शब्दों का पीछा करते हुए कई स्वाद एक साथ मुंह में घुलने लगे ! रंग दिखे , आवाज़ सुनायी दिए ! एक ही साथ हंसने और रोने लगा ! इन्द्रियां शब्दों से लत पथ थीं  !
सस्ते और महंगे शब्द की जैसे ही बात हुई अपनी औकात सामने आ गयी !
इंस्पेक्टर ने मुझे अपने से छोटे ओहदे के नए दरोगा को सुपुर्द कर दिया और बोला ये साहित्य वाले हैं इनसे बात कीजिये ! साहित्य वाला नया दरोगा अपने आप को इंस्पेक्टर कहलवाना पसंद करता है और उसे दरोगा शब्द आउट ऑफ़ डेट लगता है ये उसने खुद मुझे बताया !
उसने पुछा आप कौन ? मैंने कहा शब्दकार ! उसका कहना था कोई शब्द – कार कैसे हो सकता है ? कहाँ के शब्दकार ?
शब्द बदलते हैं तो अर्थ बदल जाता है ! आप सही शब्दों का उपयोग कीजिये ! मैंने कहा बस यही उलझन है कई शब्द गायब हैं ! उसने पुछा कौन कौन से शब्द हैं जो आपको नहीं मिल रहे ? मैंने कहा ये भी पता नहीं चल पा रहा है ! उसने कहा ये गंभीर अपराध हुआ है आपके साथ ! पर शब्दों की चोरी के बाबत आज तक कोई ऍफ़ आई आर नहीं हुआ है ! आप इत्यादि जैसे शब्दों के साथ इसे सत्य मानिए …
इस बीच कई शब्द आये और गए पर वो शब्द नहीं मिला जिसके अंत में एक ही अक्षर था जिसके बिना कई वाक्य अधूरे हैं  …
सूखी रोशनाई में शब्दों की आँखों से पानी आ जाता है और वो झिलमिलाते हुए आधे – अधूरे तरह – तरह के आकार में किसी नन्हें हाथों से कागज़ पर उतर – उतर के गीले गीले होठों से तुतली जुबां में छलकते रहते हैं !  अब मेरे पास और कोई चारा नहीं है … नए शब्द वहीँ से लाने होंगे …

बचे खुचे शब्दों के साथ –
आप इस बात पर ध्यान क्यों दे रहे हैं ? मैंने कहा सब शब्दों का खेल है मेरे पास वो शब्द नहीं हैं इसीलिए मैं शोषित हूँ ,कई विरोध शब्द नहीं होने की वजह से व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ …

( Pic : Ora Jha)

महालोक के ‘अंग प्रत्यंग’ – अंगो का एकालाप : महालोक – दो

Pic : Dina Bova

Pic : Dina Bova

युग्म शब्द ‘अंग – प्रत्यंग’ का प्रयोग बोल चाल की भाषा में पूरे शरीर को उद्धत करने के लिए किया जाता है ! इस शब्द का उपयोग मुहावरे के रूप में शारीरिक भाव या शारीरिक संरचना के सन्दर्भ में भी किया जाता रहा है ! मूलतः इसका सन्दर्भ नाट्य शाश्त्र में सबसे पहले मिलता है ! नाट्य शाश्त्र में शरीर को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है ! अंग , प्रत्यंग, और उप – अंग  !
छः अंग हैं ! शीर्ष / सिर (head), हस्त / हाथ (hand) , वक्ष / छाती (chest) , पार्श्व (sides) ,कटि (hips) , और पाद/ पैर ( leg) ! ग्रीवा / गर्दन (neck) को सातवां अंग मना जा सकता है ! प्रत्यंग भी छह हैं ! स्कंध / कंधे (shoulders), बाहू / बांह (arms ), पीठ , पेट , जांघ ,उरु ! और उप – अंग बारह ! उप – अंग चेहरे की अभिव्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं ! नेत्र,भ्रकुटी,नासिका,अधर,कपाल,चिबुक, होंठ, दांत, जीभ, ठोड़ी,पुतुली और चेहरा ! नाट्यशास्त्र के अनुसार, नर्तक या अभिनेता नाटक के अर्थ को चार प्रकार के अभिनयों के ज़रिये प्रस्तुत करता हैः आंगिक या शरीर के विभिन्न अंगों के शैलीपूर्ण संचालन के माध्यम से भावना की प्रस्तुति; वाचिक या बोली, गीत, स्वर की तारता और स्वरशैली से भावना की प्रस्तुति ; आहार्य या वेशभूषा और श्रृंगार से भावना की प्रस्तुति; और सात्विक ! सात्विक अभिनय तो उन भावों का वास्तविक और हार्दिक अभिनय है जिन्हें रस सिद्धांतवाले सात्विक भाव कहते हैं !

हर अच्छे  कलाकार के पास शैलीकृत भंगिमाओं का जटिल भंडार होता है। शरीर के प्रत्येक अंग, जिनमें से आँखें व हाथ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, के लिए पारम्परिक तौर पर मुद्राएँ निर्धारित हैं। सिर के लिए 13, भौंहों के लिए 7, नाक के लिए 6, गालों के लिए 6, ठोड़ी के लिए 7, गर्दन के लिए 9, वक्ष के लिए 5 व आँखों के लिए 36, पैरों व निम्न अंगों के लिए 32, जिनमें से 16 भूमि पर व 16 हवा के लिए निर्धारित हैं। पाँव की विभिन्न गतियाँ (जैसे-इठलाना, ठुमकना, तिरछे चलना, ताल) सावधानी से की जाती हैं। एक हाथ की 24 मुद्राएँ (असंयुक्त हस्त) और दोनों हाथों की 13 मुद्राएँ (संयुक्त हस्त), एक हस्त मुद्रा के एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न 30 अर्थ हो सकते हैं।

आजकल की अभिनयप्रणाली में एक चरित्राभिनय (कैरेक्टर ऐक्टिंग) की रीति चली है जिसमें एक अभिनेता किसी विशेष प्रकार के चरित्र में विशेषता प्राप्त करके सब नाटकों / फिल्मो में उसी प्रकार की भूमिका ग्रहण करता है। फिल्मो के कारण इस प्रकार के चरित्र अभिनेता बहुत बढ़ते जा रहे हैं। उनके अभिनय की शैली में ‘अंग – प्रत्यंग’ वही रहते हैं बस फिल्मो में उनके चरित्र के नाम बदलते रहते हैं !

अपनी फिल्मों में चरित्रों के संसार को रचने के क्रम में उनके अभिनय की परिकल्पना पर मेरा मन एक विचार से दुसरे विचार के बीच अपने वेग से विचरता रहता है ! मन में उठते विचार एक सशक्त आवेग हैं जिसकी अभिव्यक्ति के लिए मै सतत प्रयत्नशील रहता हूँ ! प्रस्तुत है मेरे मनोवेग की पहली कड़ी ! ये पंक्तियाँ ‘स्वगत स्वरुप’ में ही मुझ तक अलग अलग विचारों के क्रम में मेरे मन में आयीं जिन्हें मै अपने फेसबुक के वाल पर शेयर करता रहा हूँ !

मैं फेसबुक स्टेटस को ‘मनः स्टेटस’ भी कहता हूँ , मनः स्थिति का परिवर्तित स्व – रूप ! मनोवेग की पहली कड़ी में प्रस्तुत है ‘अंग – प्रत्यंग’ ! कोई अभिनेता अपने शरीर को लेकर अंगो के मेरी इस एकालाप को प्रयोगधर्मी प्रस्तुति में भी बदल सकता है ! अपने ‘मनः Status ‘ का ये साहित्य शेयर करते हुए मुझे ख़ुशी हो रही है !  पढ़िए और भावनाओं के जाने अनजाने सोते में गोते लगाईये … मेरे इन विचारों से आप भी अपने – अपने ‘मनो – योग’ से जुड़िये और जोड़िये ! अगर मेरा ये पोस्ट आपको पसंद आए तो अपने अंग से कहियेगा प्रदर्शित करे … अंग प्रदर्शन के लिए अभिनेता होना जरूरी नहीं है … और अंग प्रदर्शन का मतलब हमेशा वही नहीं होता जिसे हमारा सेंसर दिखाने नहीं देता… आप मुझे अंगूठा तो दिखा ही सकते हैं 😉

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कलेजा ठंडा किया जाता है और खून गर्म ! खून को खौला भी सकते हैं ! खून पीना एक बात है और खून का घूँट पीना एक दम अलग बात ! दिल लेने और देने के काम आता है, सबसे ज्यादा टूटता भी यही है ! दिमाग की दही होती है ! छाती चीरते हैं और गर्दन काटी जाती है ! गला काटने और दबाने दोनों के काम आता है ! हाथ और पाँव तोड़े जाते हैं ! पाँव तोड़ के हाथ में भी रखने की बात सुनी जा चुकी है ! उँगलियों पर नाच सकते हैं ! कन्धा दिया जाता है ! दिल पर और सर पर हाथ रखा जाता है ! पैर भारी हो सकते हैं और घुटनों के बल चला जा सकता है ! कान में तेल डाल के सो सकते है, मरोड़ सकते हैं और उसके नीचे बजा भी सकते हैं ! कुछ कान के कच्चे भी होते हैं ! पेट की पूजा होती है ! नाक कट सकती है ! मुँह काला हो सकता है ! हाथ खाली हो सकते हैं ! सर झुकाया और उठाया जाता है ! होंठ सिले जाते हैं ! आँखें बोलती हैं ! कमर कसी जाती है ! करने पर हड्डी पसली एक हो सकती है ! हाथ पीले हों तो अच्छी बात है पर रंगे हाथ पकडे गए तो गए काम से ! आँख फोड़ी जाती है और मुँह तोडा जाता है ! खाल खींची जाती है ! निकलना हो तो बाल की खाल निकाल सकते हैं ! नाक से चने चबा सकते हैं ! दांतों तले उंगलियाँ दबा सकते हैं ! दांत खट्टे हो सकते हैं ! ज़ुबान पर लगाम लगाई जाती है ! आँख मारने के काम आती है , वैसे कई अंग हैं जिनको मारते हैं ! जिस्म के साथ ये सब करना मर्दाना है !

अपने आप को सिर्फ अपने अंगों के भरोसे कैसे छोड़ दें…?

जैसे रेडियो कान में घुस गया है वैसे ही धीरे धीरे टेलीविजन भी आँख में घुस रहा है ! मोबाइल कान और आँख दोनों में घुसा हुआ है ! कैमरा, पर्स, बैग, फोन, छुट्टे पैसों में हाथ पहले से उलझे हुए हैं ! अंगूठी में उँगलियाँ फंसी हैं ! घड़ी और टोटके में कलाई ! जूते चप्पल में पाँव धंसा हुआ है ! गुप्तांगों की तो हालत बहुत खराब है पता नहीं क्या क्या फंसा के कहाँ कहाँ घुसा दिया है ! आँख और नाक पर चश्मा अलग से ! गले की हालत तो ऐसी है की कोई भी काट ले ! दिल दिमाग के बिना सारी कल्पनाएँ अधूरी हैं ! फेफरे में धुंआ भर लिया है और किडनी में शराब ! हम ‘अंग प्रत्यंग’ से खेल रहे हैं…

अंग - प्रत्यंग

अंग – प्रत्यंग

जहाँ हम होते हैं जरूरी नहीं वहीँ दिमाग हो !

चाहे कुछ भी बंद करें मुँह खुला रहता है !

दूसरा कदम रखने के बाद पहला कदम पूरा होता है !

गले से उतरते ही ज़हर अपना काम शुरू कर देता है पर उसे गले से उतारना कौन चाहता है ?

दो हाथ हमारे दो मन हैं ! एक कहीं भी पहुँच सकता है और एक सिर्फ कहीं कहीं…

हाथ जोड़ के… घुटनों के बल बैठ के… गोल गोल घूम के… खड़े खड़े… उफ़ ! बाहर कैसे कैसे इशारे…! और वो हमारे अंदर ही है …

मुँह में घी शक्कर बोला ही था थोड़ी चायपत्ती चीनी और गरम पानी भी बोल देते !

जब दिल बैठ जाता है तो कोई और अंग खड़ा होने की ज़ुर्रत नहीं करता !

खड़े होने की बात हो तो बाल और रोंगटे को हम भूल जाते हैं !

सच का साथ दें या न दें इसका फैसला हमेशा हमारे हाथ में रहता है !

मन की आवाज़ आँखों का कोलाज़ है !

जीभ अपना कहा खुद काटती है !

मन कठोर करने के लिए शिलाजीत नहीं खाना पड़ता !

आँखों से सुनना कान से देखना नाक से छूना हाथ से सूंघना पैर से सोचना और दिमाग से चलने को मल्टीमीडिया इफेक्ट कह सकते हैं !

अच्छा रसोइया ज़ुबान खींच लेता है !

हमारा चेहरा हमारे मूड का बर्तन है !

आँखें देखतीं ही नहीं एडिट भी करती हैं !

कैमरे के लिए पल भर में हम अपने अंदर से फोटो वाला चेहरा निकाल लेते हैं !

अलग अलग दोस्तों के लिए अलग अलग भावनाएं रखने में मन मास्टर होता है !

कई लोगों के पैर नहीं होते पर वो ‘sir’ होते हैं !

सच झूठ के बिना नंगा होता है !

आँखे देखती हैं ,मन रंग भरता है !

आप का मुखड़ा किसी जीवन का अंतरा है !

कमर फैशन में है सीना नहीं ! ( छाती ठोकने वालों के लिए )

जब से गुरु ने अंगूठा काट लिया है हम सब अंगुली से ही एक दुसरे को छेड़ रहे हैं !

उस आँख से क्यों नहीं कुछ दीखता जिस आँख में मन है मेरा !

हम अंदर बाहर एक नहीं हैं !

आँख चुराते हैं तो आँख में गिर भी जाते हैं !

आँख में धुल झोंकते हैं !

धुल चाटी भी जाती है !

आँख की सेंकाई करने वाले ही आँख मारते हैं !  आँख का मारा सबूत ही जुटा रह जाता है ! तरसती आँखों के बीच चार चार आँखें ले के घूमने वाले भी हैं ! आँख बिछाई भी जाती है ! फेर ली गयीं आँखें उठती नहीं हैं ! आँख लग जाए तो आँख खुलती नहीं है ! आँखों पर से पर्दा हटाते है तो सब बदल चूका होता है !

Pic : Dina Bova

Pic : Dina Bova

सांप कलेजे पर खूब लोटते हैं !

कुछ हाथों हाथ लेते हैं तो बात कानों कान फैल जाती है !

हाथों हाथ ली गयी बात कानों कान फैल जाती है !

आप अपने कान खुद क़तर सकते हैं भर नहीं सकते !

कच्चा कान किसी काम का नहीं होता !

कान पर जूँ नहीं रेंग सकता और नाक पर मख्खी नहीं बैठ सकती !

नाक सब रख सकते हैं पर नाक कोई रगड़ना नहीं चाहता ! नाक कटता है तो खून नहीं बहता !

दाँत खट्टे हो जाएँ तो मुह छुपाना पड़ता है ! मुँह की खाने के बाद पता नहीं क्यों दाँत पिसते हैं लोग !

दाँत कटी रोटी मुँह बंद रखता है !

मुँह पर का कालिख मुँह का पानी नहीं धो सकता !

मुँह नहीं रखो तो मुँह उतर जाता है !

मुँह दिखाई के रस्म में मुँह उतार के छुपा नहीं सकते !

दिल पर कोई नहीं लेता अब सब हार्ड डिस्क पर ले लेते हैं !

अक्ल के पास घोड़े होते हैं इसीलिए अक्ल के दुश्मन होते हैं !

आँख दिखाओगे तो आँख ही देखोगे !

पर पूरे अंग में भूत सिर्फ सर पर सवार होता है !

अंग छूटा संग छूटा … !

वैसे अपनी करनी सब अंग याद नहीं रखते !

अंग टूटते हैं ढीले होते हैं पर ये पढ़ के आज अंग अंग मुस्कुराएंगे …

''Sringāra Rasa''': Rasa-Abhinaya by all time great Rasa-Abhinaya maestro (late) Guru Nātyāchārya Vidūshakaratnam Padma Shri Māni Mādhava Chākyār at the age of 89.

”Sringāra Rasa”’: Rasa-Abhinaya by all time great Rasa-Abhinaya maestro (late) Guru Nātyāchārya Vidūshakaratnam Padma Shri Māni Mādhava Chākyār at the age of 89.

इतिहास में मूर्तियों के अंग भंग करना कट्टर प्रतिवाद का प्रमाण रहा है ! जिस्म के साथ मुहावरों, कहावतों और गालियों में बहुत कुछ करते हैं ! सभ्यता के इस पड़ाव पर जिस्म के साथ हम पता नहीं क्या क्या करेंगे और क्या – क्या किया जा सकता है … ! वैसे चौसठ प्रकार पर एक प्राचीन किताब भी है…

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क्रमशः