मुंशी प्रेमचंद की कहानी – ईदगाह

ग़रम भट्टी की अाँच मेंं पसीने से तर बतर हाँफते लोहार को क्या मालूम कि मेले की तैयारी के लिए वो अाज जिस लोहे को चिमटा बनाने के लिए इतनी देर से पीट रहा है, वो वही अमर चिमटा है जिसे ईद के दिन उसे घाटे मे चार-पाँच साल के एक गरीब सूरत लड़के हामिद को बेचना पड़ेगा और जिसे ख़रीद कर हामिद अपनी दादी की वही डाँट सुनेगा, जिसे सुन कर सबकी छाती फट जाएगी और लोग सदियों तक अमीना के साथ रोते रहेंगे ‘सारे मेले में तुझे और कोई चीज न मिली,जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया ?’

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रमजान का महिना चल रहा है ! बरकत और रहमतों का महीना बच्चों की जेबों में कुबेर का धन भर रहा है ! खेल खेल में बच्चों के दो दल हो गए हैं ! मोहसिन, महमद, सम्मी और नूरे अपनी अपनी जेब के खजाने के साथ एक तरफ हैं और चार-पॉँच साल का गरीब सूरत, दुबला-पतला खाली हाथ हामिद अकेला दूसरी तरफ ! आज बच्चों को क्या पता कि आने वाले ईद के दिन हामिद के पास न्याय का बल और नीति की शक्ति होगी ! एक तरफ मिटटी होगी दूसरी तरफ लोहा …

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आज कहीं मेले में हामिद चिमटा खरीद रहा होगा …! सभी दोस्तों के साथ ‘ईदगाह’ के हामिद और अमीना को भी ईद मुबारक हो !

धनपत राय श्रीवास्तव/

उपनाम

नवाब राय , उपन्यास सम्राटमुंशी प्रेमचंद

( ३१ जुलाई, १८८० – ८ अक्तूबर १९३६ )

‘ईदगाह’

रमज़ान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आई है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है।
वृक्षों पर कुछ अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है।
आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, मानो संसार को ईद की बधाई दे रहा है।
गांव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं।
किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर से सुई-तागा लाने को दौड़ा जा रहा है।
किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर भागा जाता है।
जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगी।
तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना,भेंट करना। दोपहर के पहले लौटना असंभव है। लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोज़ा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज़ है। रोजे बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है।
रोज ईद का नाम रटते थे। आज वह आ गई। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इन्हें गृहस्थी की चिंताओं से क्या प्रयोजन। सेवैयों के लिए दूध और शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवैयाँ खाएँगे।
वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं!  उन्हें क्या खबर कि चौधरी आज आँखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए। उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर का धन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना ख़जाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं।

महमूद गिनता है, एक-दो, दस-बारह। उसके पास बारह पैसे हैं। मोहसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीजें लाएँगे-खिलौने, मिठाइयाँ, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या!

और सबसे ज़्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पाँच साल का ग़रीब-सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता न चला, क्या बीमारी है। कहती भी तो कौन सुनने वाला था। दिल पर जो बीतती थी, वह दिल ही में सहती और जब न सहा गया तो संसार से विदा हो गई।

अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रुपये कमाने गए हैं। बहुत-सी थैलियाँ लेकर आएँगे। अम्मीजान अल्लाहमियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई है, इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीज है और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती हैं।

हामिद के पाँव में जूते नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी-धुरानी टोपी, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थैलियाँ और अम्मीजान नियामतें लेकर आएँगी तो वह दिल के अरमान निकाल लेगा। तब देखेगा महमूद, मोहसिन, नूरे और सम्मी कहाँ से उतने पैसे निकालेंगे।

अभागिनी अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन और उसके घर में दाना नहीं। आज आबिद होता तो क्या इसी तरह ईद आती और चली जाती? इस अंधकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस निगौड़ी ईद को? इस घर में उसका काम नहीं, लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने से क्या मतलब? उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आए, हामिद की आनंद-भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी।

हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है-तुम डरना नहीं अम्मा, मैं सबसे पहले जाऊँगा। बिलकुल न डरना।

गांव से मेला चला। और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथ वालों का इंतजार करते। ये लोग क्यों इतना धीरे चल रहे हैं? हामिद के पैरों में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है? शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ों में आम और लीचियाँ लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ उठाकर आम पर निशाना लगाता है। माली अंदर से गाली देता हुआ निकलता है। लड़के वहाँ से एक फर्लांग पर हैं। खूब हँस रहे हैं। माली को कैसे उल्लू बनाया है!

अब बस्ती घनी होने लगी थी। ईदगाह जाने वालों की टोलियाँ नजर आने लगीं। एक से एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए, कोई इक्के-ताँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग।
ग्रामीणों का वह छोटा-सा दल, अपनी विपन्नता से बेखबर, संतोष और धैर्य में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीज़ें अनोखी थीं। जिस चीज़ की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते। और पीछे से बार-बार हार्न की आवाज होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा।

सहसा ईदगाह नजर आया। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है। नीचे पक्का फर्श है, जिस पर जाजिम बिछा हुआ है और रोजेदारों की पंक्तियाँ एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गई हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहाँ जाजिम भी नहीं है। नए आने वाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं हैं। यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया और पिछली पंक्ति में खड़े हो गए।

कितना सुंदर संचालन है, कितनी सुंदर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सब-के-सब एक साथ खड़े हो जाते हैं। एक साथ झुकते हैं और एक साथ घुटनों के बल बैठ जाते हैं। कई बार यही क्रिया होती है, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाएँ और यही क्रम चलता रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाएँ, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं। मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए हैं।

नमाज खत्म हो गई है, लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाई और खिलौने की दुकान पर धावा होता है। ग्रामीणों का वह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, हिंडोला है। एक पैसा देकर जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होंगे, कभी जमीन पर गिरते हुए। चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट, छड़ों से लटके हुए हैं। एक पैसा देकर बैठ जाओ और पच्चीस चक्करों का मजा लो। महमूद और मोहसिन, नूरे और सम्मी इन घोड़ों और ऊँटों पर बैठते हैं। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हैं। अपने कोष का एक तिहाई, जरा-सा चक्कर खाने के लिए, वह नदीं दे सकता।

खिलौनों के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियाँ ली हैं, किसी ने गुलाब जामुन, किसी ने सोहन हलवा। मज़े से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक है। अभागे के पास तीन पैसे है। क्या नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई आँखों से सबकी और देखता है।

मिठाइयों के बाद कुछ दुकानें लोहे की चीज़ों की हैं, कुछ गिलट और कुछ नकली गहनों की। लड़कों के लिए यहाँ कोई आकर्षण न था। वह सब आगे बढ़ जाते हैं।

हामिद लोहे की दुकान पर रुक जाता है। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख़याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियाँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितनी प्रसन्न होंगी!  फिर उनकी उँगलियाँ कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज हो जाएगी। खिलौने से क्या फ़ायदा। व्यर्थ में पैसे ख़राब होते हैं। उसने दुकानदार से पूछा, यह चिमटा कितने का है?

दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा, ‘यह तुम्हारे काम का नहीं है जी’
‘बिकाऊ है कि नहीं?’
‘बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहाँ क्यों लाद लाए हैं?’
‘तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?’
‘छः पैसे लगेंगे?’
हामिद का दिल बैठ गया। ‘ठीक-ठीक बताओ।’
‘ठीक-ठाक पाँच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं तो चलते बनो’
हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा-तीन पैसे लोगे?
यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियाँ न सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियाँ नहीं दीं। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानो बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया।

ग्यारह बजे सारे गाँव में हलचल मच गई। मेले वाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन ने दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जो उछली, तो मियाँ भिश्ती नीचे आ गए और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई। दोनों खूब रोए। उनकी अम्मां शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो-दो चांटे और लगाए।

अब मियाँ हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज़ सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहजा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी।
‘यह चिमटा कहाँ था?’
‘मैंने मोल लिया है।’
‘कै पैसे में?’
‘तीन पैसे दिए।’
अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया, न पिया। लाया क्या, चिमटा। सारे मेले में तुझे और कोई चीज़ न मिली जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?

हामिद ने अपराधी-भाव से कहा-तुम्हारी ऊँगलियाँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैंने इसे लिया।

बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग, कितना सदभाव और कितना विवेक है!  दूसरों को खिलौना लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा!  इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहाँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गदगद हो गया।

और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बूढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गईं। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता।

प्रेमचंद / Premchand

'प्रेमचंद' - एक तैलचित्र

‘प्रेमचंद’ – एक तैलचित्र

‘राम Particles’ – कण कण में कोई है

श्री राम की भक्ति में ये पंक्तियाँ उनकी ही कृपा से सहर्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ !
ये अंश समय समय पर अपने फेसबुक वाल पर भी शेयर करता रहा हूँ !
अलग अलग रूप में ये अंश मन में राम – चिंतन के किसी न किसी क्रम से जुड़ कर आए हैं ! और जीवन की आपा – धापी में लगातार ‘राम क्षण’ आ रहे हैं इसीलिए मैं इनको राम – कृपा मानता हूँ ! श्री राम में मन लगा रहे और  मैं लिखता रहूँ , यही सपना है …

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मेरा मन जैसे श्री रामचंद्र जी का वन …

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पानी में अपनी परछाई देख कर श्रवन ठिठक गया ! लगा पानी पर कुछ लिखा है ! शांत नीले पानी में घड़ा डालने से पहले अपनी परछाई के चेहरे को पढने लगा ! तभी एक पत्ता डार से बिछुड़ के पानी पर गिरा और  तरंग बनने लगा गोल…गोल…गोल…! वो ये सब देख रहा था ! सहसा लगा जैसे कोई तेज नुकीली चीज छाती चीर कर कलेजे के आर पार हो गयी… ! श्रवन कुमार का घड़ा पानी में डूबने लगा डूब…गुडूब डूब…गुडूब…

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घुप्प अँधेरे में वो उतरता चला गया …पानी से भरी ये कैसी गुफा है ? उसने सोचा ! उसका शरीर तालाब में औंधे मुँह गिर पड़ा था ! …छपाक !!  ये आवाज़ जब माता पिता ने सुना तो मन में आशंका के ढेर लग गए ! दशरथ को ये तो पता चल गया था की उनका निशाना चूक गया है पर अभी ये पता चलना बाकी था की वो खुद दुर्भाग्य का शिकार हो गए हैं ! वो वहीँ खड़े – खड़े पत्थर के पेड़ बन गए … और अंधे माता पिता तालाब की तरफ बिलखते हुए रेंगने लगे…

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आवाज़ की प्रतिक्रिया चारो और हुई ! मेघ गर्ज़ना सी आवाज़ किसी चीज़ के टूटने की आवाज़ कैसे हो सकती है ? फिर भी सब दौड़ पड़े ! रसोइया अभिषेक के लिए दही ले के भागा … पण्डितजी दूब नोच भाग चले … माली ताज़ा फूल ले के भागा … घोड़े हिनहिनाने लगे … सब वर को देखना चाह रहे थे ! सबका दिल कह रहा था ये धनुष के टूटने की ही आवाज़ थी ! सीता जब स्वयंवर का हार ले के श्री रामचंद्र जी की और बढ़ी तो मिथिलावासी रो रहे थे

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सीता के वियोग में सबसे पहले टूटा धनुष रोया था

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वो विदाई का क्षण था ! सबकी आँखों पर पानी का पर्दा गिर चूका था और सबकुछ झिलमिला रहा था ! उनके महल के चौखट को लांघते ही दशरथ मूर्छित हो कर गिर पड़े… वन के लिए निकला पहला कदम सबको भारी लग रहा था ! उनके नंगे पाँव अभी महल में ही थे पर कल्पनाओं में वन के कांटे सबको चुभने लगे …

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रात भर कोई सो न सका ! सुबह सुबह श्री राम वन के लिए निकल पड़े ! लगा अयोध्या नगर को ही वनवास मिला है ! सब साथ थे ! सब चल रहे थे ! सब रो रहे थे ! भीड़ में वो धोबी भी था…हाँ, वही ! बेसुध रो रहा था…

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वन जाते हुए श्री राम ने कहा  “अब आप लोगों का नाथ भरत है “

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मन और वन एक थे, हर तरफ उलझन और हर तरफ रास्ता …तीनो मौन थे !

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वन में जिस रास्ते पर हंस बैठे मोती चुन रहे थे उसी रास्ते पर कौवे मरे चूहे के लिए लड़ रहे थे …! सबका रास्ता एक था ! वे तीनो भी उसी रास्ते पर चल रहे थे …

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अनदेखे अनजाने रास्तों पर ही शबरी मिलती है, प्रेम विश्वास और भक्ति के जूठे बेर मिलते हैं …

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मीठे फलों के बीच दुसरे स्वाद नहीं होते तो शबरी क्या चखती …

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चारो बत्तख सबसे धीरे चल रहे थे इसीलिए सबके पीछे थे ! उनकी मुसीबत ख़त्म ही नहीं होती थी ! कभी जंगली कुत्ते तो कभी लम्बे घास और कभी तेज़ धार वाली जंगली नदी ! फिर भी चारों बत्तख लगातार चल पा रहे थे ! वो पैदल चलने वालों में सबसे पीछे थे ! कई गाँव के सैकड़ों नागरिक उनके आगे थे ! सबसे आगे वो तीनो थे जिनको वनवास मिला था ! वही सबसे आगे थे जिनके पीछे सब चल रहे थे और वही चारो बत्तख के साथ सबसे पीछे भी ! देखने वालों ने उन्हें सबके साथ चलते हुए एक साथ देखा था !
बूढ़े, बच्चे, जवान, स्त्री – पुरुष, पशु, पक्षी सब भीड़ में और सब अकेले … श्री राम सबके साथ एक साथ थे … !

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सीता – राम का भ्रमण ही जीवन था ! लक्ष्मण चाहते थे दोनों बस कुटिया में ही रहें और जंगल का कष्ट न सहें ! पानी के साथ चरण पर लक्षमण के आंसू जब भी गिरते राम को ठंढे पानी के ढेर में भी उन दो बूंदों की गर्माहट महसूस होती ! … वनवास का असली चेहरा वो चार पाँव ही थे जिन्हें लक्ष्मण रोज़ धोते थे…

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खड़ाऊँ देने के बाद राम ने कभी अपने पाँव की तरफ नहीं देखा ! लक्ष्मण जब उन्हें पखारते तो लगता राम यहाँ वन में है और पाँव ले कर भरत अयोध्या चले गए …

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उर्मिला और भरत एक दूसरे का दुःख कभी आँख मिला के देख नहीं सके …

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लगता कोई चल रहा है ! भरत की नींद टूट जाती ! दौड़ के देखता …सिंघासन पर खडाऊँ जस का तस रखा है ! फिर ये खडाऊँ के पदचाप की आवाज़ कैसी थी…खट… खट… खट…

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वन में मन का तन से ठन जाता है ! क्षण भर मन का तन पर वन में वश नहीं रहता ! पल में जल में पल में नभ में …मन वन में रम नहीं पाता ! जब सब सोते हैं तब तीनो रोते हैं …

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आसमान तारों से भरा था ! इतने तारों को देख के उसे लगा वो अकेली कहाँ ? उर्मिला जाग रही थी ! महल अब छोटा सा वन था …

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तीनो एक दूसरे के बहुत पास आ कर बैठ गए ! रात की स्तब्धता में सिर्फ उनकी सासें चल रही थी ! बाघों की गर्जना से जंगल भरा था ! जंगल का ये खाली मैदान ही तीनो के लिए सबसे सुरक्षित था ! हमला करने वाला कोई भी जानवर चांदनी में साफ़ दिख सकता था ! किसी भी खतरे का सामना करने के लिए दोनों भाइयों ने अपने धनुष पर वाण चढ़ा रखा था ! रात की नीरवता में पता नहीं किसकी उपस्थिति से जंगल में सब जानवर बेकल थे ! वन राममय हो चला था ! चाँद उतर के सीता के भाले की नोक पर चमकने लगा ! भाले पर चाँद की परछाई देख कर सीता मुस्कुरा दी ! राम को वो हर रूप में पहचानती हैं …

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रथ – गाड़ी का पहिया ठीक करा के कोई चढ़ रहा था तो किसी का भाला नदी के कादो में गंथा हुआ था, हरे घास की गठरी की रस्सी में बकरी की टांग फंस गयी थी और बकरी मेमिया रही थी, कोई उसे देख नहीं रहा था ! सब तरफ अफरा तफरी मची थी और नाँव काफी हिल रही थी ! नाँव नहीं खुलने की वज़ह से बच्चे रो रहे थे ! भीड़ बढ़ रही थी ! कीर्तनियों का भी एक दल था जिसके झाल मंजीरे खनखना रहे थे !  मुँह में खेवैया से बचे शुल्क का मुद्रा दबाये और हाथ में कचरी का दौना पकडे वो तेजी से नाँव के सबसे पीछे और मस्तूल के बगल में सबसे ऊँची जगह पर जा बैठा था ! नाव पर सब लोग उचक के खड़े हो गये थे और कुछ देखने लगे थे ! उसने भी खड़े होकर देखा ! केवट श्री राम चन्द्र जी का पाँव पखार रहा है … रो रहा है और कुछ कहे भी जा रहा है ! पीछे से हर्ष ध्वनि में कुछ सुनायी नहीं दिया ! श्री राम को अपने बीच देख के सब अवाक थे ! यातायात की आम सवारी में सब राम राज्य के नागरिक थे ! मस्तूल के ऊपर सूर्यवंशी पताका लहरा रहा था फड…फड… ! फड…फड…!

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पाँव पखार के सबसे पहले उसने चरणामृत की थाल को उठा के सर से लगाया ! फिर अंजुरी भर चरणामृत अपने ललाट पर मला ! चरणामृत का जल ललाट को भिगोते हुए आँखों को धो गया ! आँखों से बह रही अश्रुधार चरणामृत से मिल कर गाल पर लुढ़कती चली गई ! टप्प् – टप्प् अश्रु बूंदें गर्दन पर चूने लगीं ! बदन सिहर गया ! सहसा जैसे किसी ने गुदगुदा दिया हो ! सुख के चरम पर केवट एक साथ हंस और रो रहा था ! ये सब एक क्षण में हो गया ! नाँव के पास खड़े राम, चरणो पर बैठे केवट को मौन देख रहे थे …

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गंभीर तर्क दे डाला था केवट ने … सन्नाटा था ! गीले पाँव वाले मन से बहुत दूर तक चप्पू की छप – छप सुनते रहे श्री राम ! मस्तूल की ची.. चों…

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केवट अँधा हो गया है इस बात से नाँव में हलचल बढ़ गयी ! ‘ अभी तो प्रभु के पाँव पखार रहा था फिर अँधा कब हो गया ?’ सब केवट की तरफ देखने लगे ! केवट की बंद आँखों से अश्रु की धार बह रही थी ! आँखों में प्रभु झीलमिल झीलमिल कर रहे थे ! केवट का रोम – रोम थर – थर काँप रहा था ! श्री राम सबके ह्रदय में हिलोर लेने लगे ! नाँव नदी में झूम रही थी ! लोग गा रहे थे ! केवट प्रेम में अँधा हो गया था ! अश्रु धार में नाँव बह रही थी ! प्रभु सबको पार लिए जा रहे थे …

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‘अरे ये तो श्री राम हैं’ बगल वाली नाव के नाविक ने हुलस के कहा ! यात्रियों में हलचल मच गयी ! क्या बूढ़े क्या बच्चे औरत मर्द सब एक साथ खड़े हो गए ! सबके एक साथ हिलने डुलने से नाव का ताल पानी से टूटने लगा ! नाव डगमगाने लगी ! केवट ने सबको शांत और स्थिर किया ! नाव पर बैठे बैठे ही सभी ने प्रभु को प्रणाम किया ! सीता लजाई हुई थी और हल्की घूंघट में नज़रें नीची कर के बैठी थीं ! उनको नाव तल पर फूल अक्षत पानी के छीटें ही दिख रहे थे ! सीता राम और लक्ष्मण को साथ देख कर पुष्प वर्षा का मौका कौन चूकता ? जिसके हाथ कुछ नहीं था वो नदी का निर्मल जल ही छिड़क रहे थे ! लक्ष्मण मुस्कुरा रहे थे और अविरल मौन ख़ुशी से रो रहे थे ! ‘ …कभी – कभी प्रभु आपके नाव में नहीं होते,वो बगल वाली नाव में होते हैं ‘ …किर्तनिया यही गा रहा था, दोनों केवट का चप्पू ताल से ताल मिला रहे थे ! छोटी – बड़ी सभी नाव साथ – साथ उन्मुक्त लहरों पर मंद मंद हवा के साथ हिलोर लेने लगे ! आँखें मूंदे सब आनंद में डूब रहे थे और किनारा दिखने लगा था…

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नाव मझधार में था ! केवट शांत था ! उसे पता था वो तो बस चप्पू चलाने का अभिनय कर रहा है असली खेवैया तो बैठे मुस्कुरा रहे हैं ! उधर लक्ष्मण ने सुना राम सीता से कह रहे थे केवट इतना कर्मठ हो तो भव सागर भी पार करा सकता है ये तो बस नदी है…

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हम जैसे कईयों की नाव छूटी थी … घाट छोड़ते हुए रामचंद्र जी ने खुद देखा था …

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पाँव पखार के पीने के बाद भी केवट की छाती को चीरती रही रामचन्द्र की नाव …

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कभी कभी फल इतने मीठे होते हैं… लगता है किसी ने चख के हमें दिया हो !

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उर्मिला की आँखें भरी हैं जैसे आसमान के सितारे पानी में डूब गए हो ! उर्मिला की रात तो कट जाएगी पर साथ में आज फिर थोड़ा सा ह्रदय भी कट जायेगा …

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रात्रि की स्तब्धता में लक्ष्मण ने देखा पूरे आकाश में उर्मिला झिलमिला रही थी  …

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दिल का दर्द उसकी नाक से लहू बन के बह रहा था …वो रो रही थी …किसी ने नाक नहीं उसका दिल काटा था…! उसकी एक जिद्द थी जो वनवासी समझ नहीं सके थे ! सूखे पत्तों पर गर्म लाल खून नहीं किसी का दर्प चू रहा था …टप्प… टप्प… टप्प …! हा, वो दर्पनखा थी पर अब केवल सूर्पनखा ! उसकी रुदन से जंगल की वेदना और सघन हो गयी थी…

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सूर्पनखा का कटा हुआ नाक खून से लथ – पथ ज़मीन पर पड़ा रहा ! धीरे धीरे जंगल की लाल चींटियों ने उसे मिट्टी में मिला दिया ..

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पंक्षियों का कलरव …जल की शीतलता…मंद मंद हवा…आकाश का प्रकाश… मायावी ने बहुत धीरे धीरे महीन जाल बिछाया था ! पाँचों इन्द्री सब टटोल ही रहीं थी और मन सुनहरे हिरण के पीछे भाग चला…

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आप चाहे जंगल में ही क्यों न हों… सुनहरी चीज़ मन मोहती है ! …वो तो जीता जागता हिरण था !

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ज़मीन को चीरती हुई कोई नुकीली सी चीज जब दल की ओर बढ़ी तो चारो तरफ अफरा तफरी मच गयी ! हल के फ़ाल की तरह वो जमी मिटटी को खोदती हुई आगे बढ़ गयी ! समतल ज़मीन पर अचानक अब एक खाई सी बन गयी थी और दोनों तरफ भुरभुरी मिटटी की एक छोटी सी पहाड़ी श्रृंखला ! दल बिखर गया ! फल के छोटे छोटे कण बिखर गए ! कुछ तो मिटटी में भी मिल गए ! कई चींटियों के हाथ पाँव मिटटी में दब गए थे ! सब इतनी जल्दी जल्दी हुआ की चींटियों को समझ में ही नहीं आया ! मिश्रीकंद के कण के साथ चींटियों का पूरा दल पंक्तिबद्ध चल रहा था ! आज बाम्बी में मीठे मिश्रीकंद का भोज होना था ! अभी तक इस ज़मीन पर वो बेफिक्र घूमते थे, यहाँ ऐसा कभी नहीं हुआ था ! लगा किसी ने ज़मीन को चीर दिया था ! थोड़ी देर बाद दल मिल के किसी तरह खुदे हुए ज़मीन को लांघ रहा था ! चीटियों को क्या पता कि लक्ष्मण ने ये लकीर क्यों खींची थी …

*

फल भी, ओस भी, पंखुड़ी भी, पत्ते भी … चाहे जो देना पड़े पर वो किसी साधू को खाली हाथ नहीं लौटने देती …सब ये जानते थे और वो भी.

*
आसमान कंटीला क्यों है ? आज हवा में ये धार कैसा ? सूरज घने बादल से निकल क्यों नहीं रहे ? ये कैसे भंवर उठ रहे है ? जटायु यही सब सोच के वेग से निकले… साएँ…साएँ …

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अपने कटे हुए चौड़े पंख से दूर निस्तेज पड़े खून से लथ – पथ जटायु ज़मीन पर कराह रहे थे … सब याद आ रहा था ! बचपन की बात है ! उड़ने की कोशिश में खोह से सीधे ज़मीन पर गिर गए थे जटायु ! पाँखों में चोट आ गयी थी, वो हिल नहीं पा रहे थे ! लाल चीटियों का एक विशाल झुण्ड घेरने लगा था शिशु जटायु को ! आँख बंद कर के जटायु ने अपनी माँ को याद किया ! माता भी जटायु को ढूंढ रही थी ! एक पल में आसमान को चीरते हुए माता आ गयीं और मज़बूत पंजों ने जटायु को फिर से पहाड़ी की चोटी पर खोह में पहुंचा दिया था … आँख बंद हुई जा रही थीं और पांख शिथिल थे ! गर्म लहू गर्दन से होकर चेहरे पर फ़ैल गया था ! आँख उठा कर जब जटायु ने आकाश की ओर देखा तो लगा माता को कोई लिए जा रहा है … जटायु उन्हें बचा नहीं पाये …खून और बेबसी के आँसू से जटायु का चेहरा लाल हो गया था … काले बादलों ने आसमान को ढक लिया … लाल चीटियों के विशाल फ़ौज की पहली पंक्ति कटे पांख की और बढ़ चले थे …जटायु को मांस भक्षी लाल चीटियों से एक लड़ाई और लड़नी थी, उसे ज़िंदा रहना था

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उन्होंने जब उसे अपने हाथ में उठा कर गोद में रखा तो उस एक पल के लिए उसने अपनी आँखें मूँद ली ! लगा किसी ने पीठ पर से जन्म जन्म का बोझ उतार दिया हो ! उँगलियों का स्पर्श होता ही है ऐसा ! वो सहसा उछली ! उफ़ ये सिहरन है या उँगलियों के निशान की तीन धारी …! गिलहरी की पीठ अब तक सिहर रही है !

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वो सरसराता हुआ तेजी से उनके पैर से लिपट गया और नेवले की ओर फ़न कर के फुफकारने लगा ! उसकी साँसे धौंकनी की तरह चल रही थी … उसे इसकी भनक भी नहीं लगी की वो किसी जीवित मनुष्य के पाँव से लिपटा है ! नेवला के मुंह खून लग चूका था ! वो खीं खीं कर रहा था और अपने दाँत कीटकिटा कर नाग पर आखरी दाव की तैयारी कर रहा था ! नाग डर और क्रोध से धू धू कर के जल रहा था ! उसके फुफकार में ज्वाला थी ! नेवला का मन नाग पढ़ चूका था ! अगर उसने आखरी हमला सटीक नहीं किया तो जान जा सकती थी ! हवा में विष फ़ैल चूका था ! रामचंद्र जी शिला खंड पर बैठे मंद मंद वायु को अपने फेफरों में खींच खींच कर भर रहे थे ! तभी उनको लगा उनके पाँव एक गर्म और ठंढी रस्सी से कोई बाँध रहा है ! उन्होंने बड़ी सतर्क निगाह से सब देखा ! सामने जीवन का विसात बिछा था ! जंगल का ये क्षण लगा उनके किसी मूक सहमती की प्रतीक्षा में मौन होकर ठिठक गया है ! नेवला ने अपने पूरी शक्ति से उछल कर नाग का गर्दन दांत से दबोचना चाहा पर नाग ने भी पूरे वेग से अपने कंठ की शक्ति लगा के विष की पोटली से सबसे ज्यादा ज़हर दांतों में भर लिया ! दोनों तरफ आर या पार का दाव था … नाग का फन और नेवला दोनों हवा में थे … सहसा एक हाथ ने नाग को नेवले की सीध से खींच लिया ! नेवला मुंह के बल धाराशाही हो गया ! नाग के फन से पिचकारी की तरह नीला विष अनायास हवा में लहरा गया ! ‘हे भगवान्’ अपने मुंह पर से विष पोंछते हुए बुदबुदा रहे थे श्री राम !

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रौशनी का प्रकाश बिम्ब जो पर्न कुटिया में ज़मीन पर आसमान से धँसा जा रहा था सीता का ध्यान अपनी और खींच रहा था ! पिघले सोने की मोटी सी एक पीली सुनहरी गोल धार छत से धरती पर धंसी जा रही थी ! रौशनी की धार में कण चमक रहे थे … अनगिनत अदृश्य कण ! कण कण में मानो ये उनका ही संदेश बिम्ब था जो रावण के वाटिका के एक अँधेरे बंद कुटिया में सेंध मार चूका था ! लंका की किसी वाटिका में कैद अकेली सीता रौशनी के वृत्त को देख रही थी ! मन जहाँ पिघलता है वहीँ फ़ैल जाता है …

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आज किस घाट लगी है देह की नॉव ? सुनहरी किरणों पर बिठा कर कौन रौशनी की नदी पार करा रहा है ? इतने सालों बाद केवट नही भूल पाता है वो क्षण जब उसने उनके दोनों पाँव पखारे थे और अपने नॉव से नदी पार कराया था … आह ! आज फिर से उसने उन चरणो पर अपनी आखरी सांस रख दी है …

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‘लंका’ त्यागने के लिए हर घड़ी शुभ घड़ी है…

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वो उड़ चले ! उनकी चौड़ी भुजा पर दोनों भाई लहरा रहे थे ! ये सबसे जरुरी काम था जो वो कर रहे थे ! नीचे असंख्य वानर सेना के हर्ष के चीत्कार से वातावरण गूँज रहा था ! उनके बलशाली कन्धों पर बैठे राम शोर में सिर्फ अपने पाँव से उनकी छाती की उल्लास भरी धड़कन महसूस कर रहे थे …धक्… धक्… धक्… नीचे धरती छोटी हो रही थी … नमन की गूँज अन्तरिक्ष में तैर रहा था ! भक्त और भगवान् को नमन ! नमन !! नमन !!!

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वो कुटिया वहीँ थी ! वन के बनस्पतियों ने उस पर अपना डेरा डाल लिया था ! आते जाते मौसम ने वो रेखा भी मिटा दिया था जो वहां खींची गयी थी ! अयोध्या लौटते हुए पुष्पक विमान से सीता देख रही थी और सोच रही थीं क्या मायावी था वो …

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चौदह दिन में चाँद चढ़ जाता और चौदह दिन में ही फिर घट जाता … चौदह साल तक ये चलता रहा … फिर वो घर लौट आए ! उर्मिला ने उम्र भर फिर कभी अपनी नज़र उन पर से हटाई नहीं…

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पग पग पर दीप जल रहा था ! नगर रौशनी में डूबा था ! पुष्पक विमान पर से अयोध्या नगर हीरे का ढेर लग रहा था ! पुष्पक के उतरते ही लोगों ने उन्हें घेर लिया ! गोद के शिशु अब तरुण हो चुके थे ! एक युग से ज्यादा का अंतराल हो चूका था ! अयोध्या की भूमि पर बहुत कुछ बीत चूका था ! राम को पिता की याद आ गयी और वो मौन हो गए … एक अंजुली अन्धकार राम को अपने ही अन्दर लग रहा था … किसी ने देखा हो या नहीं पर राम ने देखा हर दिए तले अँधेरा था … राम के अंदर एक बिजली कौंध गयी और वो ये सोचने लगे ये शाश्वत अन्धकार मनुष्य के अंदर से कैसे मिटेगा ? वो इतने अन्धकार से कैसे लड़ेंगे ? वो मौन हो कर खिड़की से देखने लगे ! नगर में असंख्य दीप जले थे …

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अन्ना की अंतड़ी बोल रही है

अन्ना की अंतड़ी बोल रही है
गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र

देश की गठरी खोल रही है
गुड – गुड, गुड – गुड, गुड – गुड, गुड – गुड

अंजर – पंजर, जंतर – मंतर
अंदर – अंदर, अंदर – अंदर
जंतर – मंतर, जंतर – मंतर
बाहर – बाहर, बाहर – बाहर
अंजर – पंजर, जंतर – मंतर

अनशन – फंक्शन , अनशन – फंक्शन
अनशन – फंक्शन , अनशन – फंक्शन

अन्ना की अंतड़ी बोल रही है
गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र
देश की गठरी खोल रही है
गुड – गुड, गुड – गुड, गुड – गुड, गुड – गुड

किल – बिल, किल – बिल,
बिल – बिल, बिल – बिल,
टिम – टीम, टिम – टीम,
टीम – टीम, टीम – टीम,

जा – जा, जा – जा,
बाबा – बाबा, बाबा – बाबा

आ – जा, आ – जा,
वाह – वाह, वाह – वाह,
बा – बा, बा – बा, बा -बा, बा -बा

टोपी – सीधी, टोपी – सीधी,
सिद्धि – सिद्धि, टोपी – सिद्धि,

अन्ना की अंतड़ी बोल रही है
गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र ,
देश की गठरी खोल रही है
गुड – गुड, गुड – गुड,

जन का राजी, जनता राजी – जन का राजी, जनता राजी
अन्न ना – अन्न ना, अन्न ना – अन्न ना

कर अन्न – सन्न, कर अप – सन्न, कर संसोधन – कर संसोधन
ठन – ठन, ठन – ठन, ठन – ठन, ठन – ठन
अन्न – सन्न, अन्न – सन्न, अन्न – सन्न, अन्न – सन्न
कर अप – सन्न, कर अप – सन्न,
अन्न – संसोधन, सन्न – संसोधन,
ठन – ठन, ठन – ठन, ठन – ठन, ठन – ठन

अन्ना की अंतड़ी बोल रही है
गर्र – गुर्र , गर्र – गुर्र ,

देश की गठरी खोल रही है
गुड – गुड, गुड – गुड

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कट टू –

जितना वक़्त ‘कट टु -‘ पढने में लगता है
उतना ही वक़्त ब्रह्माण्ड को छालांगने में
भूखे का पेट भरने में
लड़की को नंगा करने में
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाने में
अंडे को चूजा बनाने में
भाप को फिर से पानी बनाने में
और
आदम हव्वा को सेब खाने में लगता है…!

कट टू –
बच्चा !

और बच्चे को सीधा
माँ के नौ महीने के गर्भ संसार,
ममता की छाँव से निकाल कर
एक ही कट में
चक्रव्यूह के आखरी दरवाजे पर पटक देता है –
‘कट टू -‘

घोसले में सांप घुस जाता है
मछली अंगूठी खा जाती है
घर बस जाता है
सत्ता बँट जाती है
दुश्मन मर जाता है
सूरज उगता है
बिछड़े भाई मिल जाते हैं
पिंजरा टूट जाता है
पंछी लौट आते हैं
परदे पर संसार रच देते हैं ये दो शब्द

कट टू –
इश्वर के वो दो हाथ हैं
जिनको अकसर हम भूल जाते हैं !