पवित्र चप्पल

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पवित्र चप्पल

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चप्पल को नहीं जानना ही सारे दुःखों का मूल कारण है ! वेदों में लिखा है चप्पल को जानने से आदमी सारे बन्धनों से मुक्त हो जाता है ! अगर किसी की दिलचस्पी आजाद भारत के इतिहास को बारीकी से जानने की है, तो उसे पहले भारतीय चप्पल को जानना होगा ! लेकिन, दुर्भाग्य से चप्पल को इस दृष्टि से देखना बंद कर दिया गया है !

“धाँय…धाँय…धाँय…” ! बंदूक से तीन गोलियाँ निकलीं ! गोलियों की आवाज के बाद अगली आवाज थी – ‘हे…राम’ ! उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ याद नहीं ! मैं अभागी चप्पल बापू के पाँव से पता नहीं कब सदा के लिए अलग हो गयी ! मैं राष्ट्रपिता द्वारा पहने जाने के बाद भी वीआईपी नहीं हो पायी हूँ ! आज देश में चप्पल की हालत उनके सिद्धांतों जैसी हल्की और सार्वजनिक हो गयी है ! मुझे जो चाहे उतार ले, किसी पर भी उछाल ले, नीलामी में बेच दे या किसी को भी जड़ दे !

बिरला हाउस के हरे घास पर पड़े – पड़े मुझे लगा किसी गहरी नींद से सोकर उठी हूँ ! कुछ ठीक से याद नहीं आ रहा था ! मेरा शरीर सामने पड़ा था और मैं उससे बाहर ! मुझे सिर्फ इतना याद है मेरे धारक का नाम मोहनदास करमचंद गाँधी था जिसने मुझे कुछ भी अदा करने का वचन नहीं दिया था ! मैं बापू का वो चप्पल हूँ जो तीस जनवरी को बापू के पाँव से आत्मा की तरह बिछड़ गयी थी !

हाँ, आज मैं चप्पल के वेश में संत नहीं हूँ, क्योंकि आज किसी संत के पाँव में चप्पल नहीं है ! हाँ, मैं चप्पल के वेश में राजनेता भी नहीं हूँ, किसी राजनेता के पाँव में चप्पल नहीं है ! मुझे संत कहना यदि संभव भी हो तो अभी उसका समय बहुत दूर है ! शायद मुझे समाज की कुरीतियों में और घिसना है ! संत के पॉव में लम्बे समय तक रहने के बाद भी मैं किसी भी रूप या आकार में अपने आपको संत अनुभव नहीं करती ! स्लीपर, सैंडल, फ्लोटर, बैली, हाईहील, अब मेरे कई नाम है !

जीने के लिए कई बार नीलाम हो कर, कई बार बदनाम हो कर, वेश बदल कर भी मैं समाज की सेवा कर रही हूँ ! दुःख बस इस बात का है कि बापू की हत्या के बाद देश में चप्पल की किसी ने सुध नहीं ली ! बापू के तीनो बंदरों ने भी अपने पुतले में मुझे अपने साथ स्थान नहीं दिया ! वो चाहते तो बुरा न देखो. बुरा न बोलो, बुरा न सोचो के साथ बुरा न पहनो कहती हुई मैं गाँधी जी का चौथा बंदर बन सकती थी ! पर आज भी मैं अश्पृश्य हूँ !

हा ! बापू तुम कहाँ हो ? बापू भारतीय नोट में तुम्हारे पाँव क्यों नहीं दिखते ? तुम्हारे पाँव के बहाने मैं तुक्छ चप्पल दिख जाती तो देश में चप्पलों की गरीबी दूर हो जाती ! चप्पल गरीब नहीं होते तो तो उन्हें पहनने वाले पाँव भी गरीब नहीं रहते ! ‘ सादा जीवन उच्च विचार ‘ चप्पल का यही साफ़्ट कार्नर आज सबसे ज्यादा चुभता है ! ‘ अच्छी गुणवत्ता और सस्ती कीमत ‘ ये अब मेरी पहचान नहीं, आज गरीबी को दी हुई गाली है ! अपने अतीत की ठोकरों से सबक लेकर मैंने यही जाना है !

मेरे पिता एक जूता थे इसलिए मैंने अपने जीवन में कभी कोई जिम्मेदारी नहीं ली ! स्वतंत्रता का अनुभव करने के लिए यात्रा जरुरी है, यह मैं बचपन में ही जान गयी थी ! हमेशा घूमना – फिरना ही मेरा जीवन रहा ! चप्पल के बहाने देश की गरीबी की आत्मकथा लिखने का मेरा आशय नहीं है ! मैं बस एक चप्पल हूँ और बापू की हत्या के बाद गरीब के पैर में फँस गयी हूँ ! देश और बापू की आत्मा की तरह मुझे भी गरीबी से आज़ादी चाहिए ! भारत में गरीबी अक्सर चप्पल से चल के आती है ! चप्पल की जनसँख्या गरीबी का परिणाम है !

बापू के चश्मा के साथ सब अच्छा हुआ ! गोली लगने के बाद बापू का चश्मा भी हरे घास पर वहीँ गिरा था जहाँ मैं गिरी थी ! चश्मे को चाहे फिर बापू की नज़र न मिली हो पर उसकी रोजी रोटी पर किसी की नज़र नहीं लगी ! बापू की हत्या के बाद अपनी पहचान के लिए मेरी तरह चश्मा विदेशों में नीलाम हो कर भी स्वच्छता अभियान को पा गया है ! सब जानते हैं स्वछता अभियान के पोस्टर में बापू का चश्मा अपना पेट पाल रहा है ! गन्दगी की तरह चश्मे को मुझ चप्पल की गरीबी भी नहीं दिख रही है ! बापू तुम्हारे जाने के इतने सालों बाद भी मैं क्यों भटक रही हूँ और मेरी हालत पर व्यंग्यकार क्यों ताने मार रहे हैं ?

चप्पल एक शक्ति है, एक मार्ग है, एक धारा है, एक एहसास है, एक विश्वास है, जिसका निश्चित स्वरुप हमारे पैरों में है ! चप्पल के रूप और स्वरूप को लेकर यही सत्य है ! चप्पल एक विचार है जिसे जिया जा सकता है, चप्पल एक अनुशासन है जिसे माना जा सकता है और जिसे जीवन के कर्मों के अनुसार किसी और बदन पर उतारा भी जा सकता है ! चप्पल को शिक्षित होना चाहिए क्योंकि शिक्षा के अभाव में एक स्वस्थ पैर का चप्पल होना असंभव है !

पैरों में रहकर भटकते हुए भी मैंने रावण, चाणक्य, दादाभाई नौरोजी, विवेकानन्द, गोखले, तिलक के भाषणों और लेखों को पढ़ा है ! साथ ही मैंने भारत और कुछ अन्य प्रमुख देशों जैसे इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका और रूस के प्राचीन और आधुनिक इतिहास को भी पढ़ा है ! इनके अतिरिक्त मैंने समाजवाद और माक्र्सवाद के सिद्धान्तों का भी अध्ययन किया है, इसलिए मैं ये कह सकती हूँ कि हर चप्पल कुछ कहती है ! चप्पल का अर्थ है – किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान न पहुँचाना !

भारत देश में चप्पल का जड़ गहरा है ! क्या आप मेरे एक सवाल का जवाब दे सकते हैं ? शरीर प्रशासित पैर में और भारत प्रशासित कश्मीर में क्या समानता है ? मेरा उत्तर है – अपने पैरों के साथ बर्बरता ! चप्पल की तरह शरीर में भी बाहर की तरफ चमड़े लगे हैं और शायद अंदर रबड़ की आत्माएं हैं ! इसीलिए देश में पैरों को डरा कर रोकने के लिए देश की आत्मा को काट के रबड़ की गोली बनती है ! पैरों के साथ बर्बरता से अब शरीर में आत्मायें भी नहीं बचीं इसीलिए रबड़ की गोली भी नहीं रही और अब पत्थर बरस रहे हैं ! चप्पल के बिना देश के पैर की छब्बीस हड्डियों में सांप्रदायिक तनाव कौन फैला रहा है ? क्या अपने देश समाज का आकार चप्पल से बड़ा नहीं है ?

मैं चप्पल के रूप में भी दिल और समर्पण से भरी हुई हूँ ! अपने देश की शिक्षा, गरीबी, हेल्थकेयर, न्याय, कानून और व्यवस्था जैसे कई पथरीले रास्तों वाले किसी भी लम्बी यात्रा पर चलने के लिए और कुछ भी करने के लिए तैयार हूँ ! पर मैं देश के घोटालों को पचाने में सक्षम नहीं हूँ ! चप्पल उतना ही पचा सकता है जितना पैर खा सकता है !

जिस तरह पवित्र स्थलों पर जूते पहनकर जाना सही नहीं है, उसी तरह लोग घर के भीतर चप्पल ले जाना सही नहीं समझते ! कुछ लोग इसके पीछे साफ – सफाई और स्वच्छता का तर्क भी देते हैं, ताकि बाहर की गंदगी घर के भीतर ना पहुंच सके ! मेरा मानना है कि जनता के विचारों को मोड़ देने और सक्रिय करने में सबसे अधिक भूमिका मैंने और मेरे साथ दुसरे चप्पलों ने ही निभायी है ! मुझे दुःख है आज भारत के तीस प्रतिशत पैर चप्पल से भी बहार हैं ! पवित्र चप्पल के पाँव तुम एक हो जाओ ! खाली पैर वालों का देवता भी नहीं सुनते शोर मचाने के लिए कम से कम चप्पल पहनना जरुरी है !