सोशल मीडिया का प्रेत

 

Sketch Artist- Unknown.

Sketch Artist- Unknown.

वनवासी ने हॉस्पिटल से अपनी पत्नी का शव उठाया और चुपचाप शमशान की ओर चल पड़ा ! टीवी की मरीज़ बीवी की ठठरी का वज़न एक गठरी लकड़ी से ज्यादा नहीं था ! आदिवासी समुदाय में किसी की मृत्यु हो जाने पर ढोल नगाडे़ को एक विशेष लय में बजाकर संदेश भेजा जाता है, जिसे सुन-समझ कर आस-पास के लोग मृतक के घर की ओर शीघ्र पहुंच जाते हैं ! वनवासी के लिए फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप के नगाड़े पर थाप देने वाला जंगल में कोई नहीं था इसीलिए उसके साथ उसके समाज के चार आदिवासी नहीं पहुँच सके थे ! हाँफता हुआ वनवासी जब अपनी मरी हुई पत्नी को अकेला अपने कंधे पर लेकर पाँच किलोमीटर से अधिक चल लिया तभी शव स्तिथ बेताल ने कहा, “ पण्डित, चतुर और ज्ञानी, इनके दिन अच्छी-अच्छी बातों में बीतते हैं, जबकि मूर्खों के दिन कलह, नींद, फेसबुक, ट्वीटर और टेलीविज़न देखने में ! अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। तेरी बदहाली मुझसे देखी नहीं जा रही है ! मैं तुझसे कुछ प्रश्न करता हूँ, अगर प्रश्न का उत्तर जानते हुए भी तुमने उत्तर नहीं दिया तो तुम्हारा सर फटकर सड़क पर बिखर जायेगा ” ! सत्तर साल से आज़ाद कालाहांडी की सड़कों पर विकास के बेताल को कंधे पर लिए देश का नागरिक चल रहा था ! उसने देखा टीवी पीछे पीछे चल रहा है, और सोशल मीडिया उसके आगे आगे ! मुर्दा चुप था, बेताल बोल रहा था ! ” फाइलों में सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, रोजगार, शिक्षा मिल कर जंगल में रहते हैं फिर जंगल में तुम्हारा इनकम कम क्यों है ? तुम्हारी दुर्दशा जंगल में जन्म से ही क्यों शुरू हो जाती है ? तुम बुनियादी जरूरतों के संघर्ष में अपने बच्चों को क्यों खो देते हो ? तुम्हारे जंगल में सफेद बाघ भी अपने डिजिटल जीवन प्रमाण पत्र के लिए क्यों भटकता है ? ” वनवासी प्रेत के सवाल से बौख़ला गया और सड़क किनारे शव को रखने की जगह ढूंढने लगा ! बेताल पल भर के लिए चुप हो गया ! शव को रखते ही वनवासी ने पेड़ों के पास एक अजीबो-गरीब आकृति के जीव की झलक देखी ! गिरगिट जैसा दिखने वाला यह दैत्याकार जानवर पेड़ों के सहारे साथ साथ चल रहा था और रंग बदल रहा था ! जैसे वो अपनी पत्नी की लाश ढो रहा था दैत्याकार गिरगिट कैमरा ढो रहा था ! आज वनवासी के साथ क्या हो रहा है वो कुछ समझ नहीं पा रहा था ! प्रेत फिर बोलने लगा ” जंगल में शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार का दर्जा ले चुका है फिर तुम वनवासी बने क्यों बैठे हो ? तुम अपने चाचा-चाची का वृद्धा पेंशन का फॉर्म आज तक क्यों नही भर पाए ? ” डरा हुआ वनवासी शव उठा के फिर चल पड़ा ! वो जानता है कि गढ़, किला, बुजुर्ग, ताल, खेत, पहाड़, पत्थर सब आदिवासी का गुण गाते हैं पर शिक्षा के अभाव में वो स्वयं बद से बदतर ज़िंदगी जीने को विवश हैं ! प्रेत ने वनवासी के कान में फुसफुसा के बोला ” तुम अपने हालात देखो, और गरीब नेतृत्व से निकलो ” वनवासी चीख पड़ा ” सब झूठ है, सब झूठे हैं, तू भी मेरी पीठ पर झूठ बोल रही है ! मैं मिट्टी ले जा रहा हूँ ! माँ प्रकृति की मौत हुई है जिसकी बीज का मैं दाना हूँ ” जवाब सुनकर बेताल ठहाके लगाने लगा ! वनवासी ने शव को ज़मीन पर रख दिया ! दस से ज़्यादा किलोमीटर चल कर वो थक गया था ! प्राइवेट न्यूज चैनल का प्रेत भी सोशल मीडिया पर लटक के आराम करने लगा ! ” आदिवासी के लिए शहर में एम्बुलेंस नहीं मिला सबने देखा पर आदिवासी की मदद के लिए चार आदिवासी जंगल से नहीं आये ये किसी ने नहीं देखा ” कहता हुआ दुष्ट प्रेत हँस रहा था ! तभी एक एम्बुलेंस वनवासी को लेकर जंगल में गायब हो गया ! आदिववासियों के यूनियन ने महासभा में झाड़ – फूँक करने वाले को बुलाया जिसने रिमोट से प्रेत को वनवासी से अलग किया ! अगले दिन दुनिया के सोशल मिडियावासियों के छोटे बड़े हर साइज़ के स्क्रीन के साथ गाय गोरु, भेड़, बकरी, बतख, मुर्गी, चूजे, कुल्हारी, गैंता, तीर-धनुष को वनवासी के हाल का पता चल गया ! सोशल मीडिया का प्रेत जाते जाते वनवासी की बदहाली को वायरल कर गया था !

Sketch Artist- Unknown, Source- Google

Tagged , , , , , . Bookmark the permalink.

4 Responses to सोशल मीडिया का प्रेत

  1. Jus me.... says:

    ज़िन्दगी हर रोज़ ही कंधों पर दम तोड़ती है , सलाम है उस प्रेम को जो टूटे हुए कन्धों से भी भावनाओं को गिरने नहीं देता…कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जिन्हें कंधे देना कभी कभी नैतिक जिम्मेदारी हो जाती है,और तब और भी ज़्यादा जब कोई नुकसान ना हो…

  2. siraj says:

    it s my drawing. thank u fr publishing

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *