मेरे अंदर एक लाल पान की बेगम है

 

लाल पान की बेगम

लाल पान की बेगम

मेरे अंदर एक लाल पान की बेगम है जिसका मैं गुलाम हूँ ! मेरा मुख्य कर्तव्य दिन रात उस स्त्री की सेवा से जुड़ा हुआ है ! मेरे अंदर उसको बराबरी का दर्जा हासिल है ! अंदर की उकता देनेवाली पुनरावृत्ति और स्नायुओं में भर गयी जड़ता से वो मुझे मुक्त कराती है और वही स्त्री मुझे आत्मनिर्भर बनाती है ! मेरे ह्रदय को एक नहीं अनेक स्त्रियों ने ढाला है ! मैं अपनी स्त्री के बारे में लिख सकता हूँ इसीलिए लिख रहा हूँ ! माँ, बहन, प्रेमिका, दोस्त, पत्नी और अब बेटी, रिश्तों की हर तह में स्त्री को जानने की ललक ही रही होगी जिसकी वजह से मुझे इतना स्त्री धन मिला है ! मौसी, बुआ, मामी, चाची, भाभी, बहु और सबकी बेटियाँ ! बहुत बड़े परिवार के साथ रह कर पला बढ़ा जिसकी वजह से मेरा संसार स्त्रियों से भरा है !

नाट्य, कलाकर्म, साहित्य और अब सिनेमा से जुड़ा जीवन ! गुरु, गाइड, दोस्त, सहकर्मी, अजनबी सब किस्म की स्त्रियों से मिलने और सीखने का सौभाग्य मिला ! स्त्रियों के साथ इतने रिश्तों में जीना, मेरा ही नहीं किसी भी भारतीय या विश्व के स्वस्थ समाज में बिताये अपने बचपन और जी रहे किसी भी उम्र के आदमी का सामान्य जीवन है, जिस पर लाखों करोड़ों लोगों की तरह मुझे भी गर्व है ! मैं आज भी स्त्रियों से आकर्षित और प्रभावित होता रहता हूँ और स्त्री ही मेरे भीतर उत्सव और आनंद का बीज बोती है !

जब भी अपने अंदर झांकता हूँ, मुझे लगता है मेरे अंदर भी एक स्त्री है जो पल रही है और मुझे पाल रही है ! मेरे अंदर की लाल पान की बेगम ही मेरी दुर्गा है, देवी है, काली है, सहचरी है, मेरे जीवन की प्राण शक्ति है ! जो मेरे भीतर के आशावादी, विजयी और सुंदर चेतना की सच्चाई है ! इस स्त्री पर अभी तो कुछ सौ शब्द लिख रहा हूँ पर मैं स्त्री पर अपने हर शब्द न्योछावर कर के उसकी आँचल में बांधेने को तैयार हूँ ! दस दिनों का दशहरा या नौ दिनों की नवरात्रि मेरे लिए स्त्रयों में मेरी आस्था से फिर फिर जुड़ने का संकल्प है !