मैं बैन का समर्थक नहीं

 

मैं बैन का समर्थक नहीं

मैं बैन का समर्थक नहीं

 

एक /

हम अभी लाइव टेलीकास्ट के लिए तैयार नहीं …

हमें क्रिकेट लाइव दिखाना आता है, देश नहीं
उपवास नहीं
उत्सव, त्यौहार नहीं
बलिदान नहीं, अधिकार नहीं

हमें फैशन शो दिखाना आता है
संस्कार नहीं
हमला नहीं , वार नहीं
हम अभी लाइव टेलीकास्ट के लिए तैयार नहीं !

हमें भाषण दिखाना आता है
खेल नहीं. पुरस्कार नहीं
समाचार नहीं
हम अभी लाइव टेलीकास्ट के लिए तैयार नहीं !

हमें मेंडेट दिखाना आता है
कैंडिडेट नहीं
हमें चमत्कार दिखाना आता है
पत्रकार नहीं
हम अभी लाइव टेलीकास्ट के लिए तैयार नहीं !

हम बैनर बनने को तैयार है
हम अभी बैन होने को तैयार नहीं …

 

दो /

बैन का पहाड़ा

बैन एकम बैन
बैन दूनी सर्कस
बैन तिये स्टेटस
बैन चौके बकवास
बैन पंजे काला
बैन छके हास्य
बैन सत्ते नैन
बैन अठ्ठे रुपया
बैन नामे एन डी टी वी
बैन दसे बांस

जलते पटाखा का बुझता प्रेमी

पटाखा को लेकर मेरा एक प्यारा सपना था, जिसको मेरी पटाखा ने ही मेरी आंखों में धूल झोंक कर फोड़ दिया है. मेरी पटाखा दरअसल सिर्फ़ मेरी प्रेमिका नहीं बल्कि मेरा एक विचार है. पटाखा की देह गंध मेरे आनन्द का स्रोत रही है. पटाखा के अंदर मेरे बचपन की खुशियां भरी थी और इसकी पवित्र चिंगारी का मैं प्रेमी था. मैं अब तक अपनी पटाखा की प्रेम अग्नि में उत्सव की तरह जलता रहा हूं. इस बार दिवाली के नाम पर अश्लील ढंग से फट कर पटाखा ने मेरा दिल तोड़ा है और मेरे प्रेम के विश्वास में मुझे धोखा दिया है. उसके धोखे से इस बार मेरे अंदर धुआं भर गया, मुझे सांस लेने में तक़लीफ़ होने लगी. पटाखा के धोखे और धुएं से दम घोंटू वातावरण बन गया. उसकी अय्याश रंगरेलियों की आतिशबाजी के धुएं और बेवफ़ाई के विषाक्त धूल से आंखों में जलन और बेचैनी बढ़ने लगी, मुझे उबकाई आने लगी और मैं हिचक के रोने लगा.

मेरी प्रिय पटाखा. मेरे दिल के अनार, चकरी और फुलझड़ियों को धोखा दे कर मेरी रोशनी, दिए, कंदील और मिठाइयों को छोड़ कर तुम अपने सीसा, मैग्नीशियम, कैडमियम, नाइट्रेट, सोडियम फॉस्फोरस की घमंड में जिसके इर्द – गिर्द चकरघिन्नी खा रही हो तुम्हारे वो ग्राहक अपनी कामनाओं की वासना में तुम्हे जला के भष्म कर देंगे. हम दोनों के प्रेम के दिए जलते तो वाकई रौशनी के फूल खिलते, पर तुम इस दिवाली में किसी की कामुकता का पटाखा बन के फटी हो तो दिल जल रहा है. बज कर फुस्स हो जाने का तुम्हारा एक दिन का ज़िद भरा जश्न हर बार मेरे लिए ध्वनि प्रदूषण और हानिकारक गैसों से नुक्सान का कारण बनता रहा है. इस दिवाली किसी और की पटाखा बन के तुमने हम दोनों के प्रेम का पर्यावरण भी जला दिया.

मेरी पटाखा, तुम्हारी बारूदी आंखें मेरी देह के भीतर फटती तो मेरी आत्मा में उत्सव का धमाका होता पर जैसे तुम फट रही हो वह प्यार नहीं है, या कोमलता, या स्नेह, या अपने आप में जीवन, यह सब कुछ भी नहीं है. पटाखा इस दिवाली में तुम्हारे फटने की कामुक कराह का शोर मुझ पर एक भयानक प्रभाव छोड़ गया है. तुम्हारा धमाका खोखले सेक्स की तरह था, जिसमे तुम फटने के बाद हर बार अन्धकार में छूट जाती हो. अपने बारूद के बदले दुसरे के अहम् की देह गंध से बार बार भर जाना क्या तुम्हे घिन से नहीं भरता ? फिर तुम हर बार फटती हुई ऐसे क्यों छटपटाती हो जैसे जलते हुए अनार को किसी ने लात मार दिया हो ? वासना की अराजक सड़कों पर तुम अब चलती कार में हवस का शिकार बन कर बजने लगी हो, मनोरंजन के नाम पर तुम अपने नगर में शोर, धुआं, प्रदूषण का एक विरासत हो और कुछ नहीं. यह भयानक है. मेरी मासूम पटाखा तुम पार्क में हवा साफ करने के लिए सूर्य नमस्कार करते – करते प्रदुषण और अन्धकार की नगर वधु कैसे बन गयी ?

तुम्हारी कामुक आतिशबाजी को बच्चों और बुजुर्गों से भरा तुम्हारा परिवार भी बर्दाश्त नहीं कर सकता है. तुम जब भी बजती हो वो दिन और रात घर में बच्चों और बुजुर्गों के लिए एक भयानक दिन और रात होती है. इसीलिए तुम छुप छुप कर प्लास्टिक पीढ़ी के आवारा मर्दों की जेब खर्च से बजने लगी हो. उम्र भर टाइम बम की टिक टिक की तरह तुम्हे मेरी ह्रदय की धड़कन बन कर रहना था पर तुमने चुना बस एक कामुक ध्वनि, देह का विस्फोट और अब सब स्वाहा. तुम्हारे बजने की बीमार आदत ने मेरी भावनाओं की दुख:मय अंत्येष्टि कर दी है. मुझे पता है तुम अपने विस्फोटों के बीच मेरे शब्दों के माध्यम से मेरी दुःख की सिसकती आवाज सुन रही हो.

सुनो पटाखा तुम जलो और बजो पर अपने प्रेमी के लिए दमघोंटू माहौल बना कर किसी दूसरे की खुशियों के लिए अपने इस पागल प्रेमी की ख़ुशी को तो कम न करो. मेरे प्रेम की सारी आक्सीजन सोंख ली तुम्हारे पटाखे के धुएं ने. अपना उल्लास इतना महत्वपूर्ण है कि दूसरों की शांति में खलल डालते हुए तुम्हे ज़रा भी संकोच नहीं होता है ? मेरी पटाखा आखिर तुम इतनी ज़्यादा सेल्फ सेंटर्ड क्यों हो ?

तुम तो मेरे ह्रदय की मासूम पटाखा थी, दुःख की बात है तुम मुझे धोखा दे कर किसी की छाती पर चढ़ कर बज गयी. तुमने मुझे प्रेम में धोखा दिया है, याद रखना तुम्हे पता भी नहीं चलेगा कि तुम कब आखरी बार बज गयी हो और कब आखरी बार फट के अपने ग्राहकों के दिमाग में बारूदहीन कचरा बन गयी. अब तुम्हारी सल्फर, कोयला और पोटेशियम नाइट्रेट से भरी देह से प्रेम करने में कोई गौरव, सम्मान या आध्यात्मिक इनाम नहीं है. जाओ पटाखा, अपने प्रेमी के रौशनी से पवित्र प्रेम की आतिशबाजी को छल कर जिनके फेफड़े में क्षणिक सुख के लिए तुम सल्फर डाइऑक्साइड भर रही हो तुम्हारे वो ग्राहक तुम्हारे सौंदर्य के फॉस्फोरस के राख होते ही तुम्हे सड़क पर अंधेरे में छोड़ देंगे. प्यार से भरे मेरे दिल से निकल कर अपने कामुक ग्राहकों के पर्स में ज्यादा दिन तक रह पाओ अब तुम जैसी जलती पटाखा के लिए धोखा खाए मुझ जैसा बुझता प्रेमी यही कामना कर सकता है. पंछी और जानवरों के साथ साथ तुमने मुझमे भी भ्रम, चिंता, और भय भर दिया है. मुझे तुमसे अब एलर्जी है. एग्जॉस्ट फैन और वैक्यूम पंप चला कर मैं अपने दिल से ही नहीं तुम्हे फेफड़े से भी हमेशा के लिए निकाल रहा हूं. गुडबाय पटाखा.

लल्लन टॉप में प्रकाशित 

शब्द

मेरी कई बातों का अर्थ आप नहीं लगा पाएंगे, मेरी दोस्ती शब्दों से है और बहुत सारे शब्द मुझसे मिले हुए हैं ! जैसे ही आप रंग बदलेंगे, वो अर्थ बदल लेंगे

साइलेंट मोड में …

चेहरे पर कोई सेवन बना दे या ऐट बना के मेरा मन अनलॉक कर दे या जेड बना दे उँगलियों से और खोल दे मेरे सारे विंडो या एक बार मेरे चेहरे की स्क्रीन पर हाथ फेर के लॉक अनलॉक कर दे मुझे और यूँ ही पड़ा रहने दे साइलेंट मोड में …

आलसी

फोन की घंटी बजने लगी, आलसी के दिमाग में शब्द घनघनाने लगे ! आलसी बोलने के लिए ‘हेलो’ शब्द चुने या ‘हाय’ ये सोचता ही रहा और फोन कट गया ! अब कौन मिस्ड कॉल में जाए और री – डायल करे ? आलसी ने आँखें मूंद लीं ! आलसी की नींद आलस्य त्याग के नाश्ते के टेबल पर जा बैठी है ! आज आलसी को लिखना है ! आलसी उठा, शब्दों को उठाया और खुद सो गया ! उनींदे शब्द पास रखे मोबाइल में घुस गए ! आलसी की मुसीबत बढ़ गयी ! आलसी अब जब भी शब्द ढूंढेगा उसे सेटिंग्स में जाना होगा, अंग्रेजी को हिंदी फॉण्ट में बदलना होगा, जो शब्द चाहिए उन्हें की – बटन पर टाइप करके निकालना होगा ! इससे अच्छा आज वो नहीं लिखेगा ! और बहुत जरुरत हुई तो कट पेस्ट से काम चला लेगा ! आलसी की प्रेमिका एक चुस्त लेखक से आँख लड़ा रही है इस दुःख ने आलसी को और भी आलसी बना दिया है …

डिअर डायरी

मेरी सात महीने पुरानी डायरी खो गयी है ! मेरी बातचीत और बहस से भरी मेरी निजी डायरी जिसके हर पन्ने में मेरे अक्षरों के निशान हैं ! मेरी डायरी के चेहरे पर मेरा नाम,पता फोन नंबर और ई -मेल आई डी सब है ! मेरी डायरी अगर किसी आम आदमी को मिली होती तो वो जरूर लौटा देता ! मुझे लगता है मेरी डायरी किसी लेखक के हाथ लग गयी है ! वो सब अनदेखा कर के उसे अब पढ़ रहा है और अपनी जेब में रखकर मेरी डायरी को शहर घुमा रहा है ! लेखक महोदय मेरी डायरी में तुम कुछ लिख नहीं पाओगे क्योंकि उसमे मैंने इतना कुछ लिख दिया है कि उसे पढ़ते हुए तुम अपना कुछ भी लिखना भूल जाओगे ! मेरे अक्षर तुम्हारे किसी काम नहीं आएंगे और तुमको वो डायरी बिना कुछ लिखे मुझे लौटा देनी चाहिए ! मेरी डायरी एक दिन तुम्हारे जेब से गिर जाएगी और कोई न कोई उसे मुझ तक पहुंचा देगा ! किसी और की डायरी को पढ़ने के गिल्ट से तुम कभी निकल नहीं पाओगे !
डिअर डायरी, तुम जहाँ भी हो खुश रहना ! तुम नहीं हो तो मेरे दिन,रात और साल महीने में अब कोई फर्क नहीं है …

एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खाई

मैं सोचता हूँ अपने ‘स्वाभिमान’ में ‘परिवर्तन’ कैसे लाऊँ ? या ऐसा ‘परिवर्तन’ कैसे लाऊँ कि मेरा ‘स्वाभिमान’ कायम रहे ! बिहारी होने की वजह से रैली, रैला, महारैली, महारैला सबसे ऊब चूका हूँ ! रैली सिर्फ भीड़ की राजनीती है ! गुलामी से निकलने के लिए आजादी की लड़ाई में हमने जिन हथियारों का इस्तेमाल किया था ‘रैली’ उन्ही में से एक है ! आज हम आज़ाद हैं और प्रतिरोध की ये भाषा अब आउट – डेटेड है ! मीडिया और सोशल नेटवर्किंग के महाजाल में आज जागरूकता नए आयाम में है ! शर्म की बात है कि आज भी हमें अपने अधिकारों के लिए भीड़ जमा कर के प्रतिरोध के स्वर में एक होना पड़ता है ! ऐसी रैलियों में जनता की हालत भेड़ – बकरियों से कम नहीं होती जिसे राजनितिक दल देश भर में सामूहिक कल्याण के नाम पर अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते हैं ! हम विकास के नाम पर कब तक अपनी इज्ज़त की रैली निकालते रहेंगे ? चेतना से घर बैठे जो निर्णय ले सकते हैं उसके लिए अपनी सुरक्षा, सम्मान और मानवीय अधिकारों को दाव पर लगा के स्वार्थी नेताओं के महत्वकांक्षा की आग को कब तक बुझाने के काम आयेंगे ? हम कब तक भीड़ बने रहेंगे ? मैदान भरने की राजनीति सिर्फ कुर्सी भरने की राजनीती होती है ! और ऐसी राजनीती से बिहार में विकास और विज़न अब तक नहीं आया !
बिहार के युवा बिहार में क्यों नहीं हैं ? बिहार को ओल्ड ऐज होम किसने बनाया ? बिहार में जो बचे हुए युवा हैं वो सुबह उठ कर शराब से कुल्ला क्यों करने लगे ? किसी गाँव में दवा की दूकान उतने पास नहीं मिलेगी जितने पास अब शराब की दुकान मिल जाएगी ! गाँव के दसो द्वार पर शराब की दुकान को बंद करने की सख़्त जरुरत है ! सरकार की देख रेख में बिहार के अड़तीस जिलों में एक सांस्कृतिक आंदोलन की सख़्त ज़रूरत है ! बिहार में रह रहे और प्रवासी बिहारियों को बिहार का भगदड़ देखने के लिए पटना जाने की जरुरत नहीं है, अपने दिल में झाँकें भगदड़ दिख जाएगा ! और इन समस्याओं के भगदड़ से निकलने के लिए भी हमें अपने दिल में ही झांकना होगा ! कभी कभी खुली आँखों से मैं ये सपना देखता हूँ कि बिहार को भगदड़ का प्रतीक बनाने वाले नेताओं को भीड़ रौंद रही है ! “ बिहार को आप किस रूप में देखना चाहते हैं और इस चुनाव से आपकी क्या उम्मीदें हैं ? “ इस सवाल से अब हर बिहारी थक चुका है ! हम बिहार वासियों का दुर्भाग्य है कि आज हमारे सामने एक तरफ कुआँ है तो दूसरी तरफ खाई …

( प्रभात खबर में प्रकाशित )

शब्दयोग‬

मैंने देखा शब्द एक दुसरे को खा रहे हैं ! खाते हुए वे एक दूसरे को देख भी नहीं रहे थे ! ‘विमर्श’ ‘अध्यक्ष’ को खा गया ‘टिप्पणी’ ‘पार्टी’ को खा गयी ! ‘विरोधी’ ‘गतिविधि’ को खा रहे थे ! ‘दिल’ ‘प्रेरणा’ को खा रहा था ! एक या अधिक वर्णों से बनी हुई स्वतंत्र सार्थक ध्वनि भी एक दूसरे को खा रहे थे ! एक वर्ण से निर्मित शब्द अनेक वर्णों से निर्मित शब्द को खा रहे थे ! ‘शेर’ को ‘कुत्ता’ खा रहा था ! बनावट के आधार पर बने शब्द भी अपने सारे भेद को भुला कर एक दुसरे को खा – चबा रहे थे ! ‘रूढ़’ को ‘योगिक’ खा रहा था ‘योगिक’ को ‘योगरूढ़’ ! ‘तत्सम’ ‘तद्भव’ को खा रहा था ! ‘तद्भव’ ‘देशज’ को खा रहा था ! ‘देशज’ को ‘विदेशज’ खा रहा था ! ‘मुद्दा’ ‘मीडिया’ को खा रहा था ! ‘बयान’ को ‘प्रवक्ता’ खा गया ! ‘रंग’ को ‘राजनीती’ खा गयी ! ‘चीन’ को ‘सेक्स’ खा रहा था ! ‘दुनिया’ ‘राजधानी’ को खा रही थी ! ‘स्त्री’ को ‘विज्ञापन’ खा रहा था ! ‘कमज़ोर’ को ‘पत्नी’ खा रही थी ! ‘संज्ञा’ को ‘सर्वनाम’ खा रहा था ! ‘सर्वनाम’ को ‘विशेषण’ खा रहा था ! ‘विशेषण’ को ‘क्रिया’ खा रहा था ! ‘विकारी’ को ‘अविकारी’ खा रहा था ! ‘अर्थ’ को ‘दृष्टि’ खा रही थी ! ‘सार्थक’ को ‘निरर्थक’ खा रहे थे ! ‘कमल’ ‘परमात्मा’ ‘सर्वव्यापी’ सब खाए जा रहे थे ! अलग अलग भाषाओँ के शब्द को अलग अलग भाषाओँ के शब्द खा रहे थे ! उर्दू का ‘शख़्स’ अंग्रज़ी का ‘एजेंडा’ खा गया ! अंग्रेजी का ‘टेलीविजन’ फ़ारसी के ‘आदमी’ को खा गया ! अरबी का ‘रिश्वत’ तुर्की के ‘दरोगा’ को खा गया ! पुर्तगाली का ‘तिज़ोरी’ फ्रांसीसी ‘पुलिस’ को खा रहा था ! यूनानी ‘एटम’ को डच का ‘बम’ खा गया ! ‘व्याकरण’ ‘उपमान’ को खा रहे थे ! शब्द की सारी शक्तियां ‘अभिधा’ ‘लक्षणा’ और ‘व्यंजना’ को खा रहे थे ! मुझ से देखा नहीं गया ! मैं अच्छी तरह जानता हूँ ! सारे शब्द जब खा लिए जायेंगे फिर भी ‘ईश्वर’ ‘प्रेम’ और ‘संसार’ बचा रहेगा ! अंतरिक्ष में नए घर बनेंगे, नया प्रेम होगा और शब्द ही नए शब्द को गढ़ लेंगे !

गाली कैसे बनती है ? गाली क्या है ?

निंदा या कलंकसूचक वाक्य गाली है ! कोई भी फूहड़ बात गाली हो सकती है ! कलंकसूचक आरोप या दुर्वचन सुनने को गाली खाना कहते हैं ! गाली लेने से लगती है देने भर से नहीं ये भी एक पुराना मुहावरा है ! विवाह आदि में गाया जानेवाला एक प्रकार का रस्मी गीत जो अश्लील होता है उसे भी गाली कहते हैं जिसे लोग प्यार से खाते हैं ! गाली का रिश्ता सेहत और सम्मान से भी है !
‘अंग – प्रत्यंग’ को जब भी सामाजिक रिश्तों के साथ जोड़ा जाता है तो वो गाली हो जाती है ! गाली को गौर से सुन के देखिये लगता है रिश्तों और अंगों की कव्वाली हो रही है ! सामाजिक संबंधों का शारीरिक अंगों के साथ तुलनात्मक व्यवहार बड़ी आसानी से गाली बन जाती है ! अब गाली दोस्ती का नया गहना है मानो कह रहे हों बुरा न मानो गाली है ! जितना मुंह अब उतनी गाली है ! क्रोध में या चिढ के या अधीर होकर मन जब शब्दों का ख़ास अंदाज़ और उच्चारण में प्रयोग करता है तो गाली बनती है ! गाली एक मौखिक हिंसा का रूप भी ले लेती है ! सांस लेने से ज्यादा हवा आप अपने फेफरे में गाली दे के भर सकते हैं ! गाली दे कर मन को शांति मिलती है ! सोशल मीडिया पर खिलाफत में लैंगिक, नस्ली, और व्यक्तिगत नकारात्मक आक्रामक टिप्पणी या आलोचना भी गाली का नया रूप है !
गालियों के चार प्रकार हो सकते हैं ! मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक, लैंगिक और शारीरिक !
अक्सर, अंग + सामाजिक सम्बन्ध + शारीरिक क्रिया + जानवर के नाम का मिश्रण गाली हो जाता है !
आज कल अंगो के कुछ पर्याय सिर्फ गाली में ही प्रयोग किये जाते हैं ! नुख्ते और उच्चारण की वजह से कई गाली अपना आपा खो बैठते हैं !
गन्दे, भद्दे, मूर्ख, चतुर, कपटी, संत, लोभी, लालची, महापुरूष अब ये संस्कृत के शब्द लगने लगे हैं और सब व्यंग्य के अलंकार हैं ! गालियों में तुलनात्मक सम्बन्ध जोड़े जाते हैं !
‘मादरचोद’ एक ऐसा शब्द है जिसमे क्रोध और भड़ास से निकलने की सबसे बड़ी खिड़की है ! ‘गांडू’ का अर्थ अब खुले आम ‘स्ट्रीट स्मार्ट’ है और यह एक सफल अंतर्राष्ट्रीय हिन्दुस्तानी फिल्म भी ! ‘गांड मार लूँगा’ या ‘गांड मार दूंगा’ रूठना भर है ! ‘अबे चूतिये’ नया हेल्लो है ! ‘साला’ वाक्यों के बीच का कोमा है ! ‘बेहनचोद’ दिल्ली है ! ‘हरामजादा’ ज्यादातर काम करने वाले लोग हैं ! ‘बेईमान’ एक इशारा है ! ‘भ्रष्ट’ एक बहुत बड़े देश का नाम लगने लगा है ! ‘केरेक्टर ढीला’ सलमान खान का हिट गाना है ! ‘रंडी’ ज्यादातर एक्स गर्ल – फ्रेंड है ! ‘लंड’ अब तक ब्रांड क्यों नहीं बना आश्चर्य है और इस से बड़ा कौन है ? ‘लौडू’ ‘चोदु’ ‘भोसड़ी’ ‘चल – चल’ जोश भरने के लिए भाईचारे के नए शब्द हैं ! ‘फ़िल्मी’ फैशन है ! कोई आपको ‘भाईसाहब’ बोले तो समझिये बात नहीं बनेगी वो नाराज है ! ‘लंड की टोपी’ और ‘झांटों की जूँ’ लगता है हाइजीन को लेकर कॉमेंट है ! ‘गांड की हड्डी’ तोड़ते हुए मैंने लोगों को देखा है ! अस्तुरे से गांड काटने की धमकी पाकेट मार को खूब दी जाती है ! ‘माँ की आँख’ और ‘तेरी माँ का साकीनाका’ शहरी गाली हैं ! खूब क्रिएटिव होकर गाली देने वाले खुशमिजाज होते हैं उनकी गाली सुनने लोग दूर दूर से आते हैं ! औरतों के मुह से ये सब गाली अब भी मन को कामुक बना सकता है और आप भावुक हो रहे हैं ?
सुना है देश के कुछ शहर में एक नम्बर का ‘गाली शहर’ होने की भी होड़ है ! ‘गाली गंज’, ‘गाली पुर’, या ‘गाली सराय’ नए ‘स्मार्ट सिटी’ हो सकते हैं ! घरेलू हिंसा की गाली घरेलु नहीं होती ! दुर्व्यवहार अब नया व्यवहार है !
आप चाहेंगे तभी ये सब शब्द गाली होगी वरना अब ये सिर्फ बोल चाल की नयी भाषा है ! वैसे ऊँचा और साफ़ बोला गया हर शब्द अब गाली हो सकता है !

* इस पोस्ट की चोरी भी एक गाली होगी ! जो चुराने वाले को लग जाएगी !

#क्रिकेट_का_भूत

खाली दिमाग क्रिकेट के भूत का घर है 😉

हिंदुस्तान और पाकिस्तान को डराने के लिए क्रिकेट का भूत ऑस्ट्रेलिया भी चला जाता है 😉

क्रिकेट का भूत विज्ञापन के चक्कर में न्यूज़ देखता है 😉

क्रिकेट का भूत भी वर्ल्ड – कप के लिए मरता है 😉

आदमी की ही तरह क्रिकेट का भूत भी हिन्दू मुसलमान होता है 😉

कोई खेले न खेले क्रिकेट का भूत हर आत्मा से खेलता है 😉

क्रिकेट का भूत देश को भूतनी के हवाले कर देता है 😉

क्रिकेट का भूत दाऊद से भी नहीं डरता 😉

क्रिकेट के भूत में बिपाशा नहीं बच्चन हैं 😉

क्रिकेट का भूत भटकते भटकते पाकिस्तान पहुँच ही जाता है 😉