महालोक – उन्नीस

युगों की कड़ी मेहनत और मानवीय आंदोलनो, शोध, संस्कृति, शिक्षा, विज्ञान, के साथ साथ सुकरात डार्विन फ्रॉयड जैसे दार्शनिक विद्वानों, वात्स्यान जैसे रसिक, दुनिया के ढेरों कवि, शायर, ढोंगी, गीत और संगीतकार की कल्पनाओं के बाद रजनीश, आसाराम , मस्तराम, यू ट्यूब, टी वी, न्यूज़ पेपर, मल्टी मिडिया, सोशल साईट, इंग्लॅण्ड, अमेरिका के विज्ञापन, हॉलीवुड – बॉलीवुड के फ़िल्मी गानों, कोर्ट, कानून, अधिकार के साथ आदमी औरत और ‘सेक्स’ का ताज़ा कचूमर तैयार है … लीजिये चखिए !

मैं शब्द हूँ …

मुझे देखिये मैं शब्द हूँ ! मैने गौर से देखा वो कई अर्थों से लिपटा था ! सबसे बड़ा अर्थ धर्म का था ! मैंने प्रेम देखा ! प्रेत देखा ! नक्षत्र और ब्रह्माण्ड देखा ! स्त्री और पुरुष देखा ! खून, पसीना, सब शब्द से लिपटे थे ! मैंने कहा मुझे एक अर्थ का एक शब्द चाहिए ! उसने गति दिखाई, मैंने शुन्य देख लिया ! मुझे देखिये मैं शब्द हूँ … मुझे सब देख रहे थे और मैं कहीं नहीं था …

शिकायत नामा

शिकायत कान का गहना है पर मूंह का श्रृंगार नहीं ! शिकायत का पुर्ज़ा ढीला ही रहता है ! शिकायत देखते ही देखते बढ़ जाती है ! शिकायत की दाल कभी नहीं गलती ! शिकायत के फल में मिक्स्ड फ्रूट का जूस होता है ! शिकायत रूठने का सिग्नल है ! दूर की शिकायत पास होती है ! शिकायत नहीं होती तो हम दूर क्या करते ? शिकायत की काबिलियत सबमें होती है ! शिकायत नाप के नहीं की जाती ! शिकायत की कल्पना कोई नहीं करता ! शिकायत के पावँ भारी नहीं होते ! शिकायत के ढोल सुहाने होते हैं ! शिकायत में तिल भी ताड़ दिखता है ! जूँ के नहीं रेंगने की शिकायत सबसे पहले की गयी थी ! मेरी शिकायत सुनी नहीं जाती ये आपकी शिकायत कभी नहीं हो सकती ! शिकायत का फल मीठा नहीं होता और इसकी कोई शिकायत भी नहीं करता !
… अपनी शिकायत किस से करें ?

कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

१.

कहानी साफ़ थी पर सभी चरित्र गंदे थे ! प्रेम पवित्र था, सम्बन्ध अवैध थे ! संवाद था पर सब मौन थे ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

२.

सुई की नोक से भी कम जगह लेती है दिल में टीस ! सबसे ज्यादा चुभती है फेरी हुई नज़र ! खाली आसमान भी भर सकता है चुप्पी से ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

३.

कद काठी में हर कहानी आदमकद होती है ! कहानी की हर ज़िद अगर पूरी कर दी जाये तो वो आदमी से ऊपर उठ जाती है ! कहने की ज़िद और नहीं कह पाने की बेबसी हूबहू थी ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

४.

लो पढ़ लो मेरा दिमाग ये कह कर उसने अपने कपडे उतारना शुरू कर दिया … लिखे गए एक – एक शब्द की स्याही जैसे किसी ने चेहरे पर फेंक दी हो … काले मुंह से भरी आँखों में नंगापन झिलमिल झिलमिल कर रहा था … कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

५.

मुझे दूर ही रखना, प्रेम से बहुत दूर, मैं अपने घर और अपने माँ बाप से दूर हूँ ! मुझे हर सुख से दूर रखना , मैं अपनी भाषा अपनी मिट्टी से दूर हूँ … वो गा रहा था और मैं रो रहा था ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

६.

वो जानता था महकती गुलाब की पंखुड़ियों जैसा उसका दिल है … ! अपनी उंगली पर लहू की गर्म बूँद को गीले होंठ से चाटते हुए उसने देखा, नीचे तीखे कांटे थे … !  कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

७.

सामने आइना था ! जैसी कालिख़ मेरी पीठ पर थी वैसी ही कालिख़ आईने की पीठ पर भी थी ! आईने में मैं था या मैं ही आईना था ? मैंने हाथ बढ़ाया, दोनों तरफ सिर्फ काँच ही काँच था ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

८.

एक आहट रह जाती है ! कुछ शब्द रह जाते हैं ! एक तस्वीर रह जाती है ! कुछ निशान रह जाते हैं ! कुछ दाग रह जाते हैं ! एक स्वाद रह जाता है ! कुछ चिपचिपा रह जाता है ! कुछ न कुछ रह जाता है, जहाँ कभी कुछ भी रहा होता है ! और मैं शून्य में एक बुलबुले की तरह फूट जाता हूँ ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

९.

मेरी तरफ से सब वैसा ही है ! क्या तुम्हारी तरफ से सब वैसा है ? एक आँख से टपकी महीनों की जमी चुप्पी ! एकांत की लौ में मेरी धड़कन ने न जाने दर्द का कौन सा राग छेड़ा है ! वो आँखें मूँद कर मुझे सब बता रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

१०.

रेत की तरह मुठ्ठियों की उँगलियों के बीच से फिसल जाने वाली वो औरत और अपनी मुठ्ठियों को अपने भरोसे से भींचे हुए वो आदमी … दुनियाँ के भरोसे के लिए अपने भरोसे की मुठ्ठी वो क्यों खोले ? यही बात वो बार बार दुहरा रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

११.

अतल गहराईयों में उतर के देखा / सब सुख अपने ही सुख चुन रहे थे / आकाश अपना आकाश ही बुन रहा था / बेतरतीब पड़ी थी चुनने को सारी चीज़ें हरश्रृंगार सी / पर हृदय दुःख बीन रहा था .. कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

१२.

सारे शब्द आ गए हैं ! तुम भी लौट आओ ! मेरी वर्तनी, हिज्जै, संधि … मेरे खालीपन को कोई नहीं भर पा रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

 

क्रमशः

‘ट्वीटराती’ – महानगर का टापू / महालोक – अठारह

१.

पंछियों की बोली के नाम पर हर आदमी अपनी आवाज़ बदल कर दूसरों को आवाज़ देने लगा ! सब उसको ट्विटर कहने लगे ! पैदा होते ही सात साल में ट्विटर ने सात जनम ले लिया था ! दिन भर के दिमागी हालत की बयानबाजी का जुलूस जो चाहता ट्विटर पर निकाल लेता ! सात वचन और सात फेरे भी ट्वीट होने लगे ! जीने मरने की सारी कसमें अब ट्विटर थीं ! बातचीत के नाम पर सब टेलीविजन देखने लगते इसीलिए सब ट्वीट करने लगे ! मन की इस आभासी टापू का नाम ट्वीटराती पड़ा ! समय – काल से दूर था ट्वीटराती ! ट्वीटराती में न दिन होता न रात ! आदमी और औरत के लिए ट्विटर अब एक नया बिस्तर था ! तकिये पर एक ट्विटर रख कर लोग जागने लगे और ट्विटर के साथ सोने लगे ! रिश्तों में ट्वीटर ने एक ऐसा चोंच भर दिया था जिसे सब लड़ा रहे थे ! मुक्त सामाजिक जंजाल में एक चिविर् ! ट्वीटराती में सब अपने ट्वीट के साथ ट्विटर की सैर पर निकल पड़े हैं इस बात से अनजान कि नीला आभासी पंछी अब लाल खून का प्यासा है …

२.

ढाई आखर ट्विटर के –
ट्विटर के दो आगे ट्विटर, ट्विटर के दो पीछे ट्विटर, आगे ट्विटर, पीछे ट्विटर, बोलो कितने ट्विटर …

महालोक – सत्रह

जबसे नगर में कुछ और लोगों ने खज़ाने का सपना देखने का दावा किया है सरकार ने ‘सपना मंत्रालय’ के गठन की पेशकश की है, कार्यभार किसको दिया जाए इस पर विचार चल रहा है ! गंभीर रूप से मंत्रालय सिर्फ उन्ही ‘सपनों को देखेगी’ जिसमे खजाना हो ! युवा विभाग ने अपने प्रेस विज्ञप्ति में साफ़ किया है फिल्मों में हीरो बनने के सपनों को इससे अलग रखा जायेगा ! अच्छा स्वास्थ, साफ़ पानी, शिक्षा,के साथ कई और ऑस्कर लाने का सपना, ओलोम्पिक में गोल्ड पदक का सपना, देश में गरीबी हटाने का सपना, भ्रष्टाचार मिटाने का सपना, काला धन वापस लाने का सपना इस मंत्रालय का हिस्सा नहीं होंगी ! अच्छी नौकरी और सुंदर दुल्हन का सपना जैसी दुसरे साहित्यिक सपनो को मंत्रालय भविष्य में सोना निकलने के आधार पर विभाग में रखना है या नहीं ये तय करेगी ! नारी को सुरक्षा देने के अब तक देखे गये सपनो के बारे में पूछे जाने पर प्रवक्ता नाराज़ हो गए ! ‘ आप लोग चाहते क्या हैं ? जाइये जाके सपना देखिये …’ ! “सपना सरकार अमर रहे ” के नारे के साथ प्रवक्ता टोली नगर के बड़े से महल में घुस गयी जहाँ अंदर जाना मना था … ! ‘सोना’ है तो जाग जाइये !

महालोक – सोलह

ज़ख्म पर जब गरम धार गिरी तो वो तिलमिला गया ! वो अपने घाव पर पेशाब कर रहा था … खून रोकने का ये तरीका भी उसने अपने उसी गुरु से सीखा था जिनको वो अभी अभी अपना अंगूठा दे आया है … खून,ख़ुशी, दुःख,शिक्षा पेशाब के साथ सब बह रहा था … कुछ ज़मीन सोख रही थी और कुछ मिटटी के साथ छींटे बन कर पाँव पर पड़ रहे थे …

महालोक – पंद्रह

बढे हुए हाथ से हाथ में लेते ही उसे लगा उसके हाथ से गोद में खेलता उसका छोटा भाई गिरा …वो ज़मीन पर औंधा छाती पकड़ के दर्द से बिलबिला रहा था … चूल्हे के पास बैठी माँ से उसकी चोट देखी नहीं गयी … दौड़ी और जलावन से टकरा गयी … आंच से कोयला उड़ के भूसे की ढेर पर गिरा … देखते देखते घर धुएं से भर गया …धुएँ में घर का पूरा परिवार हांफ रहा था …! फेफरे की जलन और सांस की घुटन से उसकी आँखें बंद हो गयी ! गले में आग की धधक मिटाने के लिए उसकी आँख से पानी बहने लगा ! उसकी हाथ में सिगरेट था और वो खाँस रहा था … सब हँस रहे थे ! आज ये उसका पहला कश था …

महालोक – चौदह

चतुर्भुज नगर में एक वर्ग था ! उसकी चार बराबर भुजाएं थीं ! वर्ग की रेखाएं सरल थीं पर वो कभी भी और कहीं भी खींच दी जाती थी ! रेखा कोई भी खींच सकता था जिसकी वजह से वर्ग में सब अपने -अपने दायरे में रहते ! या यों कहें हर वर्ग ने एक दुसरे के सामने रेखा खींच रखीं थीं जो किसी घेरे से कम नहीं था और मौका मिलते ही वर्ग एक दुसरे को नब्बे की कोण पर काटते थे ! एक दिन एक वर्ग को एक वक्र मिल गई ! वो भी एक रेखा थी और नगर के किसी वर्ग से नहीं मिलती थी ! वर्ग को वक्र से प्रेम हो गया ! प्रेम में वक्र की प्रशंशा वर्ग ने प्रकृति के हर आयाम से कर दी ! वक्र को पाने की चाह अब हर वर्ग करने लगा ! किसी ने कभी उसे अपने देव के माथे पर लगा दिया तो कभी अपने विजय पताका पर ! वक्र अपने प्रेम में वर्ग को मनचाहे कोण पर काट देती ! नए कोण बनने लगे ! जिस वर्ग से वक्र नहीं मिलती वो नए कोण की चाह में छुप छुप के उसकी कल्पना करने लगे ! वक्र ने वर्ग की सभी स्थापित कोणों को तोड़ दिया था ! नए कोण नए धरातल बनाने लगे और सभी वर्ग की छटपटाहट बढ़ने लगी ! वक्र के कई वर्ग दुश्मन हो गए ! तब तक बहुत देर हो चुकी थी … नए कोणों ने वर्ग की ज्यमिति को बदल दिया था … हर वर्ग में अब लोगों को खुले आम प्रेम करते हुए देखा जाने लगा …

महालोक – तेरह

‘आप तय नहीं कर पा रहे हैं और किसी को विश्वास से वोट दे नहीं सकते तो मुझे दान कर दीजिये ! मैं उनको जमा कर के किसी सार्थक उपयोग में लाऊंगा !’ वो कैसे ? मैंने पूछा ! ‘अगर मेरे पास एक कड़ोड़ वोट की सहमती जमा हो गयी तो मैं उसे राजनितिक बाज़ार में किसी को एक कड़ोड़ रुपये में बेच दूंगा और उन पैसों से एक अनाथालय और वृधाश्रम बनाऊंगा ! आप किसी को भी वोट दें आप को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा पर आपके एक वोट के दान से एक बेसहारा बच्चा और किसी वृध्ध के बुढ़ापे को आश्रय मिल जायेगा !’ तुम इतनी माथा पच्ची क्यों कर रहे हो ? मुझसे एक रुपया लो और आगे बढ़ो, मैंने कहा ! उसने कहा ठीक है और एक दान पात्र मेरे आगे कर दिया ! एक वोट के लिए राजनितिक दलदल में दिलचस्पी कैसे बढाई जाये ? इस महंगाई में मेरे वोट से सस्ता क्या होगा ? सोचता हुआ जब आगे बढ़ा तो मन के ट्राफिक जाम में फंसा मैं, लगा कहीं खो गया हूँ …