शब्द चित्र : तीन माइ’क के लाल उर्फ़ ‘बाकी बच गया अण्डा’

आज – कल सबको सुन रहा हूँ ! सब माइ’क के लाल लग रहे हैं … ! सब माइ’क के लाल कूद पड़े हैं … ! आप भी सुनिये ! मुझे बाबा नागार्जुन की उन्नीस सौ पचास में लिखी उनकी कविता ‘बाकी बच गया अण्डा’ की याद आ गयी …

माई'क का लाल - एक

माई’क का लाल – एक

माई'क का लाल - दो

माई’क का लाल – दो

माई'क का लाल - तीन

माई’क का लाल – तीन

बाकी बच गया अण्डा / नागार्जुन

पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूँखार
गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गए चार

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झण्डा
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अण्डा

रचनाकाल : 1950

[1] गांधी [2] बोस [3] जिन्‍ना [4] नेहरु [5] जेपी

( Pic Credit : Google Search )

भीड़ के सामने माइक पर मैं भी किसी काल्पनिक आदमी को डाँटना चाहता हूँ !

मनःस्थिति अर्थात मनःस्टेटस

मेरी मिक्स्ड फीलिंग्स में जो आप महसूस कर रहे हैं वो भी मिला हुआ है …

*

जी हाँ मुझे भी ख़ुशी है ! आपको जिस बात की है, मुझे भी उसी बात की है बल्कि मुझे उन सारी बातों की ख़ुशी है जिस से आप खुश होते हैं !
जी हाँ मुझे भी दुःख है ! आपको जिस बात का है, मुझे भी उसी बात का है बल्कि मुझे उन सारी बातों का दुःख है जिस से आप दुखी होते हैं !
जी हाँ मै भी वही जा रहा हूँ जहाँ से आप हो आए हैं … या आज नहीं तो कल जाऊंगा ! वही खाऊँगा जो आपने खाया और उन सबसे मिलूँगा जिनसे आप मिल चुके !जी हाँ मै भी वही से आ रहा हूँ जहाँ आप जा रहे हैं … या आज नहीं तो कल जायेंगे ! वही खायेंगे जो मैंने खाया है और उन सबसे मिलेंगे जिनसे मै मिल चूका हूँ ! जी हाँ आप जो उखाड़ रहे हैं मै भी वही उखाड़ रहा हूँ ! जी हाँ, आप जो गाड़ रहे हैं मै भी वही गाड़ रहा हूँ ! आप जो पढ़ रहे हैं मै भी वही पढ़ रहा हूँ ! मै जो देख रहा हूँ आप भी वही सब देख रहे हैं ! जी हाँ, आप जिसको दे रहे हैं मै भी उसी को दे रहा हूँ … अपना सबकुछ ! आपकी जो ले रहे हैं मेरी भी वही ले रहे हैं…मेरा सबकुछ !आप जितनी मेहनत कर रहे हैं मै भी उतनी ही मेहनत कर रहा हूँ !
तो ?
तो आप मेरा Status पढ़ रहे हैं …! और हाँ, मैं आपका Status पढ़ चूका हूँ 😉

*

मेरे लिए आप जैसी चाहें राय बनायें मेरी सेहत पर तब तक असर नहीं होगा जब तक आप मेरे लिए दूध डाल के चीनी वाली चाय न बनायें !

*

मै यहाँ लिखूं या कहीं और पढूं ,आप बताएं या मै खुद समझूँ… अब सब एक है !

वहां आधा भरा और आधा खाली एक ग्लास था !

वहां आधा खाली और आधा भरा एक ग्लास था !
वहां आधा भरा और आधा खाली एक ग्लास था !
उसे आधा खाली ग्लास उठा के लाने कहा गया
और वो आधा भरा ग्लास उठा ले आया !
जिसे आधा खाली ग्लास चाहिए था
अब उसके पास आधा भरा ग्लास था !
वहां आधा खाली और आधा भरा एक ग्लास था !
वहां आधा भरा और आधा खाली एक ग्लास था !
खुश हो कर उसने आधा भरा ग्लास लाने किसी और को भेजा
और वो आधा खाली ग्लास ले आया !

जिसे भरा ग्लास चाहिए था अब उसके पास खाली ग्लास था !
वहां आधा भरा और आधा खाली एक ग्लास था !
वहां आधा खाली और आधा भरा एक ग्लास था !

Is the glass half empty or half full?

महालोक – उन्नीस

युगों की कड़ी मेहनत और मानवीय आंदोलनो, शोध, संस्कृति, शिक्षा, विज्ञान, के साथ साथ सुकरात डार्विन फ्रॉयड जैसे दार्शनिक विद्वानों, वात्स्यान जैसे रसिक, दुनिया के ढेरों कवि, शायर, ढोंगी, गीत और संगीतकार की कल्पनाओं के बाद रजनीश, आसाराम , मस्तराम, यू ट्यूब, टी वी, न्यूज़ पेपर, मल्टी मिडिया, सोशल साईट, इंग्लॅण्ड, अमेरिका के विज्ञापन, हॉलीवुड – बॉलीवुड के फ़िल्मी गानों, कोर्ट, कानून, अधिकार के साथ आदमी औरत और ‘सेक्स’ का ताज़ा कचूमर तैयार है … लीजिये चखिए !

मैं शब्द हूँ …

मुझे देखिये मैं शब्द हूँ ! मैने गौर से देखा वो कई अर्थों से लिपटा था ! सबसे बड़ा अर्थ धर्म का था ! मैंने प्रेम देखा ! प्रेत देखा ! नक्षत्र और ब्रह्माण्ड देखा ! स्त्री और पुरुष देखा ! खून, पसीना, सब शब्द से लिपटे थे ! मैंने कहा मुझे एक अर्थ का एक शब्द चाहिए ! उसने गति दिखाई, मैंने शुन्य देख लिया ! मुझे देखिये मैं शब्द हूँ … मुझे सब देख रहे थे और मैं कहीं नहीं था …

शिकायत नामा

शिकायत कान का गहना है पर मूंह का श्रृंगार नहीं ! शिकायत का पुर्ज़ा ढीला ही रहता है ! शिकायत देखते ही देखते बढ़ जाती है ! शिकायत की दाल कभी नहीं गलती ! शिकायत के फल में मिक्स्ड फ्रूट का जूस होता है ! शिकायत रूठने का सिग्नल है ! दूर की शिकायत पास होती है ! शिकायत नहीं होती तो हम दूर क्या करते ? शिकायत की काबिलियत सबमें होती है ! शिकायत नाप के नहीं की जाती ! शिकायत की कल्पना कोई नहीं करता ! शिकायत के पावँ भारी नहीं होते ! शिकायत के ढोल सुहाने होते हैं ! शिकायत में तिल भी ताड़ दिखता है ! जूँ के नहीं रेंगने की शिकायत सबसे पहले की गयी थी ! मेरी शिकायत सुनी नहीं जाती ये आपकी शिकायत कभी नहीं हो सकती ! शिकायत का फल मीठा नहीं होता और इसकी कोई शिकायत भी नहीं करता !
… अपनी शिकायत किस से करें ?

कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

१.

कहानी साफ़ थी पर सभी चरित्र गंदे थे ! प्रेम पवित्र था, सम्बन्ध अवैध थे ! संवाद था पर सब मौन थे ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

२.

सुई की नोक से भी कम जगह लेती है दिल में टीस ! सबसे ज्यादा चुभती है फेरी हुई नज़र ! खाली आसमान भी भर सकता है चुप्पी से ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

३.

कद काठी में हर कहानी आदमकद होती है ! कहानी की हर ज़िद अगर पूरी कर दी जाये तो वो आदमी से ऊपर उठ जाती है ! कहने की ज़िद और नहीं कह पाने की बेबसी हूबहू थी ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

४.

लो पढ़ लो मेरा दिमाग ये कह कर उसने अपने कपडे उतारना शुरू कर दिया … लिखे गए एक – एक शब्द की स्याही जैसे किसी ने चेहरे पर फेंक दी हो … काले मुंह से भरी आँखों में नंगापन झिलमिल झिलमिल कर रहा था … कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

५.

मुझे दूर ही रखना, प्रेम से बहुत दूर, मैं अपने घर और अपने माँ बाप से दूर हूँ ! मुझे हर सुख से दूर रखना , मैं अपनी भाषा अपनी मिट्टी से दूर हूँ … वो गा रहा था और मैं रो रहा था ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

६.

वो जानता था महकती गुलाब की पंखुड़ियों जैसा उसका दिल है … ! अपनी उंगली पर लहू की गर्म बूँद को गीले होंठ से चाटते हुए उसने देखा, नीचे तीखे कांटे थे … !  कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

७.

सामने आइना था ! जैसी कालिख़ मेरी पीठ पर थी वैसी ही कालिख़ आईने की पीठ पर भी थी ! आईने में मैं था या मैं ही आईना था ? मैंने हाथ बढ़ाया, दोनों तरफ सिर्फ काँच ही काँच था ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

८.

एक आहट रह जाती है ! कुछ शब्द रह जाते हैं ! एक तस्वीर रह जाती है ! कुछ निशान रह जाते हैं ! कुछ दाग रह जाते हैं ! एक स्वाद रह जाता है ! कुछ चिपचिपा रह जाता है ! कुछ न कुछ रह जाता है, जहाँ कभी कुछ भी रहा होता है ! और मैं शून्य में एक बुलबुले की तरह फूट जाता हूँ ! कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

९.

मेरी तरफ से सब वैसा ही है ! क्या तुम्हारी तरफ से सब वैसा है ? एक आँख से टपकी महीनों की जमी चुप्पी ! एकांत की लौ में मेरी धड़कन ने न जाने दर्द का कौन सा राग छेड़ा है ! वो आँखें मूँद कर मुझे सब बता रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

१०.

रेत की तरह मुठ्ठियों की उँगलियों के बीच से फिसल जाने वाली वो औरत और अपनी मुठ्ठियों को अपने भरोसे से भींचे हुए वो आदमी … दुनियाँ के भरोसे के लिए अपने भरोसे की मुठ्ठी वो क्यों खोले ? यही बात वो बार बार दुहरा रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था …

११.

अतल गहराईयों में उतर के देखा / सब सुख अपने ही सुख चुन रहे थे / आकाश अपना आकाश ही बुन रहा था / बेतरतीब पड़ी थी चुनने को सारी चीज़ें हरश्रृंगार सी / पर हृदय दुःख बीन रहा था .. कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

१२.

सारे शब्द आ गए हैं ! तुम भी लौट आओ ! मेरी वर्तनी, हिज्जै, संधि … मेरे खालीपन को कोई नहीं भर पा रहा था, कोई मुझे मेरी ही कहानी सुना रहा था !

 

क्रमशः

‘ट्वीटराती’ – महानगर का टापू / महालोक – अठारह

१.

पंछियों की बोली के नाम पर हर आदमी अपनी आवाज़ बदल कर दूसरों को आवाज़ देने लगा ! सब उसको ट्विटर कहने लगे ! पैदा होते ही सात साल में ट्विटर ने सात जनम ले लिया था ! दिन भर के दिमागी हालत की बयानबाजी का जुलूस जो चाहता ट्विटर पर निकाल लेता ! सात वचन और सात फेरे भी ट्वीट होने लगे ! जीने मरने की सारी कसमें अब ट्विटर थीं ! बातचीत के नाम पर सब टेलीविजन देखने लगते इसीलिए सब ट्वीट करने लगे ! मन की इस आभासी टापू का नाम ट्वीटराती पड़ा ! समय – काल से दूर था ट्वीटराती ! ट्वीटराती में न दिन होता न रात ! आदमी और औरत के लिए ट्विटर अब एक नया बिस्तर था ! तकिये पर एक ट्विटर रख कर लोग जागने लगे और ट्विटर के साथ सोने लगे ! रिश्तों में ट्वीटर ने एक ऐसा चोंच भर दिया था जिसे सब लड़ा रहे थे ! मुक्त सामाजिक जंजाल में एक चिविर् ! ट्वीटराती में सब अपने ट्वीट के साथ ट्विटर की सैर पर निकल पड़े हैं इस बात से अनजान कि नीला आभासी पंछी अब लाल खून का प्यासा है …

२.

ढाई आखर ट्विटर के –
ट्विटर के दो आगे ट्विटर, ट्विटर के दो पीछे ट्विटर, आगे ट्विटर, पीछे ट्विटर, बोलो कितने ट्विटर …