प्रिंटिंग मिस्टेक

मीटू क्या लिखता है वाह ! एक अधेड़ आदमी ने ‘खोल दो’ कहानी पढ़ने के बाद मुझसे कहा ! मी टू ? कौन मी टू ? मैं हैरत में था ! मेरी हैरत से वो और बौखला गए ! तुम मीटू को नहीं जानते ? मीटू बदनाम है लेकिन लिखता बहुत अच्छा है ! मीटू जब लिखने बैठता है तब वो औरत – मर्द के रिश्तों की उन परतों को उघाड़ने लगता है जहां से पूरा समाज ही नंगा दिखने लगता है ! इतने बड़े लेखक को नहीं जानते जिसने ‘खोल दो’ लिखा ? तुम जानते नहीं ‘मीटू’ की औरतें बोलने लगी हैं ? उन्होंने मुझसे ये बात अपनी डबडबाई आँखों से देखते हुए कही और कहानी दिखाया ! मैंने देखा कहानी में प्रिंटिंग मिस्टेक से मंटो मीटू हो गए थे ! मैं समझ गया ! मंटो को भाईसाहब मी टू कह रहे थे ! मंटो को एक और पाठक मिल गया है और मरने के तिरसठ साल बाद भी मंटो प्रिंटिंग मिस्टेक से ‘मीटू ‘ बनकर औरत के यौन अधिकार के मुहीम में ज़िंदा हो उठा है ! मैं स्तब्ध था ! 

सआदत हसन मंटो की कहानी ‘टोबा टेकसिंह’ की हास्यानुकृति

टोबा टेक सिंह 1947 से तौबा एक दिन 2047 तक

 ‘टोबा टेकसिंह’ 

बंटवारे के सौ साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि कैदियों और पागलों की तरह मंदिर मस्जिद का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मस्जिद हिन्दुस्तान में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाय और जो मंदिर और गुरुद्वारे पाकिस्तान में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाय !

मालूम नहीं, यह बात माक़ूल थी या गै़र माकूल़, बहरहाल दानिशमंदों के फ़ैसले के मुताबिक़ इधर -उधर ऊँची सतह की कान्फ़ेंस हुई ! कमेटियों, उपकमेटियों और मंत्रीय-स्तर के वार्तालापों के बाद आख़िर एक दिन मंदिर और मस्जिदों के तबादले के लिए मुक़र्रर हो ही गया !

अच्छी तरह छानबीन की गई ! वे मस्जिद जिनके मौलवी और संबंधी हिंदुस्तान ही में थे, वहीं रहने दिए गए, बाक़ी जो बचे, उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया ! पाकिस्तान से चूंकि करीब – करीब तमाम हिन्दु, सिख जा चुके थे इसलिए मंदिर और गुरुद्वारे को रखने – रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ ! हिन्दू – सिख के जितने बचे हुए मंदिर – गुरुद्वारे थे सबके सब पुलिस की हिफाजत में बॉर्डर पर पहुंचा दिये गये !

उधर का मालूम नहीं लेकिन इधर लाहौर के मस्जिदों में जब इस तबादले की ख़बर पहुँची तो बड़ी दिलचस्प गपशप होने लगी !

एक मुसलमान जो बारह बरस से, हर रोज़, बाक़ायदगी के साथ ‘ज़मींदार’ पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा, ” मौलवी साब, यह मंदिर क्या होता है ? ” तो उसने बड़े गौरो – फ़िक्र के बाद जवाब दिया, ” हिंदुस्तान में एक ऐसी जगह है जहाँ उस्तरे बनते हैं ! ” यह जवाब सुनकर उसका दोस्त संतुष्ट हो गया !

इसी तरह एक सिख गुरुद्वारे ने एक दूसरे सिख गुरुद्वारे से पूछा, ” सरदार जी, हमें हिंदुस्तान क्यों भेजा जा रहा है, हमें तो वहाँ की बोली नहीं आती ! ” दूसरा मुस्कराया, ” मुझे तो हिन्दुस्तानियों की बोली आती है, हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिरते हैं ! “

मंदिर मस्जिद के तबादले के फैसले पर एक मस्जिद ने ‘ पाकिस्तान जिन्दाबाद ‘ का नारा इस जोर से बुलन्द किया कि अपनी गूँज से ही ढह गया !

यहाँ सौ साल बाद भी बाज़ मस्जिद ऐसे थे जो मस्जिद नहीं थे, उनमें बहुतायत ऐसे क़ातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफ़सरों को कुछ दे दिलाकर मस्जिदों में रखवा दिया था कि वह फाँसी के फंदे से बच जाएँ ! कुछ मस्जिद समझते थे कि हिंदुस्तान क्यों तक़्सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन सही वाक़िआत से वह भी बेख़बर थे, अख़बारों से उन्हें कुछ पता नहीं चलता था और बॉर्डर के पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे, जिनकी गुफ़्तगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे ! उनको सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्नाह है जिसको क़ायदे – आज़म कहते हैं, उसने मुसलमानी के लिए एक अलहदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है, यह कहाँ हैं, इसकी भौगोलिक स्थिति क्या है, इसके मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जानते थे ! यही वजह है कि वह सब मस्जिद जिनका दिमाग पूरी तरह बिगड़ा हुआ नहीं था, इस मखमसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में हैं या हिंदुस्तान में, अगर हिंदुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहाँ हैं, अगर वह पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह कुछ अर्से पहले यहीं रहते हुए हिंदुस्तान में थे !

एक मौलवी तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान, पाकिस्तान और हिंदुस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज़्यादा मौलवी हो गया ! झाडू देते – देते वह एक दिन दरख्त़ पर चढ़ गया और टहनी पर बैठकर दो घंटे मुसलसल तक़रीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी, सिपाहियों ने जब उसे नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया ! जब उसे डराया – धमकाया गया तो उसने कहा, ” मैं हिंदुस्तान में रहना चाहता हूँ न पाकिस्तान में, मैं इस दरख़्त पर रहूँगा ” बड़ी देर के बाद जब उसका दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिंदू – सिख दोस्तों से गले मिल – मिलकर रोने लगा – इस ख़याल से उसका दिल भर आया था कि वह उसे छोड़कर हिंदुस्तान चले जाएँगे !

मस्जिद में एक मौलवी ऐसा भी था जो खुद़ को ख़ुदा कहता था ! उससे जब एक रोज़ बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में हैं या हिंदुस्तान में तो उसने हस्बे – आदत कहकहा लगाया और कहा, ” वह पाकिस्तान में हैं न हिंदुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म ही नहीं दिया ! “

बिशन सिंह ने उस ख़ुदा से कई मर्तबा बड़ी मिन्नत – समाजत से कहा कि वह हुक़्म दे दें ताकि झंझट ख़त्म हो, मगर ख़ुदा बहुत मसरूफ़ था, इसलिए कि उसे और बे – शुमार हुक़्म देने थे !

तबादले की तैयारियाँ मुकम्मल हो चुकी थीं, इधर से उधर और उधर से इधर आनेवाले मंदिरों और मस्जिदों की फ़ेहरिस्तें पहुँच चुकी थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था !

सख्त़ सर्दियाँ थीं जब लाहौर से हिंदू – सिख गुरुद्वारों और मंदिरों से भरी हुई लारियाँ पुलिस के रक्षक दस्ते के साथ रवाना हुई, संबंधित अफ़सर भी हमराह थे ! वागह के बॉर्डर पर दोनों तरफ़ के सुपरिटेंडेंट एक – दूसरे से मिले और प्रारंभिक कार्रवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया, जो रात – भर जारी रहा !

मंदिर और मस्जिदों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था ! यह सब करते हुए कोई गालियाँ बक रहा था, कोई गा रहा था क़ुछ आपस में झगड़ रहे थे क़ुछ रो रहे थे , कुछ बिलख रहे थे ! कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी ! औरतों का शोर – शराबा अलग था, और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दाँत से दाँत बज रहे थे !

मंदिर मस्जिदों की अक्सरीयत इस तबादले के हक़ में नहीं थी, इसलिए कि उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें अपनी जगह से उखाड़कर कहाँ फेंका जा रहा है, वह चंद जो कुछ सोच – समझ सकते थे, ‘पाकिस्तान : जिंदाबाद’ और ‘पाकिस्तान : मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे, दो – तीन मर्तबा फ़साद होते – होते बचा, क्योंकि बाज मुसलमानों और सिखों को यह नारे सुनकर तैश आ गया था !

बॉर्डर पर पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के मंदिरों की झलकियां देखने के लिए दुनिया भर के मानवाधिकार संगठन इस अदला – बदली पर नज़र गड़ाए थी ! हिंदुस्तान से निकली मस्जिदों में सिर्फ एक तोड़ी गयी थी बाकी सब बुलंद थे !

कराची हिंदू पंचायत जब मंदिरों के खंडहरों को संभाले ट्रक से उतरी तो मंदिरों की हालत देख कर सब दंग रह गए ! सभी मंदिरों का हाल बुरा था ! सभी मंदिर पाकिस्तान सरकार की उपेक्षा का शिकार हो गए थे ! सभी मंदिरों की हालत खस्ता थी, सब जर्जर हो चुके थे !

15 अगस्त को पाकिस्तान में 15 प्रतिशत हिंदू रह गए थे जो अब 1.5 रह गए हैं ! पिछले कुछ वर्षों में लाहौर जैसी जगह पर एक हज़ार से अधिक मंदिर ख़त्म कर दिए गए थे ! ट्रकों में सिर्फ ईंट – पत्थर भरा था ! छोटी दुकानों में धंसा रावलपिंडी का एक मंदिर केवल अपने एक बचे हुए मीनार के कारण अब भी सांसें ले रहा था ! अंदर देवताओं की जगह चावल, दाल और चीनी ने ले लिया था !

जिन मंदिरों में पचास साल से कोई पूजा अर्चना नहीं हुई वे ट्रक से उतरने को तैयार नहीं थे ! उन्हें बहुत समझाया गया कि देखो, अब देवी – देवता हिंदुस्तान में चले गए हैं और अगर नहीं गए हैं तो उन्हें फ़ौरन वहाँ भेज दिया जाएगा ! बचे हुए मंदिर चूंकि बे-ज़रर थे, इसलिए उससे मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई ; उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया, और तबादले का बाक़ी काम होता रहा !

जो किसी की भूमि नहीं थी वहां सबने रात में किसी को खड़ा देखा ! सब जानते हैं हिन्दुस्तान पाकिस्तान के बॉर्डर के बीच टोबा टेक सिंह का रहने वाला बिशन सिंह रहता है ! बिशन सिंह ने अकेले रात भर बॉर्डर के बीच अल्लाह – ईश्वर को अपना दुःख सुना कर रोके रखा ! सूरज निकलने से पहले बिना हिले डुले खड़े बिशन सिंह के हलक़ से एक गगनभेदी चीख़ निकली ! इधर – उधर से कई दौड़े आए और उन्होने देखा कि मंदिर मस्जिद जो सौ बरस से दिन – रात दोनों देशों में खड़े थे, अब वे सब नो मेंस लैंड में औंधे मुँह पड़े थे ! ईंट – पत्थर एक हो गए थे ! दोनों देशों के बीच सौ बरस और कई बम विस्फोटों के बाद आज दुश्मन देश के ख़ुदा बिशन सिंह के दुःख की वजह से एक दुसरे से मिटटी में मिल रहे थे ! उधर कंटीली तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान, दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, वहाँ मंदिर – मस्जिद पड़े थे !

‘ औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट ! ‘ आज सौ साल बाद मंटो के टोबा टेक सिंह के बिशन सिंह की बड़बड़ाहटें सिर्फ सोशल साइट्स के अपडेट्स हैं !

PS – पाकिस्तान में सबसे ज़्यादा बिकने वाले उर्दू अख़बार ‘जंग’ ने मेरी इस पैरोडी को छापने की इजाज़त मांगी है, मैंने मंटो तक बात पहुंचा दी है वही इस कहानी के मालिक हैं !