वक़्त

गठित होते हुए देश की विकाशशील संघर्षों के कडवे सच से हिन्दुस्तान के समाज को सबसे अन्धकार काल में रंगीन परदे पर असंभव को संभव कर दिखाने के लिए और अपने से भागते हुए समाज के मनोभावों की फंतासी का वो संसार जिसे मैं कभी न रच पाऊँ … रचने के लिए आप सदा याद किये जायेंगे ! आपने हमें सिनेमा के उस स्टाइल से अवगत कराया जो मनोरंजन की मुख्या धारा में पूरी दुनिया में ‘बॉलीवुड‘ के नाम से जाना जा रहा है !
प्रेम और उससे जुडी भावनाओं का नाटकीय रूपक गढ़ने और संगीतमय बिम्ब रचने के लिए आप सदा मेरे प्रेरणा श्रोत्र रहेंगे !

Yash Raj Chopra (27 September 1932 - 21 October 2012)

Yash Raj Chopra (27 September 1932 – 21 October 2012)

Yash Raj Films ( logo )

Yash Raj Films ( logo )

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बहते पानी का झरना, गाती हवा, उड़ते बादल, लम्बी लम्बी रोमान्टिक ड्राइव, कैमरे में उस एकांत पल को समेट के रख लेने की प्रेमी की ललक, पाल वाली नाव में जिस्म और जान की दुनिया और पानी पर धुप – छाँव का खेल … प्रेमी जोड़े का आउट डोर लोकेशन में मस्ती का परदे पर ये संगीतमय सिलसिला 1959 में बनी पहली फिल्म ‘धुल का फूल‘ से चल रहा था … और अब सदा के लिए प्रेरित करता रहेगा !

जब – जब सिनेमा का सफ़ेद पर्दा दिखेगा आप मुझे याद आयेंगे ! परदे पर भावनाओ का संसार आपसे सुंदर और कौन रचेगा ? अपने सिनेमा के साथ सफ़ेद परदे पर सदा के लिए रेस्ट – इन – लव यश जी ! नमन !

शब्दशः महालोक का शब्दकार / महालोक – तीन

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शब्दों के भण्डार से कुछ शब्द गायब हो गये ! कहानी यहीं से शुरू होती है ! शब्दों का कोई लेखा जोखा नहीं होने की वजह से इसकी शिकायत कैसे हो इस पर दिमाग काम करने लगा ! किसी से अगर ये बात कहें तो सबसे पहले वो यही पूछेगा कितने शब्द गायब हुए हैं और वे कौन कौन से हैं ? आप इस बात पर हंस सकते हैं पर सब ये जानते हैं की ये एक गंभीर अपराध है !
भला कौन शब्द गिन के रखता है जो सही – सही कह सकेगा ? शब्द के भण्डार में शब्द यूँ ही पड़े रहते हैं ! नए पुराने शब्द सब साथ रहते हैं ! मैंने बोलना शुरू किया तो पता चल सब बातें साफ़ – साफ़ हो रही हैं ! सारे जरूरी शब्द वहीँ थे ! शब्द बड़ी चालाकी से अपने पर्याय से अपने अर्थ निकलवा लेते हैं ! फिर ऐसा क्यों लग रहा था कि कुछ शब्द गायब हैं ? शब्दों की चोरी पकड़ना इतना आसान नहीं है ! सबके शब्द एक जैसे होते हैं !
चोरी का पता चलते ही शब्द के तीनो यार – कागज़ कलम और विचार वहां पहुँच गए ! उनकी कुछ शब्दों से आनाकानी तो चल रही थी पर वो चुरा लिए जायेंगे ये उनको भी विश्वास नहीं हो रहा था !
जितने मुंह उतने शब्द ! कैसे पता चले कौन से शब्द गायब हैं ? चोरी कर लिए गए या भाग गए या मर गए हैं ये कैसे पता चलेगा ?
कुछ सम्मानित शब्द रूठे हुए भी निकले !
अप – शब्दों की तो बुरी हालत थी ! उनके बारे में लोग मुंह पर हाथ रख के बात करते थे !
मैंने फिर भाव के आधार पर उनको ढूँढना शुरू किया ! हंसी ख़ुशी के सारे शब्द फटा – फट पहले जुबां पर आने लगे ! पता चला हिंदी अंग्रेजी साथ मिल के कई शब्दों ने नए शब्दों को जनम दे दिया है !
शब्दों का पीछा करते हुए कई स्वाद एक साथ मुंह में घुलने लगे ! रंग दिखे , आवाज़ सुनायी दिए ! एक ही साथ हंसने और रोने लगा ! इन्द्रियां शब्दों से लत पथ थीं  !
सस्ते और महंगे शब्द की जैसे ही बात हुई अपनी औकात सामने आ गयी !
इंस्पेक्टर ने मुझे अपने से छोटे ओहदे के नए दरोगा को सुपुर्द कर दिया और बोला ये साहित्य वाले हैं इनसे बात कीजिये ! साहित्य वाला नया दरोगा अपने आप को इंस्पेक्टर कहलवाना पसंद करता है और उसे दरोगा शब्द आउट ऑफ़ डेट लगता है ये उसने खुद मुझे बताया !
उसने पुछा आप कौन ? मैंने कहा शब्दकार ! उसका कहना था कोई शब्द – कार कैसे हो सकता है ? कहाँ के शब्दकार ?
शब्द बदलते हैं तो अर्थ बदल जाता है ! आप सही शब्दों का उपयोग कीजिये ! मैंने कहा बस यही उलझन है कई शब्द गायब हैं ! उसने पुछा कौन कौन से शब्द हैं जो आपको नहीं मिल रहे ? मैंने कहा ये भी पता नहीं चल पा रहा है ! उसने कहा ये गंभीर अपराध हुआ है आपके साथ ! पर शब्दों की चोरी के बाबत आज तक कोई ऍफ़ आई आर नहीं हुआ है ! आप इत्यादि जैसे शब्दों के साथ इसे सत्य मानिए …
इस बीच कई शब्द आये और गए पर वो शब्द नहीं मिला जिसके अंत में एक ही अक्षर था जिसके बिना कई वाक्य अधूरे हैं  …
सूखी रोशनाई में शब्दों की आँखों से पानी आ जाता है और वो झिलमिलाते हुए आधे – अधूरे तरह – तरह के आकार में किसी नन्हें हाथों से कागज़ पर उतर – उतर के गीले गीले होठों से तुतली जुबां में छलकते रहते हैं !  अब मेरे पास और कोई चारा नहीं है … नए शब्द वहीँ से लाने होंगे …

बचे खुचे शब्दों के साथ –
आप इस बात पर ध्यान क्यों दे रहे हैं ? मैंने कहा सब शब्दों का खेल है मेरे पास वो शब्द नहीं हैं इसीलिए मैं शोषित हूँ ,कई विरोध शब्द नहीं होने की वजह से व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ …

( Pic : Ora Jha)

महालोक के ‘अंग प्रत्यंग’ – अंगो का एकालाप : महालोक – दो

Pic : Dina Bova

Pic : Dina Bova

युग्म शब्द ‘अंग – प्रत्यंग’ का प्रयोग बोल चाल की भाषा में पूरे शरीर को उद्धत करने के लिए किया जाता है ! इस शब्द का उपयोग मुहावरे के रूप में शारीरिक भाव या शारीरिक संरचना के सन्दर्भ में भी किया जाता रहा है ! मूलतः इसका सन्दर्भ नाट्य शाश्त्र में सबसे पहले मिलता है ! नाट्य शाश्त्र में शरीर को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है ! अंग , प्रत्यंग, और उप – अंग  !
छः अंग हैं ! शीर्ष / सिर (head), हस्त / हाथ (hand) , वक्ष / छाती (chest) , पार्श्व (sides) ,कटि (hips) , और पाद/ पैर ( leg) ! ग्रीवा / गर्दन (neck) को सातवां अंग मना जा सकता है ! प्रत्यंग भी छह हैं ! स्कंध / कंधे (shoulders), बाहू / बांह (arms ), पीठ , पेट , जांघ ,उरु ! और उप – अंग बारह ! उप – अंग चेहरे की अभिव्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं ! नेत्र,भ्रकुटी,नासिका,अधर,कपाल,चिबुक, होंठ, दांत, जीभ, ठोड़ी,पुतुली और चेहरा ! नाट्यशास्त्र के अनुसार, नर्तक या अभिनेता नाटक के अर्थ को चार प्रकार के अभिनयों के ज़रिये प्रस्तुत करता हैः आंगिक या शरीर के विभिन्न अंगों के शैलीपूर्ण संचालन के माध्यम से भावना की प्रस्तुति; वाचिक या बोली, गीत, स्वर की तारता और स्वरशैली से भावना की प्रस्तुति ; आहार्य या वेशभूषा और श्रृंगार से भावना की प्रस्तुति; और सात्विक ! सात्विक अभिनय तो उन भावों का वास्तविक और हार्दिक अभिनय है जिन्हें रस सिद्धांतवाले सात्विक भाव कहते हैं !

हर अच्छे  कलाकार के पास शैलीकृत भंगिमाओं का जटिल भंडार होता है। शरीर के प्रत्येक अंग, जिनमें से आँखें व हाथ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, के लिए पारम्परिक तौर पर मुद्राएँ निर्धारित हैं। सिर के लिए 13, भौंहों के लिए 7, नाक के लिए 6, गालों के लिए 6, ठोड़ी के लिए 7, गर्दन के लिए 9, वक्ष के लिए 5 व आँखों के लिए 36, पैरों व निम्न अंगों के लिए 32, जिनमें से 16 भूमि पर व 16 हवा के लिए निर्धारित हैं। पाँव की विभिन्न गतियाँ (जैसे-इठलाना, ठुमकना, तिरछे चलना, ताल) सावधानी से की जाती हैं। एक हाथ की 24 मुद्राएँ (असंयुक्त हस्त) और दोनों हाथों की 13 मुद्राएँ (संयुक्त हस्त), एक हस्त मुद्रा के एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न 30 अर्थ हो सकते हैं।

आजकल की अभिनयप्रणाली में एक चरित्राभिनय (कैरेक्टर ऐक्टिंग) की रीति चली है जिसमें एक अभिनेता किसी विशेष प्रकार के चरित्र में विशेषता प्राप्त करके सब नाटकों / फिल्मो में उसी प्रकार की भूमिका ग्रहण करता है। फिल्मो के कारण इस प्रकार के चरित्र अभिनेता बहुत बढ़ते जा रहे हैं। उनके अभिनय की शैली में ‘अंग – प्रत्यंग’ वही रहते हैं बस फिल्मो में उनके चरित्र के नाम बदलते रहते हैं !

अपनी फिल्मों में चरित्रों के संसार को रचने के क्रम में उनके अभिनय की परिकल्पना पर मेरा मन एक विचार से दुसरे विचार के बीच अपने वेग से विचरता रहता है ! मन में उठते विचार एक सशक्त आवेग हैं जिसकी अभिव्यक्ति के लिए मै सतत प्रयत्नशील रहता हूँ ! प्रस्तुत है मेरे मनोवेग की पहली कड़ी ! ये पंक्तियाँ ‘स्वगत स्वरुप’ में ही मुझ तक अलग अलग विचारों के क्रम में मेरे मन में आयीं जिन्हें मै अपने फेसबुक के वाल पर शेयर करता रहा हूँ !

मैं फेसबुक स्टेटस को ‘मनः स्टेटस’ भी कहता हूँ , मनः स्थिति का परिवर्तित स्व – रूप ! मनोवेग की पहली कड़ी में प्रस्तुत है ‘अंग – प्रत्यंग’ ! कोई अभिनेता अपने शरीर को लेकर अंगो के मेरी इस एकालाप को प्रयोगधर्मी प्रस्तुति में भी बदल सकता है ! अपने ‘मनः Status ‘ का ये साहित्य शेयर करते हुए मुझे ख़ुशी हो रही है !  पढ़िए और भावनाओं के जाने अनजाने सोते में गोते लगाईये … मेरे इन विचारों से आप भी अपने – अपने ‘मनो – योग’ से जुड़िये और जोड़िये ! अगर मेरा ये पोस्ट आपको पसंद आए तो अपने अंग से कहियेगा प्रदर्शित करे … अंग प्रदर्शन के लिए अभिनेता होना जरूरी नहीं है … और अंग प्रदर्शन का मतलब हमेशा वही नहीं होता जिसे हमारा सेंसर दिखाने नहीं देता… आप मुझे अंगूठा तो दिखा ही सकते हैं 😉

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कलेजा ठंडा किया जाता है और खून गर्म ! खून को खौला भी सकते हैं ! खून पीना एक बात है और खून का घूँट पीना एक दम अलग बात ! दिल लेने और देने के काम आता है, सबसे ज्यादा टूटता भी यही है ! दिमाग की दही होती है ! छाती चीरते हैं और गर्दन काटी जाती है ! गला काटने और दबाने दोनों के काम आता है ! हाथ और पाँव तोड़े जाते हैं ! पाँव तोड़ के हाथ में भी रखने की बात सुनी जा चुकी है ! उँगलियों पर नाच सकते हैं ! कन्धा दिया जाता है ! दिल पर और सर पर हाथ रखा जाता है ! पैर भारी हो सकते हैं और घुटनों के बल चला जा सकता है ! कान में तेल डाल के सो सकते है, मरोड़ सकते हैं और उसके नीचे बजा भी सकते हैं ! कुछ कान के कच्चे भी होते हैं ! पेट की पूजा होती है ! नाक कट सकती है ! मुँह काला हो सकता है ! हाथ खाली हो सकते हैं ! सर झुकाया और उठाया जाता है ! होंठ सिले जाते हैं ! आँखें बोलती हैं ! कमर कसी जाती है ! करने पर हड्डी पसली एक हो सकती है ! हाथ पीले हों तो अच्छी बात है पर रंगे हाथ पकडे गए तो गए काम से ! आँख फोड़ी जाती है और मुँह तोडा जाता है ! खाल खींची जाती है ! निकलना हो तो बाल की खाल निकाल सकते हैं ! नाक से चने चबा सकते हैं ! दांतों तले उंगलियाँ दबा सकते हैं ! दांत खट्टे हो सकते हैं ! ज़ुबान पर लगाम लगाई जाती है ! आँख मारने के काम आती है , वैसे कई अंग हैं जिनको मारते हैं ! जिस्म के साथ ये सब करना मर्दाना है !

अपने आप को सिर्फ अपने अंगों के भरोसे कैसे छोड़ दें…?

जैसे रेडियो कान में घुस गया है वैसे ही धीरे धीरे टेलीविजन भी आँख में घुस रहा है ! मोबाइल कान और आँख दोनों में घुसा हुआ है ! कैमरा, पर्स, बैग, फोन, छुट्टे पैसों में हाथ पहले से उलझे हुए हैं ! अंगूठी में उँगलियाँ फंसी हैं ! घड़ी और टोटके में कलाई ! जूते चप्पल में पाँव धंसा हुआ है ! गुप्तांगों की तो हालत बहुत खराब है पता नहीं क्या क्या फंसा के कहाँ कहाँ घुसा दिया है ! आँख और नाक पर चश्मा अलग से ! गले की हालत तो ऐसी है की कोई भी काट ले ! दिल दिमाग के बिना सारी कल्पनाएँ अधूरी हैं ! फेफरे में धुंआ भर लिया है और किडनी में शराब ! हम ‘अंग प्रत्यंग’ से खेल रहे हैं…

अंग - प्रत्यंग

अंग – प्रत्यंग

जहाँ हम होते हैं जरूरी नहीं वहीँ दिमाग हो !

चाहे कुछ भी बंद करें मुँह खुला रहता है !

दूसरा कदम रखने के बाद पहला कदम पूरा होता है !

गले से उतरते ही ज़हर अपना काम शुरू कर देता है पर उसे गले से उतारना कौन चाहता है ?

दो हाथ हमारे दो मन हैं ! एक कहीं भी पहुँच सकता है और एक सिर्फ कहीं कहीं…

हाथ जोड़ के… घुटनों के बल बैठ के… गोल गोल घूम के… खड़े खड़े… उफ़ ! बाहर कैसे कैसे इशारे…! और वो हमारे अंदर ही है …

मुँह में घी शक्कर बोला ही था थोड़ी चायपत्ती चीनी और गरम पानी भी बोल देते !

जब दिल बैठ जाता है तो कोई और अंग खड़ा होने की ज़ुर्रत नहीं करता !

खड़े होने की बात हो तो बाल और रोंगटे को हम भूल जाते हैं !

सच का साथ दें या न दें इसका फैसला हमेशा हमारे हाथ में रहता है !

मन की आवाज़ आँखों का कोलाज़ है !

जीभ अपना कहा खुद काटती है !

मन कठोर करने के लिए शिलाजीत नहीं खाना पड़ता !

आँखों से सुनना कान से देखना नाक से छूना हाथ से सूंघना पैर से सोचना और दिमाग से चलने को मल्टीमीडिया इफेक्ट कह सकते हैं !

अच्छा रसोइया ज़ुबान खींच लेता है !

हमारा चेहरा हमारे मूड का बर्तन है !

आँखें देखतीं ही नहीं एडिट भी करती हैं !

कैमरे के लिए पल भर में हम अपने अंदर से फोटो वाला चेहरा निकाल लेते हैं !

अलग अलग दोस्तों के लिए अलग अलग भावनाएं रखने में मन मास्टर होता है !

कई लोगों के पैर नहीं होते पर वो ‘sir’ होते हैं !

सच झूठ के बिना नंगा होता है !

आँखे देखती हैं ,मन रंग भरता है !

आप का मुखड़ा किसी जीवन का अंतरा है !

कमर फैशन में है सीना नहीं ! ( छाती ठोकने वालों के लिए )

जब से गुरु ने अंगूठा काट लिया है हम सब अंगुली से ही एक दुसरे को छेड़ रहे हैं !

उस आँख से क्यों नहीं कुछ दीखता जिस आँख में मन है मेरा !

हम अंदर बाहर एक नहीं हैं !

आँख चुराते हैं तो आँख में गिर भी जाते हैं !

आँख में धुल झोंकते हैं !

धुल चाटी भी जाती है !

आँख की सेंकाई करने वाले ही आँख मारते हैं !  आँख का मारा सबूत ही जुटा रह जाता है ! तरसती आँखों के बीच चार चार आँखें ले के घूमने वाले भी हैं ! आँख बिछाई भी जाती है ! फेर ली गयीं आँखें उठती नहीं हैं ! आँख लग जाए तो आँख खुलती नहीं है ! आँखों पर से पर्दा हटाते है तो सब बदल चूका होता है !

Pic : Dina Bova

Pic : Dina Bova

सांप कलेजे पर खूब लोटते हैं !

कुछ हाथों हाथ लेते हैं तो बात कानों कान फैल जाती है !

हाथों हाथ ली गयी बात कानों कान फैल जाती है !

आप अपने कान खुद क़तर सकते हैं भर नहीं सकते !

कच्चा कान किसी काम का नहीं होता !

कान पर जूँ नहीं रेंग सकता और नाक पर मख्खी नहीं बैठ सकती !

नाक सब रख सकते हैं पर नाक कोई रगड़ना नहीं चाहता ! नाक कटता है तो खून नहीं बहता !

दाँत खट्टे हो जाएँ तो मुह छुपाना पड़ता है ! मुँह की खाने के बाद पता नहीं क्यों दाँत पिसते हैं लोग !

दाँत कटी रोटी मुँह बंद रखता है !

मुँह पर का कालिख मुँह का पानी नहीं धो सकता !

मुँह नहीं रखो तो मुँह उतर जाता है !

मुँह दिखाई के रस्म में मुँह उतार के छुपा नहीं सकते !

दिल पर कोई नहीं लेता अब सब हार्ड डिस्क पर ले लेते हैं !

अक्ल के पास घोड़े होते हैं इसीलिए अक्ल के दुश्मन होते हैं !

आँख दिखाओगे तो आँख ही देखोगे !

पर पूरे अंग में भूत सिर्फ सर पर सवार होता है !

अंग छूटा संग छूटा … !

वैसे अपनी करनी सब अंग याद नहीं रखते !

अंग टूटते हैं ढीले होते हैं पर ये पढ़ के आज अंग अंग मुस्कुराएंगे …

''Sringāra Rasa''': Rasa-Abhinaya by all time great Rasa-Abhinaya maestro (late) Guru Nātyāchārya Vidūshakaratnam Padma Shri Māni Mādhava Chākyār at the age of 89.

”Sringāra Rasa”’: Rasa-Abhinaya by all time great Rasa-Abhinaya maestro (late) Guru Nātyāchārya Vidūshakaratnam Padma Shri Māni Mādhava Chākyār at the age of 89.

इतिहास में मूर्तियों के अंग भंग करना कट्टर प्रतिवाद का प्रमाण रहा है ! जिस्म के साथ मुहावरों, कहावतों और गालियों में बहुत कुछ करते हैं ! सभ्यता के इस पड़ाव पर जिस्म के साथ हम पता नहीं क्या क्या करेंगे और क्या – क्या किया जा सकता है … ! वैसे चौसठ प्रकार पर एक प्राचीन किताब भी है…

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क्रमशः

महालोक में गणपति विसर्जन / शब्द – चित्र : महालोक – एक

गणपति विसर्जन चल रहा था ! भक्त थे, भीड़ थी ! भीड़ देख के भीड़ बढती है ! भीड़ बनना बहुत बड़ा मानवीय गुण है और भीड़ बन पाना बहुत बड़ा सौभाग्य ! भीड़ को चीरता हुआ मुझे एक आदमी मिला जो मुझ सा ही भटका हुआ था ! हम दोनों भीड़ थे ! वो कहीं से भाग के आ रहा था ! हांफ रहा था और मै सहमा खड़ा था, हम दोनों में बस यही फर्क था ! वो अपने हाथ से गोल गोल के इशारे कर के मुझसे कुछ पूछ रहा था पर मै कुछ सुन नहीं पा रहा था , वहां बहुत शोर था ! लोग दल में बँट कर छोटे बड़े ढोल को पीट रहे थे ! ढोल की आवाज़ इतनी थी की आवाज़ में सिर्फ ढोल पीटने का एक्शन दिख रहा था ! तेरह चौदह साल के लौंडों की वहीँ एक जमात थी जिनके हाथों में डंडे नुमा कई चीजें थीं ! सोटा , बेंत , पाइप के टुकड़े , मोटी छड़ी ! वो सड़क के आवारा देसी शहरी कुत्तों को दूंढ – दूंढ के सूत रहे थे और लंगडाते कींकियाते कुत्ते दुबकने की जगह दूंढ रहे थे ! मोबाइल डबल रोल में था, अपने अपने करतूतों का मोबाइल से सब फोटो भी खींच रहे थे और वो कान ढकने के भी काम आ रहा था !  अफरा तफरी मची थी ! उत्साही कार्यकर्ता प्रसाद के तौर पर ग्लूकोज बिस्कुट के बुरादे पकड़ पकड़ के हाथों में ठूँस रहे थे ! सड़क के किनारे किनारे मंडलियाँ जमी थीं ! जहां कहीं भी चार खड़े थे, मिल के ताड़ रहे थे ! बिसलेरी के बोतल में सबका पानी पतला और भूरा हो गया था ! गर्मी और उमस में पसीने से लथ पथ सजी औरतें भीड़ में बह रही थीं ! आवाज़ की कीचड़ में सब के कान सने थे ! बच्चों का सबसे बुरा हाल था ! वो रो और बिलबिला रहे थे !  वो शोर से थक चुके थे ! एक – एक कर के उनके हाथों से छूट के चाइनीज खिलोने भक्तों के पाँव चढ़ रहे थे ! बच्चों की आँखें उनींदी हो चली थीं और उनके हाथों से गुब्बारे छूट के उड़ रहे थे ! एक सौ इक्कीस दशमलव चार डेसिबल में चौंधियाया आकाश सब शोर निगल रहा था और चाँद मटियामेट शोर के बादल में धंसा हुआ था !

कट टू – चाँद ! चाँद पर श्री गणेश जी बैठे हैं और चाँद ट्रक पर सवार है ! गणेश जी के साथ ट्रक पर बेसुध भक्त भी हैं ! चप्पल पहने पैर लटकाए भक्तों ने ट्रक पर अपनी झालर बना के अपनी ही झांकी निकाल ली है ! आज वे सब स्व – मूर्त हो गए हैं ! तभी चाँद पर से गणेश जी को उतारते हुए ट्रक पर एक भक्त ज्यादा झुक गया और बप्पा के हाथ के थाल से एक लड्डू लुढ़क गया ! बात कानो कान फैल गयी ! हाथों हाथ लोग लड्डू ढूँढने लगे !  सामने तट था ! किनारे पर अफरा तफरी मच गयी ! अचानक  इस बात की होड़ लग गयी कि लड्डू किसको मिलता है ! सब अपने अपने अनुमान की दिशा में लपक लिए ! लोग ऐसे भाग रहे थे जैसे घर भागा जा रहा हो ! वहीँ मेडिकल का कचड़ा खुले में बह रहा था ! कचरे का सिरिंज सबको चुभ रहा था ,लोग बेखबर थे ! समुद्र भी चढ़ने लगा ! छ्प – छ्प का संगीत फच – फच हो गया ! लोग फक – फक करने लगे ! किनारे लगे नावों की रस्सी रेत में धंसी थी जो अब निकल के लोगों के पाँव में फंसने लगी ! लोग गिरने लगे और आँख वाले अंधे भक्त उन पर लुढ़क गए ! लड्डू भी धीरे धीरे ढलान पकड़ चूका था ! वो भी लुढ़क रहा था ! इतनी भीड़ थी, सब दिशा भ्रमित हो गए ! लड्डू अब तक किसी के हाथ नहीं आ सका था मानो अंधे भक्तों के बीच लड्डू बच बच के लुढ़क रहा हो ! लोग बे – सब्र होते जा रहे थे , भाग रहे थे और हाथ से गोल गोल इशारे कर रहे थे !

कट टू – श्री गणेश जी ! भगवान् और भक्त सूंड से सूंड मिला के नाच रहे थे ! गणेश जी फोटो भी खिंचवा रहे थे ! बड़े बड़े काले भुजंग स्पीकर भक्तों के कान को चाट रहे थे ! सबके कान गीले थे ! बियर कान से बह रहा था ! हाथ लहरा – लहरा कर भक्त वो सब बन रहे थे जो उनका मन कर रहा था !  तितली , नाग , अम्पायर ! भीड़ हाथ हिला के छः रनों का इशारा कर रही थी ! लड्डू शायद बाउंड्री के बाहर था !

कट टू – भीड़ ! भीड़ अपने मन से बढ़ने लगी ! लड्डू के बहाने सब निकल पड़े थे ! भक्त भक्त को ढूंढ रहे थे ! लगा लड्डू नहीं उनकी लाज है ! कल कुछ भी नहीं बस सब आज है ! अफवाह जब फैलती है तो सब लड्डू जैसा गोल हो जाता है ! गणपति जी के लड्डू को लुढ़कते गनीमत है मिडिया ने नहीं देखा और न ही दिखाया नहीं तो पता नहीं देश भर में क्या हुआ होता ! आज सड़क पर गाड़ी नहीं थी इसीलिए गढ्ढे भी नहीं थे ! आज सड़क पर सिर्फ भीड़ थी ! लोग एक दुसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे सब लड्डू हों ! आज न कोई आगे था न पीछे , न दायें था न बाएं , बस सब लड्डू जैसा गोल था !

कट टू – लड्डू  ! अंततः लड्डू लुढ़क के पानी में चला गया था और कागज़ की नाव की तरह गल गया ! प्लास्टिक का कचरा क्या जाने लड्डू का स्वाद !

कट टू – स्वंम !  ‘श्री गणेश भवन’ से गुजरते समय मुझे प्रिय लड्डू मिल गए ! उन्होंने ये कहानी सुनायी ! वो हंस हंस के ढेर हो रहे थे ! हँसते हुए ही उन्होंने कहा जो लड्डू लुढका था वो मै ही हूँ… ! मै तो सबके पास हूँ ! भक्तों को लगा मै खो गया हूँ … हा हा हा !

 

कट टू – सूचना ! मेरी इस कहानी को दिल पर मत लीजियेगा और हार्ड डिस्क पर लीजियेगा तो बता दीजियेगा ! इसे नाटकीय दृश्य समझ कर पढ़ें और आनंद लें !

कट टू – दी एंड ! शब्द – चित्र  “गणपति विसर्जन ” !

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@ + + + + + + + = © संजय झा मस्तान ,२०१२ .

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