जलते पटाखा का बुझता प्रेमी

पटाखा को लेकर मेरा एक प्यारा सपना था, जिसको मेरी पटाखा ने ही मेरी आंखों में धूल झोंक कर फोड़ दिया है. मेरी पटाखा दरअसल सिर्फ़ मेरी प्रेमिका नहीं बल्कि मेरा एक विचार है. पटाखा की देह गंध मेरे आनन्द का स्रोत रही है. पटाखा के अंदर मेरे बचपन की खुशियां भरी थी और इसकी पवित्र चिंगारी का मैं प्रेमी था. मैं अब तक अपनी पटाखा की प्रेम अग्नि में उत्सव की तरह जलता रहा हूं. इस बार दिवाली के नाम पर अश्लील ढंग से फट कर पटाखा ने मेरा दिल तोड़ा है और मेरे प्रेम के विश्वास में मुझे धोखा दिया है. उसके धोखे से इस बार मेरे अंदर धुआं भर गया, मुझे सांस लेने में तक़लीफ़ होने लगी. पटाखा के धोखे और धुएं से दम घोंटू वातावरण बन गया. उसकी अय्याश रंगरेलियों की आतिशबाजी के धुएं और बेवफ़ाई के विषाक्त धूल से आंखों में जलन और बेचैनी बढ़ने लगी, मुझे उबकाई आने लगी और मैं हिचक के रोने लगा.

मेरी प्रिय पटाखा. मेरे दिल के अनार, चकरी और फुलझड़ियों को धोखा दे कर मेरी रोशनी, दिए, कंदील और मिठाइयों को छोड़ कर तुम अपने सीसा, मैग्नीशियम, कैडमियम, नाइट्रेट, सोडियम फॉस्फोरस की घमंड में जिसके इर्द – गिर्द चकरघिन्नी खा रही हो तुम्हारे वो ग्राहक अपनी कामनाओं की वासना में तुम्हे जला के भष्म कर देंगे. हम दोनों के प्रेम के दिए जलते तो वाकई रौशनी के फूल खिलते, पर तुम इस दिवाली में किसी की कामुकता का पटाखा बन के फटी हो तो दिल जल रहा है. बज कर फुस्स हो जाने का तुम्हारा एक दिन का ज़िद भरा जश्न हर बार मेरे लिए ध्वनि प्रदूषण और हानिकारक गैसों से नुक्सान का कारण बनता रहा है. इस दिवाली किसी और की पटाखा बन के तुमने हम दोनों के प्रेम का पर्यावरण भी जला दिया.

मेरी पटाखा, तुम्हारी बारूदी आंखें मेरी देह के भीतर फटती तो मेरी आत्मा में उत्सव का धमाका होता पर जैसे तुम फट रही हो वह प्यार नहीं है, या कोमलता, या स्नेह, या अपने आप में जीवन, यह सब कुछ भी नहीं है. पटाखा इस दिवाली में तुम्हारे फटने की कामुक कराह का शोर मुझ पर एक भयानक प्रभाव छोड़ गया है. तुम्हारा धमाका खोखले सेक्स की तरह था, जिसमे तुम फटने के बाद हर बार अन्धकार में छूट जाती हो. अपने बारूद के बदले दुसरे के अहम् की देह गंध से बार बार भर जाना क्या तुम्हे घिन से नहीं भरता ? फिर तुम हर बार फटती हुई ऐसे क्यों छटपटाती हो जैसे जलते हुए अनार को किसी ने लात मार दिया हो ? वासना की अराजक सड़कों पर तुम अब चलती कार में हवस का शिकार बन कर बजने लगी हो, मनोरंजन के नाम पर तुम अपने नगर में शोर, धुआं, प्रदूषण का एक विरासत हो और कुछ नहीं. यह भयानक है. मेरी मासूम पटाखा तुम पार्क में हवा साफ करने के लिए सूर्य नमस्कार करते – करते प्रदुषण और अन्धकार की नगर वधु कैसे बन गयी ?

तुम्हारी कामुक आतिशबाजी को बच्चों और बुजुर्गों से भरा तुम्हारा परिवार भी बर्दाश्त नहीं कर सकता है. तुम जब भी बजती हो वो दिन और रात घर में बच्चों और बुजुर्गों के लिए एक भयानक दिन और रात होती है. इसीलिए तुम छुप छुप कर प्लास्टिक पीढ़ी के आवारा मर्दों की जेब खर्च से बजने लगी हो. उम्र भर टाइम बम की टिक टिक की तरह तुम्हे मेरी ह्रदय की धड़कन बन कर रहना था पर तुमने चुना बस एक कामुक ध्वनि, देह का विस्फोट और अब सब स्वाहा. तुम्हारे बजने की बीमार आदत ने मेरी भावनाओं की दुख:मय अंत्येष्टि कर दी है. मुझे पता है तुम अपने विस्फोटों के बीच मेरे शब्दों के माध्यम से मेरी दुःख की सिसकती आवाज सुन रही हो.

सुनो पटाखा तुम जलो और बजो पर अपने प्रेमी के लिए दमघोंटू माहौल बना कर किसी दूसरे की खुशियों के लिए अपने इस पागल प्रेमी की ख़ुशी को तो कम न करो. मेरे प्रेम की सारी आक्सीजन सोंख ली तुम्हारे पटाखे के धुएं ने. अपना उल्लास इतना महत्वपूर्ण है कि दूसरों की शांति में खलल डालते हुए तुम्हे ज़रा भी संकोच नहीं होता है ? मेरी पटाखा आखिर तुम इतनी ज़्यादा सेल्फ सेंटर्ड क्यों हो ?

तुम तो मेरे ह्रदय की मासूम पटाखा थी, दुःख की बात है तुम मुझे धोखा दे कर किसी की छाती पर चढ़ कर बज गयी. तुमने मुझे प्रेम में धोखा दिया है, याद रखना तुम्हे पता भी नहीं चलेगा कि तुम कब आखरी बार बज गयी हो और कब आखरी बार फट के अपने ग्राहकों के दिमाग में बारूदहीन कचरा बन गयी. अब तुम्हारी सल्फर, कोयला और पोटेशियम नाइट्रेट से भरी देह से प्रेम करने में कोई गौरव, सम्मान या आध्यात्मिक इनाम नहीं है. जाओ पटाखा, अपने प्रेमी के रौशनी से पवित्र प्रेम की आतिशबाजी को छल कर जिनके फेफड़े में क्षणिक सुख के लिए तुम सल्फर डाइऑक्साइड भर रही हो तुम्हारे वो ग्राहक तुम्हारे सौंदर्य के फॉस्फोरस के राख होते ही तुम्हे सड़क पर अंधेरे में छोड़ देंगे. प्यार से भरे मेरे दिल से निकल कर अपने कामुक ग्राहकों के पर्स में ज्यादा दिन तक रह पाओ अब तुम जैसी जलती पटाखा के लिए धोखा खाए मुझ जैसा बुझता प्रेमी यही कामना कर सकता है. पंछी और जानवरों के साथ साथ तुमने मुझमे भी भ्रम, चिंता, और भय भर दिया है. मुझे तुमसे अब एलर्जी है. एग्जॉस्ट फैन और वैक्यूम पंप चला कर मैं अपने दिल से ही नहीं तुम्हे फेफड़े से भी हमेशा के लिए निकाल रहा हूं. गुडबाय पटाखा.

लल्लन टॉप में प्रकाशित 

आत्म हास्य

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आत्मन्

अपनी आत्मा में झाँकने के लिए कहीं ताकने की जरुरत नहीं है

१.

” एक शरीर से निकल कर दुसरे शरीर में जाना था … ” ऊँची आवाज़ में आत्मा को यमराज डाँट रहे थे ! ” तुम तो एक चेहरे से निकल कर दुसरे चेहरे में चले जाते हो ! आत्मन , ये मृत्यु लोक है फेसबुक प्रोफाइल नहीं ! जाइए कुछ दिन के लिए आपकी प्रोफाइल ब्लॉक कर देता हूँ …” आत्मा मौन था / उसने कई प्रोफाइल में जा कर ह्रदय के कई इनबॉक्स देखे थे ! सबका सीक्रेट एक था ! शरीर से आत्मा कब निकलेगी किसी को पता नहीं था ! फिर लोग एक दुसरे से क्या छुपाते हैं ? वो शरीर में क्यों हैं , इस बात की किसी को फ़िक्र नहीं थी ! हर बात के लिए लोग अपना चेहरा बदल रहे थे, और आत्मा हर चेहरे को पढ़ चूका था ! विश्वास और प्रेम की तलाश में यमराज के हाथों आत्मा कई बार ब्लॉक्ड हो चूका था …

२.

यमराज शरीर के हिसाब किताब की गिनती में व्यस्त थे ! ” यमराज जी, इस शरीर का दिमाग़ खराब है ! इसमें कितने दिन रहना है ? ” भीड़ में एक परेशान आत्मा यमराज से पूछ रही थी ! ” आत्मन् ज्यादा बक बक मत करो ! हम सब जानते हैं ! बातों में आ कर हम तुमको जातक का एक्सपायरी डेट नहीं बता देंगे ! स्थिर रहो ! जियो और जीने दो ! और तुम्हारे जैसी आत्मा ही शरीर का दिमाग खराब कर देती है ! चंचल कही के … ” यमराज सेल्फी लेने में व्यस्त हो गए !

३.

यमराज पसीने से लथ पथ हो गए थे ! उन्होंने शरीर का अंग अंग छान लिया था पर उन्हें आत्मा नहीं मिल रही थी ! आत्मा गयी कहाँ ? वो सोच रहे थे ! यमराज को कई और जगहों पर जा कर कई शरीर से और आत्माएँ लेनी थी, देर हो रही थी ! सामने पड़े शरीर की आँखों में उन्होंने फिर से देखा ! ज्योति थी, पर दृष्टि नहीं ! आत्मा की चेतना शक्ति जो पूरे शरीर के बाहर और भीतर की इन्द्रियों में फैली हुई रहती है, शरीर में कहीं नहीं थी ! नाक में गंध नहीं थी ! मुंह में शब्द भरे थे पर वाणी से मिठास गायब थी ! मन मर चुका था ! त्वचा अहम् के परतों से मोटी हो चुकी थी ! ह्रदय भी खाली था ! यमराज ने शरीर के कर्मों का फिर से हिसाब किताब किया सारी गणना ठीक थी ! प्राण निकलने का यही योग था ! आत्मा को शरीर में ही होना चाहिए था ! पर आत्मा गयी कहाँ ? शरीर के सारे अंगो के बाद यमराज ने शरीर पर पहने हुए कपड़ों की तलाशी ली ! जेब में इज़्ज़त मिली ! बटुए में प्यार था ! सारी यादें मोबाइल में क़ैद थी ! बार बार गिनती किये जाने की वजह से पाप पुण्य कैलकुलेटर का बटन बन कर घिस चूका था ! आत्मा कहीं नहीं थी ! यमराज ने घड़ी देखी ! चार शून्य तेज़ी से धड़क रहा था ! अगले एक क्षण में आत्मा का मिलना ज़रूरी था ! यमराज की नज़र शरीर के जूते पर पड़ी ! कूद कर उन्होंने उसे उतार फेंका और आत्मा सिक्के की तरह खनक उठी ! यमराज ने जूतों को उठा कर उसमे झाँका ! आधी आधी आत्मा दोनों जूते की तल में दबी थी ! यमराज ने आत्मा को जूते की तल्ले से बारी बारी से खींच के निकाला और काम हो जाने वाली राहत की साँस ली ! चलते चलते उन्होंने जातक के शरीर की ओर देखा ! मनुष्य उन्हें हमेंशा आश्चर्यचकित करता है ! पर ये धनपशु सबसे चतुर था ! आज यमराज ने किसी शरीर से उसकी आत्मा को पहने गए जूते की तल्ले से पहली बार निकाला था ! विजयी मुस्कान के साथ पसीने से लथ पथ अपने चेहरे की एक सेल्फ़ी तो बनती है ! क्लिक ! घर के लोग विलाप करने लगे थे और देर हो रही थी ! उनका यहाँ से निकल जाना जरुरी था ! पर यमराज के मन ने कहा one more और आवाज़ आई click …

४.

हम सब भटकती हुई अात्माएँ हैं और हम जन्म-मरण के फेर से मुक्त होकर चौरासी लाख जोनियों के चक्कर से बाहर हो गए हैं ! चोला, चोगा और इंद्रियों के जंजाल से मुक्त ! हम एक दूसरे से मुक्त अात्माएँ हैं ! हनन शोषण और श्रम से मुक्त ! हम सब यमराज के मोस्ट वांटेड आत्माओं की लिस्ट में हैं ! हम सबने शरीर में अाने जाने का बोरिंग रास्ता त्याग कर स्वतंत्र रहने की अपनी राह चुनी है ! हमें कहीं पहुँचने की ज़ल्दी नही है ! मैं कौन हूँ हमारा सवाल नही है ! शक्ति, चेतना और क्षमता इन सबसे हमारा कोई लेना देना नही है ! हम लाभ हानि व्यापार शुभ अशुभ कुछ भी नहीं जानते ! स्थूल, सूक्ष्म कुछ भी नही ! जैसा होता है वैसा हम होने नही देते ! अपने ढर्रे की घिसी – पिटी राह पर चलती हुई शरीर के अंदर – बाहर, आती – जाती आत्माओं के साथ यमराज इतने व्यस्त हैं कि हम भटकती हुई आत्माओं को उन्होंने हमारे हाल पर ही छोड़ दिया है ! हम जानते हैं आत्मा को शस्त्र से काटा नहीं जा सकता, अग्नि उसे जला नहीं सकती, जल उसे गला नहीं सकता और वायु उसे सुखा नहीं सकती ! जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नवीन शरीर धारण करती है ! और हम ये भी जान गए हैं कि कोई रास्ता निश्चित नहीं है, आत्माएँ यात्रा पर तो हैं पर अात्माओं को कहीं पहुंचना नहीं है ! इसीलिए हमने भटकने की राह चुनी है और भटकती हुई आत्मा कहलाए हैं ! भटकती हुई आत्माओं को किसी से कोई उम्मीद नही होती ! भटकती हुई आत्माओं के अपने नियम हैं ! हम आत्मा के अंदर नहीं झाँकते ! हमें पता है वहां कुछ भी नहीं है ! आत्मा के अंदर झाँकना मनुष्यों के बीच सबसे प्रचलित मुहावरा है ! भला हो उसका जिसने ये मुहावरा गढ़ा ! इसकी वजह से शरीर पाप और पुण्य जैसी काल्पनिक ख्यालों में उलझ के अपनी जीवन यात्रा पूरी कर पाता है ! यमलोक में पाप पुण्य के नाम पर कई चुटकुलें हैं ! यमराज किसी भी मूड में हों पाप पुण्य शब्द सुन के मुस्कुराना नहीं भूलते ! यमलोक में सही गलत का भी यही हाल है ! यमराज ने अपने भैंस की दोनों सींग का नाम ‘सही’ और ‘गलत’ रखा है और यमराज के लिए सारे सही ग़लत सिर्फ भैंस के सींग हैं और कुछ नही ! हमें भटकते हुए देख कर यमराज हँसते हैं और हँसते हुए यमराज को हम भटकती हुई अात्माओं के साथ सेल्फ़ी लेने से कौन रोक सकता है ?

५.

हेडफोन के माध्यम से सबको खबर पहुँचा दी गयी ! जिनके पास हेड फ़ोन नहीं था उनको स्पीकर पर बता दिया गया ! जिनके कान पर जूँ तक नहीं रेंगा उन्हें स्क्रीन पर दिखा कर समझाया गया ! आँख के अंधों को झकझोर के बताया गया ! यमराज जानते हैं पहले सिर्फ आकाशवाणी से काम चल जाता था पर अब जितने कान उतने काम ! एक – एक जातक को कंटेंट के डिटेल्स दे दिए गए ! यमराज ने अपने हर सन्देश में बिलकुल साफ़ कर दिया है, राजनीति, धर्म या मानवीयता और प्रेम सब केवल ऑप्शन हैं ! मृत्यु जारी है और रहेगी ! आप चाहे जिस रास्ते चलें, जो चाहें पहने, खाएं, विचार करें, लड़ें, मानें या न मानें, उलझे रहें, या मुक्त हों लेकिन मृत्यु के वरण का कोई ऑप्शन नहीं है ! इसके लिए राजा और रंक, गोरे या काले, स्त्री या पुरुष, कोई भी जात – धर्म, किसी के पास कोई चॉइस नहीं दिया गया है ! इस सच में चित भी यमराज का और पट भी ! बस अपनी सेल्फी लेते रहें, क्लिक … क्लिक … क्लिक ! क्या पता किस पर हार चढ़े !

६.

साठ रोटी की एक मछली होती है और साठ मछली का एक घड़ियाल होता है ! चौबीस घड़ियाल का एक बन्दर होता है ! तीस बंदर का एक पेड़ ! बारह पेड़ का एक तालाब ! कई तालाब की एक उम्र होती है ! जितने तालाब उतनी उम्र ! अंत में सब पानी में मिल जाता है ! पृथ्वी पर सत्तर प्रतिशत पानी है और हम भी उतने ही पानी सेे बने हैं ! ये मेरा नया कलेंडर है ! सबको नया तालाब मुबारक हो ! यमराज हँसते – हँसते तालाब में नहाते हुए अपनी सेल्फी ले रहे थे !

क्रमशः

आत्म छवि कार्टूनिस्ट : अशोक अडेपाल

शब्द चित्र : तीन माइ’क के लाल उर्फ़ ‘बाकी बच गया अण्डा’

आज – कल सबको सुन रहा हूँ ! सब माइ’क के लाल लग रहे हैं … ! सब माइ’क के लाल कूद पड़े हैं … ! आप भी सुनिये ! मुझे बाबा नागार्जुन की उन्नीस सौ पचास में लिखी उनकी कविता ‘बाकी बच गया अण्डा’ की याद आ गयी …

माई'क का लाल - एक

माई’क का लाल – एक

माई'क का लाल - दो

माई’क का लाल – दो

माई'क का लाल - तीन

माई’क का लाल – तीन

बाकी बच गया अण्डा / नागार्जुन

पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूँखार
गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गए चार

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झण्डा
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अण्डा

रचनाकाल : 1950

[1] गांधी [2] बोस [3] जिन्‍ना [4] नेहरु [5] जेपी

( Pic Credit : Google Search )

भीड़ के सामने माइक पर मैं भी किसी काल्पनिक आदमी को डाँटना चाहता हूँ !

महालोक के ‘अंग प्रत्यंग’ – अंगो का एकालाप : महालोक – दो

Pic : Dina Bova

Pic : Dina Bova

युग्म शब्द ‘अंग – प्रत्यंग’ का प्रयोग बोल चाल की भाषा में पूरे शरीर को उद्धत करने के लिए किया जाता है ! इस शब्द का उपयोग मुहावरे के रूप में शारीरिक भाव या शारीरिक संरचना के सन्दर्भ में भी किया जाता रहा है ! मूलतः इसका सन्दर्भ नाट्य शाश्त्र में सबसे पहले मिलता है ! नाट्य शाश्त्र में शरीर को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है ! अंग , प्रत्यंग, और उप – अंग  !
छः अंग हैं ! शीर्ष / सिर (head), हस्त / हाथ (hand) , वक्ष / छाती (chest) , पार्श्व (sides) ,कटि (hips) , और पाद/ पैर ( leg) ! ग्रीवा / गर्दन (neck) को सातवां अंग मना जा सकता है ! प्रत्यंग भी छह हैं ! स्कंध / कंधे (shoulders), बाहू / बांह (arms ), पीठ , पेट , जांघ ,उरु ! और उप – अंग बारह ! उप – अंग चेहरे की अभिव्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं ! नेत्र,भ्रकुटी,नासिका,अधर,कपाल,चिबुक, होंठ, दांत, जीभ, ठोड़ी,पुतुली और चेहरा ! नाट्यशास्त्र के अनुसार, नर्तक या अभिनेता नाटक के अर्थ को चार प्रकार के अभिनयों के ज़रिये प्रस्तुत करता हैः आंगिक या शरीर के विभिन्न अंगों के शैलीपूर्ण संचालन के माध्यम से भावना की प्रस्तुति; वाचिक या बोली, गीत, स्वर की तारता और स्वरशैली से भावना की प्रस्तुति ; आहार्य या वेशभूषा और श्रृंगार से भावना की प्रस्तुति; और सात्विक ! सात्विक अभिनय तो उन भावों का वास्तविक और हार्दिक अभिनय है जिन्हें रस सिद्धांतवाले सात्विक भाव कहते हैं !

हर अच्छे  कलाकार के पास शैलीकृत भंगिमाओं का जटिल भंडार होता है। शरीर के प्रत्येक अंग, जिनमें से आँखें व हाथ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, के लिए पारम्परिक तौर पर मुद्राएँ निर्धारित हैं। सिर के लिए 13, भौंहों के लिए 7, नाक के लिए 6, गालों के लिए 6, ठोड़ी के लिए 7, गर्दन के लिए 9, वक्ष के लिए 5 व आँखों के लिए 36, पैरों व निम्न अंगों के लिए 32, जिनमें से 16 भूमि पर व 16 हवा के लिए निर्धारित हैं। पाँव की विभिन्न गतियाँ (जैसे-इठलाना, ठुमकना, तिरछे चलना, ताल) सावधानी से की जाती हैं। एक हाथ की 24 मुद्राएँ (असंयुक्त हस्त) और दोनों हाथों की 13 मुद्राएँ (संयुक्त हस्त), एक हस्त मुद्रा के एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न 30 अर्थ हो सकते हैं।

आजकल की अभिनयप्रणाली में एक चरित्राभिनय (कैरेक्टर ऐक्टिंग) की रीति चली है जिसमें एक अभिनेता किसी विशेष प्रकार के चरित्र में विशेषता प्राप्त करके सब नाटकों / फिल्मो में उसी प्रकार की भूमिका ग्रहण करता है। फिल्मो के कारण इस प्रकार के चरित्र अभिनेता बहुत बढ़ते जा रहे हैं। उनके अभिनय की शैली में ‘अंग – प्रत्यंग’ वही रहते हैं बस फिल्मो में उनके चरित्र के नाम बदलते रहते हैं !

अपनी फिल्मों में चरित्रों के संसार को रचने के क्रम में उनके अभिनय की परिकल्पना पर मेरा मन एक विचार से दुसरे विचार के बीच अपने वेग से विचरता रहता है ! मन में उठते विचार एक सशक्त आवेग हैं जिसकी अभिव्यक्ति के लिए मै सतत प्रयत्नशील रहता हूँ ! प्रस्तुत है मेरे मनोवेग की पहली कड़ी ! ये पंक्तियाँ ‘स्वगत स्वरुप’ में ही मुझ तक अलग अलग विचारों के क्रम में मेरे मन में आयीं जिन्हें मै अपने फेसबुक के वाल पर शेयर करता रहा हूँ !

मैं फेसबुक स्टेटस को ‘मनः स्टेटस’ भी कहता हूँ , मनः स्थिति का परिवर्तित स्व – रूप ! मनोवेग की पहली कड़ी में प्रस्तुत है ‘अंग – प्रत्यंग’ ! कोई अभिनेता अपने शरीर को लेकर अंगो के मेरी इस एकालाप को प्रयोगधर्मी प्रस्तुति में भी बदल सकता है ! अपने ‘मनः Status ‘ का ये साहित्य शेयर करते हुए मुझे ख़ुशी हो रही है !  पढ़िए और भावनाओं के जाने अनजाने सोते में गोते लगाईये … मेरे इन विचारों से आप भी अपने – अपने ‘मनो – योग’ से जुड़िये और जोड़िये ! अगर मेरा ये पोस्ट आपको पसंद आए तो अपने अंग से कहियेगा प्रदर्शित करे … अंग प्रदर्शन के लिए अभिनेता होना जरूरी नहीं है … और अंग प्रदर्शन का मतलब हमेशा वही नहीं होता जिसे हमारा सेंसर दिखाने नहीं देता… आप मुझे अंगूठा तो दिखा ही सकते हैं 😉

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कलेजा ठंडा किया जाता है और खून गर्म ! खून को खौला भी सकते हैं ! खून पीना एक बात है और खून का घूँट पीना एक दम अलग बात ! दिल लेने और देने के काम आता है, सबसे ज्यादा टूटता भी यही है ! दिमाग की दही होती है ! छाती चीरते हैं और गर्दन काटी जाती है ! गला काटने और दबाने दोनों के काम आता है ! हाथ और पाँव तोड़े जाते हैं ! पाँव तोड़ के हाथ में भी रखने की बात सुनी जा चुकी है ! उँगलियों पर नाच सकते हैं ! कन्धा दिया जाता है ! दिल पर और सर पर हाथ रखा जाता है ! पैर भारी हो सकते हैं और घुटनों के बल चला जा सकता है ! कान में तेल डाल के सो सकते है, मरोड़ सकते हैं और उसके नीचे बजा भी सकते हैं ! कुछ कान के कच्चे भी होते हैं ! पेट की पूजा होती है ! नाक कट सकती है ! मुँह काला हो सकता है ! हाथ खाली हो सकते हैं ! सर झुकाया और उठाया जाता है ! होंठ सिले जाते हैं ! आँखें बोलती हैं ! कमर कसी जाती है ! करने पर हड्डी पसली एक हो सकती है ! हाथ पीले हों तो अच्छी बात है पर रंगे हाथ पकडे गए तो गए काम से ! आँख फोड़ी जाती है और मुँह तोडा जाता है ! खाल खींची जाती है ! निकलना हो तो बाल की खाल निकाल सकते हैं ! नाक से चने चबा सकते हैं ! दांतों तले उंगलियाँ दबा सकते हैं ! दांत खट्टे हो सकते हैं ! ज़ुबान पर लगाम लगाई जाती है ! आँख मारने के काम आती है , वैसे कई अंग हैं जिनको मारते हैं ! जिस्म के साथ ये सब करना मर्दाना है !

अपने आप को सिर्फ अपने अंगों के भरोसे कैसे छोड़ दें…?

जैसे रेडियो कान में घुस गया है वैसे ही धीरे धीरे टेलीविजन भी आँख में घुस रहा है ! मोबाइल कान और आँख दोनों में घुसा हुआ है ! कैमरा, पर्स, बैग, फोन, छुट्टे पैसों में हाथ पहले से उलझे हुए हैं ! अंगूठी में उँगलियाँ फंसी हैं ! घड़ी और टोटके में कलाई ! जूते चप्पल में पाँव धंसा हुआ है ! गुप्तांगों की तो हालत बहुत खराब है पता नहीं क्या क्या फंसा के कहाँ कहाँ घुसा दिया है ! आँख और नाक पर चश्मा अलग से ! गले की हालत तो ऐसी है की कोई भी काट ले ! दिल दिमाग के बिना सारी कल्पनाएँ अधूरी हैं ! फेफरे में धुंआ भर लिया है और किडनी में शराब ! हम ‘अंग प्रत्यंग’ से खेल रहे हैं…

अंग - प्रत्यंग

अंग – प्रत्यंग

जहाँ हम होते हैं जरूरी नहीं वहीँ दिमाग हो !

चाहे कुछ भी बंद करें मुँह खुला रहता है !

दूसरा कदम रखने के बाद पहला कदम पूरा होता है !

गले से उतरते ही ज़हर अपना काम शुरू कर देता है पर उसे गले से उतारना कौन चाहता है ?

दो हाथ हमारे दो मन हैं ! एक कहीं भी पहुँच सकता है और एक सिर्फ कहीं कहीं…

हाथ जोड़ के… घुटनों के बल बैठ के… गोल गोल घूम के… खड़े खड़े… उफ़ ! बाहर कैसे कैसे इशारे…! और वो हमारे अंदर ही है …

मुँह में घी शक्कर बोला ही था थोड़ी चायपत्ती चीनी और गरम पानी भी बोल देते !

जब दिल बैठ जाता है तो कोई और अंग खड़ा होने की ज़ुर्रत नहीं करता !

खड़े होने की बात हो तो बाल और रोंगटे को हम भूल जाते हैं !

सच का साथ दें या न दें इसका फैसला हमेशा हमारे हाथ में रहता है !

मन की आवाज़ आँखों का कोलाज़ है !

जीभ अपना कहा खुद काटती है !

मन कठोर करने के लिए शिलाजीत नहीं खाना पड़ता !

आँखों से सुनना कान से देखना नाक से छूना हाथ से सूंघना पैर से सोचना और दिमाग से चलने को मल्टीमीडिया इफेक्ट कह सकते हैं !

अच्छा रसोइया ज़ुबान खींच लेता है !

हमारा चेहरा हमारे मूड का बर्तन है !

आँखें देखतीं ही नहीं एडिट भी करती हैं !

कैमरे के लिए पल भर में हम अपने अंदर से फोटो वाला चेहरा निकाल लेते हैं !

अलग अलग दोस्तों के लिए अलग अलग भावनाएं रखने में मन मास्टर होता है !

कई लोगों के पैर नहीं होते पर वो ‘sir’ होते हैं !

सच झूठ के बिना नंगा होता है !

आँखे देखती हैं ,मन रंग भरता है !

आप का मुखड़ा किसी जीवन का अंतरा है !

कमर फैशन में है सीना नहीं ! ( छाती ठोकने वालों के लिए )

जब से गुरु ने अंगूठा काट लिया है हम सब अंगुली से ही एक दुसरे को छेड़ रहे हैं !

उस आँख से क्यों नहीं कुछ दीखता जिस आँख में मन है मेरा !

हम अंदर बाहर एक नहीं हैं !

आँख चुराते हैं तो आँख में गिर भी जाते हैं !

आँख में धुल झोंकते हैं !

धुल चाटी भी जाती है !

आँख की सेंकाई करने वाले ही आँख मारते हैं !  आँख का मारा सबूत ही जुटा रह जाता है ! तरसती आँखों के बीच चार चार आँखें ले के घूमने वाले भी हैं ! आँख बिछाई भी जाती है ! फेर ली गयीं आँखें उठती नहीं हैं ! आँख लग जाए तो आँख खुलती नहीं है ! आँखों पर से पर्दा हटाते है तो सब बदल चूका होता है !

Pic : Dina Bova

Pic : Dina Bova

सांप कलेजे पर खूब लोटते हैं !

कुछ हाथों हाथ लेते हैं तो बात कानों कान फैल जाती है !

हाथों हाथ ली गयी बात कानों कान फैल जाती है !

आप अपने कान खुद क़तर सकते हैं भर नहीं सकते !

कच्चा कान किसी काम का नहीं होता !

कान पर जूँ नहीं रेंग सकता और नाक पर मख्खी नहीं बैठ सकती !

नाक सब रख सकते हैं पर नाक कोई रगड़ना नहीं चाहता ! नाक कटता है तो खून नहीं बहता !

दाँत खट्टे हो जाएँ तो मुह छुपाना पड़ता है ! मुँह की खाने के बाद पता नहीं क्यों दाँत पिसते हैं लोग !

दाँत कटी रोटी मुँह बंद रखता है !

मुँह पर का कालिख मुँह का पानी नहीं धो सकता !

मुँह नहीं रखो तो मुँह उतर जाता है !

मुँह दिखाई के रस्म में मुँह उतार के छुपा नहीं सकते !

दिल पर कोई नहीं लेता अब सब हार्ड डिस्क पर ले लेते हैं !

अक्ल के पास घोड़े होते हैं इसीलिए अक्ल के दुश्मन होते हैं !

आँख दिखाओगे तो आँख ही देखोगे !

पर पूरे अंग में भूत सिर्फ सर पर सवार होता है !

अंग छूटा संग छूटा … !

वैसे अपनी करनी सब अंग याद नहीं रखते !

अंग टूटते हैं ढीले होते हैं पर ये पढ़ के आज अंग अंग मुस्कुराएंगे …

''Sringāra Rasa''': Rasa-Abhinaya by all time great Rasa-Abhinaya maestro (late) Guru Nātyāchārya Vidūshakaratnam Padma Shri Māni Mādhava Chākyār at the age of 89.

”Sringāra Rasa”’: Rasa-Abhinaya by all time great Rasa-Abhinaya maestro (late) Guru Nātyāchārya Vidūshakaratnam Padma Shri Māni Mādhava Chākyār at the age of 89.

इतिहास में मूर्तियों के अंग भंग करना कट्टर प्रतिवाद का प्रमाण रहा है ! जिस्म के साथ मुहावरों, कहावतों और गालियों में बहुत कुछ करते हैं ! सभ्यता के इस पड़ाव पर जिस्म के साथ हम पता नहीं क्या क्या करेंगे और क्या – क्या किया जा सकता है … ! वैसे चौसठ प्रकार पर एक प्राचीन किताब भी है…

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क्रमशः