दुखान्त‬

” कागा सब तन खाइयों मेरा चुन चुन खाइयो मांस,
दो नैना मत खाइयो मोहे पिया मिलन की आस “

ना जाने फिर उन दो आँखों का क्या हुआ ? उन आँखों ने अपने जिस्म दे कर भी मिलन की लालसा में अपनी पलकें बिछाए रखीं थीं !  सुना है नरभक्षी कौव्वे उन दो प्रेमी आँखों से सदियों तक बातें करते रहे और प्रेमी के इंतज़ार में उनका साथ दिया ! फिर एक दिन किसी कपटी कौव्वे ने बारी बारी से उन्हें छल लिया ! प्रेम से निकल के जाने वाले प्रेम में कब लौटे पाए हैं ?

 

सलीब पर कोई टँगा है

मैं देख रहा था सलीब पर कोई टँगा है जिसके दुःख की कोई सीमा नहीं है ! उसके दोनों खुले हाथों को और उसके दोनों पाँव को समेट कर सलीब पर लोहे के मोटे – मोटे कील से ठोक दिया गया है ! आसूँ और खून से सलीब सना हुआ है ! दर्द से आँखें पथरा गयी हैं ! छलनी बदन से खून टपकना भी बंद हो चूका है ! पर ह्रदय अपार करुणा और प्यार से भर गया है ! उसने सबको माफ़ कर दिया है …

दिन का सपना, रात का समाचार

( एक )

मैंने अभी अभी सपने में एक दृश्य देखा कि कन्हैया अपनी जीभ निकाल कर सेल्फ़ी ले रहा है ! ‘कन्हैया’ एकदम ‘काली’ लग रहा था …

( दो )

मैंने अभी अभी सपने में एक दृश्य देखा कि देश में सब लोग अपनी अपनी जीभ निकाल कर सेल्फ़ी ले रहे हैं और सबकी जीभ के रेट अलग हैं …

( तीन )

मैंने अभी अभी सपने में एक दृश्य देखा कि सब लोग एक दुसरे से जीभ लड़ा रहे हैं और जीभ जीभ को हरा रही है …

( चार )

मैंने अभी अभी सपने में एक दृश्य देखा कि सब लोग एक जीभ बन गए हैं और एक दुसरे को चाट चाट कर खरीद बेच रहे हैं …

हाहाकार

सुनो पुरुष, योनि का कोई पिछला दरवाज़ा नहीं होता ! तुम स्त्री से आँख मिलाने अगर उसके सामने नहीं आ सकते तो जा के अपने लिंग में अपना मुंह छुपा लो ! अपने पथरीले काले ह्रदय को अगर उसके लाल सिन्दूर से ढंकना चाहते हो तो याद रखो स्त्री के पांच दिन का बहता हुआ रक्त स्त्राव तुम्हे नंगा कर के बहा देगा ! शनि के पत्थर पर तेल चढ़ा कर तुम स्त्री को शनि से दूर नहीं रख सकते ! फेंका हुआ तेल तुम्हे पवित्र नहीं रख सकता ! स्त्री का ह्रदय स्त्री की बपौती है तुम्हारी माँ की आँख नहीं ..

स्त्री देह का स्वगत

‘प्रेम मार्ग’ पर सिर्फ मेरे देह का घर नहीं और दूसरी इमारतें भी हैं ! मैं एक स्त्री हूँ ! मेरा शरीर आपके पर्यटन का अगर मुख्य केंद्र है तो मेरे देह नगर में आप का स्वागत है ! पर मेरे चेहरे का हेरिटेज वॉक करने वालों से मेरी विनती है कि पहले मेरी इस मार्ग दर्शिका को पढ़ लें !

मानती हूँ मेरा शरीर आप के लिए एक आकर्षक पर्यटन स्थल है और इसे आप वैसे ही गन्दा कर देते हैं जैसे खजुराहो को कर रहे हैं ! आपके अपने अंधकार से निकला प्रकाश और ध्वनि का कार्यक्रम आप मेरी छाती और कंठ से उठा लीजिये मेरा दम घुटता है ! मैं अपनी ख़ुशी के लिए सजती हूँ आपकी कामुकता के लिए नहीं !

मेरे ‘आँख घाट’ से ‘नाक स्मारक’ तक जब आप चलते हैं तो क्या आपको धू धू करती हुई बचपन से अब तक की क़ैद कर ली गई मेरी सारी तितलियाँ जलती हुई नहीं दिखतीं ?
मेरे ‘स्तन घाट’ में क्या आपको मेरी पाबन्दी के मुर्दे अरमानों का मरघट नहीं दिखता ?
आप जो गुलाल मेरे ‘कान फाटक’ से ‘गाल चौक’ तक मलना चाहते हैं क्या वहां मेरी सूखे आंसुओं की गोंद आपकी उँगलियों में नहीं चिपकतीं ?

मेरे शरीर से एक सही रास्ता भी निकलता है जिस पर दुर्भाग्य से आप कभी चल नहीं पाते ! ये रास्ता आपको अपने घर ले जायेगा जहाँ आपकी माँ ऐसी ही शरीर के साथ आपका इंतज़ार कर रही है जिससे आपका जन्म हुआ है ! जिस रास्ते पर चल कर आप अपनी बहन तक पहुँच सकते हैं जो आपको आप से ज्यादा प्यार करती है ! इसी रास्ते पर आपकी प्रेमिका है जो आप जैसे ही पर्यटकों से लड़ रही है ! इसी रास्ते पर आपकी पत्नी है जो आप से मदद के लिए आप को ढूंढ रही है ! पर मेरे शरीर में आप को वो रास्ता कभी नहीं दिखेगा ! मेरी आत्मा पर आपकी गीली नज़र से हुआ फंगल इंफेक्‍शन धीरे धीरे फैलता हुआ मेरे अस्तित्व को खतरे में डाल रहा है !  मेरे उभार निर्जीव पत्थर के नहीं हैं ! मेरे अंतर्वस्त्र में वही हाड़ मांस से बना शरीर है जिससे आपका शरीर निर्मित है ! मेरे अंगों और कपड़ों को घूरने की अगर आपको बीमारी है तो अपनी आँखों पर ब्रा बाँध कर और मुंह पर पैन्टी पहन कर देखिये शायद कुछ आराम मिले ! आप अपने उस पुरुष शरीर को कितना जानते हैं जो हर वक़्त स्त्री के चेहरे का हेरिटेज वॉक करने को तैयार रहता है ? अपनी वासनाओं के कोलाहल में आप मेरे भीतर का मौन फिर क्या सुन पाएंगे ? आप जैसे आतुर और छिछोरे पर्यटक ताज महल पर भी गन्दगी ही फैलाते हैं ! आप की व्याकुल हरकतें आपको मेरे मल – द्वार का प्रहरी भी नहीं बना पायेगी ! दोनों स्तन, पीठ और पेट, नितम्ब, दोनों जांघें और दोनों पिण्डलियॉं पर रखे कपडे के ऊपर भी दुपट्टा डालने के लिए मुझे मजबूर मत कीजिये ! मज़बूरी में स्त्री के बदन पर हर कपडा कफ़न हो जाता है ! आपके मन में मेरे शरीर को लेकर जो जुगुप्सा और तरह-तरह की कुंठाएं मौजूद है पहले आप उनका निवारण कर लीजिये ! आत्मरति के पर्यटन से न आपकी भूख शांत होती है न मेरी कोई कमी पूरी होती है ! मुझे जानने से पहले आप मुझे रौंदने की योजना क्यों बना लेते हैं ? मेहरबानी होगी अगर आप मुझे अपने हाल पर छोड़ देंगे ! मुझे धीरे धीरे खंडहर हो जाने दीजिये ! वैज्ञानिक, इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ताओं, भूगर्भ विशेषज्ञों, लेखक, कवि शायर एवं जिज्ञासु पर्यटकों के क़दम इन स्थानों में पड़ते रहे हैं, अगर आप नयन सुख के शिकारी हैं तो मेरे पुण्य स्थान का तीर्थ आपके भाग्य में नहीं है ! आप आगे बढ़िए ! आपके कलुषित दृष्टि – वीर्य को मैं अपने मासिक महावारी में बहाते बहाते थक जाती हूँ ! मेरा शरीर आपके पर्यटन का अगर मुख्य केंद्र है तो आपको ये पता होना चाहिए ये पर्यटन हर धर्म में वर्जित है ! मेरे चेहरे का हेरिटेज वॉक करने से पहले आप अपनी पीठ पीछे छोड़ आये शमशान और कब्रिस्तान का सैर कर लीजिये, क्या पता आँखों से मेरा बलात्कार करने से पहले आपकी आँखें खुल जाएँ !

गाली कैसे बनती है ? गाली क्या है ?

निंदा या कलंकसूचक वाक्य गाली है ! कोई भी फूहड़ बात गाली हो सकती है ! कलंकसूचक आरोप या दुर्वचन सुनने को गाली खाना कहते हैं ! गाली लेने से लगती है देने भर से नहीं ये भी एक पुराना मुहावरा है ! विवाह आदि में गाया जानेवाला एक प्रकार का रस्मी गीत जो अश्लील होता है उसे भी गाली कहते हैं जिसे लोग प्यार से खाते हैं ! गाली का रिश्ता सेहत और सम्मान से भी है !
‘अंग – प्रत्यंग’ को जब भी सामाजिक रिश्तों के साथ जोड़ा जाता है तो वो गाली हो जाती है ! गाली को गौर से सुन के देखिये लगता है रिश्तों और अंगों की कव्वाली हो रही है ! सामाजिक संबंधों का शारीरिक अंगों के साथ तुलनात्मक व्यवहार बड़ी आसानी से गाली बन जाती है ! अब गाली दोस्ती का नया गहना है मानो कह रहे हों बुरा न मानो गाली है ! जितना मुंह अब उतनी गाली है ! क्रोध में या चिढ के या अधीर होकर मन जब शब्दों का ख़ास अंदाज़ और उच्चारण में प्रयोग करता है तो गाली बनती है ! गाली एक मौखिक हिंसा का रूप भी ले लेती है ! सांस लेने से ज्यादा हवा आप अपने फेफरे में गाली दे के भर सकते हैं ! गाली दे कर मन को शांति मिलती है ! सोशल मीडिया पर खिलाफत में लैंगिक, नस्ली, और व्यक्तिगत नकारात्मक आक्रामक टिप्पणी या आलोचना भी गाली का नया रूप है !
गालियों के चार प्रकार हो सकते हैं ! मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक, लैंगिक और शारीरिक !
अक्सर, अंग + सामाजिक सम्बन्ध + शारीरिक क्रिया + जानवर के नाम का मिश्रण गाली हो जाता है !
आज कल अंगो के कुछ पर्याय सिर्फ गाली में ही प्रयोग किये जाते हैं ! नुख्ते और उच्चारण की वजह से कई गाली अपना आपा खो बैठते हैं !
गन्दे, भद्दे, मूर्ख, चतुर, कपटी, संत, लोभी, लालची, महापुरूष अब ये संस्कृत के शब्द लगने लगे हैं और सब व्यंग्य के अलंकार हैं ! गालियों में तुलनात्मक सम्बन्ध जोड़े जाते हैं !
‘मादरचोद’ एक ऐसा शब्द है जिसमे क्रोध और भड़ास से निकलने की सबसे बड़ी खिड़की है ! ‘गांडू’ का अर्थ अब खुले आम ‘स्ट्रीट स्मार्ट’ है और यह एक सफल अंतर्राष्ट्रीय हिन्दुस्तानी फिल्म भी ! ‘गांड मार लूँगा’ या ‘गांड मार दूंगा’ रूठना भर है ! ‘अबे चूतिये’ नया हेल्लो है ! ‘साला’ वाक्यों के बीच का कोमा है ! ‘बेहनचोद’ दिल्ली है ! ‘हरामजादा’ ज्यादातर काम करने वाले लोग हैं ! ‘बेईमान’ एक इशारा है ! ‘भ्रष्ट’ एक बहुत बड़े देश का नाम लगने लगा है ! ‘केरेक्टर ढीला’ सलमान खान का हिट गाना है ! ‘रंडी’ ज्यादातर एक्स गर्ल – फ्रेंड है ! ‘लंड’ अब तक ब्रांड क्यों नहीं बना आश्चर्य है और इस से बड़ा कौन है ? ‘लौडू’ ‘चोदु’ ‘भोसड़ी’ ‘चल – चल’ जोश भरने के लिए भाईचारे के नए शब्द हैं ! ‘फ़िल्मी’ फैशन है ! कोई आपको ‘भाईसाहब’ बोले तो समझिये बात नहीं बनेगी वो नाराज है ! ‘लंड की टोपी’ और ‘झांटों की जूँ’ लगता है हाइजीन को लेकर कॉमेंट है ! ‘गांड की हड्डी’ तोड़ते हुए मैंने लोगों को देखा है ! अस्तुरे से गांड काटने की धमकी पाकेट मार को खूब दी जाती है ! ‘माँ की आँख’ और ‘तेरी माँ का साकीनाका’ शहरी गाली हैं ! खूब क्रिएटिव होकर गाली देने वाले खुशमिजाज होते हैं उनकी गाली सुनने लोग दूर दूर से आते हैं ! औरतों के मुह से ये सब गाली अब भी मन को कामुक बना सकता है और आप भावुक हो रहे हैं ?
सुना है देश के कुछ शहर में एक नम्बर का ‘गाली शहर’ होने की भी होड़ है ! ‘गाली गंज’, ‘गाली पुर’, या ‘गाली सराय’ नए ‘स्मार्ट सिटी’ हो सकते हैं ! घरेलू हिंसा की गाली घरेलु नहीं होती ! दुर्व्यवहार अब नया व्यवहार है !
आप चाहेंगे तभी ये सब शब्द गाली होगी वरना अब ये सिर्फ बोल चाल की नयी भाषा है ! वैसे ऊँचा और साफ़ बोला गया हर शब्द अब गाली हो सकता है !

* इस पोस्ट की चोरी भी एक गाली होगी ! जो चुराने वाले को लग जाएगी !

शब्द चित्र : तीन माइ’क के लाल उर्फ़ ‘बाकी बच गया अण्डा’

आज – कल सबको सुन रहा हूँ ! सब माइ’क के लाल लग रहे हैं … ! सब माइ’क के लाल कूद पड़े हैं … ! आप भी सुनिये ! मुझे बाबा नागार्जुन की उन्नीस सौ पचास में लिखी उनकी कविता ‘बाकी बच गया अण्डा’ की याद आ गयी …

माई'क का लाल - एक

माई’क का लाल – एक

माई'क का लाल - दो

माई’क का लाल – दो

माई'क का लाल - तीन

माई’क का लाल – तीन

बाकी बच गया अण्डा / नागार्जुन

पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूँखार
गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गए चार

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झण्डा
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अण्डा

रचनाकाल : 1950

[1] गांधी [2] बोस [3] जिन्‍ना [4] नेहरु [5] जेपी

( Pic Credit : Google Search )

भीड़ के सामने माइक पर मैं भी किसी काल्पनिक आदमी को डाँटना चाहता हूँ !

महालोक – पाँच

फेसबुक पर एक घंटे प्रति लाइक की दर से चलता हुआ विरोध का अवसाद जब महानगर पहुंचा तो यहाँ मधुशाला में बोहनी हो चुकी थी जिस्म का बाज़ार अंगड़ाई ले रहा था और पांच सौ रूपये में भी बलात्कार करने वाले कम पड़ रहे थे ! धन्धे वालियाँ अपने खोटे नसीब को रो रही थी और धंधे के समय बैठ कर टी वी पर ठंढी राजधानी में हुए रेप का न्यूज़ देख कर मर्दों को मिस कॉल दे रही थीं ! साले मर्दों को आज की ‘रेप’ में पता नहीं क्या मजा आ रहा था …! इतने में शायद किसी का मोबाइल बजा तो, पर वो भी किसी लुख्खे का था ‘ग्राहक’ का नहीं … ‘साले मादरचोद मर्द …’ कोई टी वी पर रोती हुई एक लड़की की तरफ देख के बुदबुदाई … सब हंस पड़े … अभी राजधानी – गेट से आन्दोलन  का आँखों देखा हाल आना बचा था …

महालोक के ‘अंग प्रत्यंग’ – अंगो का एकालाप : महालोक – दो

Pic : Dina Bova

Pic : Dina Bova

युग्म शब्द ‘अंग – प्रत्यंग’ का प्रयोग बोल चाल की भाषा में पूरे शरीर को उद्धत करने के लिए किया जाता है ! इस शब्द का उपयोग मुहावरे के रूप में शारीरिक भाव या शारीरिक संरचना के सन्दर्भ में भी किया जाता रहा है ! मूलतः इसका सन्दर्भ नाट्य शाश्त्र में सबसे पहले मिलता है ! नाट्य शाश्त्र में शरीर को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है ! अंग , प्रत्यंग, और उप – अंग  !
छः अंग हैं ! शीर्ष / सिर (head), हस्त / हाथ (hand) , वक्ष / छाती (chest) , पार्श्व (sides) ,कटि (hips) , और पाद/ पैर ( leg) ! ग्रीवा / गर्दन (neck) को सातवां अंग मना जा सकता है ! प्रत्यंग भी छह हैं ! स्कंध / कंधे (shoulders), बाहू / बांह (arms ), पीठ , पेट , जांघ ,उरु ! और उप – अंग बारह ! उप – अंग चेहरे की अभिव्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं ! नेत्र,भ्रकुटी,नासिका,अधर,कपाल,चिबुक, होंठ, दांत, जीभ, ठोड़ी,पुतुली और चेहरा ! नाट्यशास्त्र के अनुसार, नर्तक या अभिनेता नाटक के अर्थ को चार प्रकार के अभिनयों के ज़रिये प्रस्तुत करता हैः आंगिक या शरीर के विभिन्न अंगों के शैलीपूर्ण संचालन के माध्यम से भावना की प्रस्तुति; वाचिक या बोली, गीत, स्वर की तारता और स्वरशैली से भावना की प्रस्तुति ; आहार्य या वेशभूषा और श्रृंगार से भावना की प्रस्तुति; और सात्विक ! सात्विक अभिनय तो उन भावों का वास्तविक और हार्दिक अभिनय है जिन्हें रस सिद्धांतवाले सात्विक भाव कहते हैं !

हर अच्छे  कलाकार के पास शैलीकृत भंगिमाओं का जटिल भंडार होता है। शरीर के प्रत्येक अंग, जिनमें से आँखें व हाथ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, के लिए पारम्परिक तौर पर मुद्राएँ निर्धारित हैं। सिर के लिए 13, भौंहों के लिए 7, नाक के लिए 6, गालों के लिए 6, ठोड़ी के लिए 7, गर्दन के लिए 9, वक्ष के लिए 5 व आँखों के लिए 36, पैरों व निम्न अंगों के लिए 32, जिनमें से 16 भूमि पर व 16 हवा के लिए निर्धारित हैं। पाँव की विभिन्न गतियाँ (जैसे-इठलाना, ठुमकना, तिरछे चलना, ताल) सावधानी से की जाती हैं। एक हाथ की 24 मुद्राएँ (असंयुक्त हस्त) और दोनों हाथों की 13 मुद्राएँ (संयुक्त हस्त), एक हस्त मुद्रा के एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न 30 अर्थ हो सकते हैं।

आजकल की अभिनयप्रणाली में एक चरित्राभिनय (कैरेक्टर ऐक्टिंग) की रीति चली है जिसमें एक अभिनेता किसी विशेष प्रकार के चरित्र में विशेषता प्राप्त करके सब नाटकों / फिल्मो में उसी प्रकार की भूमिका ग्रहण करता है। फिल्मो के कारण इस प्रकार के चरित्र अभिनेता बहुत बढ़ते जा रहे हैं। उनके अभिनय की शैली में ‘अंग – प्रत्यंग’ वही रहते हैं बस फिल्मो में उनके चरित्र के नाम बदलते रहते हैं !

अपनी फिल्मों में चरित्रों के संसार को रचने के क्रम में उनके अभिनय की परिकल्पना पर मेरा मन एक विचार से दुसरे विचार के बीच अपने वेग से विचरता रहता है ! मन में उठते विचार एक सशक्त आवेग हैं जिसकी अभिव्यक्ति के लिए मै सतत प्रयत्नशील रहता हूँ ! प्रस्तुत है मेरे मनोवेग की पहली कड़ी ! ये पंक्तियाँ ‘स्वगत स्वरुप’ में ही मुझ तक अलग अलग विचारों के क्रम में मेरे मन में आयीं जिन्हें मै अपने फेसबुक के वाल पर शेयर करता रहा हूँ !

मैं फेसबुक स्टेटस को ‘मनः स्टेटस’ भी कहता हूँ , मनः स्थिति का परिवर्तित स्व – रूप ! मनोवेग की पहली कड़ी में प्रस्तुत है ‘अंग – प्रत्यंग’ ! कोई अभिनेता अपने शरीर को लेकर अंगो के मेरी इस एकालाप को प्रयोगधर्मी प्रस्तुति में भी बदल सकता है ! अपने ‘मनः Status ‘ का ये साहित्य शेयर करते हुए मुझे ख़ुशी हो रही है !  पढ़िए और भावनाओं के जाने अनजाने सोते में गोते लगाईये … मेरे इन विचारों से आप भी अपने – अपने ‘मनो – योग’ से जुड़िये और जोड़िये ! अगर मेरा ये पोस्ट आपको पसंद आए तो अपने अंग से कहियेगा प्रदर्शित करे … अंग प्रदर्शन के लिए अभिनेता होना जरूरी नहीं है … और अंग प्रदर्शन का मतलब हमेशा वही नहीं होता जिसे हमारा सेंसर दिखाने नहीं देता… आप मुझे अंगूठा तो दिखा ही सकते हैं 😉

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कलेजा ठंडा किया जाता है और खून गर्म ! खून को खौला भी सकते हैं ! खून पीना एक बात है और खून का घूँट पीना एक दम अलग बात ! दिल लेने और देने के काम आता है, सबसे ज्यादा टूटता भी यही है ! दिमाग की दही होती है ! छाती चीरते हैं और गर्दन काटी जाती है ! गला काटने और दबाने दोनों के काम आता है ! हाथ और पाँव तोड़े जाते हैं ! पाँव तोड़ के हाथ में भी रखने की बात सुनी जा चुकी है ! उँगलियों पर नाच सकते हैं ! कन्धा दिया जाता है ! दिल पर और सर पर हाथ रखा जाता है ! पैर भारी हो सकते हैं और घुटनों के बल चला जा सकता है ! कान में तेल डाल के सो सकते है, मरोड़ सकते हैं और उसके नीचे बजा भी सकते हैं ! कुछ कान के कच्चे भी होते हैं ! पेट की पूजा होती है ! नाक कट सकती है ! मुँह काला हो सकता है ! हाथ खाली हो सकते हैं ! सर झुकाया और उठाया जाता है ! होंठ सिले जाते हैं ! आँखें बोलती हैं ! कमर कसी जाती है ! करने पर हड्डी पसली एक हो सकती है ! हाथ पीले हों तो अच्छी बात है पर रंगे हाथ पकडे गए तो गए काम से ! आँख फोड़ी जाती है और मुँह तोडा जाता है ! खाल खींची जाती है ! निकलना हो तो बाल की खाल निकाल सकते हैं ! नाक से चने चबा सकते हैं ! दांतों तले उंगलियाँ दबा सकते हैं ! दांत खट्टे हो सकते हैं ! ज़ुबान पर लगाम लगाई जाती है ! आँख मारने के काम आती है , वैसे कई अंग हैं जिनको मारते हैं ! जिस्म के साथ ये सब करना मर्दाना है !

अपने आप को सिर्फ अपने अंगों के भरोसे कैसे छोड़ दें…?

जैसे रेडियो कान में घुस गया है वैसे ही धीरे धीरे टेलीविजन भी आँख में घुस रहा है ! मोबाइल कान और आँख दोनों में घुसा हुआ है ! कैमरा, पर्स, बैग, फोन, छुट्टे पैसों में हाथ पहले से उलझे हुए हैं ! अंगूठी में उँगलियाँ फंसी हैं ! घड़ी और टोटके में कलाई ! जूते चप्पल में पाँव धंसा हुआ है ! गुप्तांगों की तो हालत बहुत खराब है पता नहीं क्या क्या फंसा के कहाँ कहाँ घुसा दिया है ! आँख और नाक पर चश्मा अलग से ! गले की हालत तो ऐसी है की कोई भी काट ले ! दिल दिमाग के बिना सारी कल्पनाएँ अधूरी हैं ! फेफरे में धुंआ भर लिया है और किडनी में शराब ! हम ‘अंग प्रत्यंग’ से खेल रहे हैं…

अंग - प्रत्यंग

अंग – प्रत्यंग

जहाँ हम होते हैं जरूरी नहीं वहीँ दिमाग हो !

चाहे कुछ भी बंद करें मुँह खुला रहता है !

दूसरा कदम रखने के बाद पहला कदम पूरा होता है !

गले से उतरते ही ज़हर अपना काम शुरू कर देता है पर उसे गले से उतारना कौन चाहता है ?

दो हाथ हमारे दो मन हैं ! एक कहीं भी पहुँच सकता है और एक सिर्फ कहीं कहीं…

हाथ जोड़ के… घुटनों के बल बैठ के… गोल गोल घूम के… खड़े खड़े… उफ़ ! बाहर कैसे कैसे इशारे…! और वो हमारे अंदर ही है …

मुँह में घी शक्कर बोला ही था थोड़ी चायपत्ती चीनी और गरम पानी भी बोल देते !

जब दिल बैठ जाता है तो कोई और अंग खड़ा होने की ज़ुर्रत नहीं करता !

खड़े होने की बात हो तो बाल और रोंगटे को हम भूल जाते हैं !

सच का साथ दें या न दें इसका फैसला हमेशा हमारे हाथ में रहता है !

मन की आवाज़ आँखों का कोलाज़ है !

जीभ अपना कहा खुद काटती है !

मन कठोर करने के लिए शिलाजीत नहीं खाना पड़ता !

आँखों से सुनना कान से देखना नाक से छूना हाथ से सूंघना पैर से सोचना और दिमाग से चलने को मल्टीमीडिया इफेक्ट कह सकते हैं !

अच्छा रसोइया ज़ुबान खींच लेता है !

हमारा चेहरा हमारे मूड का बर्तन है !

आँखें देखतीं ही नहीं एडिट भी करती हैं !

कैमरे के लिए पल भर में हम अपने अंदर से फोटो वाला चेहरा निकाल लेते हैं !

अलग अलग दोस्तों के लिए अलग अलग भावनाएं रखने में मन मास्टर होता है !

कई लोगों के पैर नहीं होते पर वो ‘sir’ होते हैं !

सच झूठ के बिना नंगा होता है !

आँखे देखती हैं ,मन रंग भरता है !

आप का मुखड़ा किसी जीवन का अंतरा है !

कमर फैशन में है सीना नहीं ! ( छाती ठोकने वालों के लिए )

जब से गुरु ने अंगूठा काट लिया है हम सब अंगुली से ही एक दुसरे को छेड़ रहे हैं !

उस आँख से क्यों नहीं कुछ दीखता जिस आँख में मन है मेरा !

हम अंदर बाहर एक नहीं हैं !

आँख चुराते हैं तो आँख में गिर भी जाते हैं !

आँख में धुल झोंकते हैं !

धुल चाटी भी जाती है !

आँख की सेंकाई करने वाले ही आँख मारते हैं !  आँख का मारा सबूत ही जुटा रह जाता है ! तरसती आँखों के बीच चार चार आँखें ले के घूमने वाले भी हैं ! आँख बिछाई भी जाती है ! फेर ली गयीं आँखें उठती नहीं हैं ! आँख लग जाए तो आँख खुलती नहीं है ! आँखों पर से पर्दा हटाते है तो सब बदल चूका होता है !

Pic : Dina Bova

Pic : Dina Bova

सांप कलेजे पर खूब लोटते हैं !

कुछ हाथों हाथ लेते हैं तो बात कानों कान फैल जाती है !

हाथों हाथ ली गयी बात कानों कान फैल जाती है !

आप अपने कान खुद क़तर सकते हैं भर नहीं सकते !

कच्चा कान किसी काम का नहीं होता !

कान पर जूँ नहीं रेंग सकता और नाक पर मख्खी नहीं बैठ सकती !

नाक सब रख सकते हैं पर नाक कोई रगड़ना नहीं चाहता ! नाक कटता है तो खून नहीं बहता !

दाँत खट्टे हो जाएँ तो मुह छुपाना पड़ता है ! मुँह की खाने के बाद पता नहीं क्यों दाँत पिसते हैं लोग !

दाँत कटी रोटी मुँह बंद रखता है !

मुँह पर का कालिख मुँह का पानी नहीं धो सकता !

मुँह नहीं रखो तो मुँह उतर जाता है !

मुँह दिखाई के रस्म में मुँह उतार के छुपा नहीं सकते !

दिल पर कोई नहीं लेता अब सब हार्ड डिस्क पर ले लेते हैं !

अक्ल के पास घोड़े होते हैं इसीलिए अक्ल के दुश्मन होते हैं !

आँख दिखाओगे तो आँख ही देखोगे !

पर पूरे अंग में भूत सिर्फ सर पर सवार होता है !

अंग छूटा संग छूटा … !

वैसे अपनी करनी सब अंग याद नहीं रखते !

अंग टूटते हैं ढीले होते हैं पर ये पढ़ के आज अंग अंग मुस्कुराएंगे …

''Sringāra Rasa''': Rasa-Abhinaya by all time great Rasa-Abhinaya maestro (late) Guru Nātyāchārya Vidūshakaratnam Padma Shri Māni Mādhava Chākyār at the age of 89.

”Sringāra Rasa”’: Rasa-Abhinaya by all time great Rasa-Abhinaya maestro (late) Guru Nātyāchārya Vidūshakaratnam Padma Shri Māni Mādhava Chākyār at the age of 89.

इतिहास में मूर्तियों के अंग भंग करना कट्टर प्रतिवाद का प्रमाण रहा है ! जिस्म के साथ मुहावरों, कहावतों और गालियों में बहुत कुछ करते हैं ! सभ्यता के इस पड़ाव पर जिस्म के साथ हम पता नहीं क्या क्या करेंगे और क्या – क्या किया जा सकता है … ! वैसे चौसठ प्रकार पर एक प्राचीन किताब भी है…

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क्रमशः