दिन का सपना, रात का समाचार

( एक )

मैंने अभी अभी सपने में एक दृश्य देखा कि कन्हैया अपनी जीभ निकाल कर सेल्फ़ी ले रहा है ! ‘कन्हैया’ एकदम ‘काली’ लग रहा था …

( दो )

मैंने अभी अभी सपने में एक दृश्य देखा कि देश में सब लोग अपनी अपनी जीभ निकाल कर सेल्फ़ी ले रहे हैं और सबकी जीभ के रेट अलग हैं …

( तीन )

मैंने अभी अभी सपने में एक दृश्य देखा कि सब लोग एक दुसरे से जीभ लड़ा रहे हैं और जीभ जीभ को हरा रही है …

( चार )

मैंने अभी अभी सपने में एक दृश्य देखा कि सब लोग एक जीभ बन गए हैं और एक दुसरे को चाट चाट कर खरीद बेच रहे हैं …

किंगफ़िशर का उदास बसंत

अपने पंखों की सारी शक्ति लगाकर किंगफ़िशर उस हवाई जहाज़ के पीछे उड़ता रहा जिसमे उसका मालिक उसे छोड़ के भाग रहा था ! बड़ा सिर, लंबे तेज नुकीले चोंच, छोटे पैर और ठूंठदार पूंछ वाला किंगफ़िशर थकने लगा और फिर बादलों में खो गया …
अपने मालिक का ट्वीट पता नहीं उसने पढ़ा, या नहीं पढ़ा पर बहुत दिनों से विलुप्त होते इस चमकीले रंग के पंछी को किसी ने जंगल में देखा नहीं है …

हैप्पी बर्थडे डिअर प्रेमचंद ,हैप्पी बर्थडे टू यू …

ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता गया और सितारों की चमक तेज होती गई, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जा रही थी ! कोई गा रहा था, कोई डींग मार रहा था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जा रहा था ! कोई अपने दोस्त के मुँह में ग्लास लगाये दे रहा था ! वातावरण में सरूर था, हवा में नशा ! कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे ! शराब से ज्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी ! जीवन की बाधाएँ उन्हें यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं ! या न जीते हैं, न मरते हैं ! दोनों बाप – बेटे भी मजे ले – लेकर चुसकियाँ ले रहे थे ! पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थी ! दोनों कितने भाग्य के बली हैं ! पूरी बोतल बीच में है ! घीसू और माधव नाच रहे थे ! उछल रहे थे, कूद रहे थे ! गिर रहे थे, मटक रहे थे ! नशे में भाव बना रहे थे और अभिनय कर रहे थे ! प्रसव वेदना में मरी औरत के कफ़न के लिए मिले रुपयों से मौज उड़ाने के लिए बाप – बेटे को शराबखाने में पहुँचाने वाला, दोनों पात्रों को रचने – गढ़ने वाला, आज ही जन्मा था ! मधुशाला में घीसू और माधव नशे में मदमस्त होकर टेबल पर चढ़ कर खड़े हो गए और गाने लगे – हैप्पी बर्थडे टू यू … हैप्पी बर्थडे टू यू … हैप्पी बर्थडे डिअर प्रेमचंद ,हैप्पी बर्थडे टू यू … 

कैलेंड्स

यूनानी सभ्यता में ‘कैलेंड्स’ का अर्थ था – ‘चिल्लाना’। उन दिनों एक आदमी मुनादी पीटकर बताया करता था कि कल कौन – सी तिथि, त्योहार, व्रत आदि होगा। नील नदी में बाढ़ आएगी या वर्षा होगी। इस ‘चिल्लाने’ वाले के नाम पर ही – दैट हू कैलेंड्स इज ‘कैलेंडर’ शब्द बना। वैसे लैटिन भाषा में ‘कैलेंड्स’ का अर्थ हिसाब-किताब करने का दिन माना गया। उसी आधार पर दिनों, महीनों और वर्षों का हिसाब करने को ‘कैलेंडर’ कहा गया है।

एक सचित्र देश के कैलेंडर की कहानी आज मुझसे सुनिए ! देश में शराब की एक कंपनी अपने हर राज्य की सुन्दर बदन वाली लड़कियों को एक साथ एक जगह जमा कर के बिकिनी में उनके बदन की तस्वीरें खींचते और उनका कैलेंडर बनाकर शराब और हवाई जहाज़ की टिकिटों के साथ उन कैलेंडरों को बैंक में दे आते !

बैंक के आदर्श लिबरल और आदर्श भक्त कर्मचारियों के बीच कैलेंडर की लड़कियों का समान अधिकार था ! कैलेंडर की बारह महीनो की बारह लड़कियाँ दिन रात सत्रह बैंक के कर्मचारियों के दिलों दिमाग में ‘कैलेंड्स’ करतीं और कर्मचारी नशे में मदहोश हवाई यात्रा करते हुए बैंक का सारा पैसा कैलेंडर के मालिक को ‘कैलेंड्स’ कर के दे देते ! अपने हुस्न और अपनी क़ातिल अदाओं के जरिये लड़कियाँ सबके होश उड़ा रही थी ! हर हाल में कैलेंडर सफल था ! कैलेंडर का मालिक हर साल कैलेंडर के लिए नयी लड़कियाँ ढूंढ लेता और उन्हें बैंक में ‘कैलेंड्स’ करने पहुंचा देता ! कैलेंडर की दुनिया सेक्स और पैसे के इर्दगिर्द घूमती रही ! शराब के सबसे बड़े व्यापारी पर किसी की नज़र नहीं पड़ी !

कैलेंडर की लड़कियाँ खूबसूरत थीं, प्रतिभावान थीं ! कोई स्विमिंग चैम्पियन थी ! कोई नर्तकी, कोई घुड़सवार थी तो कोई सुपर मॉडल, कोई गायक थी तो कोई बेली डांसर ! उन्हें कैलेंडर से निकल कर सोसाइटी में पहुंचना था ! कैलेंडर से निकल कर लड़कियों को सिनेमा के सुनहरे परदे पर पहुँचना था ! कैलेंडर की लड़कियों को पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों की खबरों में सुर्खियों में रहना था !

एक दिन कैलेंडर का मालिक देश के बैंक का बहुत सारा पैसा ले कर देश से बाहर भाग गया !

कैलेंडर की लड़कियों को जैसे ही पता चला उनके कैलेंडर का जन्मदाता और मालिक भाग गया है वे एक दुसरे को फ़ोन करने लगीं ! बिकिनी संसार में अफरा तफरी मच गयी ! कितने आईने टूट गए ! मालिक मार्च के महीने में भागा था इसीलिए सब मार्च को फ़ोन लगा रही थी ! कई फोन डिब्बाबंद थे ! सबने देखा साल में नौ महीने बचे हैं ! न जाने क्यों सब डर गयीं ! गर्ल नेक्स्ट डोर वाले रोल में अंग प्रदर्शन कर के फेमस अगस्त ने फ़रवरी को फोन किया ! अपने चीक बोन से प्यार करने वाली अक्टूबर की नीली लड़की ने न्यूडिटी कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था ! बोल्डनेस की सारी हदें तोड़ने वाली दिसम्बर को वो पीछे छोड़ना चाहती थी ! उसने जनवरी को फोन किया ! ड्रॉप डेड गॉर्जियस रो रही थी ! बेडमिंटन प्लेयर अचम्भे में हँस रही थी ! सबकी बिकिनी बॉडी थी ! सबको कैलेंडर में बिकना था ! बारह महीनों के न जाने कितने कैलेंडर लड़कियों को किंग ऑफ गुड टाइम्स रुला के पीछे छोड़ गए थे !

कैलेंडर की जल परियों ने मिल कर देश के राष्ट्रपति से अपनी शिकायत की ! राष्ट्रपति ने कैलेंडर की लड़कियों को देश की औरतों के अधिकार के लिए लड़ने की प्रेरणा दे कर उन्हें उनकी ही कैलेंडर की तारिख दिखा कर विदा कर दिया !

लड़कियों को पता था अब कलैंडर के भरोसे जीवन काटना मुश्किल हो जायेगा ! सब हॉट लड़कियाँ कोल्ड हो गयीं ! कैलेंडर से कैलेंडर की लापता लड़कियाँ भी निकल आयीं थी ! कैलेंडर की लड़कियाँ चिल्ला रहीं थीं और देशवासी ‘कैलेंड्स’ कर रहे थे ! कैलेंडर की लड़कियों के साथ कामकाजी और मिडिल क्लास को रोटी, कपड़ा और मकान की चिंता करने के लिए छोड़ कर एयरलाइन्स और शराब का व्यापारी देशवासियों और बैंक को चूना लगा के भगोड़ा हो गया था ! बारह साल से कैलेंडर का ये खेल चल रहा था ! अब कोई क्या ‘कैलेंड्स’ लगाये ? अब ‘कैलेंड्स’ लगाये होत क्या जब पंछी छोड़ गया देश !

‪‪#पैरोडी‬ #‎कालाहास्य ‪#‎Kanhaiya #JNU

मैया मोरी मैं नहिं नारो लगायो !

भोर भयो स्टूडेंट के पाछे, जेल मोहिं पठायो ।
चार पहर जे एन यु भटक्यो, साँझ परे हॉस्टल आयो ॥

मैं बालक बहिंयन को छोटो, कुर्सी किहि बिधि पायो ।
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस नारे मुख लपटायो ॥

तू जननी मन की अति भोरी, मिडिया कहे पतिआयो ।
जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो ॥

यह लै अपनी प्रेसिडेंटी , बहुतहिं नाच नचायो ।
‘मस्तान’ तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ॥

‎सोलह बसंत‬

सरसों के खेतों तक आया, इस बार मुझ तक क्यों नहीं पहुंचा मेरा बसंत ? मीनारों पर बैठे गिध्द कैसे खा गए एक गिलहरी का क्यारी भर बसंत ? कौन पेंच दे के काट गया एक बच्चे का पतंग भर बसंत ? फुनगियों पर सहम कर क्यों रह गया इस बार का मौसम भर बसंत ? किस ने मार गिराया विद्यार्थी का हंस भर बसंत ? महानगरों के तकिये पर क्यों सिसकती रही ह्रदय के आकार की हवस भर देह – बसंत ? किसने दी मौसम को गाली, कैसे बचेगा विरोध भर बसंत ? मुक्त कर दो अपने गगन मन से दमन भर बसंत ..