जलते पटाखा का बुझता प्रेमी

पटाखा को लेकर मेरा एक प्यारा सपना था, जिसको मेरी पटाखा ने ही मेरी आंखों में धूल झोंक कर फोड़ दिया है. मेरी पटाखा दरअसल सिर्फ़ मेरी प्रेमिका नहीं बल्कि मेरा एक विचार है. पटाखा की देह गंध मेरे आनन्द का स्रोत रही है. पटाखा के अंदर मेरे बचपन की खुशियां भरी थी और इसकी पवित्र चिंगारी का मैं प्रेमी था. मैं अब तक अपनी पटाखा की प्रेम अग्नि में उत्सव की तरह जलता रहा हूं. इस बार दिवाली के नाम पर अश्लील ढंग से फट कर पटाखा ने मेरा दिल तोड़ा है और मेरे प्रेम के विश्वास में मुझे धोखा दिया है. उसके धोखे से इस बार मेरे अंदर धुआं भर गया, मुझे सांस लेने में तक़लीफ़ होने लगी. पटाखा के धोखे और धुएं से दम घोंटू वातावरण बन गया. उसकी अय्याश रंगरेलियों की आतिशबाजी के धुएं और बेवफ़ाई के विषाक्त धूल से आंखों में जलन और बेचैनी बढ़ने लगी, मुझे उबकाई आने लगी और मैं हिचक के रोने लगा.

मेरी प्रिय पटाखा. मेरे दिल के अनार, चकरी और फुलझड़ियों को धोखा दे कर मेरी रोशनी, दिए, कंदील और मिठाइयों को छोड़ कर तुम अपने सीसा, मैग्नीशियम, कैडमियम, नाइट्रेट, सोडियम फॉस्फोरस की घमंड में जिसके इर्द – गिर्द चकरघिन्नी खा रही हो तुम्हारे वो ग्राहक अपनी कामनाओं की वासना में तुम्हे जला के भष्म कर देंगे. हम दोनों के प्रेम के दिए जलते तो वाकई रौशनी के फूल खिलते, पर तुम इस दिवाली में किसी की कामुकता का पटाखा बन के फटी हो तो दिल जल रहा है. बज कर फुस्स हो जाने का तुम्हारा एक दिन का ज़िद भरा जश्न हर बार मेरे लिए ध्वनि प्रदूषण और हानिकारक गैसों से नुक्सान का कारण बनता रहा है. इस दिवाली किसी और की पटाखा बन के तुमने हम दोनों के प्रेम का पर्यावरण भी जला दिया.

मेरी पटाखा, तुम्हारी बारूदी आंखें मेरी देह के भीतर फटती तो मेरी आत्मा में उत्सव का धमाका होता पर जैसे तुम फट रही हो वह प्यार नहीं है, या कोमलता, या स्नेह, या अपने आप में जीवन, यह सब कुछ भी नहीं है. पटाखा इस दिवाली में तुम्हारे फटने की कामुक कराह का शोर मुझ पर एक भयानक प्रभाव छोड़ गया है. तुम्हारा धमाका खोखले सेक्स की तरह था, जिसमे तुम फटने के बाद हर बार अन्धकार में छूट जाती हो. अपने बारूद के बदले दुसरे के अहम् की देह गंध से बार बार भर जाना क्या तुम्हे घिन से नहीं भरता ? फिर तुम हर बार फटती हुई ऐसे क्यों छटपटाती हो जैसे जलते हुए अनार को किसी ने लात मार दिया हो ? वासना की अराजक सड़कों पर तुम अब चलती कार में हवस का शिकार बन कर बजने लगी हो, मनोरंजन के नाम पर तुम अपने नगर में शोर, धुआं, प्रदूषण का एक विरासत हो और कुछ नहीं. यह भयानक है. मेरी मासूम पटाखा तुम पार्क में हवा साफ करने के लिए सूर्य नमस्कार करते – करते प्रदुषण और अन्धकार की नगर वधु कैसे बन गयी ?

तुम्हारी कामुक आतिशबाजी को बच्चों और बुजुर्गों से भरा तुम्हारा परिवार भी बर्दाश्त नहीं कर सकता है. तुम जब भी बजती हो वो दिन और रात घर में बच्चों और बुजुर्गों के लिए एक भयानक दिन और रात होती है. इसीलिए तुम छुप छुप कर प्लास्टिक पीढ़ी के आवारा मर्दों की जेब खर्च से बजने लगी हो. उम्र भर टाइम बम की टिक टिक की तरह तुम्हे मेरी ह्रदय की धड़कन बन कर रहना था पर तुमने चुना बस एक कामुक ध्वनि, देह का विस्फोट और अब सब स्वाहा. तुम्हारे बजने की बीमार आदत ने मेरी भावनाओं की दुख:मय अंत्येष्टि कर दी है. मुझे पता है तुम अपने विस्फोटों के बीच मेरे शब्दों के माध्यम से मेरी दुःख की सिसकती आवाज सुन रही हो.

सुनो पटाखा तुम जलो और बजो पर अपने प्रेमी के लिए दमघोंटू माहौल बना कर किसी दूसरे की खुशियों के लिए अपने इस पागल प्रेमी की ख़ुशी को तो कम न करो. मेरे प्रेम की सारी आक्सीजन सोंख ली तुम्हारे पटाखे के धुएं ने. अपना उल्लास इतना महत्वपूर्ण है कि दूसरों की शांति में खलल डालते हुए तुम्हे ज़रा भी संकोच नहीं होता है ? मेरी पटाखा आखिर तुम इतनी ज़्यादा सेल्फ सेंटर्ड क्यों हो ?

तुम तो मेरे ह्रदय की मासूम पटाखा थी, दुःख की बात है तुम मुझे धोखा दे कर किसी की छाती पर चढ़ कर बज गयी. तुमने मुझे प्रेम में धोखा दिया है, याद रखना तुम्हे पता भी नहीं चलेगा कि तुम कब आखरी बार बज गयी हो और कब आखरी बार फट के अपने ग्राहकों के दिमाग में बारूदहीन कचरा बन गयी. अब तुम्हारी सल्फर, कोयला और पोटेशियम नाइट्रेट से भरी देह से प्रेम करने में कोई गौरव, सम्मान या आध्यात्मिक इनाम नहीं है. जाओ पटाखा, अपने प्रेमी के रौशनी से पवित्र प्रेम की आतिशबाजी को छल कर जिनके फेफड़े में क्षणिक सुख के लिए तुम सल्फर डाइऑक्साइड भर रही हो तुम्हारे वो ग्राहक तुम्हारे सौंदर्य के फॉस्फोरस के राख होते ही तुम्हे सड़क पर अंधेरे में छोड़ देंगे. प्यार से भरे मेरे दिल से निकल कर अपने कामुक ग्राहकों के पर्स में ज्यादा दिन तक रह पाओ अब तुम जैसी जलती पटाखा के लिए धोखा खाए मुझ जैसा बुझता प्रेमी यही कामना कर सकता है. पंछी और जानवरों के साथ साथ तुमने मुझमे भी भ्रम, चिंता, और भय भर दिया है. मुझे तुमसे अब एलर्जी है. एग्जॉस्ट फैन और वैक्यूम पंप चला कर मैं अपने दिल से ही नहीं तुम्हे फेफड़े से भी हमेशा के लिए निकाल रहा हूं. गुडबाय पटाखा.

लल्लन टॉप में प्रकाशित 

मेरे अंदर एक लाल पान की बेगम है

 

लाल पान की बेगम

लाल पान की बेगम

मेरे अंदर एक लाल पान की बेगम है जिसका मैं गुलाम हूँ ! मेरा मुख्य कर्तव्य दिन रात उस स्त्री की सेवा से जुड़ा हुआ है ! मेरे अंदर उसको बराबरी का दर्जा हासिल है ! अंदर की उकता देनेवाली पुनरावृत्ति और स्नायुओं में भर गयी जड़ता से वो मुझे मुक्त कराती है और वही स्त्री मुझे आत्मनिर्भर बनाती है ! मेरे ह्रदय को एक नहीं अनेक स्त्रियों ने ढाला है ! मैं अपनी स्त्री के बारे में लिख सकता हूँ इसीलिए लिख रहा हूँ ! माँ, बहन, प्रेमिका, दोस्त, पत्नी और अब बेटी, रिश्तों की हर तह में स्त्री को जानने की ललक ही रही होगी जिसकी वजह से मुझे इतना स्त्री धन मिला है ! मौसी, बुआ, मामी, चाची, भाभी, बहु और सबकी बेटियाँ ! बहुत बड़े परिवार के साथ रह कर पला बढ़ा जिसकी वजह से मेरा संसार स्त्रियों से भरा है !

नाट्य, कलाकर्म, साहित्य और अब सिनेमा से जुड़ा जीवन ! गुरु, गाइड, दोस्त, सहकर्मी, अजनबी सब किस्म की स्त्रियों से मिलने और सीखने का सौभाग्य मिला ! स्त्रियों के साथ इतने रिश्तों में जीना, मेरा ही नहीं किसी भी भारतीय या विश्व के स्वस्थ समाज में बिताये अपने बचपन और जी रहे किसी भी उम्र के आदमी का सामान्य जीवन है, जिस पर लाखों करोड़ों लोगों की तरह मुझे भी गर्व है ! मैं आज भी स्त्रियों से आकर्षित और प्रभावित होता रहता हूँ और स्त्री ही मेरे भीतर उत्सव और आनंद का बीज बोती है !

जब भी अपने अंदर झांकता हूँ, मुझे लगता है मेरे अंदर भी एक स्त्री है जो पल रही है और मुझे पाल रही है ! मेरे अंदर की लाल पान की बेगम ही मेरी दुर्गा है, देवी है, काली है, सहचरी है, मेरे जीवन की प्राण शक्ति है ! जो मेरे भीतर के आशावादी, विजयी और सुंदर चेतना की सच्चाई है ! इस स्त्री पर अभी तो कुछ सौ शब्द लिख रहा हूँ पर मैं स्त्री पर अपने हर शब्द न्योछावर कर के उसकी आँचल में बांधेने को तैयार हूँ ! दस दिनों का दशहरा या नौ दिनों की नवरात्रि मेरे लिए स्त्रयों में मेरी आस्था से फिर फिर जुड़ने का संकल्प है !

Chaos चतुर्दशी

मुम्बई में आज chaos चतुर्दशी का कैओसशोत्सव कैओसोल्लास से मनाया जा रहा है ! चौबीस घंटे में से इक्कीस घंटे उन्नीस मिनट का समय मुम्बई में chaos चतुर्दशी का है ! chaos चतुर्दशी के कैओसशोत्सव में अठारह मार्ग पचास रास्ते पचास हज़ार पुलिस सब के सब कैलाश के नहीं कैओसोल्लास के वन – वे पर है ! आज मुम्बई वासी धार्मिक श्रद्धा और परंपरागत कैओसोल्लास के बीच गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन कर रहे हैं ! Chaos चतुर्दशी के पर्व पर ही दस दिवसीय कैओसशोत्सव का समापन होगा ! भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को chaos चतुर्दशी कहा जाता है ! डेढ़ दिन के chaos – चतुर्थी वाले दस दिन के chaos – चतुर्दशी वालों पर हँस रहे हैं ! सोसाइटी के पूजा, अर्चना, आरती, गणपति, प्रतिमा, अनंत, शांति, समृद्धि, प्रसाद, प्रभु, भगवान, प्रार्थना, दक्षिणा, सब एक साथ गणपति की पूजा, अर्चना, प्रतिमा, आरती, प्रसाद के साथ कैओस कर रहे हैं ! सबकी प्रार्थना एक थी, ” इक्कीस लड्डुओं का भोग लगाया है गणेश बाबु, नाचने में आज ज्यादा ना नुकुर मत करना नहीं तो Dj को बुरा लगेगा ” ! गणपति ने मुम्बई की लाज रख ली, खूब नाचे और सबको नचाया …

अलविदा‬

भीतर अब कोई नहीं था ! खालीपन की वजह से अपनी आवाज़ ही अपने कानों में गूंज रही थी ! अपने कदमों की आहट सुनते हुए उसने कमरे का एक चक्कर लगाया ! भरी हुई जगह ख़ाली होते ही कितनी अलग लगने लगती है ! यहाँ वहां हर तरफ दीवारों पर बिताए हुए हर पल के निशान अब धब्बे की तरह कुरूप लग रहे थे ! उसने दीवार पर बादल से काले एक दाग़ को सहला कर देखा ! उसकी आँखें भर आईं और बरस गईं ! यहाँ वो माथा टेकता था और यहीं वो सर टिका के बाहर खिड़की की तरफ देख कर मुस्कुराती थी और सहसा मुड़ के पीठ को और आराम दे कर जाने का कोई नकली बहाना बनाती थी ! न जाने कितनी बहस, खुद को छुपाने और बताने का धूप छाँव सा खेल ! पा लेने पर पीठ पर धप्पा ! झूठी सच्ची बातों का ह्रदय पर कितने धौल …
कमरे में आखरी स्माइली छोड़ कर वो कमरे को हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुकी थी ! लम्बी सांस लेता हुआ वो बाहर आया और उसने पीछे मुड़ कर फिर कभी नहीं देखा ! धूप के टुकड़े, सूखे फूल की पंखुड़ियाँ, खनकती हंसी और ठहाके हवा के साथ सूने कमरे में गोल गोल घूम रहे थे ! पीछे छूट गयी पढ़ी हुई किसी किताब के पन्नों की फड़फड़ाहट गिलहरी को बुला रही थी पर दोनों के जाने के बाद खुला और खाली इनबॉक्स का दरवाज़ा हवा में खुलता और बंद होता हुआ यादों की गिलहरी को अंदर आने से ठिठका रहा था …

आत्म हास्य

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आत्मन्

अपनी आत्मा में झाँकने के लिए कहीं ताकने की जरुरत नहीं है

१.

” एक शरीर से निकल कर दुसरे शरीर में जाना था … ” ऊँची आवाज़ में आत्मा को यमराज डाँट रहे थे ! ” तुम तो एक चेहरे से निकल कर दुसरे चेहरे में चले जाते हो ! आत्मन , ये मृत्यु लोक है फेसबुक प्रोफाइल नहीं ! जाइए कुछ दिन के लिए आपकी प्रोफाइल ब्लॉक कर देता हूँ …” आत्मा मौन था / उसने कई प्रोफाइल में जा कर ह्रदय के कई इनबॉक्स देखे थे ! सबका सीक्रेट एक था ! शरीर से आत्मा कब निकलेगी किसी को पता नहीं था ! फिर लोग एक दुसरे से क्या छुपाते हैं ? वो शरीर में क्यों हैं , इस बात की किसी को फ़िक्र नहीं थी ! हर बात के लिए लोग अपना चेहरा बदल रहे थे, और आत्मा हर चेहरे को पढ़ चूका था ! विश्वास और प्रेम की तलाश में यमराज के हाथों आत्मा कई बार ब्लॉक्ड हो चूका था …

२.

यमराज शरीर के हिसाब किताब की गिनती में व्यस्त थे ! ” यमराज जी, इस शरीर का दिमाग़ खराब है ! इसमें कितने दिन रहना है ? ” भीड़ में एक परेशान आत्मा यमराज से पूछ रही थी ! ” आत्मन् ज्यादा बक बक मत करो ! हम सब जानते हैं ! बातों में आ कर हम तुमको जातक का एक्सपायरी डेट नहीं बता देंगे ! स्थिर रहो ! जियो और जीने दो ! और तुम्हारे जैसी आत्मा ही शरीर का दिमाग खराब कर देती है ! चंचल कही के … ” यमराज सेल्फी लेने में व्यस्त हो गए !

३.

यमराज पसीने से लथ पथ हो गए थे ! उन्होंने शरीर का अंग अंग छान लिया था पर उन्हें आत्मा नहीं मिल रही थी ! आत्मा गयी कहाँ ? वो सोच रहे थे ! यमराज को कई और जगहों पर जा कर कई शरीर से और आत्माएँ लेनी थी, देर हो रही थी ! सामने पड़े शरीर की आँखों में उन्होंने फिर से देखा ! ज्योति थी, पर दृष्टि नहीं ! आत्मा की चेतना शक्ति जो पूरे शरीर के बाहर और भीतर की इन्द्रियों में फैली हुई रहती है, शरीर में कहीं नहीं थी ! नाक में गंध नहीं थी ! मुंह में शब्द भरे थे पर वाणी से मिठास गायब थी ! मन मर चुका था ! त्वचा अहम् के परतों से मोटी हो चुकी थी ! ह्रदय भी खाली था ! यमराज ने शरीर के कर्मों का फिर से हिसाब किताब किया सारी गणना ठीक थी ! प्राण निकलने का यही योग था ! आत्मा को शरीर में ही होना चाहिए था ! पर आत्मा गयी कहाँ ? शरीर के सारे अंगो के बाद यमराज ने शरीर पर पहने हुए कपड़ों की तलाशी ली ! जेब में इज़्ज़त मिली ! बटुए में प्यार था ! सारी यादें मोबाइल में क़ैद थी ! बार बार गिनती किये जाने की वजह से पाप पुण्य कैलकुलेटर का बटन बन कर घिस चूका था ! आत्मा कहीं नहीं थी ! यमराज ने घड़ी देखी ! चार शून्य तेज़ी से धड़क रहा था ! अगले एक क्षण में आत्मा का मिलना ज़रूरी था ! यमराज की नज़र शरीर के जूते पर पड़ी ! कूद कर उन्होंने उसे उतार फेंका और आत्मा सिक्के की तरह खनक उठी ! यमराज ने जूतों को उठा कर उसमे झाँका ! आधी आधी आत्मा दोनों जूते की तल में दबी थी ! यमराज ने आत्मा को जूते की तल्ले से बारी बारी से खींच के निकाला और काम हो जाने वाली राहत की साँस ली ! चलते चलते उन्होंने जातक के शरीर की ओर देखा ! मनुष्य उन्हें हमेंशा आश्चर्यचकित करता है ! पर ये धनपशु सबसे चतुर था ! आज यमराज ने किसी शरीर से उसकी आत्मा को पहने गए जूते की तल्ले से पहली बार निकाला था ! विजयी मुस्कान के साथ पसीने से लथ पथ अपने चेहरे की एक सेल्फ़ी तो बनती है ! क्लिक ! घर के लोग विलाप करने लगे थे और देर हो रही थी ! उनका यहाँ से निकल जाना जरुरी था ! पर यमराज के मन ने कहा one more और आवाज़ आई click …

४.

हम सब भटकती हुई अात्माएँ हैं और हम जन्म-मरण के फेर से मुक्त होकर चौरासी लाख जोनियों के चक्कर से बाहर हो गए हैं ! चोला, चोगा और इंद्रियों के जंजाल से मुक्त ! हम एक दूसरे से मुक्त अात्माएँ हैं ! हनन शोषण और श्रम से मुक्त ! हम सब यमराज के मोस्ट वांटेड आत्माओं की लिस्ट में हैं ! हम सबने शरीर में अाने जाने का बोरिंग रास्ता त्याग कर स्वतंत्र रहने की अपनी राह चुनी है ! हमें कहीं पहुँचने की ज़ल्दी नही है ! मैं कौन हूँ हमारा सवाल नही है ! शक्ति, चेतना और क्षमता इन सबसे हमारा कोई लेना देना नही है ! हम लाभ हानि व्यापार शुभ अशुभ कुछ भी नहीं जानते ! स्थूल, सूक्ष्म कुछ भी नही ! जैसा होता है वैसा हम होने नही देते ! अपने ढर्रे की घिसी – पिटी राह पर चलती हुई शरीर के अंदर – बाहर, आती – जाती आत्माओं के साथ यमराज इतने व्यस्त हैं कि हम भटकती हुई आत्माओं को उन्होंने हमारे हाल पर ही छोड़ दिया है ! हम जानते हैं आत्मा को शस्त्र से काटा नहीं जा सकता, अग्नि उसे जला नहीं सकती, जल उसे गला नहीं सकता और वायु उसे सुखा नहीं सकती ! जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नवीन शरीर धारण करती है ! और हम ये भी जान गए हैं कि कोई रास्ता निश्चित नहीं है, आत्माएँ यात्रा पर तो हैं पर अात्माओं को कहीं पहुंचना नहीं है ! इसीलिए हमने भटकने की राह चुनी है और भटकती हुई आत्मा कहलाए हैं ! भटकती हुई आत्माओं को किसी से कोई उम्मीद नही होती ! भटकती हुई आत्माओं के अपने नियम हैं ! हम आत्मा के अंदर नहीं झाँकते ! हमें पता है वहां कुछ भी नहीं है ! आत्मा के अंदर झाँकना मनुष्यों के बीच सबसे प्रचलित मुहावरा है ! भला हो उसका जिसने ये मुहावरा गढ़ा ! इसकी वजह से शरीर पाप और पुण्य जैसी काल्पनिक ख्यालों में उलझ के अपनी जीवन यात्रा पूरी कर पाता है ! यमलोक में पाप पुण्य के नाम पर कई चुटकुलें हैं ! यमराज किसी भी मूड में हों पाप पुण्य शब्द सुन के मुस्कुराना नहीं भूलते ! यमलोक में सही गलत का भी यही हाल है ! यमराज ने अपने भैंस की दोनों सींग का नाम ‘सही’ और ‘गलत’ रखा है और यमराज के लिए सारे सही ग़लत सिर्फ भैंस के सींग हैं और कुछ नही ! हमें भटकते हुए देख कर यमराज हँसते हैं और हँसते हुए यमराज को हम भटकती हुई अात्माओं के साथ सेल्फ़ी लेने से कौन रोक सकता है ?

५.

हेडफोन के माध्यम से सबको खबर पहुँचा दी गयी ! जिनके पास हेड फ़ोन नहीं था उनको स्पीकर पर बता दिया गया ! जिनके कान पर जूँ तक नहीं रेंगा उन्हें स्क्रीन पर दिखा कर समझाया गया ! आँख के अंधों को झकझोर के बताया गया ! यमराज जानते हैं पहले सिर्फ आकाशवाणी से काम चल जाता था पर अब जितने कान उतने काम ! एक – एक जातक को कंटेंट के डिटेल्स दे दिए गए ! यमराज ने अपने हर सन्देश में बिलकुल साफ़ कर दिया है, राजनीति, धर्म या मानवीयता और प्रेम सब केवल ऑप्शन हैं ! मृत्यु जारी है और रहेगी ! आप चाहे जिस रास्ते चलें, जो चाहें पहने, खाएं, विचार करें, लड़ें, मानें या न मानें, उलझे रहें, या मुक्त हों लेकिन मृत्यु के वरण का कोई ऑप्शन नहीं है ! इसके लिए राजा और रंक, गोरे या काले, स्त्री या पुरुष, कोई भी जात – धर्म, किसी के पास कोई चॉइस नहीं दिया गया है ! इस सच में चित भी यमराज का और पट भी ! बस अपनी सेल्फी लेते रहें, क्लिक … क्लिक … क्लिक ! क्या पता किस पर हार चढ़े !

६.

साठ रोटी की एक मछली होती है और साठ मछली का एक घड़ियाल होता है ! चौबीस घड़ियाल का एक बन्दर होता है ! तीस बंदर का एक पेड़ ! बारह पेड़ का एक तालाब ! कई तालाब की एक उम्र होती है ! जितने तालाब उतनी उम्र ! अंत में सब पानी में मिल जाता है ! पृथ्वी पर सत्तर प्रतिशत पानी है और हम भी उतने ही पानी सेे बने हैं ! ये मेरा नया कलेंडर है ! सबको नया तालाब मुबारक हो ! यमराज हँसते – हँसते तालाब में नहाते हुए अपनी सेल्फी ले रहे थे !

क्रमशः

आत्म छवि कार्टूनिस्ट : अशोक अडेपाल

दुखान्त‬

” कागा सब तन खाइयों मेरा चुन चुन खाइयो मांस,
दो नैना मत खाइयो मोहे पिया मिलन की आस “

ना जाने फिर उन दो आँखों का क्या हुआ ? उन आँखों ने अपने जिस्म दे कर भी मिलन की लालसा में अपनी पलकें बिछाए रखीं थीं !  सुना है नरभक्षी कौव्वे उन दो प्रेमी आँखों से सदियों तक बातें करते रहे और प्रेमी के इंतज़ार में उनका साथ दिया ! फिर एक दिन किसी कपटी कौव्वे ने बारी बारी से उन्हें छल लिया ! प्रेम से निकल के जाने वाले प्रेम में कब लौटे पाए हैं ?

 

emoticon

दस हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर उड़ते हुए हवाई जहाज़ में बैठा वो रो रहा था ! खिड़की से बाहर देखते हुए बुदबुदा रहा था ! ” तैरते हुए बादलों में मैं तुम्हें मुक्त कर रहा हूँ ” बगल की सीट पर बैठा मैं बस इतना ही सुन पाया ! वो और भी बहुत कुछ बड़बड़ा रहा था और लगातार रो रहा था ! बहुत देर बाद वो शांत हुआ ! मैंने अपने बैग से निकाल कर उसे एक ऑरेंज दिया ! ऑरेंज के छीले और खाये जाने तक हम चुप रहे ! आकाश बैंगनी हो गया था ! रन वे पर हवाई जहाज़ के लैंड करने तक मुझे उसकी प्रेम कहानी समझ में आ गयी थी ! कहानी बहुत सिंपल थी ! वो भावुक था ! रिश्ता वर्चुअल था ! लड़की प्रैक्टिकल थी ! वर्चुअल प्रेम से ऊब कर किसी और मर्द के साथ शरीर के असली सुख के लिए चली गयी थी ! लड़के को प्रेम में धोखा मिला था और उसका दिल चूर चूर हो गया था ! लड़का अपनी भावनाओं में जी रहा था और लड़की सच में जी रही थी ! उसने डबडबाई आँखों से मुझे एक बार देखा और नज़रें झुका लीं ! ” मैंने उसे माफ़ कर दिया है ” कन्वेयर बेल्ट के पास से चलते हुए उसने मुझसे बस इतना कहा ! मेरा दिल भर आया ! उसकी आँखों में गज़ब की शिद्दत थी ! अपने अपने सच के साथ प्यार में सब सुंदर होते हैं ! वो जिसके प्रेम में क़ैद था, वो उसके गिरफ्त से बाहर चली गयी थी ! वो प्रेम की पीड़ा में मुक्ति की छटपटाहट के लिए तड़प रहा था ! सबके अपने रीजन होते हैं, उनके अपने रीज़न होंगे ! उसकी वेदना निजी थी ! काश वो जल्द से जल्द इस दुःख से निकल पाये ! वो जिस भीड़ में खो गया मुझे अपनी दुनियाँ उसी भीड़ से ढूंढ के निकालनी थी ! मुझे घर ले जाने के लिए मेरी पत्नी बाहर इंतज़ार कर रही थी ! एक पल के लिए मैं भी प्रेम के रहस्यमय संसार में खो गया था ! इस यात्रा के लिए मैं उस अंजान प्रेमी का आभारी था और उस अनदेखी अनजानी प्रेमिका का भी ! हम फिर कभी नहीं मिले … 

भीड़ वाली सेल्फ़ी

दोस्तों की उछलकूद है भीड़ वाली सेल्फ़ी / अपने ही आसपास दोस्तों के साथ कहीं भी बन जाती है भीड़ वाली सेल्फ़ी / भीड़ वाली सेल्फ़ी खींचने के लिए कोई दोस्त फ्रेम से बाहर नहीं जाता / दोस्त दोस्त के बीच में ही खिंच जाती है भीड़ वाली सेल्फ़ी / दोस्तों के बीच बहुत पॉपुलर है भीड़ वाली सेल्फ़ी / शार्ट नोटिस पर कोई अचानक ले लेता है भीड़ वाली सेल्फ़ी / जब तक आप कपडे, बाल, मुस्कुराहट ठीक करते हैं, क्लिक हो जाती है किसी दोस्त की मोबाइल में भीड़ वाली सेल्फ़ी / देर रात किसी के वॉल पर अचानक उग आती है भीड़ वाली सेल्फ़ी / जिसका हाथ लम्बा होता है वही लेते हैं भीड़ वाली सेल्फ़ी / आवाज़ देना न भूलें, जब भी कोई ले रहा हो भीड़ वाली सेल्फ़ी / कोई रह न जाये फ्रेम से बाहर जब आप ले रहे हों भीड़ वाली सेल्फ़ी … /
अकेलेपन का हाहाकार है, अकेले ली गयी कहीं भीड़ से बाहर स्वयं की सेल्फ़ी …

साइलेंट मोड में …

चेहरे पर कोई सेवन बना दे या ऐट बना के मेरा मन अनलॉक कर दे या जेड बना दे उँगलियों से और खोल दे मेरे सारे विंडो या एक बार मेरे चेहरे की स्क्रीन पर हाथ फेर के लॉक अनलॉक कर दे मुझे और यूँ ही पड़ा रहने दे साइलेंट मोड में …

प्रार्थना

उसके रिज्यूमे को पढ़ा जाए ! नौकरी की चिंता में जाग जाग के उसे अपनी रात न खराब करनी पड़े ! फ़िज़ूल की नेटवर्किंग से ईश्वर उसे बचा ले ! काम देने के बहाने उसके हर पोस्ट और प्रोफाइल को लाइक करने वालों से उसे झूठी मुस्कराहट के साथ चैट न करना पड़े ! नौकरी की तलाश में हर लड़की को तत्काल नौकरी मिले, ईश्वर से आज मेरी सुबह की यही प्रार्थना है !